मेरी दक्षिण अफ्रीका यात्रा, भाग-4
जोहान्सबर्ग से डरबन- जोहान्सबर्ग से बाई रोड कार से हम डरबन पहुंचे। जोहान्सबर्ग उंचाई पर बसा दक्षिण अफ्रीका का महानगर है और डरबन समुद्रतट पर। जोहान्सबर्ग से नीचे उतर कर डरबन जाते हुए वैनरीनेंस पास से गुजरते हुए प्रकृति के शानदार नजारे दिखाई देते हैं। जब जोहान्सवर्ग से लगभग 290 कि0मी0 पर दक्षिण अफ्रीका के प्रान्त क्वाजा नटाल मे प्रवेश करते है तब यह पास हैरीस्मिथ से शुरु होकर वेनरीनेंस तक पर्वतों के बीच से गुजरते हुए अपने अद््भुत नजारों से आपको सम्मोहित करता रहता है। हमंे जोहान्सबर्ग की स्थानीय निवासिनी श्रीमती शिवा के सौजन्य से उनकी यहूदी सह अध्यापिका का फ्लैट मिल गया डरबन मे रहने के लिए। तड़कती बिजलियों और बारिश की फुहारों के बीच हम रात्रि 8.00 बजे जी0पी0एस0 महोदय के सहयोग से बहुमंजलीय आवास मे पहुंचे । बुुर्जुग श्वेत केयर टेकर महोदय ने हमारा स्वागत किया और फ्लैट के सम्बन्ध मे सारी जानकारी विस्तार से देते हुए हमारी सुखद यात्रा की कामना किया। बुर्जुग केयरटेकर करीब 80 साल के रहे होगें लेकिन कमर झुकी होने के बावजूद उनकी सक्रियता से हम आश्चर्यचकित थे। फ्लैट बेहद साफ सुथरा था और अपने बुर्जुग मालिकान की स्मृतियों को अपनी दीवालों पर संजोए हुए था, इसके मालिक की बनाई पेंण्टिंग्स दीवालोे पर टंगी हुई नवागंतुकों को निहार रहीं थीं। 7वीं मजिल की बड़ी-बड़ी बालकनियों से रोशनियों मे चमकता डरबन महानगर और उसके किनारे फैले हिन्द महासागर के तट पर झिलमिलाती रोशनियां हमे मंत्रमुग्ध कर रहीं थी। जैसा कि इस देश का रिवाज है उसी का अनुसरण करते हुए हम जल्दी सो गए और सुबह जल्दी ही उठकर समुद्रतट के किनारे पहुंच गए।
सामनें नीला हिन्द महासागर था, इस अपरिचित महाद्वीप की भूमि पर खड़े होकर अपने परिचित महासागर को निहारने का सुख अद्भुत था, वैसे ही जैसे बहुत दिनों बाद अपने गांव जाने वाली सड़क दिख जाने पर लगता है या कहीं दूर से लौटने पर अपने घर की खिड़की से आ रही रोशनी को देखकर लगता है। इतनी सुबह पहुंचने पर भी हमे लगा कि हमे कुुछ देर हो गयी है। तट के किनारे निवासियोें की जलक्रीड़ा देखकर धीरे-धीरे पानी से दूर रहने की मेरी हिचक खत्म हुई। मैं उत्तर भारत में जनवरी की कड़ाकेदार ठंड को झेलकर यहां के खुशगवार मौसम मे पहुंचा था लेकिन शरीर के भीतर घुसी ठंड अभी भी पानी से डरा रही थी।
काफी लम्बे, साफ-सुथरे समुद्रतट के किनारे खूबसूरत टाइल्स से बने फुटपाथ पर उस दिन मैराथन दौड़ थी, थोड़ी देर मे देखता हूं कि हजारो श्वेत, अश्वेत, एशियाई, युवा, बुर्जुग, बच्चे, पुरुष, स्त्री, विकलांग लोगों को हुजूम दौड़ रहा है और केवल जूतो की आवाज ही सुनाई दे रही है। समुद्रतट के किनारे रंगविरंगे टी-शर्ट और टोपियों को दौड़ते देखकर लग रहा था कि जैसे हजारो तितलियों का समूह एक अनुशासनबद्ध उड़ान भर रहा है। किनारे समुद्र की हिलोरों के आमंत्रण को हम देर तक अवाएड नही कर पाए और पानी मे कूद पड़े। पानी मे घुसते ही सारी हिचक वैसे ही काफूर हो गयी जैसे किसी शिशु का किसी अनजान वत्सला स्त्री की गोद मे पहुंचने पर दूर होती है, अब हमे समुद्र अपनी गोद मे उछाल रहा था और हमारी शिशुवत किलकारियां गूंज रही थी।
