सोमवार, 12 मई 2014

    आई ० पी ० एल ० ( इंडियन पॉलिटिक्स लीग ) २०१४ 

दोनों भावनाओं पर खेल रहें थे और लोग धारणाओं पर लड़ रहे थे।  एक के बारे में धारणा है  कि वो विकास पुरुष है दूसरे के बारे में धारणा है  कि वो ईमानदार है( तथ्य क्या है पता नहीं)।  चुनाव के दिन गांव पर दिन भर  पोलिंग स्टेशन से थोड़ी दूरी पर कुछ मित्रों के साथ एक पेंड के नीचें इसी विभाजन मे एक पक्ष चुनकर बैठा रहा।  गांव सवर्ण प्रभावी है लेकिन हम चकित रह गए क्योंकि थोड़ी उम्मीद थी कि चुंकि ईमानदारी भरेँ पेट वालोँ का सवाल होना चाहिए था इसलिए वहां से कुछ लोग निकलेंगे।   लेकिन सवर्ण बस्ती  ने  (भरे पेट वालों ने  ) विकास चुना और दलित बस्ती ने  ईमानदारी का पक्ष चुना।
      दिहाड़ी पर जीने वाले एक मुखर दलित साथी दिन भर बैठे रहेँ और पेड़ की छाया के साथ इधर -उधर खिसकती  दरी दिन भऱ गुलजार होतीं रही।  ……… बाउ साहेब,गंवई  काशी का चुनाव तो हमेंशा हिंदुओ के दो वर्गो के बीच होता रहा है,  लात खाने वाले और  लतियाने वालों के बीच ,पढ़े लिखे लोग इस गंदगी को फूल में ढँक कर परोसते रहेँ हैं।   इस बार आप लोगों को लात खाने वालों के बीच में बैठे देख कर हमलोगों ने भी अपना इरादा थोड़ा बदल लिया है।  मेरे एक साथी इस चुनाव में काफी सक्रिय रहे थे वो अभिभूत थे। मैं सोच रहा था कि दलितों के कितने एहसानों का बदला हिन्दू समाज चुकाएगा और  चैनलों पर उपस्थित दिहाड़ी चारणों में किसी ने इस सत्य का अर्द्धांश भी कहने की हिम्मत क्यों नहीं दिखायी।  
    इस महान(?) धर्म की महान(?) राजधानी में सम्पन्न महान (?)पर्व में संचार माध्यमों ने धुरखेल  का महान(?) फाइनल खेला। अलविदा आई ० पी ० एल ० ( इंडियन पॉलिटिक्स लीग ) २०१४ फिर मिलेंगे .......... कुछ टूटे हुए सपनों के साथ …………… कुछ खून के छींटों के साथ .......... कुछ नई उम्मीदों के साथ। 




शनिवार, 10 मई 2014

मानवीय मुनाफा 

   किसी भी फैक्ट्री  उत्पाद के उपभोक्ता को ये जानकारी मिलनी चाहिए कि उत्पाद की वास्तविक लागत क़्या है, जिससे उपभोक्ता को पता लग सके कि  उससे कितना मुनाफा लिया जां रहा है ।  इसके साथ ही किसी फैक्ट्री उत्पाद के वास्तविक मूल्य के आँकलन के लिये एक राष्ट्रीय आयोग भी गठित होना चाहिए, जिसके द्वारा निर्धारित वास्तविक मूल्य को ऍम ० आर ० पी ० के साथ अंकित किया जाना अनिवार्य होना  चाहिए।  किसी उत्पाद  के लागत मूल्य को जानने और उस उत्पाद पर लिये जा रहे मुनाफे को जानने का अधिकार उपभोक्ता को मिलना, मुनाफे के न्यायपूर्ण मानकीकरण की तरफ एक मजबूत कदम होगा। साथियों से अनुरोध है कि इसपर अपने महत्वपूर्ण सुझाव अवश्य अंकित करेँ- संतोष कुमार।  



बुधवार, 23 अप्रैल 2014

बर टूट
क्या हुआ ? क्या बुदबुदा रहें है ?
अरे देखिये न.……
देश बदलना चाहते हैं, ……… लेकिन सड़क पर नहीं निकलेंगे।
सरकार बदलना चाहते हैं.………  लेकिन बूथ पर नहीं जायेंगे।
सफाई करना चाहते हैं.………… लेकिन झाड़ू नहीं थामेंगे।
आज राय साहब नहीं दिखाई दे रहे हैं चचा ?
अरे ………… उनको राजनीति का बर टूट हो गया है। 

