मंगलवार, 28 मई 2019

2019 का भाष्य




बढ़ते नगरीकरण और फैलते मध्यवर्ग के श्रममुक्त होते घण्टों को कर्मकाण्डीय धार्मिक जीवन भर रहा है। यह नवनागरी कर्मकाण्डी समाज, खेतिहर जीवन के धार्मिक समाज से भिन्न है। खेतिहर समाज का धर्म,  जीवन के सीमित संसाधनों में किसी तरह से अपने दुख को संतोष में बदलने की कला देता था लेकिन सम्पन्न हो रहे भारत के मध्यवर्ग की नयी  धार्मिेक शैली उनको अपनी उपलव्धियों के अभिव्यक्ति का कर्मकाण्डीय कार्यक्रम दे रहा है। इस नए धर्म की जकड़बन्दी को प्रगाढ़ करने के लिए इसके दृष्टिपथ में भिन्न धार्मिक समुदायों के प्रति भय की निरन्तर सर्जना, कुछ सप्रयास और कुछ भिन्न धर्म की गतिविधियों के फलस्वरुप निरन्तर जारी है। इस सम्बन्ध में एक मित्र का कथन उल्लेखनीय है कि बम्बई फिल्म जगत की उदार जीवन शैली में एक प्रसिद्ध फिल्म संगीतकार की बेटी के बुर्कानशीनी का शौक या श्रीलंका मे करोड़पति मुस्लिम परिवार द्वारा अपने धार्मिक विश्वासों के कारण सैकड़ो लोगों को कत्ल किया जाना एक राजनैतिक संदेश भी देता है, जो लोग इसे पढ़ नही पा रहे हैं उनके लिए किसी नवीन ब्रेल लिपि के आविष्कार की आवश्यकता है।  
नगरीय क्षेत्रों जाति, वर्ण व्यवस्था के निषेधों को अतिक्रमित कर निजी जीवन की व्यवस्थाओं जैसे शादी, विवाह, मरनी, करनी आदि को सम्पन्न कराने का एक सुविधा जनक प्लेटफार्म और नगर के वार्ड स्तर तक की राजनैतिक ताकत हासिल करने का जरिया है। अब यह वर्ण व्यवस्था के जंजीरों में जकड़ी निरीह जाति नही है जिसको सशक्त करने मे सामाजिक न्यायवादियों की भूमिका रही है। नगरीय क्षेत्रों में संसद और विधानसभा के निर्वाचनों में जाति से अधिक प्रभावी भूमिका धर्म की है।  
 ग्रामीण समाज मे जाति प्रधानी से लेकर सांसदी तक राजनैतिक ताकत हासिल करने का उपकरण जरुर है लेकिन बाजारों,चट्टीचौराहों के तेजी से कस्बों में बदलने के कारण खेतिहर अर्थ व्यवस्था से तेजी से मुक्त हो रही नयी पीढ़ी पर से उनके समाज के आरक्षण भोगी मध्यवर्गियों की राजनैतिक पकड़ दिनोदिन क्षीण होता जा रही है। सामाजिक न्याय के नाम पर जयन्तियां मनाने वाले और शेष दिनों में प्रायः जाति की संकीर्णताओं में जीने वाले वाले पिछड़े और दलित समुदाय के सरकारी कारकुन प्रमोशन और आरक्षण के नाम पर भले ही गोलबन्दी खड़ी करने की कोशिश करें परन्तु आरक्षण से वंचित और उससे निराश एक विशाल आबादी का नेतृत्व उसके हाथ से फिसल रहा है। इस आरक्षणभोगी समुदाय ने निजी और सार्वजनिक जीवन में उसी भ्रष्ट जीवन शैली को अपनाया हुआ है जिसमें कथित सवर्णो को महारत हासिल है। यह वर्ग भी अपनी वर्गीय प्रकृति के अनुरुप तेजी से अपने गांव मे ही आप्रवासी बन रहा है।
सामाजिक न्याय का लक्ष्य जातीय पहचान के आधार पर उत्पीड़न को समाप्त करना और इन वंचित समुदायों मे एक मध्यवर्ग तैयार करना था कि जाति या वर्ग को समाप्त करना है। इस मायने मे एक स्तर तक यह कार्य पूर्ण हो चुका है अवशेष कार्य वह सत्ताधारियों की गोद में बैठकर रुठने मनाने का खेल करके निपटा सकता है इसके लिए उसे अपनी सुविधाओं की कीमत पर विद्रोही तेवर अपनाने की आवश्यकता नही है। इसीलिए हम सामाजिक न्याय के छोटे दुकानदारों की सत्ता मे सहज आवाजाही देख रहे हैं, हां बड़ी कम्पनियों को बड़े सौदों की तलाश है।
  
