बुधवार, 19 नवंबर 2014

कोई पत्थर से ना मारे मेरे दीवाने को


  रेडियों पर एक पुराना फ़िल्मी गीत बज रहा था " कोई पत्थर से ना मारे मेरे दीवाने को " किशोरावस्था में इस सुपर हिट फ़िल्मी गीत के बोल और रंजीता का मासूमियत भरा अभिनय देख सुन कर लगता था जमाना बस दो प्रेमियों के साथ खिलवाड़ कर रहा है और वो बस ऐसे ही गीत गाकर भीड़ से अपने  प्रेमी को बचा  लेगी।  इस गीत को देखने सुनने में कहीं भी संगेमार की भयावहता नही महसूस होती थी।  आज मध्यपूर्व की इस क्रूर परम्परा को जानसुनकर महसूस होता है कि बंबइया फिल्में क्रूरतम चीजों कों भी मांसल सौंदर्य में लपेट कर ऐसे परोसती हैं कि हम किसी कुप्रथा को भी बहुत सहजता से लेने लगते हैं , चाहे वो धार्मिक या जातीय  भेदभाव हो , दहेज प्रथा हो , आर्थिक विषमता हो या कोई और गंभीर समस्या। इसी प्रकार गैर हिंदी भाषी या नारी स्वतंत्रता, गंवई ब्यक्ति प्रायः इनके उपहास का पात्र होता है। दरअसल  तस्करी और कालेधन के बलपर बनने वाली अधिकांश फिल्मों  ने हमारी भाषा पर ऐसा प्रभाव डाला है कि हमने अपनी अगली पीढ़ियों के लिए तमाम  फर्जी नायक, महानायक या सदी नायक रच डाले  है। काले धन को सफेद करते ये फर्जी नायक या  महानायक अपनी इंड्रस्ट्री को भी इतना लूट लेते हैं कि इस इंड्रस्ट्री के छोटे मोटे  कर्मचारियों के  आवश्यक आवश्यकताओं  की पूर्ति भी नहीं हो पाती और हम इन भाँडो पर तालियां बजाकर नायकत्व का दर्जा देते रहते हैं।  समाज के इन धूर्त  नायकों के चरित्र की  निरंतर चीरफाड़ भी उतनी ही जरूरी  है, जितना राजनीति या जीवन के अन्य क्षेत्र के धूर्तों के लिए जरूरी  है । कुछ साथी सोच सकते हैं कि इनको गंभीरता से लेने की क्या जरूरत है, उनसे मेरा निवेदन है कि आप इनको गंभीरता से लें या ना लें,आपकी  परिधि के बाहर इनको गंभीरता से लिया जाता है।


शनिवार, 25 अक्टूबर 2014

नया दिन


भोर  की  गुनगुनी ठंड गर्म चादर तलाश  रही थी।  सूरज की किरणें आँगन तक पहुंची तो सोया हुआ बचपन आँखे मींचते जागा  और रात के सुनहरे ख्वाबों को ढूढ़ने लगा। कुछ अधजली मोमबत्तियों और दगे हुए पटाखों की लुगदी में. जिन्दा बमों को ढूढ़ते  बच्चे दीपावली की रात में खर्च हो चुके उल्लास में से बची खुची खुशियाँ तलाश रहे थे।  मुंडेर पर उगी घास में टंगी झिलमिलाती ओस की बूंदे बुझे हुए दीपक को  चिढ़ा रहीं थी, नया दिन दस्तक दे चुका था।   


  

