2019 का भाष्य
बढ़ते नगरीकरण और फैलते
मध्यवर्ग के श्रममुक्त
होते घण्टों को
कर्मकाण्डीय धार्मिक जीवन भर
रहा है। यह
नवनागरी कर्मकाण्डी समाज, खेतिहर
जीवन के धार्मिक
समाज से भिन्न
है। खेतिहर समाज
का धर्म, जीवन के
सीमित संसाधनों में
किसी तरह से
अपने दुख को
संतोष में बदलने
की कला देता
था लेकिन सम्पन्न
हो रहे भारत
के मध्यवर्ग की
नयी धार्मिेक
शैली उनको अपनी
उपलव्धियों के अभिव्यक्ति
का कर्मकाण्डीय कार्यक्रम
दे रहा है।
इस नए धर्म
की जकड़बन्दी को
प्रगाढ़ करने के
लिए इसके दृष्टिपथ
में भिन्न धार्मिक
समुदायों के प्रति
भय की निरन्तर
सर्जना, कुछ सप्रयास
और कुछ भिन्न
धर्म की गतिविधियों
के फलस्वरुप निरन्तर
जारी है। इस
सम्बन्ध में एक
मित्र का कथन
उल्लेखनीय है कि
बम्बई फिल्म जगत
की उदार जीवन
शैली में एक
प्रसिद्ध फिल्म संगीतकार की
बेटी के बुर्कानशीनी
का शौक या
श्रीलंका मे करोड़पति
मुस्लिम परिवार द्वारा अपने
धार्मिक विश्वासों के कारण
सैकड़ो लोगों को कत्ल
किया जाना एक
राजनैतिक संदेश भी देता
है, जो लोग
इसे पढ़ नही
पा रहे हैं
उनके लिए किसी
नवीन ब्रेल लिपि
के आविष्कार की
आवश्यकता है।
नगरीय क्षेत्रों जाति, वर्ण
व्यवस्था के निषेधों
को अतिक्रमित कर
निजी जीवन की
व्यवस्थाओं जैसे शादी,
विवाह, मरनी, करनी आदि
को सम्पन्न कराने
का एक सुविधा
जनक प्लेटफार्म और
नगर के वार्ड
स्तर तक की
राजनैतिक ताकत हासिल
करने का जरिया
है। अब यह
वर्ण व्यवस्था के
जंजीरों में जकड़ी
निरीह जाति नही
है जिसको सशक्त
करने मे सामाजिक
न्यायवादियों की भूमिका
रही है। नगरीय
क्षेत्रों में संसद
और विधानसभा के
निर्वाचनों में जाति
से अधिक प्रभावी
भूमिका धर्म की
है।
ग्रामीण समाज मे
जाति प्रधानी से
लेकर सांसदी तक
राजनैतिक ताकत हासिल
करने का उपकरण
जरुर है लेकिन
बाजारों,चट्टी–चौराहों के
तेजी से कस्बों
में बदलने के
कारण खेतिहर अर्थ
व्यवस्था से तेजी
से मुक्त हो
रही नयी पीढ़ी
पर से उनके
समाज के आरक्षण
भोगी मध्यवर्गियों की
राजनैतिक पकड़ दिनोदिन
क्षीण होता जा
रही है। सामाजिक
न्याय के नाम
पर जयन्तियां मनाने
वाले और शेष
दिनों में प्रायः
जाति की संकीर्णताओं
में जीने वाले
वाले पिछड़े और
दलित समुदाय के
सरकारी कारकुन प्रमोशन और
आरक्षण के नाम
पर भले ही
गोलबन्दी खड़ी करने
की कोशिश करें
परन्तु आरक्षण से वंचित
और उससे निराश
एक विशाल आबादी
का नेतृत्व उसके
हाथ से फिसल
रहा है। इस
आरक्षणभोगी समुदाय ने निजी
और सार्वजनिक जीवन
