आखिरी बैठक थी, उसके बाद सरकारी खजाने मे ताला लग जाता । इस आपाधापी मे खजाना वापस लौटाना और लुटाना दोनो से बचना था बड़े हाकिम को । हां दाल मे नमक तो स्वाद के लिए जरुरी है इस समझदारी पर प्रश्नचिन्ह नही था, लेकिन किसको कितना नमक पसन्द है इसका भी पैमाना नही था । हाल ठसाठस भरा हुआ था, उसके आते ही सभी को स्कूली जीवन याद आया और नतसिर खड़े हो गए । बैठते ही कुछ कातर निगाहों से, कुछ कर्बलाई अन्दाज मे और कुछ ने ससुर-पतोह अन्दाज मे बड़ा साहब को निहारा और अपने पन्ने पलटने लगे । कोशिश बस इतनी ही थी कि घण्टे-दो घण्टे किसी तरह से सकुशल गुजर जाय, इसके बाद तू कहां, मैं कहां इस अंधेरी रात मे । जिनको प्रशंसात्मक लहजे से निहारा गया, वे कुर्बान हो गए इसका मतलब ये नही था कि उन्होने जनसेवा मे कोई कमाल कर दिया उन्होने बस इतना किया कि बड़ा साहब को उपर की जबाबदेही मे किसी प्रकार की असुविधाजनक स्थितियों से उबार लिया। जिनको लताड़ा गया वे रुआंसे हो गए, इसलिए नही कि उन्होने व्यवस्था मे कोई खलल डाल दिया था वे बस चूहा दौड़ मे पिछड़ने की त्रासदी झेल रहे थे । शानदार नाश्ते से ये गम्भीर कार्य सम्पन्न हुआ, जैसे सब भूखे प्यासे ही खेत खनखोद कर आए थे और गृहणी का फर्ज था कि कैसे भी उनका स्वागत करे। विर्सजन मे कुछ ने मुग्ध भाव से निहारा कि बड़ा साहब कितना बारीक निगाह रखता है, जिसको पकड़ता है उसके तह तक पहुंच जाता है। मैं भी चकित था, तभी याद आया अपने क्षेत्र की अवैध यात्री बसों के कंडक्टरों का भी मैं लोहा मानता था क्योंकि ठसाठस भरी हुई बस मे बिना टिकट दिए उसको याद रहता था किसने पैसा दिया है, किसको वापस करना है और कौन क्षेत्र का रंगबाज है, जिससे पैसा मांगने की हिमाकत भी नही करना है।
सोमवार, 25 मई 2015
-मार्च-
आखिरी बैठक थी, उसके बाद सरकारी खजाने मे ताला लग जाता । इस आपाधापी मे खजाना वापस लौटाना और लुटाना दोनो से बचना था बड़े हाकिम को । हां दाल मे नमक तो स्वाद के लिए जरुरी है इस समझदारी पर प्रश्नचिन्ह नही था, लेकिन किसको कितना नमक पसन्द है इसका भी पैमाना नही था । हाल ठसाठस भरा हुआ था, उसके आते ही सभी को स्कूली जीवन याद आया और नतसिर खड़े हो गए । बैठते ही कुछ कातर निगाहों से, कुछ कर्बलाई अन्दाज मे और कुछ ने ससुर-पतोह अन्दाज मे बड़ा साहब को निहारा और अपने पन्ने पलटने लगे । कोशिश बस इतनी ही थी कि घण्टे-दो घण्टे किसी तरह से सकुशल गुजर जाय, इसके बाद तू कहां, मैं कहां इस अंधेरी रात मे । जिनको प्रशंसात्मक लहजे से निहारा गया, वे कुर्बान हो गए इसका मतलब ये नही था कि उन्होने जनसेवा मे कोई कमाल कर दिया उन्होने बस इतना किया कि बड़ा साहब को उपर की जबाबदेही मे किसी प्रकार की असुविधाजनक स्थितियों से उबार लिया। जिनको लताड़ा गया वे रुआंसे हो गए, इसलिए नही कि उन्होने व्यवस्था मे कोई खलल डाल दिया था वे बस चूहा दौड़ मे पिछड़ने की त्रासदी झेल रहे थे । शानदार नाश्ते से ये गम्भीर कार्य सम्पन्न हुआ, जैसे सब भूखे प्यासे ही खेत खनखोद कर