गुरुवार, 20 मार्च 2025

कृत्रिम बुद्धि से कुछ जिज्ञासाएं-1

ग्राेक‚ चेट–जीपीटी और डीप सीक से मेरी जिज्ञासा–

पहली शताब्दी से बीसवीं शताब्दी तक चीनभारतरोम अरबतुर्कीपश्चिमी यूरोप तथा अमरीका जैसे देशों का विश्व के सकल घरेलू उत्पाद में अंश के प्रतिशत का विवरण शताब्दीवार बताइए ––

ग्रोक

पहली शताब्दी से बीसवीं शताब्दी तक विश्व के सकल घरेलू उत्पाद (GDP) में विभिन्न क्षेत्रों और देशों के योगदान का सटीक शताब्दीवार डेटा प्रदान करना चुनौतीपूर्ण है, क्योंकि प्राचीन और मध्यकालीन काल में आर्थिक आंकड़े आधुनिक मानकों के अनुसार व्यवस्थित रूप से दर्ज नहीं किए गए थे। हालांकि, आर्थिक इतिहासकारों जैसे एंगस मैडिसन ने ऐतिहासिक GDP के अनुमानों को पर्चेजिंग पावर पैरिटी (PPP) के आधार पर पुनर्निर्माण करने का प्रयास किया है। इन अनुमानों के आधार पर, मैं आपको एक सामान्य अवलोकन प्रस्तुत कर सकता हूँ, जो इन क्षेत्रों (चीन, भारत, अरब,रोम, तुर्की, पश्चिमी यूरोप, और अमेरिका) के विश्व GDP में योगदान को शताब्दीवार दर्शाता है। यह डेटा सटीक प्रतिशत के बजाय रुझानों और सापेक्ष योगदान पर आधारित है, क्योंकि सटीक आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं।

पहली शताब्दी (1 AD)

  • चीन: हान वंश के अधीन, ~25-30%
  • भारत: गुप्तकाल से पहले, ~20-25%
  • रोम: रोमन साम्राज्य अपने चरम पर, ~20-25%
  • अरब: अभी एकीकृत नहीं, व्यापारिक मार्गों पर निर्भर, ~5% से कम।
  • तुर्की: तुर्क अभी प्रभावी नहीं; यह क्षेत्र रोमन/पार्थियन नियंत्रण में, योगदान नगण्य।
  • पश्चिमी यूरोप: रोमन साम्राज्य का हिस्सा, अलग से ~10-15% (रोम के साथ ओवरलैप)।
  • अमेरिका: स्वदेशी सभ्यताएँ, योगदान नगण्य।

पांचवीं शताब्दी (400-500 AD)

  • चीन: पूर्वी जिन/दक्षिणी-उत्तरी राजवंश, ~20-25%
  • भारत: गुप्त साम्राज्य का स्वर्ण युग, ~25-30%
  • रोम: पश्चिमी रोमन साम्राज्य का पतन, पूर्वी रोम (बीजान्टिन) बचा, ~10-15%
  • अरब: अभी संगठित नहीं, ~5% से कम।
  • तुर्की: तुर्कों का उदय नहीं, क्षेत्र बीजान्टिन नियंत्रण में, नगण्य।
  • पश्चिमी यूरोप: रोम के पतन के बाद गिरावट, ~5-10%
  • अमेरिका: कोई वैश्विक योगदान नहीं।

दसवीं शताब्दी (900-1000 AD)

  • चीन: सोंग वंश की शुरुआत, ~25-30%
  • भारत: चोल और अन्य राजवंश, ~20-25%
  • रोम: बीजान्टिन साम्राज्य के रूप में, ~10-15%
  • अरब: अब्बासिद खलीफा का प्रभाव, ~10-15%
  • तुर्की: सेल्जुक तुर्कों का उदय शुरू, ~5% से कम।
  • पश्चिमी यूरोप: मध्ययुगीन संकट, ~5-10%
  • अमेरिका: माया सभ्यता, योगदान नगण्य।

पंद्रहवीं शताब्दी (1400-1500 AD)

  • चीन: मिंग वंश का चरम, ~25-30%
  • भारत: विजयनगर और अन्य, ~20-25%
  • रोम: बीजान्टिन साम्राज्य का अंत (1453), योगदान ~5% (शुरुआत में) से नगण्य।
  • अरब: ममलूक और इस्लामी शक्तियाँ, ~5-10%
  • तुर्की: उस्मानी साम्राज्य का उदय, ~5-10%
  • पश्चिमी यूरोप: पुनर्जागरण, ~10-15%
  • अमेरिका: एज़्टेक/इंका, योगदान नगण्य।

सत्रहवीं शताब्दी (1600-1700 AD)

  • चीन: किंग वंश की शुरुआत, ~25-30%
  • भारत: मुगल साम्राज्य का चरम, ~20-25%
  • रोम: अब मौजूद नहीं (बीजान्टिन 1453 में समाप्त), योगदान शून्य।
  • अरब: उस्मानी साम्राज्य के हिस्से के रूप में, ~5-10%
  • तुर्की: उस्मानी साम्राज्य का स्वर्ण युग, ~10-15%
  • पश्चिमी यूरोप: औद्योगिक क्रांति से पहले, ~15-20%
  • अमेरिका: औपनिवेशिक शुरुआत, ~1-2%

अठारहवीं शताब्दी (1700-1800 AD)

