मेरी दक्षिण अफ्रीका यात्रा भाग-5
फीनिक्स सेटलमेन्ट-डरबन के उत्तर-पश्चिम मे महात्मा गांधी द्वारा स्थापित फीनिक्स आश्रम अपने इर्दगिर्द की जुलू आबादी से घिरा हुआ है। आश्रम को जी0पी0एस0 खोज नही पा रहा था तो हमने एक जुलू महिला का सहारा लिया और उसने खुशी-खुशी आश्रम तक पहुंचाया और कुछ रैण्ड का मेहनताना लेकर प्रसन्न हो गयीं । एक अश्वेत अपरिचित महिला को इस तरह से गाड़ी मे बैठाने की चर्चा होने पर विनय के सहकर्मियों ने इसे दुस्साहस कहा और भविष्य मे इससे बचने की सलाह दी, इससे पता चलता है कि भारतीयों और अश्वेत समुदाय के बीच अविश्वास की कितनी गहरी खाई है । इस आश्रम की देखभाल बहुत व्यवस्थित तरीके से हो रही है। परिसर मे लगे फलदार वृक्षों पर लदे फलांे ने सहयात्री श्रीमती शिवा के बचपने को जाग्रत कर दिया और उस परिसर की देखभाल करने वाले की ईमानदारी का भी एहसास हुआ । जूलू आबादी से घिरा परिसर जिस तरह से सुरक्षित और साफ सुथरा है, यह उल्लेखनीय है क्योंकि ऐसे स्थानों पर हमारे जैसे भारतीय ही कभी-कभार आते है। इस स्थल पर आनंे पर हमे टिन की छतो से बने छोटे-छोटे लेकिन साफ-सुथरे मकान और सड़को के किनारे आपस मे सुख-दुख बांटती महिलाएं दिखीं ।
मण्डेला कैप्चर साइट- डरबन से जोहान्सबर्ग लौटते समय हम डरबन से लगभग 100 कि0मी0 दूर मण्डेला कैप्चर साइट देखने पहुंचे । यहां पर मण्डेला को गोरी सरकार ने काफी लम्बी अवधि तक कैद मे रखा था । अब इस जगह को म्युजियम मे बदलने का कार्य चल रहा है। म्यूजिम का मुख्य भवन निर्माणाधीन है, अभी एक अस्थाई भवन मे रंगभेद कालीन अफ्रीका मे अश्वेतों के संघर्ष की चित्र प्रर्दशनी, फिल्मे दिखाई जाती हैं । यह जेल काफी वीराने मे बनायी गयी है, जिसके दूर-दूर तक मानव बस्ती नही दिखी। यहां पर सबसे आर्कषक नेल्सन मण्डेला अनेक लोहे की छड़ों से बनायी गयी विशाल मुखाकृति है, जो एक खास दूरी से देखने पर धीरे-धीरे स्पष्ट होने लगती है। दूर-दूर तक निर्जन पहाड़ियों के बीच बने इस म्यूजियम मे नेल्सन मण्डेला का यह विशाल लौह मूर्ति शिल्प इन निर्जन पहाड़ियों को निहारता हुआ इस महादेश की निगहबानी करता प्रतीत होता है। मण्डेला को इसी जगह पर 5 अगस्त,1962 को रंगभेदी पुलिस द्वारा गिरफ्तार किया गया था, जहां से उनके 27 वर्षो लम्बी कैद की शुरुआत हुई । इस जगह पर गिरफ्तारी की 50वीं वर्षगांठ पर 50 स्टील के खम्भों से यह मूर्तिशिल्प बनाया गया है।
पीटरमेरित्सबर्ग रेलवे स्टेशन- बैरिस्टर गांधी को राजनेता गांधी की दीक्षा इसी रेलवे स्टेशन के प्लेटफार्म पर मिली थी । भारतवंशियों के दक्षिण अफ्रीका के रंगभेद विरोधी आन्दोलन की पृष्ठभूमि तैयार होने मे इस रेलवे स्टेशन का इतना महत्वपूर्ण स्थान है कि भारत से आने वाले अधिकांश अतिमहत्वपूर्ण व्यक्तियो ने प्रायः इस प्लेटफार्म पर खड़े होकर उस क्षण को महसूस करने की कोशिश की है । वर्तमान भारतीय प्रधान मंत्री ने भी दक्षिण अफ्रीका के प्रवास मे इस स्टेशन का भ्रमण किया। इस रेलवे स्टेशन का प्लेटफार्म नं0 1 तथा वो बेन्च सुरक्षित रखे गए हैं, जिस पर बैठकर गांधी ने रात बिताई थी । रेलवे स्टेशन अभी भी प्रयुक्त होता है और स्टेशन पर कुछ यात्री भी प्रतीक्षारत मिले । डरबन से जोहान्सबर्ग तक रेल से लगभग 12 घण्टे का रास्ता बताया गया। यह एक छोटा सा कस्बा है, जो तमाम अफ्रीकी कस्बों की तरह चैड़ी सड़कों और उनकी दोनो तरफ दुकानों से सजा हुआ है। इस कस्बे मे एक गांधी चैक भी है, जिस पर लाठी लिए गांधी की काले पत्थर की खूबसूरत प्रतिमा है।