आए थे और गृहणी का फर्ज था कि कैसे भी उनका स्वागत करे। विर्सजन मे कुछ ने मुग्ध भाव से निहारा कि बड़ा साहब कितना बारीक निगाह रखता है, जिसको पकड़ता है उसके तह तक पहुंच जाता है। मैं भी चकित था, तभी याद आया अपने क्षेत्र की अवैध यात्री बसों के कंडक्टरों का भी मैं लोहा मानता था क्योंकि ठसाठस भरी हुई बस मे बिना टिकट दिए उसको याद रहता था किसने पैसा दिया है, किसको वापस करना है और कौन क्षेत्र का रंगबाज है, जिससे पैसा मांगने की हिमाकत भी नही करना है।
सरकिट हाउस
एकबार मैं अंग्रेजी में हाथ तंग होने के कारण सरकिट हाउस को चिरकुट हाउस पढ़ गया था । यह भारत के सभी जिला मुख्यालयों मे स्थित एक सरकारी मेहमानखाना होता है, जिसमे जनता के हित मे दुबले हो रहे लोग सरकारी अमले का दामाद बनकर कृतज्ञता ज्ञापित करते हैं । इसमे देश, प्रदेश के सरकारी हाकिम, सरकारी पार्टी के नेता सम्मिलित रहते हैं । जिलों का दौरा करने वाले ये महानुभाव जनता के काम मे इतने हलकान परेशान रहते हैं कि ये जिस विभाग का हाल खबर लेने आते है उस विभाग के स्थानीय अधिकारी, कर्मचारी चन्दा लगाकर इनकी तथा इनके चेलों का चना, चबैना, गंगजल से सत्कार करते हैं और उस चन्दे की अदायगी के बाद वे जनता को लूटने के अपराध बोध से मुक्त हो जाते हैं। शंकर, हनुमान आदि की मूर्तियां तो अनेको स्थान पर हैं लेकिन बनारस की मूर्तियों से भक्तों को कुछ ज्यादा ही डोज मिलता है इसलिए इसी के बहाने बनारस का चिरकुट हाउस भी हमेशा गुलजार रहता है । स्वर्ग सुखाभिलासियों के आगमन से बनारसियों को जो आय होती है उसमे कुछ इन सरकारी दामादों का हिस्सा भी होता होगा और दैवी न्याय देखिए कि इन सरकारी दामादों के आने-जाने से जो आय बनारसियों को होती होगी उसको सरकारी अमले द्वारा जिले की जनता से वसूल कर लिया जाता है। इसी कारण भगवान सबको देखता है, या उसके घर देर है लेकिन अन्धेर नही है, जैसे चुटकुलों मे मेरी आस्था बढ़ जाती है। यदि आप किसी सरकारी नेता के ठीक-ठाक चमचे हैं और नेता के साथ चिरकुट हाउस मे हैं तो नेताजी की सेवा मे लगे सरकारी नौकरों को फरमाइशी प्रोग्राम सुनाकर मजा लीजिए । पब्लिक से सीधे मुंह बात नही करने वाले ये सरकारी कारकुन पूरा दांत निपोर कर ऐसे लगे रहेगें जैसे आप उनके बिटिया के बाराती हो । जरा सा बताइये साहब को हल्की चीनी की चाय पसंद है, सेवा मे लगा सरकारी खादिम ऐसे दौड़ कर रसोइये के पास जाएगा जैसे किसी मरीज को आक्सीजन का मास्क लगाने की इमरजेन्सी है। अगर किसी सरकारी अफसर के साथ हैं तो उसकी बीबी की बनारसी साड़ी मे रुचि बताइये, तुरन्त वो बड़ी-बड़ी दुकानों का पता लगाने लगेगा । हर विभाग मे इस चिरकुट हाउस के पण्डा रहते हैं, वो दिखाते तो खुद को हलकान परेशान हैं लेकिन मन ही मन खुश रहते हैं, जानते हैं घर से तो कुछ लगना नही है और खर्चे की रसीद कोई मांगता नही । मेहमान के चले जाने के बाद खर्चे की वसूली मे उनकी मेहनत की मजूरी भी सम्मिलित रहेगी और यह मजूरी धीरे-धीरे जनता से मृतक वरासत, दाखिल