साझा संस्कृति मंच के तत्ववधान में आयोजित होली मिलन समारोह में शामिल होने का न्यौता था।रास्ते में चेतगंज से गोदौलिया के बीच में ६ सांड खड़े मिले चचा कुछ चुहलबाजी वाले अंदाज में बोले बनारस में इतने दिनों से रह रहा हुँ लेकिन कभी सांड़ों को गायों को दौड़ाते नही देखा, ये सब भी लगता है बनारसियों की तरह सधुआ गये है। मुझको भी चचा की बात में दम लगा कि चाहे संकटमोचन में बम फेंको या मंदिर के गेट पर अंडा फेंको अब बनारसी लोग भी बनारसी सांड़ों की मुद्रा में आ गये है ।
हम कुछ जल्दी पहुंच गये थे । अस्सी घाट पर एक न्यूज चैनल का ब्यवसायिक चुनाव चर्चा कार्यक्रम चालू था, कुर्सियां खाली थी ऒयोजको में सम्मिलित एक लड़की दौड़ कर आयी, बैठने का निवेदन करने लगी लेकिन हम तो तमाशा देखने के मूड में थे और एक किनारे बैठ तमाशा देखने लगे। जैसा अक्सर दिखाया जाता है, बहस को घेर कर बड़े पहलवान बनाम नये पहलवान पर केंद्रित करके डब्लू ० डब्लू ० एफ ० चल रहा था। बड़ा पहलवान ज्यादा बिकाऊ है इसलिए उसको कुश्ती जीतना दिखाना जरूरी था, लेकिन नया पहलवान सनसनी पैदा कर रहा था इसलिए उसको दिखाना भी मजबूरी था।
प्रोग्राम ख़त्म होते होते सूरज गंगा को तिरछी नजर से देखने लगा था, तबतक चंचल जी सायकिल पर दरी बाधे और फादर अपने दल के साथ आ चुके थे। शाम ढलते ढलते दरी बिछ चुकी थी और अफलातून की बुलंद आवाज में लल्लन यादव जी की मसहूर कविता ---गलत मत कदम उठाओ सोच कर चलो , विचार कर चलो ---से घाट गूंजने लगा। घाट पर ऊंचाई से आ रही रोशनी में सलीम शिवालवी का गरजती आवाज में धुंधली रोशनी में झूमकर कविता पाठ लोगों को ठिठकने के लिए मजबूर कर रहा था और बनारस पूरी रौं में गंगा के किनारे बह रहा था।
बनारसी भोजपुरी में -- लोग बहुते महान हो जालन, लड़िकनो सयान हो जालन , माह फागुन क हाल मत पूछा , एम्मे बुड़वो जवान हो जालन -- सलीम शिवालवी


टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें