मंगलवार, 27 नवंबर 2012

-सभ्यता-


भौकते हार्नो और ,
चीखते ब्रेको के बीच ,
महानगर में,
सहमा सा चल रहा हू |
जैसे आदमखोरों के ,
जंगल में ,
निरस्त्र टहल रहा हूं |
सभ्यता शायद ,
धरती के साथ ,
वृत्ताकार परिपथ में ,
चल रही है |
और घूमते हुए फिर उसी ,
आदिम युग में टहल रही है |


15-09-2012

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