मेरी प्रकाशित दक्षिण अफ्रीका यात्रा संस्मरण का प्रथम भाग





मानव कुल की जन्मभूमि हैैै अफ्रीका। इसके दक्षिणी हिस्से मे घूमते हुए देखकर लगा कि प्रकृति ने अपनी सर्वश्रेष्ठ कृति को अपनी सर्वोत्तम पृष्ठभूमि मे ही खेलने, बढ़ने और जूझने का अवसर दिया । इस महाद्वीप के किनारे पर उतरते समय काफी भावुक हो उठा था। सेसल्स के माहे द्वीप से उठता जहाज जब एयर टर्बुलेन्स मे हिचकोले लेने लगा तो मैं स्थिति की गम्भीरता को एयर होस्टेस के चेहरे पर दिखने वाले भावों से नाप रहा था, जब उसके चेहरे पर चिन्ता की कुछ लकीरे दिखीं तो मुझे  इस महाद्वीप के महासागर के तुफानो मे फंसे गिरमिटियों की याद आने लगी। लाखो वर्षो के मनुष्यों के संघर्ष मे कितने पानी के जहाज इस महाद्वीप से बाहर निकलने तथा आने की कोशिश मे जल की अथाह गहराइयों मे अपने सपनों के साथ डूब गए होगें। 
तो मैं जिक्र कर रहा था कि महाद्वीप के किनारे उतरते उतरते भावुक हो रहा था। मानव कुल इसी जमीन पर विकसित हुआ और विभिन्न रास्तो से पूरी दुनियां मे फैला, मानवता के इसी विस्तार मे भारत भूमि भी है। हवाई अड्डे पर उतरने के बाद सामान आदि कहां मिलेगा इसीलिए चक्कर लगा रहा था कि दो अश्वेत लोगोेेेे से वो जगह दिखाने की गुजारिश किया और रास्ते मे इसके एवज मे कुछ पैसे चाहे, उनकी विनम्रता देखकर मैने कुछ रुपए दिए और एवज मे उनका जोरदार धन्यवाद पाया।
बाहर निकलते ही चैड़ी सड़कों का जाल एवं उस पर दौड़ती कारों को देखकर मन मे कुछ दरक सा गया कि यह मुल्क तीसरी दुनिया जो कि अपनी दुनिया है उसका हिस्सा नही लग रहा है। चैड़ी सड़के, हाइवे, कारंे अजूबी नही हैं लेकिन महत्वपूर्ण था उसके आसपास का वातावरण । दूर-दूर तक काली चमकती सड़कों पर गन्दगी तो दूर की चीज है एक भी तिनका नही दिखेगा, सड़कों की पटरियों की हरी घास लगता है जैसे करीने से तराशी गई है और टायरों की सरसराहट के अलावा कोई भी आवाज नही सुनाई पड़ी लगता है लोगो की गाड़ियो के हार्न निकलवा दिए गए हों । 
यहां घूमते समय सड़को पर कभी जानवर नही दिखे । जहां पर पालतू जानवरो को सड़को पर आने की सम्भावना है उसके एक-दो कि0मी0दूर से ही इन जानवरो के सड़क पर आने की सम्भावना के संकेत दिखाई देने लगते है, इससे स्पष्ट है कि ऐसा सामान्यतया नही होता है। हजार-पांच सौ कि0मी0 सड़को पर चलने पर भी सड़को पर पालतू जानवर नही दिखे, भले ही इससे सावधान रहने के बोर्ड सड़को पर दिखे। प्रायः राजमार्गो के किनारे फैन्सिंग रहती है, जिसके उस पार आपको बड़े-बड़े फार्मो मे मक्के के लहलहाते खेत और स्वस्थ्य एवं खूबसूरत पालतू गायों का झुंड चरते दिख जाय ।
प्राकृतिक रुप से इतने समृद्ध मुल्क मे अधिकांश अश्वेत आबादी स्लम मे रहने को क्यों अभिशप्त है यहां के समृद्ध बेसिक इन्फ्रास्ट्रक्चर का स्तर देखकर आश्चर्य हो रहा है। हालांकि जिन स्लमो को मैने दूर से देखा उनकी स्थिति मुझे अपने मुल्क के स्लमो से बेहतर दिखी। यहां पर तीसरी दुनिया के मुल्कों की ऐतिहासिक साम्यता दिखी कि ये स्लम इन मुल्कों के अभिजात वर्ग ने उपभोगवादी जीवन शैली के लिए रचे हैं ।
