शनिवार, 25 अक्टूबर 2014

नया दिन


भोर  की  गुनगुनी ठंड गर्म चादर तलाश  रही थी।  सूरज की किरणें आँगन तक पहुंची तो सोया हुआ बचपन आँखे मींचते जागा  और रात के सुनहरे ख्वाबों को ढूढ़ने लगा। कुछ अधजली मोमबत्तियों और दगे हुए पटाखों की लुगदी में. जिन्दा बमों को ढूढ़ते  बच्चे दीपावली की रात में खर्च हो चुके उल्लास में से बची खुची खुशियाँ तलाश रहे थे।  मुंडेर पर उगी घास में टंगी झिलमिलाती ओस की बूंदे बुझे हुए दीपक को  चिढ़ा रहीं थी, नया दिन दस्तक दे चुका था।   


  

रविवार, 19 अक्टूबर 2014

कुत्ता, कैंची और सायकिल



 नेट पैक ख़त्म होने लगता है  तो सर्च करने वाला चक्र कभी इतना धीमे घूमता है जैसे उसकी बेयरिंग फूट गयी है  और  कभी निर्रथक इतना तेज चलता है जैसे उसका कुत्ता फेल हो गया है।
कुत्ता समझ रहें हैं न, अरे वो कुत्ता नही जिसकी जंजीर पकड़ कर सुसंकृत  लोग मॉर्निंग वाक करते हैं।
  एक कुत्ता सायकिल के धुर्री में होता है, जिसके फेल होने पर सिर्फ पैडिल ही घूमती है पहिया नही घूमता है।  कही आप ये तो नही समझने रहे हैं  कि हमारे लोकतंत्र का भी  कुत्ता फेल हो गया है ?
   इसी तरह  कैंची चलाने का मतलब  सिर्फ कपड़ा  काटना नही  होता  है या नेताओं और टीवी एंकरों का जबान चलाना ही  नही होता है  । बचपन में  जब पांव सीट पर बैठकर पैडिल तक नही पहुँचते है तो सायकिल के त्रिभुजाकार फ्रेम में घुसकर तिरछे होकर सायकिल चलाने की कला को " कैंची चलाना " कहते हैं। 
 दरअसल सायकिल हम गरीबों की जिंदगी में इतना रची बसी है की उसके प्रतीकों को लेकर ही हम अपना वर्तमान गाहे बगाहे अचेतन में रचते रहते  हैं। 
    किसी तरह पैडिल तक पहुंच कर पांव मारते डगमगाते हुए हैंडिल को संभालने की कला देखिये आपको हर बच्चे में एक  जिमनास्ट नजर आएगा। डगमगाती हैंडल संभालकर डबल सवारी खीचने के रोमांच और पेट्रोल की ताकत से सड़क पर गाड़ी दौड़ाते आज के नवाबजादों के रोमांच में मेरे हिसाब से फर्क  शारीरिक श्रम का है जो सायकिल चलाने वालों को और बहुत कुछ सिखाता है, जिससे पेट्रोल की ताकत से दौड़ने वाले नवाबजादे वंचित रह जाते है, बेचारे  ।
  एक पांव पैडल पर रखकर सायकिल दौड़ाते हुए सीट पर चढ़ने की कोशिश में  बार बार गिरना  और चोट सहलाते हुए देखना  कि कोई परिचित देख तो नही रहा है ।  कैरियर में झोला दबा  कर स्कूल जाना और लौटते समय  पहिया पंचर होने पर भूख से ब्याकुल मन से छुट्टी होने की ख़ुशी का भक्क से उड़ जाना। आगे निकलते  साथियों का  घंटी बजा बजा कर चिढ़ाना । ऐसे बहुतेरे अविस्मरणीय पल सायकिल देती रही है, जिससे पन्नें रंगे जा सकते हैं और आप बिना पढ़े लाइक करके आगे बढ़ सकते हैं।
   गेंहू पिसाने की बोरी हो, खेत में ले जाने वाली खाद की बोरी हो या नजदीक की मंडी में बेचने के लिए ढोया जा रहा अनाज हो सायकिल  हमारे इतना काम आइ जितना इसको बनाने  वाले ने सपनें में भी नही सोचा होगा।  और हा जब किसी गरीब दलित घर का किशोर अपने घर की जिम्मेदारियों में अपना कंधा लगाना चाहा   तो सायकिल  मरम्मत का हुनर उसकी उम्मीद  बना।
 मेरे बाबा (दादा ) बीसवीं सदी की शुरुआती दहाई में पैदा हुए थे उन्होंने सायकिल को रईसों की सवारी से गरीबों की सवारी बनते देखा था , वो कभी-कभार सायकिल के बहु उपयोगी होने को उसकी प्रतिष्ठा का अपमान समझ कर आह भरा करते थे। 
सुनसान पगडण्डी हो या किसी बाजार का उपेक्षित कोना, सायकिल मरम्मत की दुकान से उसको कोई  किशोर  या कोई  अधेड़ अपने हुनर से गुलजार कर देता है । पहले सायकिल मरम्मत करने वाले मुफ्त में ही बच्चों की सायकिल में हवा भरा करते थे और ये मुफ्त का काम उनके प्रतिदिन के जीवन का जरूरी हिस्सा हुआ करता था, मेरी समझ में यही काम करके कितने समाजसेवी पुरस्कार लेने की लाइन में खड़े हो सकते हैं  या लॉबिंग कर सकते हैं लेकिन मैले कुचैले कपड़े और बिखरे बालों वालों के इस काम को कितने लोगों ने  सहृदयता से धन्यवाद देने लायक भी समझा है ?
   ए भाई जरा हैंडल ठीक कर दो , ए लड़के जरा ब्रेक टाइट कर दो, दिन में हिकारत से भरी गरजती आवाजें अँधेरा होते होते पंचर बनवाने के लिए रिरियाने लगती है  ।
   सायकिल तुम हमारे कितने चेहरों की गवाह रही हो। 

