सोमवार, 5 अक्टूबर 2020

मुस्लिम दुनिया के नास्तिकों के सपने


 

बीसवीं शताब्दी में गैर मुस्लिम विश्व के बहुत बड़े हिस्से में राज्य व्यवस्थाओं नें धर्म निरपेक्षता को एक नीति निर्देशक सिद्धान्त के रुप में स्वीकार किया था। इनमें से अधिकांश क्रूसेड की व्यर्थताओं से सीखे इसाई बहुल राज्य थे। इन देशों के अतिरिक्त लोकतांत्रिक प्रणाली वाले भारत और कम्यूनिष्ट प्रणाली वाले चीन जैसे विशाल देश भी धर्मनिरपेक्ष विश्व के भूगोल में सम्मिलित थे, जिसके कारण धर्मनिरपेक्षता सर्वस्वीकार्य मूल्य की तरह दिख रही थी।

यद्यपि भारत और चीन कृषि आधारित जीवन प्रणाली वाले पिछड़े राज्य थे फिर भी इनके नेताओं ने अपने समाजों में धर्मनिरपेक्षता की स्वीकार्यता स्थापित कराया और राज्य व्यवस्थाओं को एक हद तक धर्मनिरपेक्ष आधार पर क्रियान्वित किया। इसका सुपरिणाम यह निकला कि इन राज्यों से निकले प्रवासियों ने यूरोप और अमेरिका जैसे समृद्ध और आधुनिक मुल्कों के नागरिको के कदम से कदम मिलाकर इन आधुनिक मुल्कों में सफलता के नए मानदण्ड स्थापित किए।

इस धर्मनिरपेक्ष विश्व के बाहर एशिया और अफ्रीका के बड़े हिस्से में स्थित मुस्लिम जगत में आधुनिक सुविधाओं का उपभोग करते हुए १४सौ साल पुरानी दुनिया की धार्मिक मान्यताओं में अपना आर्दश ढूढ़ने वाली राज्य व्यवस्थाएं येनकेन प्रकारेण सत्ता में बनी रहीं। इन सत्ताओं ने जहां अपने समानधर्मी नागरिकों की स्वतंत्रता पर कई किस्म की पाबन्दियां लगाए रखीं वही इन्होने अपने ही मुल्क में सदियों से रह रहे भिन्न धर्मी नागरिकों, स्त्रियों को संवैधानिक रुप से द्धितीय श्रेणी का नागरिक बनाए रखा। इन राज्य व्यवस्थाओं के लगातार टिके रहने के कारण हजार और बहाने दस हजार हो सकते हैं लेकिन यह विडंबनापूर्ण वास्तविकता है कि मुस्लिम जगत की बंजर भूमि में धर्मनिरपेक्षता और लोकतंत्र जड़ नही जमा सका। मुस्लिम जगत के नागरिक अगर आधुनिक विश्व में कहीं गए तो वहां भी उनके अधिकांश हिस्से ने अरबी कबीले के सांस्कृतिक प्रतिनिधि के रुप में ही रहना पसन्द किया।

धर्मनिरपेक्षता के पक्षधरों में काफी समय तक यह विश्वास था कि धीरे–धीरे मुस्लिम जगत स्वयं आधुनिकता के मूल्यों को स्वीकार करेगा। इस विश्वास के कारण उन्होने मुस्लिम जगत द्वारा रुढ़िवादी मूल्यों को अपनाए रखने की हठधर्मिता से उपजने वाली प्रतिक्रियाओं की तरफ से आंखे मूंदे रखा। यही नही जिसने भी इस दिशा में उंगली उठाई उनके उपर फासिस्ट होने जैसे तमाम आरोप उछाल दिए। दूसरी तरफ धर्मनिरपेक्षता के पक्षधरों की इस कार्यवाही से मुस्लिम जगत ने खुद को विक्टिम मान लिया और उनके अन्दर यह भाव पैदा हुआ कि उनसे एडजस्ट करने की सारी जिम्मेदारी आधुनिक समाज की है, वो तो इस दुनियां में बस जन्नत की तैयारी करने के लिए हैं।