  • चीन: किंग वंश का चरम, ~30-33%
  • भारत: मुगल पतन और ब्रिटिश प्रभाव, ~20-25%
  • रोम: मौजूद नहीं, योगदान शून्य।
  • अरब: उस्मानी शासन में, ~5%
  • तुर्की: उस्मानी साम्राज्य, ~5-10%
  • पश्चिमी यूरोप: औद्योगिक क्रांति शुरू, ~15-20%
  • अमेरिका: औपनिवेशिक वृद्धि, ~2-5%

उन्नीसवीं शताब्दी (1800-1900 AD)

  • चीन: अफीम युद्ध और पतन, ~15-20% (शुरुआत) से ~5-10% (अंत)।
  • भारत: ब्रिटिश शासन में गिरावट, ~20% (शुरुआत) से ~5-10% (अंत)।
  • रोम: मौजूद नहीं, योगदान शून्य।
  • अरब: उस्मानी प्रभाव में कमी, ~2-5%
  • तुर्की: उस्मानी कमजोरी, ~2-5%
  • पश्चिमी यूरोप: औद्योगिक क्रांति का प्रभाव, ~30-40%
  • अमेरिका: तेज औद्योगिकीकरण, ~10-20% (अंत तक)।

बीसवीं शताब्दी (1900-2000 AD)

  • चीन: गृहयुद्ध और सुधार, ~5% (शुरुआत) से ~15% (अंत)।
  • भारत: स्वतंत्रता और वृद्धि, ~3-5% (शुरुआत) से ~5-7% (अंत)।
  • रोम: मौजूद नहीं, योगदान शून्य।
  • अरब: तेल अर्थव्यवस्था, ~1-3%
  • तुर्की: आधुनिकीकरण, ~1-2%
  • पश्चिमी यूरोप: युद्धों के बाद पुनर्निर्माण, ~25-30% (मध्य) से ~20% (अंत)।
  • अमेरिका: विश्व की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था, ~20% (शुरुआत) से ~25-30% (अंत)।

महत्वपूर्ण टिप्पणियाँ:

  1. रोम: पहली से पांचवीं शताब्दी तक रोमन साम्राज्य (और बाद में बीजान्टिन) का प्रभाव था, लेकिन 1453 में उस्मानी विजय के बाद यह समाप्त हो गया।
  2. अरब और तुर्की: मध्यकाल में ये क्षेत्र इस्लामी साम्राज्यों (अब्बासिद, उस्मानी) का हिस्सा थे, जिससे इनका योगदान ओवरलैप करता है।
  3. पश्चिमी यूरोप: रोम के पतन के बाद इसका योगदान अलग से गिना गया, लेकिन औद्योगिक क्रांति के साथ यह तेजी से बढ़ा।
  4. अमेरिका: 15वीं शताब्दी तक वैश्विक अर्थव्यवस्था से अलग-थलग, 17वीं शताब्दी से योगदान शुरू हुआ।
  5. चीन और भारत: 18वीं शताब्दी तक ये विश्व GDP का ~50% से अधिक हिस्सा थे, जो औपनिवेशिक शोषण और औद्योगिक क्रांति के कारण घटा। 

चैटजीपीटी

पहली शताब्दी से बीसवीं शताब्दी तक विभिन्न क्षेत्रों का विश्व सकल घरेलू उत्पाद (GDP) में योगदान समय के साथ बदलता रहा है। हालाँकि, इस अवधि के लिए सटीक और व्यापक आँकड़े उपलब्ध नहीं हैं, लेकिन कुछ अनुमानों के आधार पर निम्नलिखित जानकारी प्रस्तुत की जा सकती है:

1. पहली से दसवीं शताब्दी:

·         चीन और भारत: प्राचीन काल से ही चीन और भारत की अर्थव्यवस्थाएँ मजबूत थीं। इस अवधि में, ये दोनों देश विश्व GDP में महत्वपूर्ण योगदानकर्ता थे।

·         रोम: प्रथम शताब्दी में रोमन साम्राज्य यूरोप और भूमध्यसागरीय क्षेत्र में प्रमुख शक्ति था, लेकिन पाँचवीं शताब्दी तक इसके पतन के बाद इसका आर्थिक प्रभाव कम हो गया।

·         अरब: सातवीं शताब्दी में इस्लाम के उदय के बाद, अरब साम्राज्य ने व्यापार और विज्ञान में महत्वपूर्ण प्रगति की, जिससे उनकी आर्थिक स्थिति मजबूत हुई।

2. ग्यारहवीं से पंद्रहवीं शताब्दी:

·         चीन: सांग और मिंग राजवंशों के दौरान, चीन की अर्थव्यवस्था विश्व में अग्रणी रही।

·         भारत: चोल, दिल्ली सल्तनत और विजयनगर साम्राज्य के समय, भारत की अर्थव्यवस्था भी महत्वपूर्ण थी।

·         पश्चिमी यूरोप: धीरे-धीरे आर्थिक विकास हुआ, विशेषकर पुनर्जागरण काल में।

3. सोलहवीं से उन्नीसवीं शताब्दी:

·         चीन और भारत: अठारहवीं शताब्दी तक, ये दोनों देश विश्व GDP में प्रमुख योगदानकर्ता थे।

·         पश्चिमी यूरोप: औद्योगिक क्रांति के बाद, यूरोपीय देशों का आर्थिक प्रभाव तेजी से बढ़ा।

·         अमेरिका: उन्नीसवीं शताब्दी में संयुक्त राज्य अमेरिका की अर्थव्यवस्था तेजी से बढ़ी।