हम क्या हैं यह हमारे परिवार, पर्यावरण, मित्र और शत्रुओं से निर्धारित होता है। हम जिससे प्रतिद्वन्दिता करते हैं उसकी तुलना में खुद को सचेतन रुप से बदलते हैं। साम्राज्यवाद के दौर मे हमारे नेतृत्व की प्रतिद्वन्दिता जिनसे थी उन्होने अपने साहस, अध्ययनशीलता, आधुनिक चितंन और पेशेवराना दक्षता से इस ग्रह के बहुत बड़े भूभाग पर कब्जा किया था। साम्राज्यवाद के विरुद्ध लड़ रहे तत्कालीन भारत का नेतृत्व भी उसी स्तर पर स्वयं को परिष्कृत कर उनको चुनौती दिया परिणामतः हम उनको सफल चुनौती दे सके और एक आधुनिक भारत की नींव रख सके। यह दुर्भाग्य रहा कि स्वतंत्रता के उपरान्त विभिन्न कारणों से हम एक मध्ययुगीन मानसिक अवस्थिति मे रह रहे पड़ोसी के विभिन्न कारणों से प्रतिद्वन्दी बनते गए और चाहअनचाहे उसी स्तर पर उतरते चले गए। अंग्रेजी साम्राज्यवाद के विरुद्ध संघर्ष और उसके दमन की पीड़ा विस्मृतियों मे दर्ज हो चुकी है। इस संघर्ष मे प्रमुख भूमिका निभाने वाला कथित सवर्ण और मध्यवर्ग गांधी की हत्या को स्वीकृति प्रदान कर चुका है। नेहरुवादी माडल से तैयार किए गए सार्वजनिक संस्थानों को निजी सम्पत्ति के रुप में औने पौने दामों पर बेच दिए जाने को सामाजिक स्वीकृति मिल चुकी है। ऐसे में उस धारा का प्रतिनिधित्व करने वाले राजनैतिक दल की परम्परागत वंशावलियों में छिटपुट हरी कोंपले दिखेगीं अवश्य लेकिन उपरोक्त जनाधारों के बूते इनकी वापसी दिवास्वप्न है।   
खेती किसानी, आदिवासियों, स्त्रियों और अल्पसंख्यकों के मानवाधिकार, मजदूरी आदि के मुदृे पर धरना प्रदर्शन करने वाला लेफ्ट भी एक पिछड़ी अर्थव्यवस्था वाले समाज के राजनैतिक तौर तरीकों वाला उपकरण मात्र रह गया है जिसके लिए नए जमाने की ई०वी०एम० में जगह नही है। किसी दिन टी०वी० में लाल झण्डा लेकर मुम्बई, दिल्ली जैसे महानगर की तरफ बढ़ते किसानों को लेकर यह मध्यवर्ग को चौंकाता अवश्य है लेकिन किसान की फटी बिवाइयां सम्पन्न किसानों के शोषण और रुढ़िग्रस्त सामाजिक व्यवस्थाओं का आश्रयस्थल भी है, जिससे मुक्त करके इस समुदाय को अपने हितों के लिए एकजुट होकर राजनीति की ªाइविंग सीट पर बैठाना उतना ही दूभर है जितना किसान से मजदूर के रुप में वर्गान्तरित हो रहे इस समुदाय की एक वर्गीय पहचान बनाना।
 लेकिन समाज मे संकटों को अपनी वैकल्पिक राजनीति की तलाश जारी है और जो इसमें से मुखर संकटों को डील करेगा वही भावी राजनीति मे निर्णायक जगह पाएगा। बेरोजगारी, भीषण आर्थिक असमानता, प्राइवेट कम्पनियों मे बेरोजगारों का शोषण, आगनबाड़ी, शिक्षामित्र, किसान मित्र, आशा कार्यकत्री जैसी सेवाओं की सेवाशर्तो को सम्मानजनक किया जाना, अमीरी की सीमारेखा, किसी भी उत्पाद पर अधिकतम लाभ की निर्धारित दर, लघु तथा कुटीर उद्योगों को संरक्षण, सहकारी खेती, प्रति व्यक्ति आय के अनुपात में ही सरकारी कारकुनों के वेतनभत्तों का निर्धारण, प्रत्येक वरिष्ठ नागरिक के लिए सम्मानजनक पेंशन, रोजगार प्रदाता कम्पनियों द्वारा बेरोजगारों का शोषण, चिकित्सा तथा शिक्षा में मची लूट, पर्यावरण, जाति और लिंग आधारित शोषण, राज्य के अधिकार को सीमित करके स्थानीय निकायों को अधिकार सम्पन्न बनाने आदि जैसी चुनौतियों को सूत्रबद्ध करके भावी भारत को सम्बोधित करने के लिए लेफ्ट को अपने बूढ़े तथा रुढ़ नेतृत्व से विद्रोह करके सम्मिलित काडर बनाकर एक नया विकल्प प्रस्तुत करने के अलावा कोई रास्ता नही है। संतोष मात्र इतना है कि वैकल्पिक दल के रुप में लेफ्ट के अन्दर काडर को आकर्षित करने की क्षमता है और लेफ्ट ही धर्म, जाति,वंशवाद और भ्रष्टाचार से मुक्त रहकर काडर आधारित दीर्घकालीन राजनीति करने में सक्षम है। इस चुनाव ने परम्परागत विपक्ष को हाशिए पर डाल कर एक सम्भावनाशील और बेहतर राजनीति के लिए स्थान रिक्त किया है। यदि ऐसा नही हो सका तो इस निर्वात को जाति, उपजाति, गोत्र, क्षेत्र आधारित संगठन और उग्र धार्मिक समूह भरेगें जो दुनिया के दूसरे सबसे विशाल जनसमूह का प्रतिनिधित्व कर रहे राष्टª के लिए अत्यधिक पीड़ा दायी होगा। निश्चय ही यह सर्वाधिक संकटग्रस्त और सर्वाधिक संभावनाशील समय है।       