रविवार, 19 अक्टूबर 2014

कुत्ता, कैंची और सायकिल



 नेट पैक ख़त्म होने लगता है  तो सर्च करने वाला चक्र कभी इतना धीमे घूमता है जैसे उसकी बेयरिंग फूट गयी है  और  कभी निर्रथक इतना तेज चलता है जैसे उसका कुत्ता फेल हो गया है।
कुत्ता समझ रहें हैं न, अरे वो कुत्ता नही जिसकी जंजीर पकड़ कर सुसंकृत  लोग मॉर्निंग वाक करते हैं।
  एक कुत्ता सायकिल के धुर्री में होता है, जिसके फेल होने पर सिर्फ पैडिल ही घूमती है पहिया नही घूमता है।  कही आप ये तो नही समझने रहे हैं  कि हमारे लोकतंत्र का भी  कुत्ता फेल हो गया है ?
   इसी तरह  कैंची चलाने का मतलब  सिर्फ कपड़ा  काटना नही  होता  है या नेताओं और टीवी एंकरों का जबान चलाना ही  नही होता है  । बचपन में  जब पांव सीट पर बैठकर पैडिल तक नही पहुँचते है तो सायकिल के त्रिभुजाकार फ्रेम में घुसकर तिरछे होकर सायकिल चलाने की कला को " कैंची चलाना " कहते हैं। 
 दरअसल सायकिल हम गरीबों की जिंदगी में इतना रची बसी है की उसके प्रतीकों को लेकर ही हम अपना वर्तमान गाहे बगाहे अचेतन में रचते रहते  हैं। 
    किसी तरह पैडिल तक पहुंच कर पांव मारते डगमगाते हुए हैंडिल को संभालने की कला देखिये आपको हर बच्चे में एक  जिमनास्ट नजर आएगा। डगमगाती हैंडल संभालकर डबल सवारी खीचने के रोमांच और पेट्रोल की ताकत से सड़क पर गाड़ी दौड़ाते आज के नवाबजादों के रोमांच में मेरे हिसाब से फर्क  शारीरिक श्रम का है जो सायकिल चलाने वालों को और बहुत कुछ सिखाता है, जिससे पेट्रोल की ताकत से दौड़ने वाले नवाबजादे वंचित रह जाते है, बेचारे  ।
  एक पांव पैडल पर रखकर सायकिल दौड़ाते हुए सीट पर चढ़ने की कोशिश में  बार बार गिरना  और चोट सहलाते हुए देखना  कि कोई परिचित देख तो नही रहा है ।  कैरियर में झोला दबा  कर स्कूल जाना और लौटते समय  पहिया पंचर होने पर भूख से ब्याकुल मन से छुट्टी होने की ख़ुशी का भक्क से उड़ जाना। आगे निकलते  साथियों का  घंटी बजा बजा कर चिढ़ाना । ऐसे बहुतेरे अविस्मरणीय पल सायकिल देती रही है, जिससे पन्नें रंगे जा सकते हैं और आप बिना पढ़े लाइक करके आगे बढ़ सकते हैं।
   गेंहू पिसाने की बोरी हो, खेत में ले जाने वाली खाद की बोरी हो या नजदीक की मंडी में बेचने के लिए ढोया जा रहा अनाज हो सायकिल  हमारे इतना काम आइ जितना इसको बनाने  वाले ने सपनें में भी नही सोचा होगा।  और हा जब किसी गरीब दलित घर का किशोर अपने घर की जिम्मेदारियों में अपना कंधा लगाना चाहा   तो सायकिल  मरम्मत का हुनर उसकी उम्मीद  बना।
 मेरे बाबा (दादा ) बीसवीं सदी की शुरुआती दहाई में पैदा हुए थे उन्होंने सायकिल को रईसों की सवारी से गरीबों की सवारी बनते देखा था , वो कभी-कभार सायकिल के बहु उपयोगी होने को उसकी प्रतिष्ठा का अपमान समझ कर आह भरा करते थे। 
सुनसान पगडण्डी हो या किसी बाजार का उपेक्षित कोना, सायकिल मरम्मत की दुकान से उसको कोई  किशोर  या कोई  अधेड़ अपने हुनर से गुलजार कर देता है । पहले सायकिल मरम्मत करने वाले मुफ्त में ही बच्चों की सायकिल में हवा भरा करते थे और ये मुफ्त का काम उनके प्रतिदिन के जीवन का जरूरी हिस्सा हुआ करता था, मेरी समझ में यही काम करके कितने समाजसेवी पुरस्कार लेने की लाइन में खड़े हो सकते हैं  या लॉबिंग कर सकते हैं लेकिन मैले कुचैले कपड़े और बिखरे बालों वालों के इस काम को कितने लोगों ने  सहृदयता से धन्यवाद देने लायक भी समझा है ?
   ए भाई जरा हैंडल ठीक कर दो , ए लड़के जरा ब्रेक टाइट कर दो, दिन में हिकारत से भरी गरजती आवाजें अँधेरा होते होते पंचर बनवाने के लिए रिरियाने लगती है  ।
   सायकिल तुम हमारे कितने चेहरों की गवाह रही हो। 

शनिवार, 11 अक्टूबर 2014

    अँधेरा होते होते सड़क पिपहरियों और बांसुरियों की धुन में मगन थी । गुब्बारों की विभिन्न आकृतियों को रगड़ने से निकलने वाली तीखी आवाज से भड़क कर जानवर अपनी  पगुरी रोक  करके खड़े हो गए थे । खरीददारी करके लौटी बेटियों के आँगन में पहुँचते ही तलाशी शुरू हो गयी थी । मूंगफली, रेवड़ी, सफेद बाल वाली मिठाई, चूड़ी, आलता, गृहस्थी का छोटा-मोटा सामान क्या नहीं था इन झोलियों में । मेले से लौटी किशोरियों के चहकने में  दुल्हनों को अपने नैहर का मेला याद आ रहा था, तो दरवाजे पर बैठे वयस्क गुब्बारे फोड़ते बच्चों को देखकर अपना बचपन याद कर रहे थे । कुछ कंधे पर बच्चों को लादे पान चुआते महंगाई का रोना रोते हुए वापस चले आ रहे थे तो कुछ बहुत दिनों बाद मिले परदेशियों से हालचाल कर रहे थे । मेला महीनों के इंतजार के बाद कब शुरू हुआ और कब ख़त्म हुआ पता ही नहीं चला लेकिन गांव इस थोड़े से वक्त के लिए रेँड़ा पर आ रहे धान की प्यास को भूल गया था । 