धीरे–धीरे इक्कीसवीं सदी के प्रारम्भिक दशक में आधुनिक मूल्यों वाले समाज की आंखों के सामनें भिन्न प्रकार की वेशभूषा, दोयम दर्जे की नागरिक स्त्रियों और धार्मिक कर्मकाण्ड में जीने की जिद के साथ ही उदार मूल्यों वाले समाजों की सारी सुविधाओं का लाभ उठाने वाली धूर्तताएं धीरे–धीरे  स्पष्ट होने लगी।

इस हठधर्मिता का दुष्परिणाम यह निकला कि इग्लैण्ड, फ्रांस, डेनमार्क, स्वीडेन, अमेरिका जैसे उदार समाजों और राजनैतिक व्यवस्थाओं वाले देश के नागरिकों ने मुस्लिम जगत को ज्यादा यर्थाथवादी ढंग से डील करनें के लिए उदार धर्मनिरपेक्षतावादी राजनैतिक धारा के बजाय यर्थाथवादी दक्षिणपंथ की तरफ देखना पसन्द किया। उदार धर्मनिरपेक्षतावादी दलों ने यूरोप की मजलिसों मे शरिया कायम करने की तकरीरों, इंग्लैण्ड में हजारो गोरी बच्चियों का यौन शोषण करने वाले के ग्रूमिंग गैंग के कारनामे जिसके ९९ प्रतिशत सदस्य पाकिस्तानी मुस्लिम थे या अमेरिका में न्यूर्याक के ग्राउण्ड जीरो की जमीन खरीद कर इस्लाम की फतह के स्मारक की मस्जिद बनाने के अभियान जैसी अनेक घटनाओं को अनदेखा किया। जिसकी प्रतिक्रिया में इन लोकतांत्रिक देशों में बहुसंख्यक समाज में दक्षिणपंथी राजनीति का जनसमर्थन बढ़ना ही था।

एक पार्टी प्रणाली वाले चीन ने तानाशाही तरीके से धार्मिक शिक्षा में आवश्यक संशोधन करके पुनः प्रशिक्षित कर मुस्लिमों को आधुनिक मनुष्य बनाने की एकतरफा कार्यवाही किया है जिसका सुपरिणाम या दुष्परिणाम आना शेष है। चीन जैसी एकाधिकारवादी सत्ता के पास यह प्रयोग करने का विकल्प है।

भारत जैसे लोकतांत्रिक परम्पराओं वाले विकासशील देश के पास राजनैतिक विकल्पों में एक तरफ वामोन्मुख राजकीय समाजवाद के साथ बोनस में अल्पमत सांम्प्रदायिकता है तो दूसरी तरफ दक्षिणपंथी कारपोरेटवाद के साथ नत्थी बहुसंख्यकवाद है। बहुसंख्यकवाद उसका वर्तमान नष्ट करने में सक्षम है तो अल्पसंख्यक सांम्प्रदायिकता में भविष्य की भयावह सम्भावना दिखती है। हम वर्तमान में जिस डर से डील कर रहे होते हैं उसकी उसकी भयावहता भविष्य के काल्पनिक डर से कम होती है और यही मनोदशा भारत का सामान्य बहुसंख्यक की है।

भारतीय बहुसंख्यकों के बीच यह प्रभावी धारणा है कि मुस्लिम अल्पसंख्यक किसी भी देश के उदार संवैधानिक प्राविधानों को रणनीतिक रुप से इस्तेमाल करते हैं लेकिन उनका इसमें विश्वास बिल्कुल नही होता है। भारतीय बहुसंख्यक के सामने इस्लामिक स्टेट का माडल प्रमाण के रुप में उपलव्ध है जिसको यूरोप, अमेरिका के पढ़ेलिखे मुस्लिम नौजवानों और छिटपुट कुछ पढ़ेलिखे भारतीय मुस्लिम नौजवानों का भी समर्थन प्राप्त था। इस्लामिक स्टेट ने धार्मिक विश्वासों के आधार पर गैर मुस्लिम युवतियों को यौन दासी के रुप में इस्तेमाल करने, हाथ पैर सिर काटने जैसी बर्बर कार्यवाहियां की, जिसको पढ़ेलिखे मुस्लिम समुदाय के मौन समर्थन की तरह प्रस्तुत किया गया।