शुक्रवार, 26 अप्रैल 2019

नंगा युग


धारणाओं के सुकाल मे जनसमर्थन के हाथी जातियों के ठेले पर खड़ी की गयी प्रतिरोधी चट्टानों से नही रुकने वाले हैं। चट्टानें अपने आप मे मजबूत हो सकती हैं लेकिन अस्थिर आधार उनको रोकने का हास्यापद प्रयास भर ही कर सकती है। अगर इन प्रतिरोधी चट्टानों की बुनावट देखेगें तो इसमें आदिम स्मृतियों मे बसी जातीय वैमनस्यता के तत्व ही मिलेगें। इनके द्वारा कोशिश की जाती है कि जातीय वैमनस्यता को मात्र चर्तुवर्ण की वैमनस्यता का आकार दे सकें और उसके बल पर एक बड़ी गोलबन्दी कर सकें लेकिन यह परिकल्पना जमीन पर उतरते-उतरते वास्तविक रंग मे आ ही जाती है। बौद्धिक लोगों को जातियों की दुकानों से राशनपानी मिल जाता है इसलिए जातीय वैमनस्यता पर वर्ण की वैमनस्यता का कलेवर चढ़ाकर भ्रमित करने के लिए कागज काला करते  रहते है। ज्यादा नही जानता हूं लेकिन उत्तर भारत की सच्चाई यही है कि प्रत्येक जाति अपने से भिन्न जाति के प्रति अविश्वास और नफरत पालती है और यही अविश्वास और नफरत उनकी अन्दरुनी जातीय एका का रसायन पैदा करता है। इसीलिए किसी बड़े शत्रु के विरुद्ध यदि जाति आधारित कोई एका बनता भी है तो उसके परिदृश्य से हटते ही यह एका जातिगत स्वार्थ के उतने ही तीखे संघर्ष मे बदल जाता है।  जो लोग पारम्परिक जातीय नफरत की गंध को नकार कर मात्र चर्तुवर्ण की नफरत को सूंघते हैं उन के आचरण का दोहरापन अधिक पारदर्शी होकर दिख रहा है। यह दुहराने की आवश्यकता नही है कि भारतीय समाज कभी भी यूरोपियन अर्थो मे धर्म निरपेक्ष समाज नही रहा है क्योंकि यहां के बहुसंख्यक सामी तौर तरीके के धार्मिक नही थे। यह विभिन्न आर्थिक संस्तरों और हुनर जीवियों का बहुकोशीय प्रकृति पूजक समाज रहा है जो साम्राज्यवाद से मुक्ति के बाद एक आधुनिक जीवन पद्धति के आर्दश की आकांक्षा पाले अभिजातवर्गीय नेतृत्व में अपने संख्याबल को हथियार बनाकर अपने सामुदायिक हितों का सौदा करता रहा है और आवश्यकतानुसार अपनी रुढ़ियों से मुक्त होने की कोशिश भी करता रहा है। इधर बीच तेजी से इस बहुसंख्यक समाज ने एक धार्मिक पहचान से खुद को जोड़ना शुरु किया है और दुर्योग यह है कि इस पहचान की प्रेरणा उसको अपने सहजीवी अल्पसंख्यक धर्म से मिल रही है अन्यथा इस समाज ने अपने अल्पसंख्यकों को भी एक प्रकार की भिन्न जाति मानकर अपने बहुकोशीय ढाचें मे समाहित कर लिया था जिसके साथ अन्य जातियों की तरह ही नफरत और मुहब्बत का रिश्ता बना हुआ था। सूचना के युग ने हमारी बहुत सारी पहचानों की प्रच्छन्नता को बेनकाब कर दिया है और इक्कीसवीं सदी में हम ज्यादा नंगे होने के लिए अभिशप्त हैं।