डर लग रहा है ? इन लोगों ने नोबेल देकर तुमको उम्मीदों के एवरेस्ट पर खड़ा कर दिया है।  जहाँ से गिरने की त्रासदी बगदादियों की फौज को ज्यादे मारक हथियार मुहैया कराएगी , लेकिन तुम्हारे शिखर पर बने रहने तक शायद बगदादियों के खिलाफ खड़ी जमात को ऊर्जा मिलती रहे।  इसी आशा के साथ ……… शुभकामना।











मंगलवार, 9 सितंबर 2014


अगर फूट के न निकले
बिना किसी वजह के
मत लिखो …
अगर पैसे के लिए
शोहरत के लिए लिख रहे हो
मत लिखो …
अगर लिख रहे हो
कि यह रास्ता है
किसी औरत को बिस्तर तक लाने का
तो मत लिखो …
दुनिया भर की लाइब्रेरियां
त्रस्त हो चुकीं हैं
तुम्हारी कौम से
मत बढ़ाओ इसे……
तुम्हे पूरे चाँद की  रात के भेड़िये सा
नही कर देता पागल या हत्यारा
जब तक कि तुम्हारी नाभि का सूरज
तुम्हारे कमरे में आग नहीं लगा देता
मत मत मत लिखो … ( चार्ल्स बुकोस्की )
कैसा इत्तफाक है जब मैं एक पत्रिका में ये कविता पढ़ रहा था तभी गूगल बाबा ने याद दिलाया आज टालस्टाय का जन्मदिन है और  लगभग 20 साल पहले पढ़ी  युद्ध और शांति, अन्ना केरिनिन्ना की भूली बिसरी यादो को सहेजने लगा।  एक अहिंसक विश्व का स्वप्नदर्शी बिना लिखे कैसे एक मशाल बनता जिसमें  मानवता  अँधेरे में अपना रास्ता तलाशती।




सोमवार, 12 मई 2014

    आई ० पी ० एल ० ( इंडियन पॉलिटिक्स लीग ) २०१४ 

दोनों भावनाओं पर खेल रहें थे और लोग धारणाओं पर लड़ रहे थे।  एक के बारे में धारणा है  कि वो विकास पुरुष है दूसरे के बारे में धारणा है  कि वो ईमानदार है( तथ्य क्या है पता नहीं)।  चुनाव के दिन गांव पर दिन भर  पोलिंग स्टेशन से थोड़ी दूरी पर कुछ मित्रों के साथ एक पेंड के नीचें इसी विभाजन मे एक पक्ष चुनकर बैठा रहा।  गांव सवर्ण प्रभावी है लेकिन हम चकित रह गए क्योंकि थोड़ी उम्मीद थी कि चुंकि ईमानदारी भरेँ पेट वालोँ का सवाल होना चाहिए था इसलिए वहां से कुछ लोग निकलेंगे।   लेकिन सवर्ण बस्ती  ने  (भरे पेट वालों ने  ) विकास चुना और दलित बस्ती ने  ईमानदारी का पक्ष चुना।
      दिहाड़ी पर जीने वाले एक मुखर दलित साथी दिन भर बैठे रहेँ और पेड़ की छाया के साथ इधर -उधर खिसकती  दरी दिन भऱ गुलजार होतीं रही।  ……… बाउ साहेब,गंवई  काशी का चुनाव तो हमेंशा हिंदुओ के दो वर्गो के बीच होता रहा है,  लात खाने वाले और  लतियाने वालों के बीच ,पढ़े लिखे लोग इस गंदगी को फूल में ढँक कर परोसते रहेँ हैं।   इस बार आप लोगों को लात खाने वालों के बीच में बैठे देख कर हमलोगों ने भी अपना इरादा थोड़ा बदल लिया है।  मेरे एक साथी इस चुनाव में काफी सक्रिय रहे थे वो अभिभूत थे। मैं सोच रहा था कि दलितों के कितने एहसानों का बदला हिन्दू समाज चुकाएगा और  चैनलों पर उपस्थित दिहाड़ी चारणों में किसी ने इस सत्य का अर्द्धांश भी कहने की हिम्मत क्यों नहीं दिखायी।  
    इस महान(?) धर्म की महान(?) राजधानी में सम्पन्न महान (?)पर्व में संचार माध्यमों ने धुरखेल  का महान(?) फाइनल खेला। अलविदा आई ० पी ० एल ० ( इंडियन पॉलिटिक्स लीग ) २०१४ फिर मिलेंगे .......... कुछ टूटे हुए सपनों के साथ …………… कुछ खून के छींटों के साथ .......... कुछ नई उम्मीदों के साथ। 