4. बीसवीं शताब्दी:

·         संयुक्त राज्य अमेरिका: बीसवीं शताब्दी में अमेरिका विश्व की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन गया।

·         पश्चिमी यूरोप: यूरोपीय देशों ने भी मजबूत आर्थिक विकास किया।

·         चीन और भारत: बीसवीं शताब्दी के अंत तक, विशेषकर 1980 के बाद, चीन और भारत की अर्थव्यवस्थाएँ तेजी से बढ़ीं।

नोट: उपरोक्त जानकारी ऐतिहासिक अनुमानों पर आधारित है। सटीक आँकड़ों के लिए ऐतिहासिक आर्थिक अध्ययनों और शोध पत्रों का संदर्भ लेना आवश्यक है।

 डीपसीक

विश्व के सकल घरेलू उत्पाद (GDP) में विभिन्न देशों और क्षेत्रों का योगदान समय के साथ बदलता रहा है। यह परिवर्तन आर्थिक, राजनीतिक, सामाजिक और तकनीकी कारकों से प्रभावित होता है। नीचे पहली शताब्दी से बीसवीं शताब्दी तक चीन, भारत, रोम, अरब, तुर्की, पश्चिमी यूरोप और अमेरिका जैसे देशों/क्षेत्रों का विश्व GDP में अनुमानित योगदान (प्रतिशत में) शताब्दीवार दिया गया है। यह डेटा ऐतिहासिक आर्थिक अध्ययनों और अनुमानों पर आधारित है।


हली शताब्दी (1–100 ईस्वी)

  • चीन: ~26%
  • भारत: ~32%
  • रोमन साम्राज्य: ~20%
  • अरब: ~1%
  • तुर्की: ~1%
  • पश्चिमी यूरोप: ~5%
  • अमेरिका: ~0% (अज्ञात)

टिप्पणी: इस समय भारत और चीन विश्व की प्रमुख आर्थिक शक्तियाँ थे, जबकि रोमन साम्राज्य भी एक महत्वपूर्ण आर्थिक केंद्र था।


दसवीं शताब्दी (900–1000 ईस्वी)

  • चीन: ~30%
  • भारत: ~28%
  • रोमन साम्राज्य: ~0% (पतन)
  • अरब: ~10%
  • तुर्की: ~2%
  • पश्चिमी यूरोप: ~8%
  • अमेरिका: ~0% (अज्ञात)

टिप्पणी: इस समय तक रोमन साम्राज्य का पतन हो चुका था, और अरब साम्राज्य एक प्रमुख आर्थिक शक्ति के रूप में उभरा।


पंद्रहवीं शताब्दी (1400–1500 ईस्वी)

  • चीन: ~25%
  • भारत: ~25%
  • अरब: ~5%
  • तुर्की (ओटोमन साम्राज्य): ~10%
  • पश्चिमी यूरोप: ~15%
  • अमेरिका: ~0% (अज्ञात)

टिप्पणी: इस समय तक पश्चिमी यूरोप में पुनर्जागरण और समुद्री खोजों का आरंभ हो चुका था, जबकि चीन और भारत अभी भी प्रमुख आर्थिक शक्तियाँ थे।


सत्रहवीं शताब्दी (1600–1700 ईस्वी)

  • चीन: ~30%
  • भारत: ~25%
  • तुर्की (ओटोमन साम्राज्य): ~8%
  • पश्चिमी यूरोप: ~20%
  • अमेरिका: ~1%

टिप्पणी: इस समय तक पश्चिमी यूरोप का आर्थिक विकास तेजी से हो रहा था, और अमेरिका में यूरोपीय उपनिवेशों की स्थापना शुरू हो चुकी थी।


अठारहवीं शताब्दी (1700–1800 ईस्वी)

  • चीन: ~35%
  • भारत: ~25%
  • तुर्की (ओटोमन साम्राज्य): ~5%
  • पश्चिमी यूरोप: ~25%
  • अमेरिका: ~2%

टिप्पणी: इस समय तक चीन और भारत अभी भी विश्व की प्रमुख आर्थिक शक्तियाँ थे, लेकिन पश्चिमी यूरोप में औद्योगिक क्रांति का आरंभ हो चुका था।


उन्नीसवीं शताब्दी (1800–1900 ईस्वी)

  • चीन: ~17%
  • भारत: ~12%
  • तुर्की (ओटोमन साम्राज्य): ~3%
  • पश्चिमी यूरोप: ~40%
  • अमेरिका: ~15%

टिप्पणी: इस समय तक पश्चिमी यूरोप और अमेरिका ने औद्योगिक क्रांति के कारण अपनी आर्थिक शक्ति में भारी वृद्धि की, जबकि चीन और भारत का योगदान कम हो गया।


बीसवीं शताब्दी (1900–2000 ईस्वी)

  • चीन: ~5% (1950 तक), ~15% (2000 तक)
  • भारत: ~4% (1950 तक), ~5% (2000 तक)
  • तुर्की: ~1%
  • पश्चिमी यूरोप: ~30% (1950 तक), ~20% (2000 तक)
  • अमेरिका: ~30% (1950 तक), ~25% (2000 तक)

टिप्पणी: बीसवीं शताब्दी में अमेरिका और पश्चिमी यूरोप प्रमुख आर्थिक शक्तियाँ बने रहे, लेकिन शताब्दी के अंत तक चीन और भारत का आर्थिक विकास तेजी से होने लगा।