बुधवार, 17 अप्रैल 2019

––अनमनापन––

इतिहास की व्याख्या की जाती है, भविष्य की कल्पना की जाती है लेकिन वर्तमान को जीना पड़ता है और जीना ही राजनीति है। सांस्कृतिक मनुष्य के अंतरण मे जिस बुद्धि ने नेतृत्व किया उसका स्तर समुदाय मे कभी बराबर नही रहा है। उर्वर मस्तिष्कों ने समुदायों के वर्तमान का नेतृत्व किया, समुदायों के सुदूर भविष्य की सम्भावनाओं के बारे मे सचेत किया तथा अपने उप समूहों के वृत्त बनाए। नवीनता के प्रति आकर्षण और अज्ञात के प्रति उत्सुकता से भरे इन मस्तिष्कों के उप समूह के केन्द्र में जबतक नवीनता के उत्पादन की क्षमता रही तबतक इसकी परिधि को विस्तार मिलता रहा परन्तु यह दुर्योग है कि अधिकांश समूहों के केन्द्र मे नवोन्मेष का पुनरुत्पादन पाण्डा प्रजाति की तरह ही दुर्लभ रहा। इस दुर्योग ने इन उप समूहो को उसी प्रकार की रुढ़ियों से आबद्ध कर दिया, जिनसे उच्छेदन का शंखनाद करके नव समूह का सृजन हुआ था। सभ्यता के शुरुआती चरण में  विचारों के विस्तार की गति अपेक्षाकृत धीमी परन्तु उम्र सदियों मे हुआ करती थी। आज विचारों के विस्तार मे अभूतपूर्व गतिकी आ चुकी है परन्तु उनकी उम्र तेजी से घट रही है। वर्तमान संकट किसी भी विचार के अनिगिनत संस्करणों के तत्काल प्रचलित होने के कारण मौलिकता के क्षीण होते जाने के कारण पैदा हो रहा है और यह नवीनता के अल्पजीवी होने का कारण भी बन रहा है। इसको यूं कहा जा सकता है कि हम किसी मैदान मे दो टीमों के बीच फुटबाल मैच को देखने और उसके साथ जीवंत रिश्ता बनाए
जाने के आदी रहे हैं लेकिन अब हो ये रहा है कि उस मैदान मे कई टीमे फुटबाल खेल रही है, जिनके खेल का स्तर, गोलपोस्ट और नियम भी असमान हैं और हम है कि अब भी मैदान मे उसी पुराने खेल को जीना चाहते हैं। इसी तरह से वर्तमान मे बदलाव की आकांक्षी शक्तियों बनाम यथास्थितिवादी शक्तियों के खेल मे हमारी कर्मकाण्डीय हिस्सेदारी जरुर दिखती हैं लेकिन हमारा अनमनापन भी दिखता है, जिसके टूटने की तभी सम्भावना है जब पूरा खेल एक निर्णायक गोलबन्दी के तहत खेला जाए। या ऐसा भी हो सकता है कि जीवन की विविधता हमारी एकनिष्ठ लक्ष्य की तरफ बढ़ने की क्षमता को इस हद तक प्रभावित कर चुकी हो कि हम टेस्ट मैच के बजाय ट््वण्टी-ट्वण्टी खेलने लायक ही रह गए हों यानी दूरगामी स्थिर लक्ष्य के बजाय निकट के छोटे-छोटे लक्ष्य हमे अधिक विष्वसनीय लग रहे हों और फिर यह अनमनापन इसलिए हो सकता है कि हम पसीना कम बहाना चाहते हैं लेकिन गहरी नींद का सुख भी नही छोड़ना चाहते हैं।

बुधवार, 10 अप्रैल 2019

जहाज

सामाजिक न्यायवाद जाति उन्मूलन की जगह जाति सशक्तीकरण की लड़ाई लड़ता है जिसका चरम वंश और परिवार के सशक्तीकरण पर खत्म होता है। किसी का भी सशक्त होना यानी किसी के सापेक्ष मजबूत होना होता है जो बदलते समीकरण के अनुसार शोषण और शोषित का पक्ष बदल देता है। इसी प्रकार धार्मिक पुनरुद्धानवाद या शुद्धिकरण का चरम राज्यसत्ता पर नियंत्रण कर अन्य धर्मो को बलात प्रतिबन्धित करते हुए अपने अनुयायियों को असमानता की आध्यात्मिक स्वीकार्यता दिलाना होता है। इतिहास में उत्पीड़ित उत्पीड़क की भूमिका मे बदलते रहे हैं जिसके नजदीकी उदाहरण यहूदी या अफ्रीका की हूतू जाति या भारत मे हरित क्रन्ति से सशक्त हुई जातियां है। जाति तथा धर्म का उन्मूलन किसी भी भौगालिक इकाई को दो आयामी समाजिक रचना की तरफ ले जाता है जहां से समता स्वप्न न होकर कुछ दूर पर यथार्थ मे खड़ी दिखेगी और इस प्रकार की स्पष्टदृश्यता किसी भी प्रभुत्वशाली वर्ग के लिए खतरनाक होती है। जाति तथा धर्म के भौतिक आधार समाप्त हो जाने के उपरान्त भी उनके सांस्कृतिक अवशेष सदियों तक प्रचलित रहकर इस विभाजन की नैतिक स्वीकार्यता बनाए रखने का प्रयास करते रहते हैं। संस्कृति जीवन जीने की कला है और धार्मिक और जातिवादी राजनीति का निषेध वैकल्पिक सांस्कृतिक जीवन पद्धति के विकल्प की मांग भी करता है जिसको उपरोक्त दोनो प्रकार की राजनीति का विकल्प विरोध करने वाली राजनैतिक शक्तियों ने प्रस्तुत करने का सचेतन प्रयास नही किया है इसका परिणाम यह दिखता है कि धार्मिक और जातिवादी राजनैतिक शक्तियों की निषेध करने वाली राजनीति शीघ्र ही खोखलेपन का शिकार होकर क्षरित हो जाती है। समस्या यह है कि संस्कृति को रेडिमेड नही प्रस्तुत किया जा सकता है यह सदियों का अभ्यास होता है इसलिए इस क्षेत्र में परिमार्जन ही विकल्प है।ऐसा नही है कि शेष विश्व मे इसके लिए प्रयास नही किए गए लेकिन अभी असफलता दर ज्यादा है लेकिन घबराने की जरुरत नही है हवाई जहाज ही कहां हम चन्द बार में उड़ाना सीख लिए थे।