शनिवार, 11 अक्टूबर 2014

    अँधेरा होते होते सड़क पिपहरियों और बांसुरियों की धुन में मगन थी । गुब्बारों की विभिन्न आकृतियों को रगड़ने से निकलने वाली तीखी आवाज से भड़क कर जानवर अपनी  पगुरी रोक  करके खड़े हो गए थे । खरीददारी करके लौटी बेटियों के आँगन में पहुँचते ही तलाशी शुरू हो गयी थी । मूंगफली, रेवड़ी, सफेद बाल वाली मिठाई, चूड़ी, आलता, गृहस्थी का छोटा-मोटा सामान क्या नहीं था इन झोलियों में । मेले से लौटी किशोरियों के चहकने में  दुल्हनों को अपने नैहर का मेला याद आ रहा था, तो दरवाजे पर बैठे वयस्क गुब्बारे फोड़ते बच्चों को देखकर अपना बचपन याद कर रहे थे । कुछ कंधे पर बच्चों को लादे पान चुआते महंगाई का रोना रोते हुए वापस चले आ रहे थे तो कुछ बहुत दिनों बाद मिले परदेशियों से हालचाल कर रहे थे । मेला महीनों के इंतजार के बाद कब शुरू हुआ और कब ख़त्म हुआ पता ही नहीं चला लेकिन गांव इस थोड़े से वक्त के लिए रेँड़ा पर आ रहे धान की प्यास को भूल गया था । 









डर लग रहा है ? इन लोगों ने नोबेल देकर तुमको उम्मीदों के एवरेस्ट पर खड़ा कर दिया है।  जहाँ से गिरने की त्रासदी बगदादियों की फौज को ज्यादे मारक हथियार मुहैया कराएगी , लेकिन तुम्हारे शिखर पर बने रहने तक शायद बगदादियों के खिलाफ खड़ी जमात को ऊर्जा मिलती रहे।  इसी आशा के साथ ……… शुभकामना।











मंगलवार, 9 सितंबर 2014


अगर फूट के न निकले
बिना किसी वजह के
मत लिखो …
अगर पैसे के लिए
शोहरत के लिए लिख रहे हो
मत लिखो …
अगर लिख रहे हो
कि यह रास्ता है
किसी औरत को बिस्तर तक लाने का
तो मत लिखो …
दुनिया भर की लाइब्रेरियां
त्रस्त हो चुकीं हैं
तुम्हारी कौम से
मत बढ़ाओ इसे……
तुम्हे पूरे चाँद की  रात के भेड़िये सा
नही कर देता पागल या हत्यारा
जब तक कि तुम्हारी नाभि का सूरज
तुम्हारे कमरे में आग नहीं लगा देता
मत मत मत लिखो … ( चार्ल्स बुकोस्की )
कैसा इत्तफाक है जब मैं एक पत्रिका में ये कविता पढ़ रहा था तभी गूगल बाबा ने याद दिलाया आज टालस्टाय का जन्मदिन है और  लगभग 20 साल पहले पढ़ी  युद्ध और शांति, अन्ना केरिनिन्ना की भूली बिसरी यादो को सहेजने लगा।  एक अहिंसक विश्व का स्वप्नदर्शी बिना लिखे कैसे एक मशाल बनता जिसमें  मानवता  अँधेरे में अपना रास्ता तलाशती।