भारतीय बहुसंख्यक विश्वास करता है कि कश्मीर में सरकार का दमन प्रतिक्रिया में है और कश्मीरी उग्रवाद सिर्फ उस राज्य के बहुसंख्यक मुसलमानों की धार्मिक लड़ाई है, जो लोकतंत्र और आधुनिकता के विरुद्ध है और गजवा–ए–हिन्द का एक पड़ाव मात्र है। भारतीय धर्मनिरपेक्ष दलों के पास इसका कोई काउण्टर नैरेटिव नही है। इन धर्मनिरपेक्ष दलों के पास हिन्दुओं की जातीय संरचना में अगड़े–पिछड़े का समीकरण, अल्पसंख्यक वोट और एण्टी इन्कैम्बेन्सी का सहारा है जिसे साधकर चुनाव का अंकगणित हल कर लेगें है। कोढ़ में खाज यह है कि अल्पसंख्यक वोट पाने के लिए ये धर्मनिरपेक्ष दल रुढ़िवादी मुस्लिम नेतृत्व को प्रश्रय देते रहे है जिनके दबाव में मुस्लिम कठमुल्लावाद से लड़ रही तस्लीमा नसरीन जैसी लेखिका को उस बंगाल में रहने के लिए एक घर नही मिल पाता है जिसके लिए कोलकाता मौसी के घर जैसा था। भारतीय धर्मनिरपेक्ष दलों के इस प्रकार के तमाम दोहरेपन को भारतीय बहुसंख्यकों के मानस में यह बात बैठा दिया है कि ये धर्मनिरपेक्ष दल वोट के लालच में मुस्लिम रुढ़िवादिता को प्रश्रय दे रहे हैं।

संचार माध्यमों की उपलव्धता से भारतीय बहुसंख्यक के समक्ष भारतीय मुस्लिम में एक अंतराष्टªीय छवि विकसित हुई है। जिसमें उसके पड़ोस में रहने वाला अपनी रोजी रोटी में बेहाल सामान्य गरीब मुसलमान भी किसी अरबी या इस्लामिक स्टेट जैसे कट्टर धार्मिक गिरोह का भारतीय प्रतिनिधि है, जो किसी कमजोर और निर्णायक समय में उनके दुश्मन के साथ होगा।

यद्यपि गैर मुस्लिम विश्व, मुस्लिम जगत में धर्मनिरपेक्ष राजनीति को विकसित करने में असफल रहा है लेकिन ऐसा नही है कि मुस्लिम समाज जड़वत है तथा उनके अन्दर किसी प्रकार की हलचल नही है। जब से सोशल मीडिया ने राज्य समर्थित मीडिया के एकाधिकार को कमजोर किया है इन रुढ़िग्रस्त बन्द समाजों में सेंध लग गयी है। इन देशों के वैज्ञानिक सोच वाले सामाजिक कार्यकर्ताओं ने अपने समाजों के धार्मिक विश्वासों और सामन्ती सत्ताओं के विरुद्ध बिगुल फूंक दिया है। इन नास्तिक प्रचारकों का घोषित लक्ष्य अपने राज्य को धर्मनिरपेक्ष बनाने के लिए जनमत तैयार करना है। पाकिस्तान के दसियों नास्तिक नागरिकों द्वारा यू–ट्यूब चैनल चलाए जा रहे हैं जिसमें लगातार धार्मिक रुढ़ियों की लानत मलामत की जाती है। इसी प्रकार फ्री–थिंकर्स के बहुत से पेज है जिनको सरकार लगातार प्रतिबंधित कराती रहती है लेकिन वे जिन्दा होते रहते हैं। इन फ्री–थिंकर्स का आंकलन है कि पाकिस्तान में नास्तिक नागरिकों की संख्या लगभग २ करोड़ है। बताया जा रहा है कि गैलप के आंकलन के अनुसार ईरान में नास्तिकों का प्रतिशत २० से ३० है। इसी प्रकार भारत बाग्लादेश में भी मुस्लिम नास्तिकों ने यू–ट्यूब चैनल शुरु किए हैं। अपना अस्तित्व दांव पर लगाकर इस्लामी रुढ़िवादियों के विरुद्ध लड़ने वाले ये अल्पचर्चित योद्धा यह अच्छी तरह से जानते हैं कि उनकी लड़ाई कई दशकों तक लड़ी जानी है और धर्मान्धों द्वारा उनकी या उनके परिजनों की हत्या होने पर किसी समूह या राजनैतिक दल द्वारा एक कतरा आंसू भी नही बहाया जायेगा फिर भी गैलिलियो के ये साधनहीन वंशज पूरी दिलेरी से लड़ते हुए मुस्लिम जगत को लोकतांत्रिक धर्मनिरपेक्ष समाज में बदलने का सपना देख रहे हैं। लोकतांत्रिक और धर्मनिरपेक्षता में विश्वास करने वाले जाग्रत नागरिकों को क्रूर धार्मिक सत्ताओं के विरुद्ध लड़ने वाले इन बहादुरों के प्रति अपना दायित्व नही भूलना चाहिए क्योंकि इनकी सफलता ही शेष विश्व में धर्मनिरपेक्षता और लोकतंत्र को स्थायित्व दे सकेगी। खुली आंखों से देखे जा रहे इन सपनों को सलाम।              