एक तरफ बिरादरी है, एक तरफ धर्म है, एक तरफ समाज है,  समझे में नहीं आ रहा है किधर करवट लें......... चचा की हल्की मुस्कराहट में डूबे ब्यंग का मजा लेकर अगल बगल का माहौल शरारती हो गया।
किसी ने आवाज लगाई,…………………… का सरदार तोहू देखायल रहल ह रैलिया में ,
बिरादरी क सरकार बा तोहके त ना रहे के चाही ?
 छोड़ा जाति बिरादरी के बात एतना त  हमहनो जानिला कि .......... के लड़े वाला पहलवान हौ ……  अउर के खाली मिट्टी लगा के घूमत हौ।
सरदार के जवाब से लाजबाब लोग अपना-अपना बीड़ा दबाकर चल दिए। 

सोमवार, 14 अप्रैल 2014

   संकल्प   
   भ्रष्ट्राचार हमारे देश में पसरे रावण की नाभि का अमृत है। भ्रष्ट्राचार विधवाओं और विकलांगो के पेंशन में डाका डालता है।  भ्रष्ट्राचार बच्चों की शिक्षा में , गरीबों के स्वास्थ्य में, बेरोजगारों के सपनों में दीवाल बनकर खड़ा है।  इसका परिमाण इतना बड़ा है कि लोग शून्य  लगाते लगाते गिनती भूल जाते हैं। हम इस रावण की   नाभि में निशाना साध रहे हैं, आपके संबल से।  नेता ने  आखिरी चंद बातों से अपना सम्बोधन ख़त्म किया।       
   ये  महानगर से मिलने को आतुर बगल के कस्बे में एक छोटी सी बैठक थी।   जिसे  एक डॉक्टर ने अपने नर्सिंग होम में रखी थी। दिन के  तीसरे  पहर सूरज की तिरछी किरणे नर्सिंग होम के गलियारे से होते हुए  हाल के दरवाजे  का पीछा कर रहीं थीं, जहां सामान्य किस्म की सस्ती और टिकाऊ चप्पलें बिखरी पड़ी थी । पसीने में डूबी कमीजों  और मोज़े की बदबू उस बैठक पर कोई असर नही डाल रही थी।  बैठक में शामिल चेहरों में सुकुमारता नहीं थी, भाषा में पाखंडी अभिजात्यता नहीं थी, ये कृषक और कमेरी जातियों के ग्रामीण बनारस के सक्रिय राजनैतिक लोग थे और  इनमें से अधिकांश अपनी खेतीबारी के महत्वपूर्ण कार्यों को छोड़कर आये थे।  इनमें से हर एक के पास  बर्चस्ववादी संस्कृति और राजनीति के विरुद्ध संघर्ष की थाती थी। ये लोग  नफरत और असहमति के इस दौर में अपने अपने बाड़े के ठगों से आहत अपनी लड़ाई को एक और धार देने के लिए वे  बेसब्र थे, लेकिन आशंकित नही थे।

मैं उनकी दृढ़ता और संकल्पो को महसूस करते हुए  सोच रहा था 1857 के उन स्वतः स्फूर्त विद्रोहियों के बारे में जिन्होंने कभी जमीन के मिल्कियत या सैनिकों की तनख्वाह के सवाल पर बहादुर शाह जफर या तात्या टोपे से कोई आश्वासन नही लिया होगा, वो बस इस जिद पर लड़े होंगे कि यही एकजुटता हमारे अगले सवालों का जवाब भी निकलेगी और इसी विश्वास ने उनको इस महादेश के रास्तो में खड़े विशाल वृक्षों की शाखाओं पर फांसी के झूले पर झूलने का साहस दिया होगा।          