सोमवार, 8 अप्रैल 2019

भीमा कोरेगांव बनाम सारागढ़ी का युद्ध



1 जनवरी 1818 को भीम नदी के किनारे एक लड़ाई लड़ी गयी थी जिसे संख्याबल के अनुसार युद्ध के बजाय सैनिक शब्दावली मे झड़प कहा जा सकता है। इस लड़ाई में पेशवा के दो हजार सैनिकों तथा ब्रिटिश कम्पनी के आठ सौ सैनिकों ने भाग लिया था। पेशवा की सेना मे मराठों के साथ अरबी सैनिकों ने भी भाग लिया था जो कि जाहिर है मुसलमान थे लेकिन ये किसी इस्लामी राज्य की लड़ाई नही लड़ रहे थे। ये बस अपने हुनर से अपने ढंग की जिन्दगी जीने की लड़ाई लड़ रहे थे। ब्रिटिश कम्पनी मे महार सैनिक लड़ रहे थे और यह भी अपनी जिन्दगी जीने की लड़ाई ही लड़ रहे थे। यह युद्ध महार सैनिकों की बहादुरी के लिए याद किया जाता है जिन्होने कम संख्या मे होने के बावजूद पेशवाई सैनिकों को पीछे हटने के लिए मजबूर कर दिया। यह युद्ध कम्पनी के लिए पेशवाओं पर विजय प्राप्त करने के क्रम में महत्वपूर्ण था और जैसा कि होता विजेता ने जीत के बाद अपना स्तम्भ स्थापित किया। जाहिर है इस कीर्तिस्तम्भ अपने हुनर मे असाधारण दक्षता तथा आत्मोसर्ग करने वाले योद्धाओं का नाम अंकित किया गया। ऐसे स्तम्भ कम्पनी ने और जगहों पर भी स्थापित किया है परन्तु इस युद्ध मे महारों की बहादुरी की प्रसिद्धि मे अन्य कारण भी सम्मलिति होते गए।
सारागढ़ी युद्ध का इतिहास भी इसी 19वीं शताब्दी के आखिरी वर्षो में ब्रिटिश साम्राज्य के विस्तार का एक महत्वपूर्ण पन्ना है जब 12 सितम्बर 1897 को आधुनिक पाकिस्तान के नार्थ वेस्ट फ्रण्टियर प्रान्त मे सारागढ़ी किले पर लड़ा गया था। इस युद्ध मे ब्रिटिश सेना के 21 सिक्ख बहादुर सैनिकों ने लगभग 10 हजार अफगान सैनिकों का मुकाबला करते हुए अपने प्राणों का उत्सर्ग किया था और लगभग 450 अफगान सैनिक मारे गए थे। जैसी की परम्परा रही है विजेता ब्रिटिश साम्राज्य ने इस युद्ध की याद मे भी सारागढ़ी मे एक गुरुद्वारे का निर्माण कराया।
ब्रिटिश साम्राज्य से मुक्ति के लगभग 70 साल बाद इस साम्राज्य की हिफाजत मे शहीद हुए योद्धाओं को विभिन्न कारणों से याद किया जा रहा है। भीमा कोरेगांव का युद्ध सामाजिक न्यायवादियों का स्मृतिचिन्ह बन चुका है तो सारागढ़ी के युद्ध को मुस्लिम कबाइलियों के विरुद्ध शानदार स्मारक के रुप मे खड़ा किया गया है। अपने समय मे ये दोनो युद्ध भारतीय उपमहाद्धीप मे उभरी नयी राजनैतिक ताकत की सेवा मे लड़े गए थे लेकिन अब वर्चुवल विश्व मे इन दोनो युद्धों  को पुनः लड़ा जा रहा है तथा इसके नायकों को स्वतंत्र भारत की प्रभावी राजनैतिक ताकतों ने अपने अपने झण्डे थमा दिए हैं। इन योद्धाओं को जनस्मृतियों मे दर्ज कराने के लिए दोनो राजनैतिक धाराएं अपने आर्थिक राजनैतिक क्षमता का प्रयोग कर रही है ताकि यह घटना उनके राजनैतिक प्रतिद्वन्दियों के विरुद्ध प्रेरक बल का कार्य कर सके। ब्रिटिश साम्राज्य कालीन भारत में हिन्दू वर्णवादी व्यवस्था के शोषण और दमन के प्रतिरोध मे जागृत हो रही शक्तियों के लिए अगर ब्रिटिश साम्राज्य मुख्य शत्रु नही था तो अरबी सांस्कृतिक परम्पराओं के प्रति चिढ़ और अपनी वर्चस्वशाली जाति व्यवस्था की अक्षुण्णता के लिए गोलबन्द हो रही शक्तियों के लिए भी ब्रिटिश साम्राज्य मुख्य शत्रु नही था। इसलिए आश्चर्यजनक नही है कि आजादी के कुछ दशाब्दियों के उपरान्त ही ब्रिटिश व्यवस्था को स्थानापन्न करने वाली राजनैतिक धारा के विरुद्ध एक दूसरे की प्रबल विरोधी दिखने वाली ये राजनैतिक ताकतें आवश्यकतानुसार आपस मे रणनीतिक एवं राजनैतिक सहयोग करती पायी जाती हैं।


