––अनमनापन––

इतिहास की व्याख्या की जाती है, भविष्य की कल्पना की जाती है लेकिन वर्तमान को जीना पड़ता है और जीना ही राजनीति है। सांस्कृतिक मनुष्य के अंतरण मे जिस बुद्धि ने नेतृत्व किया उसका स्तर समुदाय मे कभी बराबर नही रहा है। उर्वर मस्तिष्कों ने समुदायों के वर्तमान का नेतृत्व किया, समुदायों के सुदूर भविष्य की सम्भावनाओं के बारे मे सचेत किया तथा अपने उप समूहों के वृत्त बनाए। नवीनता के प्रति आकर्षण और अज्ञात के प्रति उत्सुकता से भरे इन मस्तिष्कों के उप समूह के केन्द्र में जबतक नवीनता के उत्पादन की क्षमता रही तबतक इसकी परिधि को विस्तार मिलता रहा परन्तु यह दुर्योग है कि अधिकांश समूहों के केन्द्र मे नवोन्मेष का पुनरुत्पादन पाण्डा प्रजाति की तरह ही दुर्लभ रहा। इस दुर्योग ने इन उप समूहो को उसी प्रकार की रुढ़ियों से आबद्ध कर दिया, जिनसे उच्छेदन का शंखनाद करके नव समूह का सृजन हुआ था। सभ्यता के शुरुआती चरण में  विचारों के विस्तार की गति अपेक्षाकृत धीमी परन्तु उम्र सदियों मे हुआ करती थी। आज विचारों के विस्तार मे अभूतपूर्व गतिकी आ चुकी है परन्तु उनकी उम्र तेजी से घट रही है। वर्तमान संकट किसी भी विचार के अनिगिनत संस्करणों के तत्काल प्रचलित होने के कारण मौलिकता के क्षीण होते जाने के कारण पैदा हो रहा है और यह नवीनता के अल्पजीवी होने का कारण भी बन रहा है। इसको यूं कहा जा सकता है कि हम किसी मैदान मे दो टीमों के बीच फुटबाल मैच को देखने और उसके साथ जीवंत रिश्ता बनाए
जाने के आदी रहे हैं लेकिन अब हो ये रहा है कि उस मैदान मे कई टीमे फुटबाल खेल रही है, जिनके खेल का स्तर, गोलपोस्ट और नियम भी असमान हैं और हम है कि अब भी मैदान मे उसी पुराने खेल को जीना चाहते हैं। इसी तरह से वर्तमान मे बदलाव की आकांक्षी शक्तियों बनाम यथास्थितिवादी शक्तियों के खेल मे हमारी कर्मकाण्डीय हिस्सेदारी जरुर दिखती हैं लेकिन हमारा अनमनापन भी दिखता है, जिसके टूटने की तभी सम्भावना है जब पूरा खेल एक निर्णायक गोलबन्दी के तहत खेला जाए। या ऐसा भी हो सकता है कि जीवन की विविधता हमारी एकनिष्ठ लक्ष्य की तरफ बढ़ने की क्षमता को इस हद तक प्रभावित कर चुकी हो कि हम टेस्ट मैच के बजाय ट््वण्टी-ट्वण्टी खेलने लायक ही रह गए हों यानी दूरगामी स्थिर लक्ष्य के बजाय निकट के छोटे-छोटे लक्ष्य हमे अधिक विष्वसनीय लग रहे हों और फिर यह अनमनापन इसलिए हो सकता है कि हम पसीना कम बहाना चाहते हैं लेकिन गहरी नींद का सुख भी नही छोड़ना चाहते हैं।

टिप्पणियाँ

  1. दिखावे की प्रवृत्ति बढ़ी है मानसिक, शारीरिक, भौतिक हर तरह से अपने आपको बेहतर बताने में लगे है समय के साथ विचारो में परिवर्तन आवश्यक है ये समझते है लेकिन शादी करनी हो तो अपनी ही जाति ढूंढेंगे, नई युवा पीढ़ी इसमें जबरदस्त योगदान कर सकती थी लेकिन उच्च स्तरीय शिक्षा ग्रहण किए हुए को भी मैंने खोखली पुरानी विचारधारा में पिसते देखा है।

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