 

मंगलवार, 28 मई 2019

2019 का भाष्य




बढ़ते नगरीकरण और फैलते मध्यवर्ग के श्रममुक्त होते घण्टों को कर्मकाण्डीय धार्मिक जीवन भर रहा है। यह नवनागरी कर्मकाण्डी समाज, खेतिहर जीवन के धार्मिक समाज से भिन्न है। खेतिहर समाज का धर्म,  जीवन के सीमित संसाधनों में किसी तरह से अपने दुख को संतोष में बदलने की कला देता था लेकिन सम्पन्न हो रहे भारत के मध्यवर्ग की नयी  धार्मिेक शैली उनको अपनी उपलव्धियों के अभिव्यक्ति का कर्मकाण्डीय कार्यक्रम दे रहा है। इस नए धर्म की जकड़बन्दी को प्रगाढ़ करने के लिए इसके दृष्टिपथ में भिन्न धार्मिक समुदायों के प्रति भय की निरन्तर सर्जना, कुछ सप्रयास और कुछ भिन्न धर्म की गतिविधियों के फलस्वरुप निरन्तर जारी है। इस सम्बन्ध में एक मित्र का कथन उल्लेखनीय है कि बम्बई फिल्म जगत की उदार जीवन शैली में एक प्रसिद्ध फिल्म संगीतकार की बेटी के बुर्कानशीनी का शौक या श्रीलंका मे करोड़पति मुस्लिम परिवार द्वारा अपने धार्मिक विश्वासों के कारण सैकड़ो लोगों को कत्ल किया जाना एक राजनैतिक संदेश भी देता है, जो लोग इसे पढ़ नही पा रहे हैं उनके लिए किसी नवीन ब्रेल लिपि के आविष्कार की आवश्यकता है।  
नगरीय क्षेत्रों जाति, वर्ण व्यवस्था के निषेधों को अतिक्रमित कर निजी जीवन की व्यवस्थाओं जैसे शादी, विवाह, मरनी, करनी आदि को सम्पन्न कराने का एक सुविधा जनक प्लेटफार्म और नगर के वार्ड स्तर तक की राजनैतिक ताकत हासिल करने का जरिया है। अब यह वर्ण व्यवस्था के जंजीरों में जकड़ी निरीह जाति नही है जिसको सशक्त करने मे सामाजिक न्यायवादियों की भूमिका रही है। नगरीय क्षेत्रों में संसद और विधानसभा के निर्वाचनों में जाति से अधिक प्रभावी भूमिका धर्म की है।  
 ग्रामीण समाज मे जाति प्रधानी से लेकर सांसदी तक राजनैतिक ताकत हासिल करने का उपकरण जरुर है लेकिन बाजारों,चट्टीचौराहों के तेजी से कस्बों में बदलने के कारण खेतिहर अर्थ व्यवस्था से तेजी से मुक्त हो रही नयी पीढ़ी पर से उनके समाज के आरक्षण भोगी मध्यवर्गियों की राजनैतिक पकड़ दिनोदिन क्षीण होता जा रही है। सामाजिक न्याय के नाम पर जयन्तियां मनाने वाले और शेष दिनों में प्रायः जाति की संकीर्णताओं में जीने वाले वाले पिछड़े और दलित समुदाय के सरकारी कारकुन प्रमोशन और आरक्षण के नाम पर भले ही गोलबन्दी खड़ी करने की कोशिश करें परन्तु आरक्षण से वंचित और उससे निराश एक विशाल आबादी का नेतृत्व उसके हाथ से फिसल रहा है। इस आरक्षणभोगी समुदाय ने निजी और सार्वजनिक जीवन में उसी भ्रष्ट जीवन शैली को अपनाया हुआ है जिसमें कथित सवर्णो को महारत हासिल है। यह वर्ग भी अपनी वर्गीय प्रकृति के अनुरुप तेजी से अपने गांव मे ही आप्रवासी बन रहा है।
सामाजिक न्याय का लक्ष्य जातीय पहचान के आधार पर उत्पीड़न को समाप्त करना और इन वंचित समुदायों मे एक मध्यवर्ग तैयार करना था कि जाति या वर्ग को समाप्त करना है। इस मायने मे एक स्तर तक यह कार्य पूर्ण हो चुका है अवशेष कार्य वह सत्ताधारियों की गोद में बैठकर रुठने मनाने का खेल करके निपटा सकता है इसके लिए उसे अपनी सुविधाओं की कीमत पर विद्रोही तेवर अपनाने की आवश्यकता नही है। इसीलिए हम सामाजिक न्याय के छोटे दुकानदारों की सत्ता मे सहज आवाजाही देख रहे हैं, हां बड़ी कम्पनियों को बड़े सौदों की तलाश है।
  
