आई ० पी ० एल ० ( इंडियन पॉलिटिक्स लीग ) २०१४
दोनों भावनाओं पर खेल रहें थे और लोग धारणाओं पर लड़ रहे थे। एक के बारे में धारणा है कि वो विकास पुरुष है दूसरे के बारे में धारणा है कि वो ईमानदार है( तथ्य क्या है पता नहीं)। चुनाव के दिन गांव पर दिन भर पोलिंग स्टेशन से थोड़ी दूरी पर कुछ मित्रों के साथ एक पेंड के नीचें इसी विभाजन मे एक पक्ष चुनकर बैठा रहा। गांव सवर्ण प्रभावी है लेकिन हम चकित रह गए क्योंकि थोड़ी उम्मीद थी कि चुंकि ईमानदारी भरेँ पेट वालोँ का सवाल होना चाहिए था इसलिए वहां से कुछ लोग निकलेंगे। लेकिन सवर्ण बस्ती ने (भरे पेट वालों ने ) विकास चुना और दलित बस्ती ने ईमानदारी का पक्ष चुना।
दिहाड़ी पर जीने वाले एक मुखर दलित साथी दिन भर बैठे रहेँ और पेड़ की छाया के साथ इधर -उधर खिसकती दरी दिन भऱ गुलजार होतीं रही। ……… बाउ साहेब,गंवई काशी का चुनाव तो हमेंशा हिंदुओ के दो वर्गो के बीच होता रहा है, लात खाने वाले और लतियाने वालों के बीच ,पढ़े लिखे लोग इस गंदगी को फूल में ढँक कर परोसते रहेँ हैं। इस बार आप लोगों को लात खाने वालों के बीच में बैठे देख कर हमलोगों ने भी अपना इरादा थोड़ा बदल लिया है। मेरे एक साथी इस चुनाव में काफी सक्रिय रहे थे वो अभिभूत थे। मैं सोच रहा था कि दलितों के कितने एहसानों का बदला हिन्दू समाज चुकाएगा और चैनलों पर उपस्थित दिहाड़ी चारणों में किसी ने इस सत्य का अर्द्धांश भी कहने की हिम्मत क्यों नहीं दिखायी।
इस महान(?) धर्म की महान(?) राजधानी में सम्पन्न महान (?)पर्व में संचार माध्यमों ने धुरखेल का महान(?) फाइनल खेला। अलविदा आई ० पी ० एल ० ( इंडियन पॉलिटिक्स लीग ) २०१४ फिर मिलेंगे .......... कुछ टूटे हुए सपनों के साथ …………… कुछ खून के छींटों के साथ .......... कुछ नई उम्मीदों के साथ।


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