शाम के धुँधलके में कोल्हाड़ की खुशबु फैली हुई थी। भट्ठे की आग की ऊपरी परत ठंडी होकर चमक को धुंधला कर रही थी रह रह कर कोई चिंगारी चटक कर आग की ऊपरी परतो को कुरेद रही थी। अमूमन अब तक गन्ने से भेली बनाने का काम हो चुका होता है, क्योकि किसान जल्दी से पेराई करके एक और फसल लेने की कोशिस करते है लेकिन इस साल की बेमौसम बारिशों ने सबकुछ उलट पुलट कर दिया। भेली बनाते बनाते मौन टूटा---- ए साल आलू लेहलन ,मंटर लेहलन, चना लेहलन, अब गेहुओं लिहन का----लगा चचा आत्मालाप कर रहे हैं। किसी ने विषय बदला, एतना बरबादी हो..…ता अख़बार में बस पानी से लगल जाम खबर निकलेला। शिवगोविंद के लड़िकवा फोन कइले रहल की इंदौर (मध्य प्रदेश ) के तरफ भी बारिस से बड़ी बरबादी भइल बा गेंहू, चना खेतै में खराब हो जायल चाहत बा। बेबसी की चर्चा से ऊबे रामजी ने गुरूजी को उकसाया--- का गुरु एदा त मामला चपल हो--। हर चुनाव में रामराज का सपना बुनते बुनते गुरु की दाड़ी खिचड़ी से सफेद हो गई थी, बमक गये---- अरे सुनामी खाली बनरसे में हौ कि ओही बहाने बुढ़वा के धकियावल चाहत हवन एक दरे ढेला चला के भगा देहलन त का सबे भाग जाइ--। लालटेन की रोशनी में ताजी बनी भेली की चमक और चारो ओर गहराते अंधेरे में सबको सड़ रहे आलू की फिकर थी किसी ने गुरु के दुःख में अपने होंठ नही हिलाए। भेली बन चुकी थी घुटना पकड़कर पीठ सीधी करते हुए लोग अपनी-अपनी सिन्नी लेकर अँधेरे में गुम होने लगे जैसे चुनाव ख़त्म हो गया था।
कैसी सुनामी है भाई,
जो बस बनारस की सरहद में हैं समाई।
पहले एक पुराने गिद्ध को पत्थर फेंक कर भगा दिया ,
अब एक बुजुर्ग को डरा दिया।
(गावं के कोल्हाड़ पर हुई बतकही )

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