हम क्या हैं यह हमारे परिवार, पर्यावरण, मित्र और शत्रुओं से निर्धारित होता है। हम जिससे प्रतिद्वन्दिता करते हैं उसकी तुलना में खुद को सचेतन रुप से बदलते हैं। साम्राज्यवाद के दौर मे हमारे नेतृत्व की प्रतिद्वन्दिता जिनसे थी उन्होने अपने साहस, अध्ययनशीलता, आधुनिक चितंन और पेशेवराना दक्षता से इस ग्रह के बहुत बड़े भूभाग पर कब्जा किया था। साम्राज्यवाद के विरुद्ध लड़ रहे तत्कालीन भारत का नेतृत्व भी उसी स्तर पर स्वयं को परिष्कृत कर उनको चुनौती दिया परिणामतः हम उनको सफल चुनौती दे सके और एक आधुनिक भारत की नींव रख सके। यह दुर्भाग्य रहा कि स्वतंत्रता के उपरान्त विभिन्न कारणों से हम एक मध्ययुगीन मानसिक अवस्थिति मे रह रहे पड़ोसी के विभिन्न कारणों से प्रतिद्वन्दी बनते गए और चाहअनचाहे उसी स्तर पर उतरते चले गए। अंग्रेजी साम्राज्यवाद के विरुद्ध संघर्ष और उसके दमन की पीड़ा विस्मृतियों मे दर्ज हो चुकी है। इस संघर्ष मे प्रमुख भूमिका निभाने वाला कथित सवर्ण और मध्यवर्ग गांधी की हत्या को स्वीकृति प्रदान कर चुका है। नेहरुवादी माडल से तैयार किए गए सार्वजनिक संस्थानों को निजी सम्पत्ति के रुप में औने पौने दामों पर बेच दिए जाने को सामाजिक स्वीकृति मिल चुकी है। ऐसे में उस धारा का प्रतिनिधित्व करने वाले राजनैतिक दल की परम्परागत वंशावलियों में छिटपुट हरी कोंपले दिखेगीं अवश्य लेकिन उपरोक्त जनाधारों के बूते इनकी वापसी दिवास्वप्न है।   
खेती किसानी, आदिवासियों, स्त्रियों और अल्पसंख्यकों के मानवाधिकार, मजदूरी आदि के मुदृे पर धरना प्रदर्शन करने वाला लेफ्ट भी एक पिछड़ी अर्थव्यवस्था वाले समाज के राजनैतिक तौर तरीकों वाला उपकरण मात्र रह गया है जिसके लिए नए जमाने की ई०वी०एम० में जगह नही है। किसी दिन टी०वी० में लाल झण्डा लेकर मुम्बई, दिल्ली जैसे महानगर की तरफ बढ़ते किसानों को लेकर यह मध्यवर्ग को चौंकाता अवश्य है लेकिन किसान की फटी बिवाइयां सम्पन्न किसानों के शोषण और रुढ़िग्रस्त सामाजिक व्यवस्थाओं का आश्रयस्थल भी है, जिससे मुक्त करके इस समुदाय को अपने हितों के लिए एकजुट होकर राजनीति की ªाइविंग सीट पर बैठाना उतना ही दूभर है जितना किसान से मजदूर के रुप में वर्गान्तरित हो रहे इस समुदाय की एक वर्गीय पहचान बनाना।