सारांश

  • चीन और भारत: पहली शताब्दी से अठारहवीं शताब्दी तक विश्व GDP में प्रमुख योगदानकर्ता थे, लेकिन उन्नीसवीं और बीसवीं शताब्दी में उनका योगदान कम हो गया।
  • पश्चिमी यूरोप और अमेरिका: उन्नीसवीं और बीसवीं शताब्दी में इन क्षेत्रों ने औद्योगिक क्रांति और तकनीकी विकास के कारण विश्व GDP में प्रमुख योगदान दिया।
  • अरब और तुर्की: इन क्षेत्रों का योगदान मध्यकाल में महत्वपूर्ण था, लेकिन बाद के समय में कम हो गया।

यह डेटा ऐतिहासिक अनुमानों पर आधारित है और विभिन्न स्रोतों में थोड़ा भिन्न हो सकता है।



रविवार, 18 अक्टूबर 2020

पुर्नजन्म( हमारा मोर्चा में प्रकाशित 26-3-2020)

 


1.

   ई बुढ़वा झगड़ा रोप कर अपने तो दऊ पर गया आउर जिनगी भर का किचाइन माथे पर डाल गया, इमिरतिया बरसातू को साइकिल से आते देख कर भुनभुना रही थी।

चुप रह तनि पानी त दे.....बरसातू अपनी साइकिल मड़ई के किनारे खड़ी करके झिलंगही खटिया पर ठहते हुए बोला। आज भी दिन भर कचहरी मे ही बीत गया था उसका।

वकील से भी बतकुच्चन हो गया पता नही काहे जब तारीखे पड़ना था, तो दिन भर बैठा कर एक दिन की मजूरी मरवाने का का मतलब, उसने पानी लेकर खड़ी अपनी पत्नी से बोलते हुए लोटा थाम लिया।

ठेकेदरवा कल फिर टोकेगा कि या तो मुकदमा लड़ लो या राजगिरी करो। फिर सोचा उसका भी दोष नही है, जिसका काम फंसेगा उ तो बोलेगा ही।

2.

मसला पुराना है, बरसातू के बाप को भाइयों से बटवारे मे जो हिस्सा मिला था, उससे सटी हुई थोड़ी सी सार्वजनिक जमीन भी थी। अतिरिक्त सार्वजनिक जमीन के कारण उसके हिस्से की जमीन रकबे मे थोड़ी बड़ी हो गयी थी।

जमीन के उस अतिरिक्त हिस्से पर पर बरसातू के बाप ने अपने बूढ़ी गाय और बकरी की नाद, चरनी बना ली थी। उसी अतिरिक्त हिस्से के लिए भाइयों मे आपस मे काफी गाली-गलौज हुई थी, उनकी पत्नियों ने भी महीनों इस गाली-गलौज को विस्तार दिया था, जिसमें टोला के लोगों को बिला नागा धारावाहिक मनोरंजन हुआ करता था।

3.

   जब का यह वाकया है, तब थर्ड क्लास के सरकारी कर्मचारी साइकिल से चला करते थे।

बरसातू के बाप खेलावन का घर सड़क के किनारे होने के कारण हलके से शाम को वापस लौट रहे लेखपाल को उसके दरवाजे के नीम के पेड़ पर बैठे मुर्गे की बंाग से अपने लड़की के ससुर यानी समधी के स्वागत-सत्कार की समस्या का समाधान सूझ गया।

मुर्गे ने जब दुबारा बांग दिया तो लेखपाल को लगा जैसे मुर्गा उसको ही बुला रहा है। कुछ आगे बढ़ चुके लेखपाल ने साइकिल वापस मोड़ा और खेलावन को पुकारने लगा ।

 ‘‘अरे खेलावन भाई घर कुछ मेहमान आने वाले हैं, इ मुर्गवा दे देते‘‘ उसने नीम के पेंड़ की डालियों में छिपे मुर्गे की ओर इशारा करते हुए कहा ।

खेलावन अपनी तल्ख जबान के लिए मशहूर था। उस दिन सुबह ही किसी ने खेलावन के दरवाजे पर नीबू सिन्दूर रखकर अपना भूत उसके घर भेजा था और उसकी बीबी पूरे दिन आस पड़ोस को गरियाती रही।

खेलवान की मेहरारु पर उस दिन सचमुच का भूत आ गया था, पूरे दिन मानसून की बारिश की तरह कभी उसकी गालियां तेज हो जाती तो कभी हल्की फुहार की तरह धीमी हो जाती। खेलवान काम पर नही गया, पता नही कब किससे बात बढ़ जाय।

दिन भर की चिकचिक से खिन्नमन अभी लेटा ही था कि लेखपाल की पुकार सुनाई दी, उसे यह भी आशंका हुई कि लेखपाल या तो मुर्गे का दाम नही देगा अथवा औने-पौने में खरीदना चाहेगा, इसीलिए उसने सीधे टाट उलट दिया।

लेखपाल कुछ अपमानित महसूस करते हुए वापस घर चला गया और कुछ दिन बाद उसने अपनी व्यथा गांव के कथित मानिन्दों को बताई। सबने उसके दर्द को सहलाया, दरअसल बहुत से सवर्ण पिछड़ी जाति के खेलावन की तल्ख जबानियों को अपने-अपने दिल में सहेजे सही वक्त का इंतजार कर रहे थे।

4.

