सोमवार, 15 अप्रैल 2013

छिम्मी

   सत्तर के दशक में हमारे गावं में बोनबिला प्रजाति की मटर किसानों ने बोना शुरू किया, इसके बाद में बोनबिला  से कम समय में तैयार होने वाली प्रजाति अर्किल प्रचलन में आयी  । तब से मटर की फली (छिम्मी ) बेचने की  खेती हमारे क्षेत्र के किसानो को नकदी रुपया देखने का बहुत बड़ा श्रोत रही है । हर साल जनवरी के अंतिम सप्ताह से फरवरी के अंत तक आसपास के गावं के किसान भोर में लगभग 3  से 4 बजे सायकिल, सगड़ी या ट्रैक्टर ट्राली से मटर (जिसका उच्चारण मंटर प्रचलित है ) चन्दुआ सट्टी (बोलचाल की भाषा में चनुआ सट्टी प्रचलित है ) में बेचने के लिए ले जाते है । जाड़े की भोर में बोरा भरने और सिलने में उंगलिया ठन्ड के मारे काठ हो जाती है, लेकिन इन कठुयाई उंगलियों से  सायकिल या सगड़ी खीचना अगली चुनौती हुआ करती है । वाराणसी शहर के पूरब तरफ जी ० टी ० रोड और वरुणा नदी के बीच स्थित ग्रामीण क्षेत्र  सघन आबादी वाला छोटी काश्त के खेतिहरों और बुनकरों का इलाका है । चनुआ सट्टी से वापस लौटते किसानों के चेहरे पर अक्सर बाजार के उतार चढ़ाव का बयान रहता है । अस्सी के दशक के अंत में जी ० टी ० रोड पर स्थित राजा तालाब सब्जी मंडी का विकास हुआ, लेकिन मेरे क्षेत्र के गावों में चनुआ सट्टी ही लोकप्रिय रही, क्योकि इस मंडी में सुबह 8 बजे तक खरीद फरोख्त का सारा कारोबार सम्पन्न हो जाता है और किसान वापस अपने घर पहुच कर दोपहर से खेतीबारी का काम संभाल लेते है । बीच में कईबार इस मंडी को हटाये जाने की ख़बरें आती  रहती है, क्योकि शहरी बाबू वर्ग की आखों में यह मंडी खटकती रहती है, फिर भी इसका आजतक बनें रहना मेरे क्षेत्र के किसानों को काफी राहत देता है ।
      मटर की खेती के साथ ही नगदी फसलों की तरफ लोगों का रुझान हुआ और अस्सी के दशक से ही मिर्च, बैगन आदि सब्जियों की ब्यावसायिक खेती भी होनें लगी । इन फसलों से बस इतना होता है कि लोग नगदी देख लेते थे । हर साल नाते रिश्ते में पड़ने वाली शादियों के नेवता आदि की रस्म निपटा लेते थे और तीन चार साल की फसलों की कमायी जुटाकर बेटे-बेटी की शादी की रस्म निपटा लेते थे । अस्सी के दशक तक बच्चे प्रायः घर में ही पैदा होते थे और अंग्रेजी स्कूलों का चलन प्रारम्भिक दौर में था । गावं में खाने की थाली के नीचे टेवकन लगाने की परम्परा अपने आखिरी दौर में थी और कही-कही खड़ाऊ प्रयोग में दिख जाता था लेकिन पीढ़ा अभी भी प्रांसगिक बना हुआ था । टेवकन लकड़ी का एक छोटा टुकड़ा होता है जो खाने की थाली के नीचे उस ओर लगाया जाता है जिधर ठोस खाद्य  पदार्थ जैसे चावल,रोटी,सूखी सब्जी,प्याज आदि रखे जाते है जिससे दाल नीचे की ओर रहे और उसको इक्षानुसार  ही मिलाया जा सके ।
  मटर में फली आने पर कौवा, मैना,गेदुर,मोर आदि पक्षियों से फली को बचाने के लिये खेत को लगातार दिन भर अगोरना पड़ता है,लेकिन इधर हाल के बरसों में इस खेती को नील गायो और संकर नस्ल के छुट्टा बछड़ो से बचाने के लिए जाड़ो की रातों में भी किसानों को लगातार रखवाली करनी पड़ती है । अब हमारे गावं में मटर जैसी फसलों की खेती कृषी श्रम परम्परा से जुडे लोग ही कर पाते है क्योकि यह खेती लगभग दो महीनों तक किसानो को अपने चौतरफा शत्रुओ का बंधक बना देती है । इसके बाद बाजार से मिलने वाली निराशा बचे-खुचे हौसले को तोड़ देती है लेकिन विकल्प का अभाव और समय का मरहम इन जख्मो को भरते हुए अगले सितम्बर अक्टूबर तक किसानो को उसी चक्रब्यूह में पहुंचा देता है और फिर शुरू हो जाता है कौवा, मैना,गेदुर,मोर, नील गायो,छुट्टा जर्सी बछड़ो  और चनुआ सट्टी का खेल ।
  मित्रों जाड़े में छिम्मी खाते समय उसकी मिठास में मेरे क्षेत्र के किसानों की मेहनत को भी याद कर लीजियेगा , जिससे यह मिठास थोड़ी नमकीन हो जाएगी ।