शनिवार, 10 मई 2014

मानवीय मुनाफा 

   किसी भी फैक्ट्री  उत्पाद के उपभोक्ता को ये जानकारी मिलनी चाहिए कि उत्पाद की वास्तविक लागत क़्या है, जिससे उपभोक्ता को पता लग सके कि  उससे कितना मुनाफा लिया जां रहा है ।  इसके साथ ही किसी फैक्ट्री उत्पाद के वास्तविक मूल्य के आँकलन के लिये एक राष्ट्रीय आयोग भी गठित होना चाहिए, जिसके द्वारा निर्धारित वास्तविक मूल्य को ऍम ० आर ० पी ० के साथ अंकित किया जाना अनिवार्य होना  चाहिए।  किसी उत्पाद  के लागत मूल्य को जानने और उस उत्पाद पर लिये जा रहे मुनाफे को जानने का अधिकार उपभोक्ता को मिलना, मुनाफे के न्यायपूर्ण मानकीकरण की तरफ एक मजबूत कदम होगा। साथियों से अनुरोध है कि इसपर अपने महत्वपूर्ण सुझाव अवश्य अंकित करेँ- संतोष कुमार।  



बुधवार, 23 अप्रैल 2014

बर टूट
क्या हुआ ? क्या बुदबुदा रहें है ?
अरे देखिये न.……
देश बदलना चाहते हैं, ……… लेकिन सड़क पर नहीं निकलेंगे।
सरकार बदलना चाहते हैं.………  लेकिन बूथ पर नहीं जायेंगे।
सफाई करना चाहते हैं.………… लेकिन झाड़ू नहीं थामेंगे।
आज राय साहब नहीं दिखाई दे रहे हैं चचा ?
अरे ………… उनको राजनीति का बर टूट हो गया है। 

एक तरफ बिरादरी है, एक तरफ धर्म है, एक तरफ समाज है,  समझे में नहीं आ रहा है किधर करवट लें......... चचा की हल्की मुस्कराहट में डूबे ब्यंग का मजा लेकर अगल बगल का माहौल शरारती हो गया।
किसी ने आवाज लगाई,…………………… का सरदार तोहू देखायल रहल ह रैलिया में ,
बिरादरी क सरकार बा तोहके त ना रहे के चाही ?
 छोड़ा जाति बिरादरी के बात एतना त  हमहनो जानिला कि .......... के लड़े वाला पहलवान हौ ……  अउर के खाली मिट्टी लगा के घूमत हौ।
सरदार के जवाब से लाजबाब लोग अपना-अपना बीड़ा दबाकर चल दिए। 

सोमवार, 14 अप्रैल 2014

   संकल्प   
   भ्रष्ट्राचार हमारे देश में पसरे रावण की नाभि का अमृत है। भ्रष्ट्राचार विधवाओं और विकलांगो के पेंशन में डाका डालता है।  भ्रष्ट्राचार बच्चों की शिक्षा में , गरीबों के स्वास्थ्य में, बेरोजगारों के सपनों में दीवाल बनकर खड़ा है।  इसका परिमाण इतना बड़ा है कि लोग शून्य  लगाते लगाते गिनती भूल जाते हैं। हम इस रावण की   नाभि में निशाना साध रहे हैं, आपके संबल से।  नेता ने  आखिरी चंद बातों से अपना सम्बोधन ख़त्म किया।       
   ये  महानगर से मिलने को आतुर बगल के कस्बे में एक छोटी सी बैठक थी।   जिसे  एक डॉक्टर ने अपने नर्सिंग होम में रखी थी। दिन के  तीसरे  पहर सूरज की तिरछी किरणे नर्सिंग होम के गलियारे से होते हुए  हाल के दरवाजे  का पीछा कर रहीं थीं, जहां सामान्य किस्म की सस्ती और टिकाऊ चप्पलें बिखरी पड़ी थी । पसीने में डूबी कमीजों  और मोज़े की बदबू उस बैठक पर कोई असर नही डाल रही थी।  बैठक में शामिल चेहरों में सुकुमारता नहीं थी, भाषा में पाखंडी अभिजात्यता नहीं थी, ये कृषक और कमेरी जातियों के ग्रामीण बनारस के सक्रिय राजनैतिक लोग थे और  इनमें से अधिकांश अपनी खेतीबारी के महत्वपूर्ण कार्यों को छोड़कर आये थे।  इनमें से हर एक के पास  बर्चस्ववादी संस्कृति और राजनीति के विरुद्ध संघर्ष की थाती थी। ये लोग  नफरत और असहमति के इस दौर में अपने अपने बाड़े के ठगों से आहत अपनी लड़ाई को एक और धार देने के लिए वे  बेसब्र थे, लेकिन आशंकित नही थे।

मैं उनकी दृढ़ता और संकल्पो को महसूस करते हुए  सोच रहा था 1857 के उन स्वतः स्फूर्त विद्रोहियों के बारे में जिन्होंने कभी जमीन के मिल्कियत या सैनिकों की तनख्वाह के सवाल पर बहादुर शाह जफर या तात्या टोपे से कोई आश्वासन नही लिया होगा, वो बस इस जिद पर लड़े होंगे कि यही एकजुटता हमारे अगले सवालों का जवाब भी निकलेगी और इसी विश्वास ने उनको इस महादेश के रास्तो में खड़े विशाल वृक्षों की शाखाओं पर फांसी के झूले पर झूलने का साहस दिया होगा।          