सोमवार, 31 मार्च 2014

हाशिया पर  लकड़बग्घा मिल गया। 

उस समय तुम कुछ नहीं कर सकोगे

अब लकड़बग्घा
बिल्कुल तुम्हारे घर के 
करीब आ गया है
यह जो हल्की सी आहट
खुनकती हंसी में लिपटी
तुम सुन रहे हो
वह उसकी लपलपाती जीभ
और खूंखार नुकीले दांतों की 
रगड़ से पैदा हो रही है।
इसे कुछ और समझने की
भूल मत कर बैठना,
जरा सी गलत गफलत से
यह तुम्हारे बच्चे को उठाकर भाग जाएगा
जिसे तुम अपने खून पसीने से
पोस रहे हो।
लोकतंत्र अभी पालने में है
और लकड़बग्घे अंधेरे जंगलों 
और बर्फीली घाटियों से
गर्म खून की तलाश में 
निकल आए हैं।
उन लोगों से सावधान रहो
जो कहते हैं
कि अंधेरी रातों में
अब फरिश्ते जंगल से निकलकर
इस बस्ती में दुआएं बरसाते
घूमते हैं
और तुमहारे सपनों के पैरों में चुपचाप
अदृश्य घूंघरू बांधकर चले आते हैं
पालने में संगीत खिलखलिता
और हाथ-पैर उछालता है
और झोंपड़ी की रोशनी तेज हो जाती है।

इन लोगों से सावधान रहो।
ये लकड़बग्घे से
मिले हुए झूठे लोग हैं
ये चाहते हैं
कि तुम
शोर न मचाओ
और न लाठी और लालटेन लेकर
इस आहट
और खुनकती हंसी
का राज समझ
बाहर निकल आओ
और अपनी झोंपड़ियों के पीछे
झाड़ियों में उनको दुबका देख
उनका काम-तमाम कर दो।

इन लोगों से सावधान रहो
हो सकता है ये खुद
तुम्हारे दरवाजों के सामने 
आकर खड़े हो जाएं
और तुम्हें झोंपड़ी से बाहर
न निकलने दें,
कहें-देखो, दैवी आशीष बरस
रहा है
सारी बस्ती अमृतकुंड में नहा रही है
भीतर रहो, भीतर, खामोश-
प्रार्थना करते
यह प्रभामय क्षण है!

इनकी बात तुम मत मानना
यह तुम्हारी जबान
बंद करना चाहते हैं
और लाठी तथा लालटेन लेकर
तुम्हें बाहर नहीं निकलने देना चाहते।
ये ताकत और रोशनी से 
डरते हैं
क्योंकि इन्हें अपने चेहरे
पहचाने जाने का डर है।
ये दिव्य आलोक के बहाने
तुम्हारी आजादी छीनना चाहते हैं।
और पालने में पड़े
तुम्हारे शिशु के कल्याण के नाम पर
उसे अंधेरे जंगल में
ले जाकर चीथ खाना चाहते हैं।
उन्हें नवजात का खून लजीज लगता है।
लोकतंत्र अभी पालने में है।

तुम्हें सावधान रहना है।
यह वह क्षण है
जब चारों ओर अंधेरों में
लकड़बग्घे घात में हैं
और उनके सरपरस्त
तुम्हारी भाषा बोलते
तुम्हारी पोशाक में
तुम्हारे घरों के सामने घूम रहे हैं
तुम्हारी शांति और सुरक्षा के पहरेदार बने।
यदि तुम हांक लगाने
लाठी उठाने
और लालटेन लेकर बाहर निकलने का
अपना हक छोड़ दोगे
तो तुम्हारी अगली पीढ़ी
इन लकड़बग्घों के हवाले हो जाएगी
और तुम्हारी बस्ती में
सपनों की कोई किलकारी नहीं होगी
कहीं एक भी फूल नहीं होगा।
पुराने नंगे दरख्तों के बीच
वहशी हवाओं की सांय-सांय ही
शेष रहेगी
जो मनहूस गिद्धों के
पंख फड़फड़ाने से ही टूटेगी।
उस समय तुम कुछ नहीं कर सकोगे
तुम्हारी जबान बोलना भूल जाएगी
लाठी दीमकों के हवाले हो जाएगी
और लालटेन बुझ चुकी होगी।
इसलिए बेहद जरूरी है
कि तुम किसी बहकावे में न आओ
पालने की ओर देखो-
आओ आओ आओ
इसे दिशाओं में गूंज जाने दो
लोगों को लाठियां लेकर
बाहर आ जाने दो
और लालटेन उठाकर
इन अंधेरों में बढ़ने दो
हो सके तो
सबसे पहले उन पर वार करो
जो तुम्हारी जबान बंद करने

और तुम्हारी आजादी छीनने के
चालाक तरीके अपना रहे हैं
उसके बाद लकड़बग्घों से निपटो।