डरबन- जोहान्सबर्ग से लगभग 500 कि0मी0 दूरी पर हिन्द महासागर के किनारे बसा दक्षिण अफ्रीका का एक बेहद खूबसूरत शहर है। भारतीय ब्यापारी, मजदूर इसी किनारे उतर कर सदियों से इस महाद्वीप मे समाते चले गए। इसीलिए यहां पर भारतवंशी अच्छी संख्या मे सड़को पर दिखते हैं। कहीं-कहीं पर तो इनकी बस्तियां लघु भारत होने का भ्रम देती हैं। डरबन और भारत का रिश्ता सदियो पुराना रहा है, इसकी खाड़ी मे क्रिसमस के समय 1497 मे पहंुचे थे वास्को डि गामा। महान जूलू राजा शाका और हेनरी के समझौते मे इसको व्यापार केन्द्र के रुप मे विकसित किया गया और केप के गर्वनर सर बेंजामिन डरबन के नाम पर इस बस्ती का नाम डरबन रखा गया। शुरु मे इसको पोर्ट नाटाल नाम दिया गया था। डरबन मे 16 नवम्बर 1860 को पहले 342 गिरमिटिया भारतीय उतरे थे फिर 26 नवम्बर, 1860 को गिरमिटिया मजदूरों का दूसरा जत्था इस खाड़ी मे उतरा था। 1860 से 1911 तक लगभग 15184 भारतीय गन्ने की खेती के लिए डरबन मे लाए गए थे। डरबन मे भारतीयो ने व्यापार मे अश्वेतों से सहज रिश्ते बना कर शीघ्र ही श्वेत व्यापारियों के माथे पर बल डाल दिए और यही चलकर आगे भारतीयों के आगमन पर प्रतिबंध का कारण बना। अधिकांश भारतीय चेस्टवर्थ मे रहते हैं। भारतीय बच्चों के लिए रोमन कैथोलिक चर्च ने 1867 मे पहला भारतीय स्कूल खोला और 1909 तक 35 भारतीय स्कूल खोले गए थे।
डरबन के समुद्रतट- हिन्द महासागर के किनारे पर बसा यह महानगर अपने शानदार समुद्र तटों पर इतराता रहता है क्योंकि इन समुद्र तटों के किनारे इसके निवासी लगातार खेलते रहते हैं। इस महानगर के किनारे दूर-दूर तक छोटे-छोटे तटों पर सुन्दर स्नानागारों मे प्रकृति का आनन्द मे डूबे निवासियों को देखकर आप विभोर हो उठेगें। मुख्य नगर के किनारे के समुद्रतटों के अतिरिक्त नगर के बाहरी हिस्सों मे स्थित समुद्रतटों के समानान्तर तरणताल भी बने हुए हैं और नगरवासी इच्छानुसार समुद्रतट और तरणतालों का देर रात तक आनन्द लेते रहते हैं।
डरबन के म्यूजियम- डरबन मे डरबन लोकल हिस्ट्री म्यूजियम, ओल्ड हाउस म्यूजियम, ओल्ड कोर्ट हाउस म्यूजियम, पोर्ट नेटाल मेरीटाइम म्यूजियम हमने देखा। इन म्यूजियमों मे दक्षिण अफ्रीका का उपनिवेशकालीन इतिहास दर्ज है। ओल्ड हाउस म्यूजियम नेटाल प्रान्त के प्रथम उपनिवेशकालीन प्रधानमंत्री के घर को यथावत बनाकर रखा गया है। जब हम पहंुचे तो म्यूजियम की मरम्मत शुरु होने के कारण उसको बन्द करके तिरपाल से ढका जा चुका था। सुदूर भारत से आने और फिर कभी देखपाने का अवसर न मिल पाने की सम्भावना जब हमने दर्शायी तो आयोजकों ने हमे 5 मिनट के लिए अन्दर प्रवेश करके म्यूजियम देखने की अनुमति खुशी-खुशी दे दी गयी। इन म्यूजियमों के माध्यम से आप न केवल दक्षिण अफ्रीका का अतीत जान सकते है वरन इन म्यूजियमों मे जीवन के विकास क्रम को समझाने, मानव जाति के विकास क्रम को भी जान सकते हैं।






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