लेखपाल को गांव के गणितज्ञों का थोड़ा इशारा ही तो चाहिए था, खेलावन के आबादी की जमीन से सटी हुई सार्वजनिक जमीन जिन्दा हो गयी और उस पर अतिक्रमण का मुकदमा कचहरी में दाखिल हो गया।

लोग कहते हैं कचहरी जिसको पकड़ती है, उसकी पीढ़ियों को भी नही बख्शती है। तारीख............वकील.............पेशकार..............मुहर्रिर.....................साहब.............हजूर............पुकार.................हड़ताल...............फीस..................फैसला................अपील...................बहस................के साथ खेलावन की बची खुची उम्र गुजर गयी।

बीस-पच्चीस साल बहुत होते हैं भाइ, अखबारों ने इतने दिनों मे भिंडरवाले से लादेन का सफर तय कर लिया, अमरीका ने  रीगन से बुश और रुस ने गोर्बाचेव से पुतिन का सफर तय कर किया।

गांव में उग रही गुमटियों में बोरे के नमक की जगह बन्द पैकेट का टाटा नमक बिकने लगा। इतने दिनों मे नीम के पेड़ की डालियां खेलावन के क्रिया कर्म में काम आ गयी  और वह मुर्गा भी किसी बिलार के काम आ गया था।

बाप की  विरासत को बरसातू नें दो-चार साल ढोने के बाद...............वकीलों की चैकी पर जम्हाई लेते ............ दाना खाते................... पेशी देते........................दरखासी कागज खरीदते.............................किस्मत खोलने वाली अंगूठी परखते.....................मदारियों का मजमा देखते........................जोश बढ़ाने वाली दवाओं और साण्डा का तेल निहारते.................समझ लिया कि कचहरी रोज कमाने खाने वाले आदमी को तारीख-दर-तारीख मारती है।

5.

कचहरी का चक्कर लगाते-लगाते बरसातू को समझ मे आ गया कि मसला प्रधान से हल हो सकता है।

इस बार के चुनाव मे उसने काफी नाप तौल कर पुराने प्रधान की पार्टी पकड़ ली और जाति, बिरादरी, टोला, मोहल्ला मे जबानी प्रचार से लेकर दारु की पाउच तक बांटने का काम बड़े मन से किया।

प्रधान भी पिछली बार आरक्षण के कारण नही लड़ पाया था और इस बार गांव वालों को वर्तमान से अतीत अच्छा लगने की सहज प्रवृत्ति के चलते और कुछ बिरादरियों का गणित बैठ जाने के कारण झार कर वोट पाया।

तो साहेब जब कोई झार कर वोट पाकर जीत जाता है तो उसको भरम हो जाता है कि उ किसी की बदौलत चुनाव नही जीता है बल्कि कोई उससे काबिले नही है।

6.

खैर जैसे प्रधान झार कर वोट पाकर जीत गया था, वैसे ही उसको जिन्दगी मे बहुत कुछ बड़ी सहजता से मिल गया था।

उसके बाप ने सार्वजनिक उपक्रम की नौकरी से अपना काफी बड़ा निजी उपक्रम खड़ा कर लिया था। आधा दर्जन बहनो मे सबसे छोटा इकलौता भाई होने के कारण उसके हिस्से काफी प्यार-दुलार आया था।

बाप ने उसकी बहनों की शादी बुश-रेडियों और रैले-साइकिल से शुरु करके रंगीन-टी0वी0 और मारुती-800 पर खत्म की थी और इसी से उसने अपने अस्तबल में काफी अच्छे-अच्छे घोड़े(दामाद) बांध लिए थे।

घर में पड़ने वाले प्रयोजनों मे जब इन घोड़ो की हिनहिनाहट उसके दरवाजे पर गूंजती तो समृ़िद्ध के उस अहाते मे चापलूसों की भीड़ उमड़ पड़ती।

बाप के बुढ़ापे और बेटे की जवानी के बीच मे सिर्फ रिटायरमेन्ट के दिन ही बचे थे और बाप ने अपने बचे-खुचे दिन बेटे के साथ गांव मे ही काटने का फैसला किया था।

बड़े होते बेटे ने अपने बहनोइयों की संगत में बातचीत, अदब और मुफ्तखोरी का सलीका भरपूर सीख लिया, जो उसके प्रधानी के दिनों मे सरकारी तंत्र से घुलने-मिलने में बहुत काम आया।

सुबह, शाम हाजिर रहने वाले गांव के निठल्लों के लिए उसका अहाता बड़ी माकूल जगह साबित हुआ, दिन भर ताश-पत्ती और कभी-कभार मिलने वाली चाय से ज्यादा इन निठल्लों का क्या चाहिए था।

कभी-कभार निठल्लों के मां, बाप, पत्नियां उनकी कामचोरी का उलाहना देते माने गरियाते-गरियाते अहाते तक आ जातीं तो, उन बेचारों को जमी-जमाई बाजी छोड़कर खेती-गिरस्ती के जरुरी कामों मे उलझना पड़ता।

इन निठल्लों मे छोटी-छोटी राशियों पर सूद वसूलने वाले कथित सवर्ण थे, तो हरित क्रांति के बाद उभरे पिछड़ी जाति के लोग भी थे, जिन्होने अपनी खेती-गिरस्ती का भी कार्यभार घर की औरतों को सौंपकर अपनी दुनिया अलग कर ली थी और कुछ निरर्थक मेहनत का मतलब समझ चुके दलित भी थे, कहने का मतलब यह पूरा परजीवी सर्व समाज था, जिनको खेतीबारी मे परिश्रम की निरर्थकता का ज्ञान हो गया था।

7.

