क्रिकेट का तिलस्म और वान्डर्रस का मैदान-1




 ( दक्षिण अफ्रीका यात्रा गतांक से आगे)--
हम गलियो मे, बगीचो मे, खाली जगहों मे, स्कूलों की बोझिल कक्षाओं से जान बचातेे  अभिभावकों की तिरस्कृत निगाहों से नजरे छुपाते, ‘‘खेलोगे-कूदोगे होगे खराब‘‘ जैसे मुहावरांे की घुट्टी पीते हुए क्रिकेट खेलकर कर बड़े हुए हैं।
रेडियों हमे क्रिकेट परोसता था और हम टेस्ट मैचों मे लगे एक-एक चैक्के-छक्के पर आधे-आधे घण्टे चाव से उस स्ट्रोक की तारीफ सुनाते कमेन्टेटरों और विषेषज्ञों की टोली से खेल के नाम पर क्रिकेट सेे ही संस्कारित हुए थे। 
क्रिकेट हमारे उदास ठहरे वक्त को चबाने वाली च्यूगम की तरह था, जिसमें ढलती ढलती सांझ कब गुजर जाती थी पता नही चलता था।
निराशा के पठार मे क्रिकेट की जमीन पर उगे इक्के दुक्के दरख्तों की विशालता और अनोखेपन को देखते-निहारते और उनके बारे मे बात करते-करते अपने साथियांे से बहस मे उलझ जाना ही क्रिकेट था। 
क्रिकेट हमारे गांव के किशोरों और युवाओं की जिन्दगी मे अक्टूबर-नवम्बर मे उतरता था और फरवरी-मार्च की कड़ी होती धूप मे कपूर की तरह उड़ जाता था।
गांव जब अपनी हरी-भरी लहलहाती फसलों को खुशनुमा धूप मे सहेजने के लिए जूझ रहा होता था, तब मेले मे माइक लगाकर कमेन्ट्री कर रहे नए-नवेले किशोरों की जुबान मे क्रिकेट नए-नए शब्द गढ़ता है। 
हमारे जीवन मे क्रिकेट बस बचपने के गुजर जाने का अफसोस और जवानी की जिम्मेदारियों से जूझने का हौसला था। इसकी शब्दावली ने आहिस्ता-आहिस्ता कब हमारे बोलचाल मे जगह बना ली इसका हमे पता नही लगा लेकिन टूर्नामेण्ट के रस्मी उद्घाटनों से क्षेत्र में उभरते नए-नए रसूखदारों का पता लगता रहा।
क्रिकेट हमारे गांवो मे मेले की तरह आता है जिसके किनारे बैठ कर जुलाहे अपना करघा भूल जाते हैं, बाउण्ड्री के किनारे भीड़ मे खड़ा राजगीर अपनी दिहाड़ी भूल जाता है।
क्रिकेट के मेले में फसल अगोरने निकला किसान तालियों की गड़गड़ाहट सुनकर हरियाली के दुश्मनों को भूल जाता है और सड़क से गुजर रहे दूधिए के मु़ड़-मुड़ कर देखने से डगमगाती साइकिल से लोग बच कर निकलते हैं।
गांव मे क्रिकेट जब मचलता था तो मनु से लेकर मण्डल तक की सरहदों के आरपार खेलता था। यह हर साल कुछ नायक गढ़ता था जिसके बारे मे सुनकर गदोरी पर सुर्ती मलते-मलते उनके बाप-चचा अक्सर झल्ला जाते थे। क्रिकेट हर साल हमारे गांव की थकी-हारी गिरस्थी मे कुछ ऐसा अस्तब्यस्त कर जाता था, जिसका उलाहना महीनों चलता रहता था। क्रमश:

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