    

रविवार, 31 मार्च 2019

लोभ और भय


देर सबेर मनुष्यता वहीं पहुंचेगी जब लोग अपने क्षमता भर उत्पादन या श्रम करेगें और आवश्यकता भर उपभोग करेगें। जो कि कम्यूनिष्टों का दर्शन कहता है। इसको दिवास्वप्न और अव्यवहार्य मानते हुए इसके विरोध मे मनुष्य की सहज प्रवृत्तियों का हवाला देते हुए कहा जाता है कि लालच और भय मनुष्यता की प्रेरक शक्ति रही है इसलिए इससे मुक्त मानव समाज नही बन सकता है। इसी प्रकार का तर्क स्त्रियों को बुर्का पहनाने के लिए भी दिया जाता है कि सार्वजनिक स्थल पर नखशिख ढंकी स्त्री ही पुरुष की कामुकता से बच सकती है परन्तु यूरोप का पुरुष समाज तो इस कमजोरी से मुक्त हो सका है हालाकि अपवाद हर जगह होते हैं। इसी प्रकार सत्य बोलना विकसित देशों के नागरिकों का सामान्य लक्षण है और उनकी बहुत सी सार्वजनिक व्यवस्थाएं इस सहज विश्वास पर चलती है कि उनके नागरिक प्रायः सत्य बोलते हैं परन्तु हमारे समाज के सत्यवादी होना विशिष्ट लक्षण है और एक सत्यवादी को समाज का बौड़म स्वीकार कर लिया जाना सहज स्वीकार्य है। इसका अनुभव विकसित देशों से लौटे हमारे समाज के सदस्यों के उनकी व्यवस्थाओं को बेवकूफ बनाने और अपनी चतुराई का वर्णन करके गर्वित होते चेहरों का भाव देखकर लगता है। कहने का आशय यह है कि हम भले अभी यह विश्वास न कर सकें कि समाज का बहुलांश सत्यवादी बन सकता है परन्तु इसी पृथ्वी के हिस्से में ऐसे विकसित समाज हैं जिनमें सत्यवादिता सामान्य गुंण है। यानी जिस आर्दश की परिकल्पना कम्यूनिष्ट करते हैं वो न तो अव्यावहारिक है और न ही कपोल कल्पना कि भविष्य का मानव समाज ऐसा बनाना पड़ेगा जिसमें लोग अपनी क्षमता भर कार्य कर सके और अपनी आवश्यकता भर उपभोग कर सकें। यदि अभी भी अविश्वास है तो इस अविश्वास की तुलना मैं अस्सी के दशक में देहातियों के उस अविश्वास से करता हूं जब हम बूफे सिस्टम मे खाना खाने में भोजन की लूट हो जाने या अराजकता फैल जाने के कारण इसके अव्यावहारिक होने की बात किया करते थे। अन्त मे एक बात और समझ में आती है लालच अर्न्तभूत क्रिया है जिस पर नियंत्रण किया जा सकता है और भय बाहृय क्रिया की प्रतिक्रिया है जिससे मुक्त होना इस पर निर्भर करता है कि बाहृय परिस्थितियों पर हमारा कितना नियंत्रण है। निश्चय ही हम जंगली जानवरों के भय से मुक्त हो चुके हैं, कबीलाई मानसिकता से भी क्रमशः मुक्त होते जा रहे हैं, अधिकांश बीमारियों को ठीक कर लिए जाने का आश्वस्ति भाव समाज मे दिखता है, जीवन जीने की नैतिक और सांस्कृतिक एकरुपता की तरफ भी हमारी आश्वस्तिकारक स्वीकार्यता बढ़ रही हैं और सोशल मीडिया के विस्तार के फलस्वरुप लोभ पर आधारित उत्पादन प्रणाली  द्वारा विभिन्न राष्टªों और मानव समुदाय के विरुद्ध उत्पन्न किए जा रहे संकट भी ज्यादे स्पष्टता से दिख रहे हैं। इसलिए लोभमुक्त उत्पादन और वितरण प्रणाली का सपना भी साकार होना चन्द पीढ़ियों की बात है, हां हम भय मुक्त नही हो सकते क्योंकि भय का श्रोत कहीं और है आने वाले दिनों मे हमारी प्रजाति हमारे ग्रह की पर्यावरणीय प्रणाली के संकट मे होने के कारण भय ग्रस्त होगी और यह भय हमें गम्भीरता चुनौतियों मे उलझाए रखेगा।