में उसी भ्रष्ट
जीवन शैली को
अपनाया हुआ है
जिसमें कथित सवर्णो
को महारत हासिल
है। यह वर्ग
भी अपनी वर्गीय
प्रकृति के अनुरुप
तेजी से अपने
गांव मे ही
आप्रवासी बन रहा
है।
सामाजिक न्याय का लक्ष्य
जातीय पहचान के
आधार पर उत्पीड़न
को समाप्त करना
और इन वंचित
समुदायों मे एक
मध्यवर्ग तैयार करना था
न कि जाति
या वर्ग को
समाप्त करना है।
इस मायने मे
एक स्तर तक
यह कार्य पूर्ण
हो चुका है
अवशेष कार्य वह
सत्ताधारियों की गोद
में बैठकर रुठने
मनाने का खेल
करके निपटा सकता
है इसके लिए
उसे अपनी सुविधाओं
की कीमत पर
विद्रोही तेवर अपनाने
की आवश्यकता नही
है। इसीलिए हम
सामाजिक न्याय के छोटे
दुकानदारों की सत्ता
मे सहज आवाजाही
देख रहे हैं,
हां बड़ी कम्पनियों
को बड़े सौदों
की तलाश है।
हम क्या हैं
यह हमारे परिवार,
पर्यावरण, मित्र और शत्रुओं
से निर्धारित होता
है। हम जिससे
प्रतिद्वन्दिता करते हैं
उसकी तुलना में
खुद को सचेतन
रुप से बदलते
हैं। साम्राज्यवाद के
दौर मे हमारे
नेतृत्व की प्रतिद्वन्दिता
जिनसे थी उन्होने
अपने साहस, अध्ययनशीलता,
आधुनिक चितंन और पेशेवराना
दक्षता से इस
ग्रह के बहुत
बड़े भूभाग पर
कब्जा किया था।
साम्राज्यवाद के विरुद्ध
लड़ रहे तत्कालीन
भारत का नेतृत्व
भी उसी स्तर
पर स्वयं को
परिष्कृत कर उनको
चुनौती दिया परिणामतः
हम उनको सफल
चुनौती दे सके
और एक आधुनिक
भारत की नींव
रख सके। यह
दुर्भाग्य रहा कि
स्वतंत्रता के उपरान्त
विभिन्न कारणों से हम
एक मध्ययुगीन मानसिक
अवस्थिति मे रह
रहे पड़ोसी के
विभिन्न कारणों से प्रतिद्वन्दी
बनते गए और
चाह–अनचाहे उसी
स्तर पर उतरते
चले गए। अंग्रेजी
साम्राज्यवाद के विरुद्ध
संघर्ष और उसके
दमन की पीड़ा
विस्मृतियों मे दर्ज
हो चुकी है।
इस संघर्ष मे
प्रमुख भूमिका निभाने वाला
कथित सवर्ण और
मध्यवर्ग गांधी की हत्या
को स्वीकृति प्रदान
कर चुका है।
नेहरुवादी माडल से
तैयार किए गए
सार्वजनिक संस्थानों को निजी
सम्पत्ति के रुप
में औने पौने
दामों पर बेच
दिए जाने को
सामाजिक स्वीकृति मिल चुकी
है। ऐसे में
उस धारा का
प्रतिनिधित्व करने वाले
राजनैतिक दल की
परम्परागत वंशावलियों में छिटपुट
हरी कोंपले दिखेगीं
अवश्य लेकिन उपरोक्त
जनाधारों के बूते
इनकी वापसी दिवास्वप्न
है।
खेती किसानी, आदिवासियों, स्त्रियों
और अल्पसंख्यकों के
मानवाधिकार, मजदूरी आदि के
मुदृे पर धरना
प्रदर्शन करने वाला
लेफ्ट भी एक
पिछड़ी अर्थव्यवस्था वाले समाज
के राजनैतिक तौर
तरीकों वाला उपकरण