पहली बार के इलेक्शन में प्रधानी के चुनाव की घोषणा होते ही निठल्लों को मानो नया काम मिल गया, उन्होने उसको चुनाव लड़ने के लिए उकसाना शुरु कर दिया और एक बार ब्लाक पर परचा भरने जाते समय निठल्लों ने जब उसके जिन्दाबाद का नारा लगाया तो उसको पहली बार अपनी सार्थकता समझ में आयी, जिससे चुनाव को लेकर उसका अनमनापन खत्म हो चुका था।

गांव में बाप की समृद्धि ने सम्मानजनक स्वीकृति दिला दी थी, लोग भूल चुके थे कि उसके बाप ने अपने सगे भाइयों के हिस्से की जमीन को उनकी बेटियों की शादी-बीमारी आदि मे मदद के नाम पर किस तरह औने पौने दाम पर खरीदा था, दरअसल गंवई समाज मे परिवार के किसी व्यक्ति को समृद्धि आती है तो वो पहले अपने  भाई, बन्धु, पड़ोसी को ही डंसती है।

  चचाजात भाई, पट्टीदार बहुत दिनों तक दूर रहे, लेकिन समय ने धीरे-धीरे उनके दर्द को कम किया और इसमें बेटे का सहज-सरल स्वभाव भी मरहम ही साबित हुआ था।

  गांव में धीरे-धीरे उग रही गुमटियां ग्लोबलाइजेशन की खबर दे रही थी और निठल्लों के लिए ये गुमटियां ज्यादे बेहतर सार्वजनिक स्थल हो गयी थी।

  प्रधानी के चुनाव मे उतरने का यह भी एक प्रमुख कारण था क्योंकि लोग अहाते की अपेक्षा गुमटियों पर बैठकी करने लगे थे, इनको अहाते मे बनाए रखने के लिए भी चुनाव में भागीदारी जरुरी थी।

  आकंठ दारिद्र्य में डूबा गांव का बहुसंख्य उसकी समृद्धि की चकाचैंध मे बस वोट डालनें की औपचारिकता ही पूरा कर पाया था।

  पहली प्रधानी के शुरुआती कुछ दिनों उसमंे समाज-सेवा का भाव रहा, फिर प्रधानी खाते मे आने वाली धनराशि से साहबों के खैर-मकदम का खर्चा और उसीसे अपना रोजमर्रा का खर्चा निकालने की ब्यावहारिकता समझ मे आ गयी ।

  दो बार आरक्षण के कारण चुनाव नही लड़ पाया तो अपने चेले चाटिंयो को ही खड़ाऊ रखकर प्रधानी चलाना चाहा लेकिन चेले खड़ाऊ पहन कर अहाते के बाहर निकल गए थे।

 इसलिए इसबार का इलेक्शन काफी मंहगा पड़ गया था। अरे भाई इलेक्शन जादेतर या तो खलिहर लड़ते हैं या लतिहर। खलिहर माने जिसके पास  अपनी रोजी-रोटी का संकट न हो और लतिहर माने गांव के गणित मे हमेशा नया कोंण पैदा करके अपना मतलब सिद्ध करने वाले।

(2)

1.

   अगले दिन बरसातू जब काम पर निकला उसके थोड़ी देर बाद ही सोनार का आदमी तकादा करने उसके घर पहुंच गया।

   बरसातू की पत्नी इमरिती हिसाब किताब के माने मे बहुत साफ-पाक थी। दो महीना पहले बाजार के सोनार से महीना खाड़ के उधार पर बिटिया के पहिलौठी लड़के के लिए और बिटिया के चांदी की पैजनी, मुनरी गढ़वा कर भेजी थी।

   का करती, बिटिया की सास लगातार ताना मार रही थी, उसको बरदास नही हो रहा था। उसको भी बिटिया की शान रखनी थी।

   अब वही शान उसको परेशान कर रही थी। उसको इन्तजार था बकरीद का। उसके बकरे का अच्छा दाम पिछले बकरीद पर ही लग रहा था लेकिन उसने लालच मे नही बेचा था कि अगले साल और अच्छा दाम मिल जाएगा।

   उसने महाजन से एकाध महीने की और मोहलत मांगी और विश्वास दिलाया कि एक-एक पैसा जरुर चुकता कर देगी।

   2.

  इस बार के इलेक्शन मे अपनी पार्टी जीतने पर तो बरसातू बड़ी उम्मीद से था। उसको वकील ने समझा दिया था कि सरकार की तरफ से पैरवी नही होगी तो मामला खतम हो जाएगा।

  वकील भी अपने दरिद्र मुवक्किल से उब गया था, वो हर तारीख पर फीस के लिए होने वाली चिकचिक से पिण्ड छुड़ाना चाहता था क्योंकि पुराने मुवक्किल की फीस भी पुरानी होती है और मंुहलगा हो जाने के कारण फीस बढ़ाने के सवाल पर किचाइन करने लगता है।

 मुकदमे मे सरकार माने प्रधान था और चुनाव जीतने के बाद जब प्रधान से उसने अपने मुकदमे की चर्चा किया तो प्रधान का अंदाज कुछ बदल गया था । इसी तरह के कई मामलो मे उसको अपने विपक्षियों को मजा चखाना था, इसलिए बरसातू को जहां वो इलेक्शन के पहले आश्वस्त कर रहा था, वहीं इलेक्शन के बाद हीलाहवाली करने लगा।

3.