शनिवार, 30 मार्च 2019

अतीत और वर्तमान


धरती के असीम विस्तार मे कहां कौन सी हलचल हो रही है इसके अवलोकन की सीमा हमारे प्रेक्षण बिन्दु से तय होती है। व्यक्ति अथवा समूहांे का प्रेक्षण बिन्दु उनकी वर्तमान की समझ से तय होता है। यानी एक ही समय मे विभिन्न व्यक्ति या समूह भविष्य का अलग-अलग आंकलन करते हैं कि कौन सा प्रश्न मुख्य है जिसे हल करके अपने आदर्श तक पहुंचा जा सकता है। हमारा वर्तमान हमेशा ऐसा होता है जैसे हम कंधे के उपर तक के झाड़ झंखाड़ से भरे मैदान मे खड़े हों और कुछ कदम आगे सुझाई देना मुश्किल है। इस वर्तमान से हमारी गति भविष्य की उंचाई की तरफ होती है और इसके विपरीत ढलान की तरफ हमारा इतिहास होता है। यानी वर्तमान की उंचाई पर खड़े होने पर हमे इतिहास अधिक स्पष्ट नजर आता है, जिसके सम्बन्ध मे हमारे विचार स्पष्ट होते जाते हैं। इसी का उदाहरण है कि संघ अब उपनिवेशवाद के विरुद्ध कांग्रेस के संघर्ष को स्वीकार करता है। यानी विगत को समझना अपेक्षाकृत सरल होता है लेकिन झाड़ झंखाड़ से घिरे वर्तमान मे भविष्य की दिशा खोजना हमेशा दुरुह होता है। इस आंशिक अक्षमता के बावजूद हम सौभाग्यशाली हैं कि हजारो साल के जैविक मनुष्य से सांस्कृतिक मनुष्य के संक्रमण हेतु हमारे निरंतर संघर्ष ने जीव जगत मे मात्र हममे ही यह गुण विकसित हो पाया है कि हम इतिहास से वर्तमान का आंकलन करते हुए सुदूर भविष्य की कल्पना कर सकें। लेकिन इस आंकलन की गुणवत्ता अलग-अलग समुदायों मे भिन्न-भिन्न तो होती ही है एक ही भौगोलिक क्षेत्र के उप समुदायों मे भी उनकी आर्थिक सांस्कृतिक बनावट के अनुसार उनकी आंकलन क्षमता भिन्न हो सकती है।
यही कारण है कि वर्तमान की ब्याख्या मे उतनी समानता नही दिखती जितनी समानता इतिहास की व्याख्या मे सहज मिल जाती है हालांकि भिन्नता वहां भी होती है लेकिन विभाजन उतना चौड़ा नही होता है। हमारे वर्तमान के मुख्य अर्न्तविरोध कौन से हैं इसकी मुख्यतया तीन समझ है। एक धारा कहती है कि अरब आक्रमणकारी सांस्कृतिक साम्राज्यवाद, धार्मिक बाने मे हमारी धार्मिक सहिष्णुता का फायदा उठाते हुए अपना वर्चस्व कायम करने के फिराक मे है जो हमारी सांस्कृतिक विशिष्टता को नष्ट कर देगा। दूसरी धारा कहती है कि हमारे समाज में विशिष्ट रुप से एक छोटा सा समूह अनुवांशिक रुप से हजारो वर्षो से आर्थिक संसाधनों पर कब्जा करके अपने सांस्कृतिक मूल्यांे का बलात रोंपण किए हुए है और अभी भी आधुनिक विज्ञान से सम्पन्न हुए उत्पीड़ित समुदाय के मध्यम वर्ग को सांस्कृतिक बराबरी नही देना चाहता, जिसके फलस्वरुप इस अमानवीयता से समाज हमेशा संकट ग्रस्त रहेगा। तीसरी धारा कहती है कि मानव समाज के विभाजन की बुनियाद मे उत्पादन सम्बन्ध से उपजे मालिकाना रिश्ते रहे हैं अब मनुष्य को अपने उत्पादन सम्बन्ध बदलने पड़ेगें और भावी समाज ऐसा बनाना पड़ेगा जिसमे लोग अपनी क्षमता के अनुरुप उत्पादन कर सके और आवश्यकता के अनुरुप उपभोग कर सकें।
आधुनिक ज्ञान की बदौलत 21वीं सदी मे मध्यम वर्ग तेजी से बढ़ रहा है। रोटी का प्रश्न दुनिया और समाज के अपेक्षाकृत छोटे से हिस्से मे ही प्रमुख प्रश्न रह गया है यही स्थिति कपड़ा और मकान की भी है। औद्योगिक विकास ने मनुष्यता के बड़े हिस्से को इस मुकाम तक पहुंचा दिया है कि रोटी, कपड़ा और मकान नही बल्कि रोटी, कपड़ा और मकान के प्रकार हमारे लिए महत्वपूर्ण प्रश्न बन चुके हैं। रोटी, कपड़ा और मकान के प्रकार को तंय करने मे हमारी संस्कृति की महत्वपूर्ण भूमिका है। इसीलिए सांस्कृतिक प्रश्न महत्वपूर्ण होते जा रहे हैं और आधुनिक वैज्ञानिक चिंतकों के बल पर विकसित हमारे समुदाय का बड़ा हिस्सा मिथकीय चरित्रों को अधिक महत्वपूर्ण समझ रहा है और आधुनिक ज्ञान से विकसित संसाधनो का उपयोग करके उनको ही तिरष्कृत कर रहा है, जिनकी क्रमबद्ध समझ से उपजे संसाधन से वह संवाद योग्य हुआ है।

सोमवार, 11 फ़रवरी 2019

गांव का हाल-1(नवरंग में प्रकाशित)