सोमवार, 31 मार्च 2014

हाशिया पर  लकड़बग्घा मिल गया। 

उस समय तुम कुछ नहीं कर सकोगे

अब लकड़बग्घा
बिल्कुल तुम्हारे घर के 
करीब आ गया है
यह जो हल्की सी आहट
खुनकती हंसी में लिपटी
तुम सुन रहे हो
वह उसकी लपलपाती जीभ
और खूंखार नुकीले दांतों की 
रगड़ से पैदा हो रही है।
इसे कुछ और समझने की
भूल मत कर बैठना,
जरा सी गलत गफलत से
यह तुम्हारे बच्चे को उठाकर भाग जाएगा
जिसे तुम अपने खून पसीने से
पोस रहे हो।
लोकतंत्र अभी पालने में है
और लकड़बग्घे अंधेरे जंगलों 
और बर्फीली घाटियों से
गर्म खून की तलाश में 
निकल आए हैं।
उन लोगों से सावधान रहो
जो कहते हैं
कि अंधेरी रातों में
अब फरिश्ते जंगल से निकलकर
इस बस्ती में दुआएं बरसाते
घूमते हैं
और तुमहारे सपनों के पैरों में चुपचाप
अदृश्य घूंघरू बांधकर चले आते हैं
पालने में संगीत खिलखलिता
और हाथ-पैर उछालता है
और झोंपड़ी की रोशनी तेज हो जाती है।

इन लोगों से सावधान रहो।
ये लकड़बग्घे से
मिले हुए झूठे लोग हैं
ये चाहते हैं
कि तुम
शोर न मचाओ
और न लाठी और लालटेन लेकर
इस आहट
और खुनकती हंसी
का राज समझ
बाहर निकल आओ
और अपनी झोंपड़ियों के पीछे
झाड़ियों में उनको दुबका देख
उनका काम-तमाम कर दो।

इन लोगों से सावधान रहो
हो सकता है ये खुद
तुम्हारे दरवाजों के सामने 
आकर खड़े हो जाएं
और तुम्हें झोंपड़ी से बाहर
न निकलने दें,
कहें-देखो, दैवी आशीष बरस
रहा है
सारी बस्ती अमृतकुंड में नहा रही है
भीतर रहो, भीतर, खामोश-
प्रार्थना करते
यह प्रभामय क्षण है!

इनकी बात तुम मत मानना
यह तुम्हारी जबान
बंद करना चाहते हैं
और लाठी तथा लालटेन लेकर
तुम्हें बाहर नहीं निकलने देना चाहते।
ये ताकत और रोशनी से 
डरते हैं
क्योंकि इन्हें अपने चेहरे
पहचाने जाने का डर है।
ये दिव्य आलोक के बहाने
तुम्हारी आजादी छीनना चाहते हैं।
और पालने में पड़े
तुम्हारे शिशु के कल्याण के नाम पर
उसे अंधेरे जंगल में
ले जाकर चीथ खाना चाहते हैं।
उन्हें नवजात का खून लजीज लगता है।
लोकतंत्र अभी पालने में है।

तुम्हें सावधान रहना है।
यह वह क्षण है
जब चारों ओर अंधेरों में
लकड़बग्घे घात में हैं
और उनके सरपरस्त
तुम्हारी भाषा बोलते
तुम्हारी पोशाक में
तुम्हारे घरों के सामने घूम रहे हैं
तुम्हारी शांति और सुरक्षा के पहरेदार बने।
यदि तुम हांक लगाने
लाठी उठाने
और लालटेन लेकर बाहर निकलने का
अपना हक छोड़ दोगे
तो तुम्हारी अगली पीढ़ी
इन लकड़बग्घों के हवाले हो जाएगी
और तुम्हारी बस्ती में
सपनों की कोई किलकारी नहीं होगी
कहीं एक भी फूल नहीं होगा।
पुराने नंगे दरख्तों के बीच
वहशी हवाओं की सांय-सांय ही
शेष रहेगी
जो मनहूस गिद्धों के
पंख फड़फड़ाने से ही टूटेगी।
उस समय तुम कुछ नहीं कर सकोगे
तुम्हारी जबान बोलना भूल जाएगी
लाठी दीमकों के हवाले हो जाएगी
और लालटेन बुझ चुकी होगी।
इसलिए बेहद जरूरी है
कि तुम किसी बहकावे में न आओ
पालने की ओर देखो-
आओ आओ आओ
इसे दिशाओं में गूंज जाने दो
लोगों को लाठियां लेकर
बाहर आ जाने दो
और लालटेन उठाकर
इन अंधेरों में बढ़ने दो
हो सके तो
सबसे पहले उन पर वार करो
जो तुम्हारी जबान बंद करने

और तुम्हारी आजादी छीनने के
चालाक तरीके अपना रहे हैं
उसके बाद लकड़बग्घों से निपटो।