एक महत्वपूर्ण आदत यहां के लोगो मे पायी जाती है कि जब भी दो लोग एक-दूसरे के आमने-सामने होते हैं एक दूसरे की खैरियत अवश्य पूछते हैं, इससे इस मुल्क के दो अनजान नागरिकों मे भी आपस मे एक सकारात्मक संवाद का पुल बन जाता है। हमारे यहां यह ऐच्छिक होता है लेकिन यहां पर जरुरी और महत्वपूर्ण औपचारिकता होती है। आपके कितने भी सम्पन्न या महत्वपूर्ण हों लेकिन बाहर निकलते वक्त चैकीदार वगैरह से जरुरी औपचारिकता अवश्य निभाएं अन्यथा असभ्यों की श्रेणी मे गिने जाएगें ।यह इतना महत्वपूर्ण होता है कि यदि आप किसी से दिन मे कई बार मिलते है तब भी सामने वाले की खैरियत पूछ कर ही अपनी बात कहना सभ्यता का तकाजा है।
जब तक हिरन अपना इतिहास
खुद नही लिखेगें तबतक
हिरनों के इतिहास मे
शिकारियों की शौर्य गाथाएं
गायी जाती रहेंगी।---चिनुआ अचेबे
उपरोक्त कविता इसलिए याद आ रही है क्योंकि यह महत्वपूर्ण है कि इस मुल्क को देखने वाली निगाह की ब्याख्या करने वाला मस्तिष्क अश्वेत, गोरा, एशियायी या किसी अन्य किसी समुदायिक चेतना की निर्मिति से कितना स्वायत्त है। इस महाद्वीप से मनुष्य छोटी-छोटी नदियों की तरह निकले और भू-भाग पर समुद्र की तरह छा गए । उसी जनसमुद्र की कुछ लहरें सहश्त्र्ााब्दियों बाद प्रशान्त और हिन्द महासागर पर सवार होकर वापस लौटीं और उन्होने इस जमीन को अश्वेत रक्त से सरोबार करके जनसांख्यकी को एक नयी रंगत दे दी ।
दक्षिण अफ्रीका का क्षेत्रफल भारत का 37 प्रतिशत है और जनसंख्या भारत का मात्र 4.14 प्रतिशत है। जिसमे 9 प्राविन्सेज और 52 डिस्टिक हैं । पूरा देश 8 मेट्रोपोलिटन शहरों, 44 डिस्टिक म्यूनिसपिलिटीज और 226 लोकल म्यूनिसपिलिटीज मे विभाजित है। हजार-पांच सौ किलोमीटर एक दिन मे कारों से चल लेना सहज है क्योंकि दूर-दूर सभी प्रमुख सड़कें फोरलेन हैं और आपकी कार मे रखा गिलास का पानी जुम्बिस नही करेगा । अगर कैमरे नही लगें हो तो लोग अधिकतम प्राविधानित 120 की रफ्तार को कब पार कर जाएंगे पता नही चलेगा । प्रत्येक पेट्रौल पम्प पर सारी विश्वस्तरीय सुविधाएं उपलव्ध मिलीं चाहे टायलेट हो या खाने-पीने की चीज। पेट्रौल भरने वाला आपकी गाड़ी का विन्डस्क्रीन और साइडस्क्रीन को साफ करके आपकी गाड़ी का हवा-पानी भी चेक करेगा। सैकड़ो किलोमीटर चले जाइए आपको कार का हार्न नही सुनाई देगा । हार्न यहां पर अप्रसन्नता प्रगट करने के लिए बजाया जाता है जबकि अपने यहां तो अनायास खाली सड़कों पर भी लोग प्रेशर हार्न बजाकर आनन्दित होते हैं । अगर आपने ओवरटेक किया है तो पीछे वाले को सम्मान सहित आभार प्रगट करना आपकी सभ्यता का परिचायक होगा । यदि आपकी गाड़ी रास्ते मे खराब हो गयी हो तो आपके पास से गुजरती गाड़ियां स्वयं मदद के लिए तैयार रहती हैं । इसकी पहचान यह होती है कि आपके बगल से गुजरती गाड़ी धीमी हो जाती हैैै और उसका चालक आपसे मदद का संकेत पाने की अपेक्षा करते हैं यदि आपने मदद का इशारा किया तो वे गाड़ी रोककर भरसक आपकी सहायता करते हैं । लोगों द्वारा सहज ढंग से लिफ्ट मांगते देखकर पता चल जाता है कि लिफ्ट लेना एवं देना यहां के सहज ब्यवहार का हिस्सा है। पब्लिक सवारी गाड़ियां हमारे यहां की मिनी बसों की तरह होती है मुझको किसी भी सवारी गाड़ी का सीसा टूटा या गाड़ी पर धूल जमी नही दिखी । लोग बस स्टाप पर लाइन लगाकर ही खड़े मिले । एक चीज उल्लेखनीय है कि भले ही यह देश तीसरी दुनिया का हिस्सा गिना जाता हो लेकिन दूर-दराज मे भी किसी यूरीनल या टायलेट मे गन्दगी नही मिली और प्रायः चालू हालत में फ्लस मिला । जिस तरह सड़को पर मलमूत्र विसर्जन हमारे यहां सामान्य है लेकिन यहां पर कई हजार किलोमीटर चलने पर भी सड़को पर जानवरो का भी मलमूत्र देखने को नही मिला ।