शुक्रवार, 22 मार्च 2013

-उदासी -


ड्राईंग रूम बहुत उदास था,
इसलिए नही कि ,
श्रीलंकाई तमिलों की क्षत -विक्षत लाशों ने,
क्रूरता कि पराकास्ठा दिखलाई थी।
इसलिए नही कि,
शर्मिला इरोम का अनशन,
अभी भी जारी रहने कि खबर आई थी ।
इसलिए नही कि,
सीरिया में फटते बमों ने,
छोटे -छोटे बच्चो की नीद उड़ाई थी ।
इसलिए नही कि,
एक गरीब रिश्तेदार का कैंसर,
लाइलाज होने की खबर आई थी ।
बस इसलिए कि,
नायक और खलनायक के बीच झूलता,
हमारी लम्पट संस्कृति का प्रतिनिधि,
बेचारा बन गया था ।
बस इसलिए कि,
वो कैसे उस जेल में जियेगा,
जो उसके लिए,
केवल ड्रामा  का हिस्सा होता ।
बस इसलिए कि,
वो भोलेपन में स्क्रीन की दुनिया से बाहर,
वास्तविक दुनिया के खलनायको में चला गया था ।
बस इसलिए कि,
लाखों वसूल कर सलाह देने वाले वकीलों ने भी,
मुफ्त में बताया था कि वो बच नही सकता ।





सोमवार, 18 मार्च 2013

रैबीज

शीला की जवानी ,
और ,
मुन्नी की बदनामी से ,
पैदा रैबीज ने ,
गावों से महानगरों तक ,
पागल कुत्तों की फौज ,
खड़ी कर दी है ,
लेकिन ,
संसद रैबीज को नही ,
कुत्तों को खोज रही है .

शनिवार, 23 फ़रवरी 2013

कैप्टेन लक्ष्मी सहगल


वर्मा के जंगलो में,
मलेरिया बुखार से,
सफेद हो गये,
पपडीदार  होठों,
और,
बारुद से पथराये सपनों ने,
जिन्दगी भर,
युद्धरत रहने का संकल्प दिया होगा ।
लेकिन ..................
इस बिकाऊ वक्त में ,
जब भडुए और ढिढोरची ही,
नायकत्व के प्रतिमान हों।
तुम्हारे लिए नया,
विशेसण  गढ़ने में ,
लगने वाले वक्त तक,
स्थगित रहें ...................
विसर्जन समारोह,
लम्बित रहें ..........
श्रधान्जली सभाये ।
(कैप्टेन लक्ष्मी सहगल  के निधन पर उनकी स्मृति में ) 

बुधवार, 16 जनवरी 2013

सौन्दर्यबोध


चेचकरू चेहरे , तिरछी निगाहों,
और आबनूसी रंग के साथ,
कुदरत ने,
लड़खड़ाते कदमों की नेमत बख्शी,
जो मेरे प्रथम रुदन से ही,
स्वजनों की हिकारत का,
उपहार देती रही ।
इस नेमत ने,
मेरे उस स्नेह कवच को,
अक्सर तार तार किया,
जो हर सजीव को,
गर्भ से बाहर,
अनायास मिलती है ।
सौन्दर्यबोध के,
जिस गुण ने,
हमारी चेतना को,
शेष से विशेष बनाया,
उसी के वमन में,
आकंठ डूबा रहा,
मै जीवनभर ।