  हफ्ता दिन बाद संयोग से प्रधान मुन्हार बेला मे बरसातू के घर के बगल से अकेले गुजर रहा था कि उसने मौका देखकर प्रधान को घेर लिया।

 प्रधान भी थोड़ा थका था और बतिआते बतिआते धुधलके मे उसके दरवाजे पर बिछी खाट पर बैठना चाहा तबतक उसका बकरा बें-बें करता खाट से कूद कर नीचे आ गया।

  प्रधान कुछ परेशान था चुनाव मे उसका काफी खर्चा हो चुका था लेकिन हेली मेली, नेता परेता, थाना, ब्लाक वाले सब दावत के लिए पीछे पड़े थे।

  बकरा जब बें बोलकर खटिया से नीचे कूदा तो प्रधान को समझ मे आ गया कि अगली दावत का इंतजाम कैसे होगा और उसके इशारा करते ही बरसातू की समझ मे आ गया कि बाप के मुर्गे की आत्मा उसके बकरे का रुप धर कर उसके दुआर पर इतने दिनो से माया फैलाए हुए है।

  कमजोर गृहस्थी मे बकरा बड़ी उम्मीद था। जल्दी ही बकरीद आने वाली थी, पिछली बार भाव अच्छा लगा था लेकिन अगले साल और अच्छी कीमत के लालच मे बकरा कुर्बान होने से बचा हुआ था।

  बरसातू के लिए दुविधा खड़ी हो गयी एक तरफ बकरे की कीमत से इमिरितिया का तगादा खतम करा सकता था या दूसरी तरफ उसको प्रधान को देकर कचहरी के जंजाल से छुटकारा पा सकता था।

  प्रधानी के चुनाव मे जितने उत्साह से लगा था उससे उसको उम्मीद थी कि प्रधान खाली ब्यवहार पर फोकट में उसके पक्ष मे बयान देकर मुकदमा खारिज करा सकता है लेकिन झार कर वोट पाने से प्रधान का दिमाग आसमान पर था। अब उसको बरसातू जैसे समर्थकों की सहूलियत से ज्यादा विपक्षियो को सबक सिखाने की पड़ी थी।

4.

  प्रधान के जाने के बाद खटिया पर पड़े-पड़े बरसातू सोचता रहा कि इमिरितिया से इसपर चरचा करे या न करें, कारण मेहरारु जात है कब टोला मोहल्ला मे बकर देगी और सारा खेल बिगड़ जाएगा, पता नही।

  अन्त मे उसे लगा कि बकरा प्रधान को देने की बात तो इमिरितिया को बताए लेकिन मुफ्त मे देने की बात गोल कर जाय और कौनो मौके पर बाद मे बताया जाएगा । उसने मेहरारु को समझाया कि प्रधान के यहां जलसा है बड़े-बड़े साहेब, नेता लोग आएगें और बकरा मांग रहे हैं, कीमत समझ कर दे देगें।

  इमिरितिया पहले तोे भड़क गयी क्योंकि उसको अन्दाज था कि कीमत उसकी मनमुताबिक नही होगी लेकिन चुनावी गोलबन्दी मे प्रधान के पक्ष से एतना हेलमेल हो गया था कि उसको लगा जादे मोलतोल करने मे हिनाई होगी और थोड़ी ना नुकुर के बाद बकरा देने को राजी हो गयी।

तो अगले दिन भोर मे बकरा प्रधान के दरवाजे पर पहुंच गया । प्रधान ने भी गांव वालों को बकरा खरीदने की बात बताई और बरसातू ने भी बेचने की बात कही । भोज हुआ लेकिन बरसातू नही गया क्योंकि बकरे से उसको ममता हो गयी थी।

 प्रधान को भी अपने गोल को इसी बहानंे उपकृत करना था नही तो आज के जमानें मे कौन बिना किसी मतलब के उसके पक्ष मे खड़ा होकर दहलेंगई बतिआएगा।

दहलेंगई मतलब समझते हैं इसका मतलब होता है कि सच बात पर तो सब्बे लोग मनमार कर हां.....हूं कर देते है लेकिन झूठ्ठो बात पर जो ललकार कर हुंकारी पारे उसको दहलेंगई कहते हैं। सबको ऐसे लोग ही चाहिए चाहे प्रधान हो या प्रधान मंत्री।

5.

  इधर फिर महीना खांड़ बीतते बीतते सुनार का तगादा फिर आने लगा औरइमिरितिया बरसातू से तगादा करने लगी। अपनी बात कटते देख कर उसका गुस्सा आसमान पकड़ रहा था।

  पैसे की बात तो उसके दिमाग मे बरहो बखत घूम रही थी लेकिन जब बरसातू मुह नही खोल रहा था तो वो भी अन्दाज रही थी कि दाम मिलने पर खुद ही उसको आदमी पैसा थमा देगा।

  इधर प्रधान ने बरसातू को तागीद किया था कि मुकदमे मे गवाही की बात और बकरा मुफ्त मे देने की बात खुलने न पाए नही तो केस बिगड़ जाएगा।

  अब बरसातू दोहमस मे था का करे, सुनार का पैसा भी देना है और बकरे का दाम भी नही लेना है। अब वही सूदखोर सहारा थे, जिनसे लाख जतन करके बचता आया था।