सोमवार, 12 मई 2014

    आई ० पी ० एल ० ( इंडियन पॉलिटिक्स लीग ) २०१४ 

दोनों भावनाओं पर खेल रहें थे और लोग धारणाओं पर लड़ रहे थे।  एक के बारे में धारणा है  कि वो विकास पुरुष है दूसरे के बारे में धारणा है  कि वो ईमानदार है( तथ्य क्या है पता नहीं)।  चुनाव के दिन गांव पर दिन भर  पोलिंग स्टेशन से थोड़ी दूरी पर कुछ मित्रों के साथ एक पेंड के नीचें इसी विभाजन मे एक पक्ष चुनकर बैठा रहा।  गांव सवर्ण प्रभावी है लेकिन हम चकित रह गए क्योंकि थोड़ी उम्मीद थी कि चुंकि ईमानदारी भरेँ पेट वालोँ का सवाल होना चाहिए था इसलिए वहां से कुछ लोग निकलेंगे।   लेकिन सवर्ण बस्ती  ने  (भरे पेट वालों ने  ) विकास चुना और दलित बस्ती ने  ईमानदारी का पक्ष चुना।
      दिहाड़ी पर जीने वाले एक मुखर दलित साथी दिन भर बैठे रहेँ और पेड़ की छाया के साथ इधर -उधर खिसकती  दरी दिन भऱ गुलजार होतीं रही।  ……… बाउ साहेब,गंवई  काशी का चुनाव तो हमेंशा हिंदुओ के दो वर्गो के बीच होता रहा है,  लात खाने वाले और  लतियाने वालों के बीच ,पढ़े लिखे लोग इस गंदगी को फूल में ढँक कर परोसते रहेँ हैं।   इस बार आप लोगों को लात खाने वालों के बीच में बैठे देख कर हमलोगों ने भी अपना इरादा थोड़ा बदल लिया है।  मेरे एक साथी इस चुनाव में काफी सक्रिय रहे थे वो अभिभूत थे। मैं सोच रहा था कि दलितों के कितने एहसानों का बदला हिन्दू समाज चुकाएगा और  चैनलों पर उपस्थित दिहाड़ी चारणों में किसी ने इस सत्य का अर्द्धांश भी कहने की हिम्मत क्यों नहीं दिखायी।  
    इस महान(?) धर्म की महान(?) राजधानी में सम्पन्न महान (?)पर्व में संचार माध्यमों ने धुरखेल  का महान(?) फाइनल खेला। अलविदा आई ० पी ० एल ० ( इंडियन पॉलिटिक्स लीग ) २०१४ फिर मिलेंगे .......... कुछ टूटे हुए सपनों के साथ …………… कुछ खून के छींटों के साथ .......... कुछ नई उम्मीदों के साथ। 




शनिवार, 10 मई 2014

मानवीय मुनाफा 

   किसी भी फैक्ट्री  उत्पाद के उपभोक्ता को ये जानकारी मिलनी चाहिए कि उत्पाद की वास्तविक लागत क़्या है, जिससे उपभोक्ता को पता लग सके कि  उससे कितना मुनाफा लिया जां रहा है ।  इसके साथ ही किसी फैक्ट्री उत्पाद के वास्तविक मूल्य के आँकलन के लिये एक राष्ट्रीय आयोग भी गठित होना चाहिए, जिसके द्वारा निर्धारित वास्तविक मूल्य को ऍम ० आर ० पी ० के साथ अंकित किया जाना अनिवार्य होना  चाहिए।  किसी उत्पाद  के लागत मूल्य को जानने और उस उत्पाद पर लिये जा रहे मुनाफे को जानने का अधिकार उपभोक्ता को मिलना, मुनाफे के न्यायपूर्ण मानकीकरण की तरफ एक मजबूत कदम होगा। साथियों से अनुरोध है कि इसपर अपने महत्वपूर्ण सुझाव अवश्य अंकित करेँ- संतोष कुमार।  



