छिम्मी

   सत्तर के दशक में हमारे गावं में बोनबिला प्रजाति की मटर किसानों ने बोना शुरू किया, इसके बाद में बोनबिला  से कम समय में तैयार होने वाली प्रजाति अर्किल प्रचलन में आयी  । तब से मटर की फली (छिम्मी ) बेचने की  खेती हमारे क्षेत्र के किसानो को नकदी रुपया देखने का बहुत बड़ा श्रोत रही है । हर साल जनवरी के अंतिम सप्ताह से फरवरी के अंत तक आसपास के गावं के किसान भोर में लगभग 3  से 4 बजे सायकिल, सगड़ी या ट्रैक्टर ट्राली से मटर (जिसका उच्चारण मंटर प्रचलित है ) चन्दुआ सट्टी (बोलचाल की भाषा में चनुआ सट्टी प्रचलित है ) में बेचने के लिए ले जाते है । जाड़े की भोर में बोरा भरने और सिलने में उंगलिया ठन्ड के मारे काठ हो जाती है, लेकिन इन कठुयाई उंगलियों से  सायकिल या सगड़ी खीचना अगली चुनौती हुआ करती है । वाराणसी शहर के पूरब तरफ जी ० टी ० रोड और वरुणा नदी के बीच स्थित ग्रामीण क्षेत्र  सघन आबादी वाला छोटी काश्त के खेतिहरों और बुनकरों का इलाका है । चनुआ सट्टी से वापस लौटते किसानों के चेहरे पर अक्सर बाजार के उतार चढ़ाव का बयान रहता है । अस्सी के दशक के अंत में जी ० टी ० रोड पर स्थित राजा तालाब सब्जी मंडी का विकास हुआ, लेकिन मेरे क्षेत्र के गावों में चनुआ सट्टी ही लोकप्रिय रही, क्योकि इस मंडी में सुबह 8 बजे तक खरीद फरोख्त का सारा कारोबार सम्पन्न हो जाता है और किसान वापस अपने घर पहुच कर दोपहर से खेतीबारी का काम संभाल लेते है । बीच में कईबार इस मंडी को हटाये जाने की ख़बरें आती  रहती है, क्योकि शहरी बाबू वर्ग की आखों में यह मंडी खटकती रहती है, फिर भी इसका आजतक बनें रहना मेरे क्षेत्र के किसानों को काफी राहत देता है ।
      मटर की खेती के साथ ही नगदी फसलों की तरफ लोगों का रुझान हुआ और अस्सी के दशक से ही मिर्च, बैगन आदि सब्जियों की ब्यावसायिक खेती भी होनें लगी । इन फसलों से बस इतना होता है कि लोग नगदी देख लेते थे । हर साल नाते रिश्ते में पड़ने वाली शादियों के नेवता आदि की रस्म निपटा लेते थे और तीन चार साल की फसलों की कमायी जुटाकर बेटे-बेटी की शादी की रस्म निपटा लेते थे । अस्सी के दशक तक बच्चे प्रायः घर में ही पैदा होते थे और अंग्रेजी स्कूलों का चलन प्रारम्भिक दौर में था । गावं में खाने की थाली के नीचे टेवकन लगाने की परम्परा अपने आखिरी दौर में थी और कही-कही खड़ाऊ प्रयोग में दिख जाता था लेकिन पीढ़ा अभी भी प्रांसगिक बना हुआ था । टेवकन लकड़ी का एक छोटा टुकड़ा होता है जो खाने की थाली के नीचे उस ओर लगाया जाता है जिधर ठोस खाद्य  पदार्थ जैसे चावल,रोटी,सूखी सब्जी,प्याज आदि रखे जाते है जिससे दाल नीचे की ओर रहे और उसको इक्षानुसार  ही मिलाया जा सके ।
  मटर में फली आने पर कौवा, मैना,गेदुर,मोर आदि पक्षियों से फली को बचाने के लिये खेत को लगातार दिन भर अगोरना पड़ता है,लेकिन इधर हाल के बरसों में इस खेती को नील गायो और संकर नस्ल के छुट्टा बछड़ो से बचाने के लिए जाड़ो की रातों में भी किसानों को लगातार रखवाली करनी पड़ती है । अब हमारे गावं में मटर जैसी फसलों की खेती कृषी श्रम परम्परा से जुडे लोग ही कर पाते है क्योकि यह खेती लगभग दो महीनों तक किसानो को अपने चौतरफा शत्रुओ का बंधक बना देती है । इसके बाद बाजार से मिलने वाली निराशा बचे-खुचे हौसले को तोड़ देती है लेकिन विकल्प का अभाव और समय का मरहम इन जख्मो को भरते हुए अगले सितम्बर अक्टूबर तक किसानो को उसी चक्रब्यूह में पहुंचा देता है और फिर शुरू हो जाता है कौवा, मैना,गेदुर,मोर, नील गायो,छुट्टा जर्सी बछड़ो  और चनुआ सट्टी का खेल ।
  मित्रों जाड़े में छिम्मी खाते समय उसकी मिठास में मेरे क्षेत्र के किसानों की मेहनत को भी याद कर लीजियेगा , जिससे यह मिठास थोड़ी नमकीन हो जाएगी ।



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