यहां सहज है कि आपके टिकट की जांच करने वाला कोई अश्वेत कर्मचारी किसी संगीत की धुन पर थिरक रहा हो या थिरक रही हो, इस मामले मे श्वेत तथा अश्वेत समुदाय की प्रवृत्तियां लगभग समान हैं । चूंकि श्वेत और अश्वेत समुदाय मे श्रम को हेय नही समझा जाता इसलिए श्रम से जुड़े कार्यो को लेकर विश्वगुरुओं की तरह हीन भावना नही पायी जाती है। मेहनत का सम्मान और दूसरों की तनिक सी असुविधा पर विनीत होकर खेद प्रकट करने के सहज भाव दिखे । तुलनात्मक रुप से अपने समाज मे पाता हूं कि किसी भी संस्थान मे तीन-चार परिश्रमी कार्मिको की तुलना मे एक चापलूस किस्म का कार्मिक अपने मुखिया का ज्यादे पसंदीदा होता है क्योंकि हमारे समाज मे श्रम के सम्मान का आभाव प्रतिपल दिखता है, आत्ममुग्धता मे डूबे विश्वगुरु सिर्फ अपनी निजी सुविधाओं और प्रशंसाओं के आकांक्षी होते हैं ।
प्रतीकों को ही धर्म मानने का पिछड़ापन मुस्लिम समुदाय मे ही ज्यादा दिखता है इसलिए रंग आधारित विभाजन के अतिरिक्त वेशभूषा और खानपान के आधार पर मुस्लिम समुदाय ही अपनी भिन्नता के प्रति आग्रही दिखा अन्यथा बाकी हिन्दू, इसाई, यहूदी और स्थानीय धर्मावलम्बियों की कोई भिन्न पहचान नही दिखी। एक मजेदार वाकया लोगों ने बताया कि हलाल मीट बेचने के चक्कर मे एक दुकान मे सूअर के मांस पर भी हलाल का टैग लगा दिया गया था, जिसका कुछ मुस्लिम धार्मिकों ने विरोध किया तो उसे हटाया गया । 
     कोकाकोला आदि कम्पनियों की साजिश और लगातार प्रचार के चलते यहां पर पीने के लिए श्वेत तथा गरीब अश्वेत समुदाय भी पानी के स्थान पर कोक ही पीता है। यहां के मजदूर वर्ग को भी दुकानों से दुकानो से कोक ढोते देखकर दुख हुआ कि कैसे कम्पनियो ने एक पूरे देश के स्वाद को बदल कर गुलाम बना दिया है। यहां का अश्वेत समुदाय भी घूस के रुप मे गर्मी के बहाने कोक की अपेक्षा करता है। 
भारतीय समुदाय के जितने भी लोगों से मुलाकात हुई उससे बातचीत से आभास हुआ कि अश्वेत समुदाय के प्रति अज्ञात भय से यह समुदाय हमेशा आशंकित रहता है और अपनी गतिविधियों को अपने समुदाय तक ही सीमित रखता है। स्थानीय पुलिस-प्रशासन की कार्य पद्धति से लोग असंतुष्ट दिखे लेकिन भयभीत नही दिखे। 
           दक्षिण अफ्रीका यहां के मूल निवासियों की जीवन्तता, एशियाईमूल के लोगोे के लगन और यूरोपीयमूल के लोगो के दूरगामी समझ से विकसित हो रहा है। तीनो संस्कृतियों का मिलन इस महादेश को मनुष्यता का एक बेहतर मुकाम बना सकता है । भविष्य मे यह विकसित देश बनने की सम्भावना से भरा हुआ है मेरी कामना है कि यह साम्राज्यवादी ताकत और अहंकार से मुक्त समृद्ध निवासियों के देश के रुप मे विकसित हो। पूरे अफ्रीकी महाद्वीप को इस देश के विकसित होने से दूरगामी लाभ होगा। यह सारा कुछ निर्भर होगा एक लोकतांत्रिक, प्रगतिशील और सेक्यूलर नेतृत्व की कई दशाब्दियों की लम्बी परम्परा के अधीन, लेकिन फिलहाल वर्तमान नेतृत्व से यहां के नागरिक निराश हैं। क्रमषः






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