हजारों साल पुराना वृक्ष-जोहान्सवर्ग से 400 कि0मी0 दूर लिम्पोपो प्रान्त मे बाओबाब वृक्ष के बारे मे बताया गया कि 10000 वर्ष पुराना वृक्ष है। कार्बन डेटिंग के अनुसार यह वृक्ष 1700 वर्ष पुराना पाया गया, इसकी उंचाई 22 मी0 एवं फैलाव कहीं-कहीं पर 47 मी0 है। वृक्ष का तना इतना चैड़ा था कि उसके भीतर एक टेबुल रखी हुई थी और खाली जगह मे पांच-छ लोग खड़े हो सकते है। उसके तने को खोखला करके बनाए बार को देखकर आश्चर्यलगा लगा लेकिन दुख हुआ कि हमारे कौतुक पसन्दगी ने इस बुर्जुग बृक्ष को कितना घायल कर दिया है। इस बुर्जुग बृक्ष की शुरुआती तीन डालियां तीन दिशाओं मे जमीन की टेक लेकर उपर उठी हुई थीं, मानो यह महाबृक्ष अपने भारी शरीर को जमीन की टेक लगाकर खड़ा होने की कोशिश कर रहा है। वृक्ष आम के शानदार बागो के बीच घिरा हुआ था । पके सिन्दूरी आमो को देखकर खरीदनें का मन हुआ, देखभाल करने वाली अफ्रीकी महिला जिसे बोलचाल मे ममा कहते है से अनुरोध करने पर ममा ने मालिक से फोन पर बात करनी चाही लेकिन छुट्टी होने के कारण मालिक द्वारा फोन नही उठाया गया और ममा ने अपने स्तर से आम देने मे असमर्थता व्यक्त की गयी । दक्षिण अफ्रीका मे साप्ताहिक छुट्टी शनिवार और रविवार को होती है और इन दोनो दिनो मे प्रायः लोग अपने व्यावसायिक काम नही करके पार्टी आदि का आनन्द लेते हैं । यदि आप इन दो दिनो के बीच गम्भीर बीमार पड़ गए तो आपका दुर्भाग्य है, आपको बेहतर चिकित्सा सेवा शायद ही मिले । दक्षिण अफ्रीका को चिकित्सा और सार्वजनिक परिवहन के क्षेत्र मे काफी काम करने की जरुरत है।
क्रूगर नेशनल पार्क- क्रूगर नेशनल पार्क का क्षेत्रफल 19485 वर्ग कि0मी0 का अभयारण्य है। इसको अंग्रेज साम्राज्यवादियों द्वारा 1899 से 1926 के मध्य टोंगा जाति के मूल निवासियों को जबरन विस्थापित करके बनाया गया है। इसमे प्रवेश करने एवं निकलने के लिए 09 गेट बने हैं । हमलोगों ने पुण्डा मारिया गेट से प्रवेश करने और फेबियन गेट से बाहर निकलने की योजना बनाई थी, जिसकी दूरी लगभग 400 कि0मी0 है, इस प्रकार हम इस जंगल के दो तिहाई हिस्से लम्बाई को पार करने वाले थे ।
हम लिम्पोपो प्रान्त के बाओबाब वृक्ष से लगभग 2.30 बजे क्रूगर पार्क मे प्रवेश के लिए पुन्डा मारिया गेट। के लिए निकले । पुन्डा मारिया गेट तक पहुंचते पहुंचते अंधेरा हो गया क्योंकि जी0पी0एस0 की महिमा से हमारी गाड़ी कुछ मुख्य रास्तो से अलग रास्तो को पकड़ कर चली । इसका फायदा यह हुआ कि हम अफ्रीका के भीतरी हिस्सो का दर्शन कर पाए जो प्रायः पर्यटक निगाहों से ओझल होता है। रास्ते में अश्वेत समुदाय के लिए निर्माणाधीन और निर्मित हो चुकी कालोनियां दिखीं । प्रत्येक मकान के इर्दगिर्द शाक सब्जी उगाने के लिए पर्याप्त भूमि छोड़ी गयी थी और कालोनी के चारो तरफ तारों की बाड़ बनायी गयी थी । कालोनियां यद्यपि की निर्माणाधीन थी परन्तु बहुत ही साफ-सुथरी थी। दक्षिण अफ्रीका मे घूमते हुए आप पाएगें कि यहां पर ईटें भी पालीथिन मे लपेट कर ही रखी मिलेगी न कि खुली इधर-उधर बिखरी हुई ।