  लेकिन चार-पांच हजार रुपया और उसका सूद चुकाने के नाम पर झुरझुरी आ रही थी उसको। रोजही का मजूर कितना खाएगा कितना बचाएगा।

  ले दे कर एक बछिया रह गयी थी जो इमिरितिया के सेवा जतन से दो महिने पहले गाभिन हुई थी। एक रात बड़ी हिम्मत करके उसने मेहरारु से सारी बात बताते हुए मिन्नत किया कि इसकी कानो-कान खबर नही होनी चाहिए।

   हफ्ता दिन बीतते बीतते बछिया का दाम लग गया। नाद, चरनी सूनी हो गयी और वो सार्वजनिक जमीन भी खाली हो गयी। अब इमिरितिया अपने पति से झगड़ा होने पर अपने मृतक ससुर का नाम लेकर कोसना भूल गयी है।

 

 

  

  

 

 

बम्बई में का बा बनाम बिहार में का बा

 


              कोरोना त्रासदी की रचना्त्मक अभिव्यक्तियां विभिन्न प्रकार के माध्यमों से लोकप्रिय हो रहीं है। जिसमें आजकल एक चर्चित रैप बम्बई में का बा भी काफी लोकप्रियता प्राप्त कर रहा है। अनुभव सिन्हा द्वारा निर्देशित और मनोज बाजपेयी द्वारा अभिनीत यह रैप चन्द घण्टों में ही हिन्दी पट्टी पर छा गया मानो सड़क पर भूखे प्यासे घिसटते हुए घर वापस आए पूरबिया के आहत स्वाभिमान पर मरहम लगा गया।

 

  इस रैप में पुरबिया ने वर्गफुट में घमण्ड करने वालों को बताया कि हमलोग बिगहा (जमीन के क्षेत्रफल की एक देशज इकाई जिसमें एक बीघे या बिगहे में लगभग 17452 वर्गफुट होता है) में अपना घर दुआर रखते हैं। यानि इस रैप का नायक उस बिहार का प्रतिनिधित्व नही कर रहा है जहां के ग्रामीण क्षेत्र में 65 प्रतिशत परिवार भूमिहीन है अपितु यह नायक बिहार के उस हिस्से का प्रतिनिधित्व करता है जिसके पास इतना भूगोल है कि वो महानगर में वर्गफुट में जीने वालों की खिल्ली उड़ा सके। सामाजिक संरचना में यह हैसियत बिहार और उत्तर प्रदेश में  पूर्वाचंल के सवर्ण और ताकतवर पिछड़े समुदाय से आने वाले उस विपन्न  युवक की है जिसकी सारी प्रतिभा और क्षमता का महानगर ने दोहन कर उसको निष्प्रयोज्य जूठे खाली बर्तन की तरह फेंक दिया है और इसे बस हवा में उड़ते–उड़ते किसी पालीथिन के थैले की तरह किसी गटर में अटक कर सड़ांध को और विस्तार देना है। इसके पास बिहार में थोड़े कम में लेकिन स्वाभिमान से जी लेने की सम्भावना है लेकिन उसके सपनों को उड़ान मुम्बई ही दे सकती है। यह युवा बिहार में जी नही सकता है और मुम्बई में मर नही सकता है। यह जब मुम्बई पहुंचता है तो उसको पूर्वाचंल और बिहार में छूट गयी सामाजिक पूंजी याद आती है और जब बिहार पहुंचता है तो यहां की सामाजिक जकड़न और आर्थिक गतिहीनता के बरक्स उसके सपनों में मुम्बई झिलमिलाती है।

              इसी के समानान्तर एक नवोदित गायिका द्वारा गाया गया एक रैप बिहार में का बा भी लोकप्रियता बटोर रहा है। यह भी बिहार के सम्भावना विहीन भविष्य, मर्दवादी अपसंस्कृति और बर्चस्ववादी राजनीति में घुटते युवाओं का दर्द है। यह गीत कमजोर सामाजिक आधार वाले उसी बिहार और पूर्वाचंल के गांव के दलितों कमजोर पिछड़ों और महिलाओं के संत्रास को बयान करता है। जिसके पास अपनी ही जन्मभूमि पर अपने पावों के नीचे खड़े रहने भर की भी जमीन नही है। यह दूसरा गीत बिहार के उस युवा का बयान है जिसको सभी राजनैतिक दलों ने स्वास्थ्य विभाग द्वारा मुफ्त में बांटे गए निरोध के गुब्बारों की तरह फुला–फुला कर बच्चों का खिलौना बना दिया और जिसकी नियति कुछ देर हवा में उछलते रहकर फट कर बिखर जाने के अलावा कुछ नही है।

              इस प्रकार ये दोनो गीत इस मायनें में एक विरल सांस्कृतिक घटना है कि इन दोनो गीतों ने बिहार की त्रासद राजनैतिक और सामाजिक पक्षों को एक दूसरे का पूरक बनकर उजागर किया है और शायद भोजपुरी यहां से पुर्नजन्म ले रही है जो अपने अश्लील और भौंड़े नायकों से मुक्त होकर गंभीर सामाजिक मुद्दों पर विर्मश का माध्यम बनेगी। 

 

जेन जी के द्वन्द

सुबह उठकर चाय बनाने के लिए फ्रिज से दूध निकालते समय देखा कि दूध पर मलाई की एक मोटी परत जमी है, जिसको निकालकर अलग एक बरतन में रखा जिसमें लगात...