 लेकिन समाज मे संकटों को अपनी वैकल्पिक राजनीति की तलाश जारी है और जो इसमें से मुखर संकटों को डील करेगा वही भावी राजनीति मे निर्णायक जगह पाएगा। बेरोजगारी, भीषण आर्थिक असमानता, प्राइवेट कम्पनियों मे बेरोजगारों का शोषण, आगनबाड़ी, शिक्षामित्र, किसान मित्र, आशा कार्यकत्री जैसी सेवाओं की सेवाशर्तो को सम्मानजनक किया जाना, अमीरी की सीमारेखा, किसी भी उत्पाद पर अधिकतम लाभ की निर्धारित दर, लघु तथा कुटीर उद्योगों को संरक्षण, सहकारी खेती, प्रति व्यक्ति आय के अनुपात में ही सरकारी कारकुनों के वेतनभत्तों का निर्धारण, प्रत्येक वरिष्ठ नागरिक के लिए सम्मानजनक पेंशन, रोजगार प्रदाता कम्पनियों द्वारा बेरोजगारों का शोषण, चिकित्सा तथा शिक्षा में मची लूट, पर्यावरण, जाति और लिंग आधारित शोषण, राज्य के अधिकार को सीमित करके स्थानीय निकायों को अधिकार सम्पन्न बनाने आदि जैसी चुनौतियों को सूत्रबद्ध करके भावी भारत को सम्बोधित करने के लिए लेफ्ट को अपने बूढ़े तथा रुढ़ नेतृत्व से विद्रोह करके सम्मिलित काडर बनाकर एक नया विकल्प प्रस्तुत करने के अलावा कोई रास्ता नही है। संतोष मात्र इतना है कि वैकल्पिक दल के रुप में लेफ्ट के अन्दर काडर को आकर्षित करने की क्षमता है और लेफ्ट ही धर्म, जाति,वंशवाद और भ्रष्टाचार से मुक्त रहकर काडर आधारित दीर्घकालीन राजनीति करने में सक्षम है। इस चुनाव ने परम्परागत विपक्ष को हाशिए पर डाल कर एक सम्भावनाशील और बेहतर राजनीति के लिए स्थान रिक्त किया है। यदि ऐसा नही हो सका तो इस निर्वात को जाति, उपजाति, गोत्र, क्षेत्र आधारित संगठन और उग्र धार्मिक समूह भरेगें जो दुनिया के दूसरे सबसे विशाल जनसमूह का प्रतिनिधित्व कर रहे राष्टª के लिए अत्यधिक पीड़ा दायी होगा। निश्चय ही यह सर्वाधिक संकटग्रस्त और सर्वाधिक संभावनाशील समय है।       

जेन जी के द्वन्द

सुबह उठकर चाय बनाने के लिए फ्रिज से दूध निकालते समय देखा कि दूध पर मलाई की एक मोटी परत जमी है, जिसको निकालकर अलग एक बरतन में रखा जिसमें लगात...