थोड़ा रास्तो के भटकाव के कारण और अपने ठहरनें के ठिकाने के सम्बन्ध मे हुए कन्फ्यूजन के कारण पुण्डा मारिया गेट तक पहुंचने मे रात हो गयी, इस सूनसान गेट तक पहुंचने मे पहली बार हमे बीच सड़क पर खड़ा एक गधा और कुछ दूरी पर खड़ी गाय मिली, जिससे टकराने से हम बाल बाल बचे। अन्धेरे मे गेट के सामने जो चैकीदार मिले उनके द्वारा बताया गया कि सुबह 5.00 बजे से अन्दर प्रवेश मिलेगा । रुकने के ठिकाने के बारे मे उनके द्वारा बताया गया कि लगभग 15 कि0मी0 दूरी पर कोपाकोपा गेस्ट हाउस मे रुका जा सकता है। हमें अन्दाजा था कि पुण्डा मारिया गेट के आसपास कुछ कस्बेनुमा जगह होगी लेकिन रात के अन्धेरे मे 15 कि0मी0 दूरी बहुत लम्बी लग रही थी, क्योंकि रात मे प्रायः मिलने वाले अफ्रीकी नशे मे होगें और अन्जान भिन्न नस्ल के लोगों के साथ तो लूटपाट होने की सम्भावना से यहां के गैर अफ्रीकी समुदाय के लोग काफी डरते हैं । डरने कारण लूटपाट नही, बल्कि लूट के साथ-साथ हत्या कर दिया जाना यहां के नशे मे चूर अपराधियों के लिए असामान्य नही होता है।
रात मे कोपा-कोपा गेस्ट हाउस पहुंचने पर वह गेस्ट हाउस भी जंगल का ही एक हिस्सा लग रहा था क्योंकि एक तो गेस्ट हाउस कई एकड़ मे बाग-बगीचों मे फैला था दूसरे बिजली मे कुछ समस्या होने के कारण कहींे-कहीं पर ही रोशनी दिख रही थी । रिसेप्सन पर खड़े अश्वेत सज्जन यद्यपि कुछ नशे मे थे लेकिन उनके द्वारा बहुत सहृदयता से कुछ सस्ती दर पर एक सूट उपलव्ध कराया गया । सूट मे हम कुछ व्यवस्थित हुए ही थे कि बिजली पूर्णतया चली गयी लेकिन रिसेप्सनिष्ट सज्जन ने, यद्यपि कि हमारा सूट मुख्य भवन से दूरी पर था लेकिन बैटरी वाली लालटेन खुद लाकर दी गयी और असुविधा के लिए बार-बार क्षमा मांगी गयी । बिजली की आपूर्ति की समस्या रात 11 बजे तक ठीक हुई लेकिन हमलोग तबतक सो गए ।
अगली सुबह 7 बजे तक हम पासपोर्ट वगैरह चेक कराकर परमिट लेकर पुण्डा मारिया गेट से क्रूगर पार्क मे प्रवेश कर गए । पुण्डा मारिया गेट से फेबियन गेट की दूरी लगभग 400 कि0मी0 को अधिकतम 60 कि0मी0 प्रति घण्टे की गति से ही तय करना था, जो कि यहां के लिए असहज गति है। गति पर प्रतिबन्ध का कारण आगे चलते ही स्पष्ट होने लगा, सुबह बादलों से भरी थी और कहीं-कहीं पर बारिश भी हुई । पार्क के भीतर की सड़क भी डबल लेन की थी, सड़क पर कहीं-कहीं हाथियो के गोबर पड़े हुए थे जिससे लग रहा था कि उन्हांेने कुछ देर पहले रास्ता पार किया हो । कू्रगर पार्क का दर्शन बिग 5 से पूर्ण माना जाता है, बिग 5 मतलब शेर,चीता,हाथी, भैंसा, गैण्डा । यह आपके भाग्य पर है कि इन पांचो के दर्शन हो पाते हैं कि नही । जंगल मे घुसने के दसियों किलोमीटर पर हमे जिराफों का समूह दिखाई दिया, उसके बाद जेब्रा, हिरन की तमाम प्रजातियों के अलग-अलग झुण्ड और विशालकाय अफ्रीकी हाथियों के कई झुण्ड रास्ते मे मिलते चले गए। कई बार ये झुण्ड हमारे आने के कुछ पहले ही सड़क को पार कर दूसरी तरफ जंगल मे उतरे होते थे तो कई बार इन हमे गाड़ी खड़ी करके इन झुण्डों को सड़क पार करने का इन्तजार करना पड़ता था । एक बार हाथियों का झुण्ड सड़क पार करने के लिए लगभग किनारे पर था कि हमारी कार पहुंच गयी, झुण्ड मे हाथी का बच्चा भी था, हाथी अपने बच्चों के प्रति बहुत ही संवेदनशील होते हैं उस पर दुर्योग यह कि हमारे कार का रंग भी गाढ़ा लाल था, एक हथिनी चिघ्घाड़ते हुए काफी आक्रामक अंदाज मे आगे ब़ढ़ी गनीमत था कि हमारी कार कुछ आगे निकल चुकी थी लेकिन झुरझुरी के लिए काफी था ।