सोमवार, 31 दिसंबर 2012

नया वर्ष

ऐशगाह के बाशिंदों के ,
जलसे का बहाना है नया वर्ष ।
अँधेरे सिवान में ठिठुरते किसान के ,
मरने का बहाना है नया वर्ष ।
लक्ष्यहीन पीढ़ी को नशे की मंडी में ,
उतरने का बहाना है नया वर्ष ।
उफनते बाजार में लाचार सपनों के ,
टूटने का बहाना है नया वर्ष ।
चलती फिरती कब्रों का ,
दुनिया के हाकिम का ,
अगला निशाना है नया वर्ष ।
काल के प्रवाह में ,
चिर नूतन क्षण की ,
पहचान का बहाना है नया वर्ष ।
(काफी पहले की अबतक बची थी।  प्रासंगिकता  मित्रो के हवाले )

शनिवार, 29 दिसंबर 2012

   सामूहिक बलात्कार कांड की दरिंदगी ने संपूर्ण सभ्य समाज को हिलाकर रख दिया है । सम्वेंद्शील  नौजवानों के जत्थों ने जिस तरह इंडिया गेट से लेकर जनपथ तक प्रदर्शन किया है ,उसने शासन तंत्र को मामले में तत्काल गंभीर कार्यवाही हेतु बाध्य कर दिया है । लेकिन इस पूरे वाकये को भिन्न नजरिये से भी देखा जा सकता है ।
     सभ्यता के विकास के साथ तकनीक का भी एक बाजार विकसित हुआ है जिसको अपने उत्पाद को लगातार बेचते रहने की मजबूरी है,मिडिया अपनी पेशेगत मजबूरी के कारण दिल्ली में सामूहिक बलात्कार से उमड़े गुस्से को बेच रहा है । इसमें उसका सबसे बड़ा फायदा यह भी है क़ि बेचा जाने  वाला मॉल उसकी दुकान के बाहर ही इंडिया गेट से लेकर राजपथ तक तैयार हो रहा है । कुछ दिनों में ये गुस्सा ठंडा हो जायेगा और हम अगली किसी घटना की प्रतीक्षा करेंगे जो मध्यमवर्गियो को क्रन्तिकारी होने का एहसास दिलाएगी और कुछ को उस ऐतिहासिक घटना का साक्षी होने का सुख प्रदान करेगी ।
     पुरनिया लोग विस्मय में है कि पिज्जा -बर्गर खाकर  हीरो हिरोइनों के  पीछे सिसकारी मारने  वाले लोग चना की घुघुनी खाने वालों की तरह धरना प्रदर्शन पर कैसे उतर आये ।
    प्रर्दशनकारी इस घटना की लगातार सुनवाई की मांग कर रहे है लेकिन  सवाल है कि प्रत्येक मुकदमे की लगातार सुनवाई क्यों नही हो सकती । न्यायाधीश तथा सफल वकील भारतीय कुलीन तंत्र के महत्वपूर्ण अंग है तथा अधिकांश प्रदर्शनकारी भी इस कुलीनतंत्र में सम्मिलित होने के लिए लालायित मध्यमवर्गीय नौजवान है । दुर्भाग्यवश इस कुलीनतंत्र का एक हिस्सा मुकदमे की लगातार सुनवाई की मांग करके अपने वर्ग के ही एक हिस्से के पेट पर लात मार रहा है । न्याय की आवश्यकता सबल को नही गरीब आदमी को होती है, इसीलिए हमारा शासन तंत्र बहुत ठन्डे दिमाग से सोचसमझ कर एक लाख की जनसंख्या पर 1.4 जज रखता है ताकि आभासी न्याय ब्यवस्था लोगो को दीखती रहे और कुलीन लोग इस विलम्बित न्याय ब्यवस्था को अपने हित में प्रयोग करते रहें । इसीतरह पुलिस भी उतनी ही संख्या  में है जिसमे हमारे माननीयो को सैल्यूट और जनता को लूट मिलती रहे । दरअसल विलम्बित न्याय ब्यवस्था हमारे कुलीन तंत्र के लिए बहुत उपयोगी रही है इसीलिए ये 1.4 की संख्या 140 में नही बदलेगी क्योकि तब संविधान में अंकित हमारे संकल्प प्राय: कटघरे में दिखाई देने लंगेगे और उनसे खेलता हमारा कुलीनतंत्र जेलों में दिखाई देने लगेगा । लाखो रु मासिक खर्च करके एक जज को भारतीय अभिजात वर्ग के निचले पायदान में सम्मिलित किया जाता है जबकि इससे काफी कम खर्च में हम जज तैयार करके 1.4 को 140 करके  सारे  आपराधिक  मामलो   की  लगातार सुनवायी करा सकते   है और इसके लिए प्रतिभाओ की कोई कमी नही है।  इसलिए मामले को यहा तक मत खीजिए  नही तो लोकतंत्र की कालीन के नीचे से बहुत सारे सांप और बिच्छू निकलने लगेगे । फ़िलहाल एक कवि की चंद लाईने समर्पित है -