अब लकड़बग्घा
बिल्कुल तुम्हारे घर के करीब
आ गया है।-सर्वेश्वरदयाल सक्सेना 

शुक्रवार, 28 मार्च 2014

  साझा संस्कृति मंच के तत्ववधान में आयोजित होली मिलन समारोह में शामिल होने का न्यौता था।रास्ते में  चेतगंज से गोदौलिया  के बीच में ६ सांड खड़े मिले  चचा कुछ चुहलबाजी वाले अंदाज में बोले बनारस में इतने दिनों से रह रहा हुँ लेकिन कभी सांड़ों को गायों को दौड़ाते नही देखा, ये सब भी लगता है बनारसियों की तरह सधुआ गये है।  मुझको भी चचा की बात में दम लगा कि  चाहे संकटमोचन में बम फेंको या मंदिर के गेट पर अंडा फेंको अब बनारसी लोग भी बनारसी सांड़ों  की मुद्रा में आ गये है ।  
   हम कुछ जल्दी पहुंच गये थे ।  अस्सी  घाट पर एक न्यूज चैनल का ब्यवसायिक चुनाव चर्चा कार्यक्रम चालू था, कुर्सियां खाली थी ऒयोजको में सम्मिलित एक लड़की दौड़ कर आयी, बैठने का निवेदन करने लगी लेकिन हम तो तमाशा देखने के मूड में थे और एक किनारे बैठ तमाशा देखने लगे। जैसा  अक्सर  दिखाया जाता  है, बहस को घेर कर बड़े पहलवान बनाम नये पहलवान पर केंद्रित करके डब्लू ० डब्लू ० एफ ० चल रहा था।  बड़ा पहलवान ज्यादा बिकाऊ है इसलिए उसको कुश्ती जीतना  दिखाना जरूरी था, लेकिन नया पहलवान सनसनी पैदा कर रहा था इसलिए उसको दिखाना भी मजबूरी था। 
  प्रोग्राम ख़त्म होते होते  सूरज गंगा को तिरछी नजर से देखने लगा था, तबतक   चंचल जी सायकिल पर दरी बाधे और फादर अपने दल के साथ आ चुके थे।  शाम ढलते ढलते दरी बिछ चुकी थी और अफलातून  की बुलंद आवाज में लल्लन यादव जी की मसहूर कविता ---गलत मत कदम उठाओ सोच कर चलो , विचार कर चलो ---से घाट  गूंजने लगा।  घाट पर ऊंचाई से आ रही रोशनी में  सलीम शिवालवी का गरजती आवाज में धुंधली रोशनी में झूमकर कविता पाठ  लोगों को ठिठकने के लिए मजबूर कर रहा था और  बनारस पूरी रौं में गंगा के किनारे बह रहा था।   
    बनारसी भोजपुरी में -- लोग बहुते महान हो जालन, लड़िकनो सयान हो जालन , माह फागुन क हाल मत पूछा , एम्मे बुड़वो जवान हो जालन --  सलीम शिवालवी


रविवार, 16 मार्च 2014

 पत्थर के गिट्कों से  उछलती बाइकों पर बिना फलोर के डिस्को करते मजनुओं, किसी भी जाम की टांग में अपना अगला पहिया डाल कर गुर्राते टेम्पुओं, डाक्टरों की सट्टी में मरीज फंसाते कुंजड़ों , अकबकाये सैलानियों को हर क़ुब्यवस्था का सोंदर्य दिखाते गाइडों, ठगों को भी ठगते महान ज्योतिषियों के साथ शंकर की बरात के अन्य समस्त विभुतिओं की काशी में लोग सदियों से अपना पाप धोने आते रहें है। इ  सही है की ए बार इलेक्सन की होली में खूब कबीर गाये जायेंगे, लेकिन बनारसियों से अनुरोध है की कबीर पर अपना जन्मसिद्ध अधिकार होने के बावजूद इस होली में उनके अश्लील संस्करण से बचियेगा नहीं तो बहरियो समझ जायेंगे कि बनरसिया खाली हवा बाँधते हैं।  हवा पर याद आया चचा कह रहे थे कि नेतवा सब हवा पर भी अपना अधिकार मान लिए है, मीडिया वाले हांक रहे हैं इ बार फलाने की हवा है, अरे कैसा जमाना आ गया बदबू को भी हवा समझते हैं।  अब बदबू  साफ नही कर सकते तो नाक दबा कर निकल जाइये जइसे, अंग्रेजवा सब मनकनीका घाट से निकलते हैं, लेकिन  जिनका कफ़न बेंचने का रोजगार है उ तो रहबे करेंगें न अउर जिनको दाह संस्कार करना है उनकी भी मजबूरिये है भाई.……… चचा समझा रहे थे।            .………………… होली की अग्रिम शुभकामना मित्रों।   