अब लकड़बग्घा
बिल्कुल तुम्हारे घर के करीब
आ गया है।-सर्वेश्वरदयाल सक्सेना 

शुक्रवार, 28 मार्च 2014

  साझा संस्कृति मंच के तत्ववधान में आयोजित होली मिलन समारोह में शामिल होने का न्यौता था।रास्ते में  चेतगंज से गोदौलिया  के बीच में ६ सांड खड़े मिले  चचा कुछ चुहलबाजी वाले अंदाज में बोले बनारस में इतने दिनों से रह रहा हुँ लेकिन कभी सांड़ों को गायों को दौड़ाते नही देखा, ये सब भी लगता है बनारसियों की तरह सधुआ गये है।  मुझको भी चचा की बात में दम लगा कि  चाहे संकटमोचन में बम फेंको या मंदिर के गेट पर अंडा फेंको अब बनारसी लोग भी बनारसी सांड़ों  की मुद्रा में आ गये है ।  
   हम कुछ जल्दी पहुंच गये थे ।  अस्सी  घाट पर एक न्यूज चैनल का ब्यवसायिक चुनाव चर्चा कार्यक्रम चालू था, कुर्सियां खाली थी ऒयोजको में सम्मिलित एक लड़की दौड़ कर आयी, बैठने का निवेदन करने लगी लेकिन हम तो तमाशा देखने के मूड में थे और एक किनारे बैठ तमाशा देखने लगे। जैसा  अक्सर  दिखाया जाता  है, बहस को घेर कर बड़े पहलवान बनाम नये पहलवान पर केंद्रित करके डब्लू ० डब्लू ० एफ ० चल रहा था।  बड़ा पहलवान ज्यादा बिकाऊ है इसलिए उसको कुश्ती जीतना  दिखाना जरूरी था, लेकिन नया पहलवान सनसनी पैदा कर रहा था इसलिए उसको दिखाना भी मजबूरी था। 
  प्रोग्राम ख़त्म होते होते  सूरज गंगा को तिरछी नजर से देखने लगा था, तबतक   चंचल जी सायकिल पर दरी बाधे और फादर अपने दल के साथ आ चुके थे।  शाम ढलते ढलते दरी बिछ चुकी थी और अफलातून  की बुलंद आवाज में लल्लन यादव जी की मसहूर कविता ---गलत मत कदम उठाओ सोच कर चलो , विचार कर चलो ---से घाट  गूंजने लगा।  घाट पर ऊंचाई से आ रही रोशनी में  सलीम शिवालवी का गरजती आवाज में धुंधली रोशनी में झूमकर कविता पाठ  लोगों को ठिठकने के लिए मजबूर कर रहा था और  बनारस पूरी रौं में गंगा के किनारे बह रहा था।   
    बनारसी भोजपुरी में -- लोग बहुते महान हो जालन, लड़िकनो सयान हो जालन , माह फागुन क हाल मत पूछा , एम्मे बुड़वो जवान हो जालन --  सलीम शिवालवी


रविवार, 16 मार्च 2014

 पत्थर के गिट्कों से  उछलती बाइकों पर बिना फलोर के डिस्को करते मजनुओं, किसी भी जाम की टांग में अपना अगला पहिया डाल कर गुर्राते टेम्पुओं, डाक्टरों की सट्टी में मरीज फंसाते कुंजड़ों , अकबकाये सैलानियों को हर क़ुब्यवस्था का सोंदर्य दिखाते गाइडों, ठगों को भी ठगते महान ज्योतिषियों के साथ शंकर की बरात के अन्य समस्त विभुतिओं की काशी में लोग सदियों से अपना पाप धोने आते रहें है। इ  सही है की ए बार इलेक्सन की होली में खूब कबीर गाये जायेंगे, लेकिन बनारसियों से अनुरोध है की कबीर पर अपना जन्मसिद्ध अधिकार होने के बावजूद इस होली में उनके अश्लील संस्करण से बचियेगा नहीं तो बहरियो समझ जायेंगे कि बनरसिया खाली हवा बाँधते हैं।  हवा पर याद आया चचा कह रहे थे कि नेतवा सब हवा पर भी अपना अधिकार मान लिए है, मीडिया वाले हांक रहे हैं इ बार फलाने की हवा है, अरे कैसा जमाना आ गया बदबू को भी हवा समझते हैं।  अब बदबू  साफ नही कर सकते तो नाक दबा कर निकल जाइये जइसे, अंग्रेजवा सब मनकनीका घाट से निकलते हैं, लेकिन  जिनका कफ़न बेंचने का रोजगार है उ तो रहबे करेंगें न अउर जिनको दाह संस्कार करना है उनकी भी मजबूरिये है भाई.……… चचा समझा रहे थे।            .………………… होली की अग्रिम शुभकामना मित्रों।   

