सामूहिक बलात्कार कांड की दरिंदगी ने संपूर्ण सभ्य समाज को हिलाकर रख दिया है । सम्वेंद्शील  नौजवानों के जत्थों ने जिस तरह इंडिया गेट से लेकर जनपथ तक प्रदर्शन किया है ,उसने शासन तंत्र को मामले में तत्काल गंभीर कार्यवाही हेतु बाध्य कर दिया है । लेकिन इस पूरे वाकये को भिन्न नजरिये से भी देखा जा सकता है ।
     सभ्यता के विकास के साथ तकनीक का भी एक बाजार विकसित हुआ है जिसको अपने उत्पाद को लगातार बेचते रहने की मजबूरी है,मिडिया अपनी पेशेगत मजबूरी के कारण दिल्ली में सामूहिक बलात्कार से उमड़े गुस्से को बेच रहा है । इसमें उसका सबसे बड़ा फायदा यह भी है क़ि बेचा जाने  वाला मॉल उसकी दुकान के बाहर ही इंडिया गेट से लेकर राजपथ तक तैयार हो रहा है । कुछ दिनों में ये गुस्सा ठंडा हो जायेगा और हम अगली किसी घटना की प्रतीक्षा करेंगे जो मध्यमवर्गियो को क्रन्तिकारी होने का एहसास दिलाएगी और कुछ को उस ऐतिहासिक घटना का साक्षी होने का सुख प्रदान करेगी ।
     पुरनिया लोग विस्मय में है कि पिज्जा -बर्गर खाकर  हीरो हिरोइनों के  पीछे सिसकारी मारने  वाले लोग चना की घुघुनी खाने वालों की तरह धरना प्रदर्शन पर कैसे उतर आये ।
    प्रर्दशनकारी इस घटना की लगातार सुनवाई की मांग कर रहे है लेकिन  सवाल है कि प्रत्येक मुकदमे की लगातार सुनवाई क्यों नही हो सकती । न्यायाधीश तथा सफल वकील भारतीय कुलीन तंत्र के महत्वपूर्ण अंग है तथा अधिकांश प्रदर्शनकारी भी इस कुलीनतंत्र में सम्मिलित होने के लिए लालायित मध्यमवर्गीय नौजवान है । दुर्भाग्यवश इस कुलीनतंत्र का एक हिस्सा मुकदमे की लगातार सुनवाई की मांग करके अपने वर्ग के ही एक हिस्से के पेट पर लात मार रहा है । न्याय की आवश्यकता सबल को नही गरीब आदमी को होती है, इसीलिए हमारा शासन तंत्र बहुत ठन्डे दिमाग से सोचसमझ कर एक लाख की जनसंख्या पर 1.4 जज रखता है ताकि आभासी न्याय ब्यवस्था लोगो को दीखती रहे और कुलीन लोग इस विलम्बित न्याय ब्यवस्था को अपने हित में प्रयोग करते रहें । इसीतरह पुलिस भी उतनी ही संख्या  में है जिसमे हमारे माननीयो को सैल्यूट और जनता को लूट मिलती रहे । दरअसल विलम्बित न्याय ब्यवस्था हमारे कुलीन तंत्र के लिए बहुत उपयोगी रही है इसीलिए ये 1.4 की संख्या 140 में नही बदलेगी क्योकि तब संविधान में अंकित हमारे संकल्प प्राय: कटघरे में दिखाई देने लंगेगे और उनसे खेलता हमारा कुलीनतंत्र जेलों में दिखाई देने लगेगा । लाखो रु मासिक खर्च करके एक जज को भारतीय अभिजात वर्ग के निचले पायदान में सम्मिलित किया जाता है जबकि इससे काफी कम खर्च में हम जज तैयार करके 1.4 को 140 करके  सारे  आपराधिक  मामलो   की  लगातार सुनवायी करा सकते   है और इसके लिए प्रतिभाओ की कोई कमी नही है।  इसलिए मामले को यहा तक मत खीजिए  नही तो लोकतंत्र की कालीन के नीचे से बहुत सारे सांप और बिच्छू निकलने लगेगे । फ़िलहाल एक कवि की चंद लाईने समर्पित है -

नपुंसक दर नपुंसक पीढ़िया है ,
और क्या है हम ,
की जब चाहे बना लो सीढिया है ,
और क्या है हम ,
हमारी वेदना से जन्म लेते है ,
कई नारे ,
जिन्हें रटकर बने मिट्ठू मियां है ,
और क्या है हम । 

टिप्पणियाँ

लोकप्रिय पोस्ट