का कइलन बाऊ ?
जिनको संयुक्त परिवारों का सुख और हश्र पता है, वो ऐसे सवालो पर चैंकते नही हैं अपितु समय की महिमा को स्वीकार करते हुए पी जाने का अभ्यास कर लेते हैं ।
जब आंगन मे उठती दीवालें सवाल करने लगती हैं, चूल्हे मे दरार और भाई पट्टीदार बनते हैं तों तोहमतो के ऐसे ही सिलसिले उठते हैं ।
सरकारी स्कूल की फीस कई महीनो पर किसी तरह जमा कर पाने की विवशता और कहने पर भी बच्चों को ट्यूशन नही करा पाने की मजबूरियां पिछली पीढ़ी की अर्कमण्यता समझी जाती हैं।
थकता मिजाज और बूढ़ा होता शरीर नयी कोपलो के रोज बदलते स्कूल परिधानो और टिफिन के मैगी नूडल्स को देखकर अपराधबोध से भर उठता है कि वे अपने बच्चो को ऐसा सुख नही दे पाए और उनकी तोहमतो को जाने-अनजाने मे स्वीकार करने लगते हंै।
ऐसे मे शायद ही कभी याद आता है कि कैसे अपने पालितो की नौकरियों के लिए जिसतिस के दरवाजे पर उन्होने मत्थे टेके थे, कैसे पढ़ाकू बच्चे लिए उन्होने अपनी जरुरतो को नगण्य बना दिया और कैसे उन्होने उनके सपनों के लिए अपने गांव, समाज और भाइयों से दगा किया था ।
अपनी पीढ़ी के रिश्तो मे सूखती नमी और नौजवान पीढ़ी के रिश्तो मे पनपती गर्मी के बीच उनको पता ही नही चलता कि जिसको उन्होने पाला पोसा उनके लिए वे अप्रासंगिक हो गए ।
ऐसे ही जब 60 साल मे क्या हुआ ? जैसे व्यंग जब आभाषी दुनिया मे तैरते हैं, तो होटलनुमा कालेजो से निकलते युवा और सोशल साइटों की चिप्पियो से देश, इतिहास और समाज को जानने का अभिमान पाले लोगों के तंज जाने-अनजाने स्वीकार होने लगते हैं।
तब याद नही आता है कि सरकारी योजनाओं की लूट और सुविधा पर पनपी यह पीढ़ी विगत की असफलताओ को गिनाते हुए उन्ही बुनियादों पर हमलावर हो रही है, जिसने उसको तंज करने लायक हैसियत बख्शी है।

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