हलो.........हलो..........
  मोबाइल लेकर रामरती कोठरी से आंगन तक और अगवार से पिछवार तक दौड़ लगा रही थी लेकिन टावर गायब हो गया ।
उसे गुस्सा आया पता नही मोबाइल पर या अपने पति पर और......निबहुरा......कहकर मोबाइल ताक पर रखा ही था कि फिर उसमे भोजपुरी कालर ट्यून बजने लगा । हलो...........हलो......हां............हां............सुनायी देतबा............इहां सब ठीक बा............हलो....................हलो.................हां.......हां...........इहां सब ठीक बा...........धत तेरी कि......फिर टावर गायब हो गया ।
उसकन लेकर बरतन रगड़ते हुए उसका गुस्सा लगातार चढ़ रहा था, आज इनका फोन आएगा तो कहूंगी चाहे जो हो जाय, पैसा भेजो पखाना बनवाना है।
ई मोबाइल से पूरी बात नही हो पाती है आज चिठ्ठी लिखूंगी, आखिर नैहर के स्कूल का पढ़ना लिखना किस काम आएगा ।
रामरती को जितना गुस्सा आ रहा था बरतन उतने ही चमक रहे थे ।
गुस्सा इस बात पर भी आ रहा था कि कई दिन पर आज आधी रात मे बिजली आयी थी और भोर मे उठकर मोबाइल चार्ज मे लगाया था लेकिन बात नही हो पायी ।
लड़का अभी उठेगा तो कितनो मना करो मोबाइल से गेम खेलना शुरु कर देगा और फिर बैटरी खतम हो जाएगी ।
उसका आदमी भी फैक्टरी पर निकलने के पहले सबेरे एक बार कोशिश करता है आज फोन लगा भी तो बात नही हो पायी ।
जबतक पूरा अजोर हो बरतन माज कर उसने कागज कलम उठा लिया.............सम्बोधन मे कुछ लिखने से लजाते हुए स्याही ने शिकायतो को शिनाख्त करना शुरु कर दिया ।
लड़का एकदम नही पढ़ता है...जब से मोबाइल पाया है उसीसे खेलने लगता है जिससे बैटरी बार बार डिस्चार्ज हो जाती है।
बिजली कई दिन पर रात बिरात कब आती है पता ही नही चलता, वही उठकर मोबाइल चार्ज मे लगाता है।
अब जिद कर रहा है कि उसको भी एक मोबाइल चाहिए, कहां से खरीद......ब हमहूं के पता है ओसे कौनो बहाना कर दी...ह।
आजकल सबेरे-सबेरे निपटान के समय टोका-टाकी करते हैं एकदिन परधान कह रहे थे शौचालय बनवा ल, 4000रु0 दे रहे थे बतावा चांपाकल लगाने के लिए एतना दिन से कह रहे है कि हमलोगों के आठ-दस घर के बीच मे चांपाकल नही है तो इसपर चुप्प हो जाते हैं आखिर पखाना बनवाएगे तो पानी कहां से लाएगें ।
अबही तो पानी खातिर वैसे ही मारामारी रहता है बछियवा को भी दिन भर मे तीन-चार बाल्टी पानी लग जाता है, बरतन-बासन, नहान-धोअन, खाना-पीना, चूल्हा-चैका खातिर ओतना दूर से पानी ढोते ढोते सांस फूलता रहता है इसी मे पखाना खातिर भी पानी ढोने का काम बढ़ जाएगा।
लेकिन पखाना भी जरुरी हो गया है क्योंकि जबसे पूरुब वाला बगीचा कटकर वहां पर भट्ठा खुल गया है कहीं एकान्त नही रह गया है।
ई सोबरना जब से परधान के गोल मे हो गया है तबसे बड़ा खरखाह बन गया है, सबेरे-सबेरे चक्कर लगाने लगता है परधनवा उसकी माई का विधवा पिन्सिन पास करा दिया है ।
कइसहूं कुछ पैसा का जोगाड़ करो तो परधान वाला पैसा लेकर पिछवारे पखाना बनवा दें । इससे दो काम हो जाएगा एक तो पखाना बन जाएगा और पिछवारे वाली जगह मे बड़की माई बकरी बांध रही है उस पर उनकी नियत डोल रही है, जिससे वहां पर कुछ बनवाना जरुरी हो गया है।
अरे...................हां सुधना बड़की माई मर गइलीं, उनके तेरही के बाद दुनो पतोहों मे खूब झगड़ा हुआ ।
सुधना बड़की माई के बड़का बेटा के पास आजकल आमदनी है उ धूमधाम से तेरही करना चाहता था लेकिन छोटका का हाथ तंग था उ सोच रहा था जैइसे बाऊ का हुआ था वैसे ही हो जाय और उसने बड़के भाई के हिसाब से तेरही करने मे आधा खर्चा देने से इन्कार कर दिया था तेरही तो ठीक-ठाक से हो गयी लेकिन बड़की माई के कमरा पर बड़की पतोह जब कब्जा करने लगी तो दोनो मे खूब झगड़ा हुआ ।
कैसा जमाना आ गया है..........रामरती सोचने लगी ।

जेन जी के द्वन्द

सुबह उठकर चाय बनाने के लिए फ्रिज से दूध निकालते समय देखा कि दूध पर मलाई की एक मोटी परत जमी है, जिसको निकालकर अलग एक बरतन में रखा जिसमें लगात...