शनिवार, 8 मार्च 2014

   शाम के धुँधलके में कोल्हाड़ की खुशबु फैली हुई थी।  भट्ठे की आग की ऊपरी परत ठंडी होकर चमक को धुंधला कर रही थी रह रह कर कोई चिंगारी चटक कर आग की ऊपरी परतो को कुरेद रही थी। अमूमन अब तक गन्ने से  भेली बनाने का काम हो चुका होता है, क्योकि किसान जल्दी से पेराई करके एक और फसल लेने की कोशिस करते है लेकिन इस साल की बेमौसम बारिशों ने सबकुछ उलट पुलट कर दिया।  भेली बनाते बनाते मौन टूटा---- ए साल आलू लेहलन ,मंटर लेहलन, चना लेहलन, अब गेहुओं लिहन का----लगा चचा आत्मालाप कर रहे हैं।  किसी ने विषय बदला, एतना बरबादी हो..…ता अख़बार में बस पानी से लगल जाम खबर निकलेला। शिवगोविंद के लड़िकवा फोन कइले रहल की इंदौर (मध्य प्रदेश ) के तरफ भी बारिस से बड़ी बरबादी भइल बा गेंहू, चना खेतै में खराब हो जायल चाहत बा। बेबसी की चर्चा से ऊबे रामजी ने गुरूजी को उकसाया--- का गुरु एदा त मामला चपल हो--।  हर चुनाव में रामराज का सपना बुनते बुनते गुरु की दाड़ी खिचड़ी से सफेद हो गई थी, बमक गये---- अरे सुनामी खाली बनरसे में हौ कि ओही बहाने बुढ़वा के धकियावल चाहत हवन एक दरे ढेला चला के भगा देहलन त का सबे भाग जाइ--। लालटेन की रोशनी में ताजी बनी भेली की चमक और चारो ओर गहराते अंधेरे में सबको सड़ रहे आलू की फिकर थी  किसी ने गुरु के दुःख में अपने होंठ नही हिलाए। भेली बन चुकी थी घुटना पकड़कर पीठ सीधी करते हुए लोग अपनी-अपनी सिन्नी लेकर अँधेरे में गुम होने लगे जैसे चुनाव ख़त्म हो गया था।    
कैसी सुनामी है भाई,
जो बस बनारस की सरहद में हैं समाई।
पहले एक पुराने गिद्ध को पत्थर फेंक कर भगा दिया , 
अब एक बुजुर्ग को डरा दिया।
(गावं के कोल्हाड़ पर हुई बतकही )

शनिवार, 22 फ़रवरी 2014

श्री नारायण भाई देसाई ने गांधी जी के जीवन ,आदर्शो  और दर्शन को रोचक शैली में समझाने के लिए कथा शैली का प्रयोग किया है। वो गांधीजी के वैयक्तिक सहायक स्व ० महादेव देसाई के पुत्र है तथा उनके जीवन का प्रथम २२ वर्ष गांधीजी के सानिध्य में गुजरा है। उनके तथा गांधीजी की उम्र में करीब ५८ वर्षों का फासला था लेकिन गांधी उनके साथ समवयस्क हो जाते हैं। नारायण भाई देसाई की गांधी कथा समस्त श्रोताओं को बालक मोहन से बैरिस्टर गांधी और बैरिस्टर गांधी से महात्मा गांधी बनने का श्रोता नही बनाती अपितु इतिहास के उस खंड का सहयात्री भी बनाती है। कथावाचक बारबार श्रोताओं को गांधी को महात्मा के बजाय मनुष्य समझने का आग्रह करता है और धीरे धीरे श्रोता की समझ को इस प्रकार विकसित करता है की वो एक साधारण मनुष्य की क्षमता को समझ सके।  ऐसी कथा शैली को और विस्तार दिए जाने की अवश्यकता है।

मंगलवार, 11 फ़रवरी 2014

आजादी के बाद अबतक के सफर में हमनें हो सकता है बहुत चमकदार शहर न बनाएँ हो ,बहुत चिकनी  सड़के बना पाने में सफलता न पाई हो  लेकिन हमने ऐसा बहुत कुछ बनाया है जो कुछ विकसित मुल्कों को छोड़कर बाकी के लिए अभी भी दुर्लभ हैं । हमारी लोकतंत्र के प्रति प्रतिबध्दता, धर्मनिपरपेक्षता  और समावेशी विकासनीति पर चलने का प्रयास बहुतो के लिए एक आदर्श  है और  जब इनमें विचलन दिखाई देता है तो अपने अपने मुल्कों में इन मूल्यों को स्थापित करने के लिए लड़ रहे लोगों के लिये हताशा होती है । ऐसी ही हताशा पाकिस्तान की कवियत्री  फहमीदा रियाज की कविता में दिखायी देती है लेकिन लोकतंत्र हमें आश्वस्त करता है कि हम अपने जहाज़ को इन हिचकोलों से उबार लेंगे । 

नया भारत

फ़हमीदा रियाज़fahmida
तुम बिल्‍कुल हम जैसे निकले
अब तक कहाँ छिपे थे भाई 
वो मूरखता, वो घामड़पन
जिसमें हमने सदी गँवाई
आखिर पहुँची द्वार तुम्‍हारे
अरे बधाई, बहुत बधाई।

प्रेत धर्म का नाच रहा है
कायम हिंदू राज करोगे ?
सारे उल्‍टे काज करोगे !
अपना चमन ताराज़ करोगे !