मात्र रह गया
है जिसके लिए
नए जमाने की
ई०वी०एम० में जगह
नही है। किसी
दिन टी०वी० में
लाल झण्डा लेकर
मुम्बई, दिल्ली जैसे महानगर
की तरफ बढ़ते
किसानों को लेकर
यह मध्यवर्ग को
चौंकाता अवश्य है लेकिन
किसान की फटी
बिवाइयां सम्पन्न किसानों के
शोषण और रुढ़िग्रस्त
सामाजिक व्यवस्थाओं का आश्रयस्थल
भी है, जिससे
मुक्त करके इस
समुदाय को अपने
हितों के लिए
एकजुट होकर राजनीति
की डªाइविंग
सीट पर बैठाना
उतना ही दूभर
है जितना किसान
से मजदूर के
रुप में वर्गान्तरित
हो रहे इस
समुदाय की एक
वर्गीय पहचान बनाना।
लेकिन समाज मे
संकटों को अपनी
वैकल्पिक राजनीति की तलाश
जारी है और
जो इसमें से
मुखर संकटों को
डील करेगा वही
भावी राजनीति मे
निर्णायक जगह पाएगा।
बेरोजगारी, भीषण आर्थिक
असमानता, प्राइवेट कम्पनियों मे
बेरोजगारों का शोषण,
आगनबाड़ी, शिक्षामित्र, किसान मित्र, आशा
कार्यकत्री जैसी सेवाओं
की सेवाशर्तो को
सम्मानजनक किया जाना,
अमीरी की सीमारेखा,
किसी भी उत्पाद
पर अधिकतम लाभ
की निर्धारित दर,
लघु तथा कुटीर
उद्योगों को संरक्षण,
सहकारी खेती, प्रति व्यक्ति
आय के अनुपात
में ही सरकारी
कारकुनों के वेतन–भत्तों का निर्धारण,
प्रत्येक वरिष्ठ नागरिक के
लिए सम्मानजनक पेंशन,
रोजगार प्रदाता कम्पनियों द्वारा
बेरोजगारों का शोषण,
चिकित्सा तथा शिक्षा
में मची लूट,
पर्यावरण, जाति और
लिंग आधारित शोषण,
राज्य के अधिकार
को सीमित करके
स्थानीय निकायों को अधिकार
सम्पन्न बनाने आदि जैसी
चुनौतियों को सूत्रबद्ध
करके भावी भारत
को सम्बोधित करने
के लिए लेफ्ट
को अपने बूढ़े
तथा रुढ़ नेतृत्व
से विद्रोह करके
सम्मिलित काडर बनाकर
एक नया विकल्प
प्रस्तुत करने के
अलावा कोई रास्ता
नही है। संतोष
मात्र इतना है
कि वैकल्पिक दल
के रुप में
लेफ्ट के अन्दर
काडर को आकर्षित
करने की क्षमता
है और लेफ्ट
ही धर्म, जाति,वंशवाद और भ्रष्टाचार
से मुक्त रहकर
काडर आधारित दीर्घकालीन
राजनीति करने में
सक्षम है। इस
चुनाव ने परम्परागत
विपक्ष को हाशिए
पर डाल कर
एक सम्भावनाशील और
बेहतर राजनीति के
लिए स्थान रिक्त
किया है। यदि
ऐसा नही हो
सका तो इस
निर्वात को जाति,
उपजाति, गोत्र, क्षेत्र आधारित
संगठन और उग्र
धार्मिक समूह भरेगें
जो दुनिया के
दूसरे सबसे विशाल
जनसमूह का प्रतिनिधित्व
कर रहे राष्टª
के लिए अत्यधिक
पीड़ा दायी होगा।
निश्चय ही यह
सर्वाधिक संकटग्रस्त और सर्वाधिक
संभावनाशील समय है।



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