शनिवार, 8 मार्च 2014

   शाम के धुँधलके में कोल्हाड़ की खुशबु फैली हुई थी।  भट्ठे की आग की ऊपरी परत ठंडी होकर चमक को धुंधला कर रही थी रह रह कर कोई चिंगारी चटक कर आग की ऊपरी परतो को कुरेद रही थी। अमूमन अब तक गन्ने से  भेली बनाने का काम हो चुका होता है, क्योकि किसान जल्दी से पेराई करके एक और फसल लेने की कोशिस करते है लेकिन इस साल की बेमौसम बारिशों ने सबकुछ उलट पुलट कर दिया।  भेली बनाते बनाते मौन टूटा---- ए साल आलू लेहलन ,मंटर लेहलन, चना लेहलन, अब गेहुओं लिहन का----लगा चचा आत्मालाप कर रहे हैं।  किसी ने विषय बदला, एतना बरबादी हो..…ता अख़बार में बस पानी से लगल जाम खबर निकलेला। शिवगोविंद के लड़िकवा फोन कइले रहल की इंदौर (मध्य प्रदेश ) के तरफ भी बारिस से बड़ी बरबादी भइल बा गेंहू, चना खेतै में खराब हो जायल चाहत बा। बेबसी की चर्चा से ऊबे रामजी ने गुरूजी को उकसाया--- का गुरु एदा त मामला चपल हो--।  हर चुनाव में रामराज का सपना बुनते बुनते गुरु की दाड़ी खिचड़ी से सफेद हो गई थी, बमक गये---- अरे सुनामी खाली बनरसे में हौ कि ओही बहाने बुढ़वा के धकियावल चाहत हवन एक दरे ढेला चला के भगा देहलन त का सबे भाग जाइ--। लालटेन की रोशनी में ताजी बनी भेली की चमक और चारो ओर गहराते अंधेरे में सबको सड़ रहे आलू की फिकर थी  किसी ने गुरु के दुःख में अपने होंठ नही हिलाए। भेली बन चुकी थी घुटना पकड़कर पीठ सीधी करते हुए लोग अपनी-अपनी सिन्नी लेकर अँधेरे में गुम होने लगे जैसे चुनाव ख़त्म हो गया था।    
कैसी सुनामी है भाई,
जो बस बनारस की सरहद में हैं समाई।
पहले एक पुराने गिद्ध को पत्थर फेंक कर भगा दिया , 
अब एक बुजुर्ग को डरा दिया।
(गावं के कोल्हाड़ पर हुई बतकही )

शनिवार, 22 फ़रवरी 2014

श्री नारायण भाई देसाई ने गांधी जी के जीवन ,आदर्शो  और दर्शन को रोचक शैली में समझाने के लिए कथा शैली का प्रयोग किया है। वो गांधीजी के वैयक्तिक सहायक स्व ० महादेव देसाई के पुत्र है तथा उनके जीवन का प्रथम २२ वर्ष गांधीजी के सानिध्य में गुजरा है। उनके तथा गांधीजी की उम्र में करीब ५८ वर्षों का फासला था लेकिन गांधी उनके साथ समवयस्क हो जाते हैं। नारायण भाई देसाई की गांधी कथा समस्त श्रोताओं को बालक मोहन से बैरिस्टर गांधी और बैरिस्टर गांधी से महात्मा गांधी बनने का श्रोता नही बनाती अपितु इतिहास के उस खंड का सहयात्री भी बनाती है। कथावाचक बारबार श्रोताओं को गांधी को महात्मा के बजाय मनुष्य समझने का आग्रह करता है और धीरे धीरे श्रोता की समझ को इस प्रकार विकसित करता है की वो एक साधारण मनुष्य की क्षमता को समझ सके।  ऐसी कथा शैली को और विस्तार दिए जाने की अवश्यकता है।

जेन जी के द्वन्द

सुबह उठकर चाय बनाने के लिए फ्रिज से दूध निकालते समय देखा कि दूध पर मलाई की एक मोटी परत जमी है, जिसको निकालकर अलग एक बरतन में रखा जिसमें लगात...