तुम भी बैठे करोगे सोचा
पूरी है वैसी तैयारी
कौन है हिंदू, कौन नहीं है
तुम भी करोगे फ़तवे जारी

होगा कठिन वहाँ भी जीना
दाँतों आ जाएगा पसीना
जैसी तैसी कटा करेगी
वहाँ भी सब की साँस घुटेगी

माथे पर सिंदूर की रेखा
कुछ भी नहीं पड़ोस से सीखा!
क्‍या हमने दुर्दशा बनायी
कुछ भी तुमको नजर न आयी?

कल दुख से सोचा करती थी
सोच के बहुत हँसी आज आयी
तुम बिल्‍कुल हम जैसे निकले
हम दो कौम नहीं थे भाई।

मश्‍क करो तुम, आ जाएगा
उल्‍टे पाँव चलते जाना
ध्‍यान न मन में दूजा आए
बस पीछे ही नजर जमाना

भाड़ में जाए शिक्षा-विक्षा
अब जाहिलपन के गुन गाना।
आगे गड्ढा है यह मत देखो
लाओ वापस, गया जमाना

एक जाप सा करते जाओ
बारंबार यही दोहराओ
'कैसा वीर महान था भारत
कैसा आलीशान था-भारत'

फिर तुम लोग पहुँच जाओगे
बस परलोक पहुँच जाओगे

हम तो हैं पहले से वहाँ पर
तुम भी समय निकालते रहना
अब जिस नरक में जाओ वहाँ से
चिट्ठी-विठ्ठी डालते रहना।

शुक्रवार, 31 जनवरी 2014

30 जनवरी को "सरकारी गाँधी" की हत्या पर 2 मिनट का मौन रखने के बाद "आंदोलनकारी गाँधी" की शहादत पर आयोजित गोष्ठी में भाग लेने चला गया । विषय उसी सम्प्रदायकिता का था जिसने विभाजन में लाखों लोगों के खून से अपना कटोरा नही भर पाने के कारण गांधी की भी आहुति ली थी । शहर के विभिन्न लोगों को सुनकर,  सवाल की गम्भीरता पर चिंतामग्न घर लौटा । शाम को घर खाली था और मैं रिमोट का मालिक बन गया । एक चैनल पर फ़िल्म आ रही थी "नो -मेंस लैंड "। बोस्निया युद्ध पर ये बहुत अच्छी फ़िल्म है । फ़िल्म में एक सैनिक युद्धरत सेनाओं की मोर्चाबंदी  के बीच बारूदी सुरंग पर इस तरह फंस जाता है कि वो करवट भी ले तो बारूद उसके चीथड़े उड़ा सकती है । न्यूज़ चैनलों के दबाव में संयुक्त रास्ट्र संघ के टेक्नीशियन सुरंग पर से उस सैनिक को हटाने की कोशिस करते हैं लेकिन उनको जल्दी ही पता चल जाता है कि बारूदी सुरंग को हटाया जाना सम्भव नहीं है । एक उदास संगीत और ढलती शाम की पृष्ठभूमि में कैमरा उस विवश  सैनिक से  धीरे धीरे दूर होता चला जाता है । 
पता नहीं क्यों मुझे पूरा भारतीय उप महाद्वीप बारूदी सुरंग पर फंसे उस विवश सैनिक की तरह लगा । बगल में बैठे मित्र से बोला यार मानता हू ईश्वर बहुतेरे मनुष्यों की अवश्यकता है, लेकिन क्या वो धर्म से अपना पीछा छुड़ा नही सकता । मित्र ने हमेशा की तरह मेरी बुद्धि पर तरस खाकर ठहाका लगाया और बोला भाई धर्म तो उसी मेकेनिज्म का बाई प्रोडक्ट है जिससे ईश्वर बनता है । मैंने फिर संभावना प्रगट की कि अब तो बहुत सी कम्पनियां अपने हानिकारक बाई प्रोडक्ट से बचने की तकनीक विकसित कर रही हैं फिर सामाजिक क्षेत्र में ऐसी सम्भावना क्यों नहीं है । उसको मेरे प्रश्न में कुछ दम तो लगा लेकिन फिर मेरी सम्भावना को ख़ारिज करते हुए बोला, इसमें कोई तात्कालिक फायेदा तो है नही फिर कोई इसमें क्यों इन्वेस्ट करेगा । 
उदास मन से चैनल बदलने लगा तो खबर आ रही थी कि 84 ,गुजरात , मुरादाबाद के प्रेत अपनी अपनी कब्रों से निकलकर अपने अपने वार लार्डो की सेवा में पहुँच चुके हैं । मैं पूरी रात बिस्तर पर करवट नहीं बदल रहा था कि कही कोई बारूदी सुरंग न फट पड़े । पता नही ये डर सपना है या हकीकत, इसका जवाब तो सुबह ही दे सकती है । 

जेन जी के द्वन्द

सुबह उठकर चाय बनाने के लिए फ्रिज से दूध निकालते समय देखा कि दूध पर मलाई की एक मोटी परत जमी है, जिसको निकालकर अलग एक बरतन में रखा जिसमें लगात...