बुधवार, 23 अप्रैल 2014

बर टूट
क्या हुआ ? क्या बुदबुदा रहें है ?
अरे देखिये न.……
देश बदलना चाहते हैं, ……… लेकिन सड़क पर नहीं निकलेंगे।
सरकार बदलना चाहते हैं.………  लेकिन बूथ पर नहीं जायेंगे।
सफाई करना चाहते हैं.………… लेकिन झाड़ू नहीं थामेंगे।
आज राय साहब नहीं दिखाई दे रहे हैं चचा ?
अरे ………… उनको राजनीति का बर टूट हो गया है। 

एक तरफ बिरादरी है, एक तरफ धर्म है, एक तरफ समाज है,  समझे में नहीं आ रहा है किधर करवट लें......... चचा की हल्की मुस्कराहट में डूबे ब्यंग का मजा लेकर अगल बगल का माहौल शरारती हो गया।
किसी ने आवाज लगाई,…………………… का सरदार तोहू देखायल रहल ह रैलिया में ,
बिरादरी क सरकार बा तोहके त ना रहे के चाही ?
 छोड़ा जाति बिरादरी के बात एतना त  हमहनो जानिला कि .......... के लड़े वाला पहलवान हौ ……  अउर के खाली मिट्टी लगा के घूमत हौ।
सरदार के जवाब से लाजबाब लोग अपना-अपना बीड़ा दबाकर चल दिए। 

सोमवार, 14 अप्रैल 2014

   संकल्प   
   भ्रष्ट्राचार हमारे देश में पसरे रावण की नाभि का अमृत है। भ्रष्ट्राचार विधवाओं और विकलांगो के पेंशन में डाका डालता है।  भ्रष्ट्राचार बच्चों की शिक्षा में , गरीबों के स्वास्थ्य में, बेरोजगारों के सपनों में दीवाल बनकर खड़ा है।  इसका परिमाण इतना बड़ा है कि लोग शून्य  लगाते लगाते गिनती भूल जाते हैं। हम इस रावण की   नाभि में निशाना साध रहे हैं, आपके संबल से।  नेता ने  आखिरी चंद बातों से अपना सम्बोधन ख़त्म किया।       
   ये  महानगर से मिलने को आतुर बगल के कस्बे में एक छोटी सी बैठक थी।   जिसे  एक डॉक्टर ने अपने नर्सिंग होम में रखी थी। दिन के  तीसरे  पहर सूरज की तिरछी किरणे नर्सिंग होम के गलियारे से होते हुए  हाल के दरवाजे  का पीछा कर रहीं थीं, जहां सामान्य किस्म की सस्ती और टिकाऊ चप्पलें बिखरी पड़ी थी । पसीने में डूबी कमीजों  और मोज़े की बदबू उस बैठक पर कोई असर नही डाल रही थी।  बैठक में शामिल चेहरों में सुकुमारता नहीं थी, भाषा में पाखंडी अभिजात्यता नहीं थी, ये कृषक और कमेरी जातियों के ग्रामीण बनारस के सक्रिय राजनैतिक लोग थे और  इनमें से अधिकांश अपनी खेतीबारी के महत्वपूर्ण कार्यों को छोड़कर आये थे।  इनमें से हर एक के पास  बर्चस्ववादी संस्कृति और राजनीति के विरुद्ध संघर्ष की थाती थी। ये लोग  नफरत और असहमति के इस दौर में अपने अपने बाड़े के ठगों से आहत अपनी लड़ाई को एक और धार देने के लिए वे  बेसब्र थे, लेकिन आशंकित नही थे।

मैं उनकी दृढ़ता और संकल्पो को महसूस करते हुए  सोच रहा था 1857 के उन स्वतः स्फूर्त विद्रोहियों के बारे में जिन्होंने कभी जमीन के मिल्कियत या सैनिकों की तनख्वाह के सवाल पर बहादुर शाह जफर या तात्या टोपे से कोई आश्वासन नही लिया होगा, वो बस इस जिद पर लड़े होंगे कि यही एकजुटता हमारे अगले सवालों का जवाब भी निकलेगी और इसी विश्वास ने उनको इस महादेश के रास्तो में खड़े विशाल वृक्षों की शाखाओं पर फांसी के झूले पर झूलने का साहस दिया होगा।          

जेन जी के द्वन्द

सुबह उठकर चाय बनाने के लिए फ्रिज से दूध निकालते समय देखा कि दूध पर मलाई की एक मोटी परत जमी है, जिसको निकालकर अलग एक बरतन में रखा जिसमें लगात...