सबसे बड़ी उत्कन्ठा जंगल के राजा से मुलाकात की होती है । दोपहर की धूप कड़ी हो गयी थी और सड़क एक नदी के किनारे किनारे चल रही थी, कभी सड़क नदी के पास पहंुच जाती तो कभी नदी कुछ दूर हो जाती । दोपहर बीतने के कुछ बाद एक जगह सड़क के किनारे दो तीन कारे और पर्यटकों को घुमाने वाली गाड़िया खड़ी थी । पर्यटक खिड़कियों मे से बड़े-बड़े लेंसो वाले कैमरे आदि लगाकर शूट करने की कोशिश कर रहे थे । जहां पर लोगो ने कार और पर्यटको की गाड़ियां सड़क के किनारे खड़ी थी, वहां पर नदी सड़क से काफी नजदीक और गहराई मे थी । उचक-उचक कर देखने पर नदी के दूसरी तरफ घने वृक्षों की छाया मे एक शेर परिवार नदी की रेत पर लेटा मिला, घनी छाया मे करीब 5 शेर लेटे हुए थे लेकिन हम जहां पर खड़े थे वहां से एक झलक ही मिल पा रही थी । धीरे धीरे गाड़ियां जब आगे निकलीं तो हमे भी देखने का मौका मिला । शेरों का परिवार काफी गहराई मे सोया हुआ था तो मुझे लगा कि मैं सड़क पर निकल कर कुछ अच्छी जगह लेकर फोटो ले सकता हूं । वहां पर अन्य गाड़ियां नही थी इसलिए मै गेट खोलकर सड़क की पटरी की ढलान पर उगी झाड़ियों के पास पहुंचा ही था कि झुण्ड मे हलचल हो गयी । एक दो तो वापस नदी की दूसरी तरफ जाने लगे लेकिन एक महाशय को मेरा बर्ताव पसन्द नही आया और वे अपनी पूरी आक्रामकता से नदी की दूसरी तरफ खड़े हो गए, नदी की धारा इतनी पतली थी कि वो उनके एक छलांग के भी काबिल नही थी यानी दूसरी छलांग मे हम और वो आमने सामने होते । मुझको अपनी हठधर्मिता समझ मे आ गयी और भाग कर कार मे घुसकर दरवाजा बन्द करके हम नौ-दो ग्यारह हो लिए। कुछ देर मे समझ मे आया कि सम्भवतः कार से बाहर निकल कर खुले मे आ जाने के कारण दूसरी तरफ मुह करके काफी दूरी पर लेटे शेर परिवार को हमारी गंध मिल गयी थी इसीलिए पार्क मे खुले मे निकलना प्रतिबन्धित होता है परन्तु हमने सुनसान होने पर नियम की परवाह न करने की अपनी आदत के अनुसार ब्यवहार किया था, जिसमे खतरा हो सकता था ।
इसी तरह दूर-दराज एक पेड़ पर बैठे दो चीतों के भी दर्शन हो गए । पार्क की मुख्य सड़क से जुड़ी बहुत सड़के अर्द्ध चन्द्राकार पथ मे बनाई गयी हैं जो कई किलोमीटर लम्बी होती है और इनको लूप कहते हैं । लूप मे जाकर आप जंगल की गहराई का दृश्यावलोकन कर सकते हैं । करीब 70-80 किलोमीटर के अन्तराल पर पार्क मे एक ही कैम्पस मे पेट्रौल पम्प मनोरम रेस्टोरेंट वगैरह रहते हैं जहां पर आप रिफ्रेस होकर अपनी यात्रा जारी रख सकते हैं । हमको अपनी मंजिल पूरी करते करते 5 बज गए और बिग 5 मे से एक गेंडा महाराज के दर्शन नही हो सके।
कुल मिलाकर क्रूगर पार्क हमे उस दुनिया से मुखातिब करता है, जिसको हमने सदियों पहले अपने आधुनिक विकास की जरुरतों के मद्देनजर रौंद डाला है।
क्रमशः







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