संकल्प
भ्रष्ट्राचार हमारे देश में पसरे रावण की नाभि का अमृत है। भ्रष्ट्राचार विधवाओं और विकलांगो के पेंशन में डाका डालता है। भ्रष्ट्राचार बच्चों की शिक्षा में , गरीबों के स्वास्थ्य में, बेरोजगारों के सपनों में दीवाल बनकर खड़ा है। इसका परिमाण इतना बड़ा है कि लोग शून्य लगाते लगाते गिनती भूल जाते हैं। हम इस रावण की नाभि में निशाना साध रहे हैं, आपके संबल से। नेता ने आखिरी चंद बातों से अपना सम्बोधन ख़त्म किया।
ये महानगर से मिलने को आतुर बगल के कस्बे में एक छोटी सी बैठक थी। जिसे एक डॉक्टर ने अपने नर्सिंग होम में रखी थी। दिन के तीसरे पहर सूरज की तिरछी किरणे नर्सिंग होम के गलियारे से होते हुए हाल के दरवाजे का पीछा कर रहीं थीं, जहां सामान्य किस्म की सस्ती और टिकाऊ चप्पलें बिखरी पड़ी थी । पसीने में डूबी कमीजों और मोज़े की बदबू उस बैठक पर कोई असर नही डाल रही थी। बैठक में शामिल चेहरों में सुकुमारता नहीं थी, भाषा में पाखंडी अभिजात्यता नहीं थी, ये कृषक और कमेरी जातियों के ग्रामीण बनारस के सक्रिय राजनैतिक लोग थे और इनमें से अधिकांश अपनी खेतीबारी के महत्वपूर्ण कार्यों को छोड़कर आये थे। इनमें से हर एक के पास बर्चस्ववादी संस्कृति और राजनीति के विरुद्ध संघर्ष की थाती थी। ये लोग नफरत और असहमति के इस दौर में अपने अपने बाड़े के ठगों से आहत अपनी लड़ाई को एक और धार देने के लिए वे बेसब्र थे, लेकिन आशंकित नही थे।

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