नपुंसक दर नपुंसक पीढ़िया है ,
और क्या है हम ,
की जब चाहे बना लो सीढिया है ,
और क्या है हम ,
हमारी वेदना से जन्म लेते है ,
कई नारे ,
जिन्हें रटकर बने मिट्ठू मियां है ,
और क्या है हम । 

सोमवार, 17 दिसंबर 2012

क़ुरबानी


एक बूढ़ा नरभक्षी मृत्युशैया पर था ,
दो सूअर आपस में लड़कर मर गये थे .
वृक्षों की अंतहीन कतार ,
शोक की गवाह बनकर खड़ी थी .
अगली आपदा की सम्भावना से डरे .
बहेलियों ने ,
दो कबूतरों की क़ुरबानी देकर ,
जंगल के देवता को खुश कर दिया .
26-11-2012

बुधवार, 5 दिसंबर 2012

-खबर -


एक अभिनेत्री के ,
शादी कर लेने के अलावा ,
24 घन्टे में बहुत कुछ ,
घट गया था |
एक बुनकर की बेटी ने ,
आत्महत्या कर ली थी .
एक किशोरी ने छेड़खानी से ,
आजिज आकर रपट लिखाई थी |
एक पत्नी ने नवजात के साथ ,
कुए में छलांग लगाई थी .
एक बेटी ने तमाम मुश्किलों के ,
बावजूद कालेज में शीर्ष स्थान पाया था |
ये खबरें भी उसी अख़बार के ,
पिछले पन्नों में दुबली - पतली ,
रेखाओं में छपी थी |
लेकिन मेरी संवेदनाओ ने ,
पिछले पन्ने की खबरों को ,
उनका हक नही दिया |


19-10-2012

शनिवार, 1 दिसंबर 2012

- घड़ी -


जनरेटर शांत होते ही,
फैले अँधेरे में,
पत्तलों पर जूझते कुत्तो की गुर्राहट,
सन्नाटे को भंग कर रही है।
प्रयोजन के गुणदोष पर,
फुसफुसाते हुए मेहमानों,
के होठो पर तैर रहा है,
तुम्हारे वजूद से बना रिश्ता ।
तमाम थकन के बावजूद,
नीद से कोसों दूर आखो में,
याद आ रहा है,
तुम्हारा प्रथम आगमन,
जिसका अवशेष साक्षी मै,
बंसखट पर बलगम थूक रहा हूं।
गोबर लिपे आंगन में,
तुलसी के चौरे पर,
बुदबुदाती माँ,
तुम्हारी प्रथम सन्तति के,
सकुशल होने की प्रार्थना कर रही है।
बेटी की बिदाई पर,
धार-धार रोती आंखे,
और बेटों के बंटवारे पर,
हतप्रभ चेहरे से,
अपनी उम्र के पड़ाव,
गिनता रहा हूं,
शायद अब वो घड़ी,
भी बंद हो गई,
जो बुढ़ाते समय का सन्देश देती।


14-10-2012

मंगलवार, 27 नवंबर 2012

-सभ्यता-


भौकते हार्नो और ,
चीखते ब्रेको के बीच ,
महानगर में,
सहमा सा चल रहा हू |
जैसे आदमखोरों के ,
जंगल में ,
निरस्त्र टहल रहा हूं |
सभ्यता शायद ,
धरती के साथ ,
वृत्ताकार परिपथ में ,
चल रही है |
और घूमते हुए फिर उसी ,
आदिम युग में टहल रही है |


15-09-2012

जेन जी के द्वन्द

सुबह उठकर चाय बनाने के लिए फ्रिज से दूध निकालते समय देखा कि दूध पर मलाई की एक मोटी परत जमी है, जिसको निकालकर अलग एक बरतन में रखा जिसमें लगात...