खारिज, जन्म/मृत्यु/जाति प्रमाण पत्र, खड़न्जा/नाली/हैण्डपम्प मरम्मत, बाल पोषाहार वितरण, बिजली कनेक्शन, नक्शा पास कराने, सरकारी राशन पाने आदि सुविधाओं के बदले असंख्य रुपों मे वसूल ली जाएगी । इस पूरे प्रहसन का अन्तिम दृश्य खासा मजेदार होता है जिसमे सरकारी मेहमान की बिदायी के समय उसके अर्दली, पी0ए0 विभाग के पण्डे को अपनी दक्षिणा पाने के लिए या सरकारी गाड़ी मे तेल भरवाने के बहाने पैसा वसूलने के लिए खोजते फिरते है और पण्डा भी इस मौके पर लुकाछिपी लगाए रहता है। कुछ सरकारी मेहमान इतने उदार होते है कि वे अपने स्टाफ से उनको बिदायी मिली कि नही इसकी जानकारी भी लेते हैं और ऐसे हाकिमों पर उनका स्टाफ कुर्बान रहता है । अचरज होता है कि ये स्वर्ग सुखाभिलासी अपने विश्वास को भी धोखा देते रहते हैं क्योंकि ये आते हैं तो निजी प्रयोजन के लिए लेकिन खाना-खर्चा सरकारी होता है, इनको शायद यह अगाध विश्वास है कि जिस तरह जनता को मूर्ख बनाकर ऐशोआराम लूट रहे हैं वैसे ही अपने ईश्वर को भी मूर्ख बना रहे हैं । हिन्दू देवी देवताओं के उपासको में अपने वैशिष्ट्य पर इतराने का भाव प्रभावी रहता है जिसके कारण ये सामान्यजन की तरह दर्शन पूजन करना तो छोड़िए सामान्य जन के दर्शन-पूजन मे बाधा डालकर अलग से इन मूर्तियों के साक्षात्कार मे किसी किस्म की बुराई नही समझते और न ही इनको कोई अपराधबोध महसूस होता है। वैसे अब अति विशिष्टों को इन चिरकुट हाउसों मे सामान्य जन के पसीने की बदबू आने लगी है इसलिए अब बेचारे जनता के चन्दे से पांच सितारा होटलो मे ठहर कर रुखी सूखी खाकर जनता की समस्याओ का समाधान करना ज्यादा सुविधाजनक मान रहे हैं । मित्रों से निवेदन है कि चिरकुट हाउस के सामने से गुजरते समय इस गोमुख पर मत्था टेकने का पुण्य जरुर लिजिए।
क्रिकेट टीम
जीत पर जय-जयकार, हार पर हाहाकार । एक प्रयोजन में गांव पर अपनी क्रिकेट टीम के पुरनिया भी जुटे थे, और सेमी फाइनल पर मचे हाहाकार की चर्चा हो रही थी । गांव के आज के क्रीड़ाविहीन माहौल पर निराशा ब्यक्त करते करते हमलोग याद करने लगे कि अपनी टीम को, जिसमे प्रायः गांव के अधिकतर युवा किसी न किसी भूमिका मे सम्मिलित रहते थे । कुछ कठिन जीतों और शर्मनाक हारों को याद करते हुए हमने गिनना शुरु किया उन गुणों को जो हमारी टीम के खिलाड़ियों और समर्थकों ने अर्जित किया । तब पता चला कि खेलते-खेलते हम असहमतियों को बरदाश्त करना सीख गए, सामूहिक हित के आगे अपने लालच को काबू मे रखना जान गए और फूले नथुनों से फेफड़ों को संयत करते हुए जुनून क्या होता है जान सके । इस खेल के सहारे ही हम अपनी विरासत मे मिली संर्कीण जातीय सोच से उबर सके और चीजों को अलग-अलग नजरिए से समझने की कुव्वत पैदा कर सके । हमारी टीम मे मण्डल और कमण्डल के चरम वैमनस्य के दौर में भी सभी जाति एवं धर्म के खिलाड़ियों मे सहज सम्बन्ध बने रहे । इसी की बदौलत हम आज यह समझ सके कि बाजार को इस खेल की नही बस इसके चन्द बिकाऊ चेहरों की जरुरत है और यह भी देख सके कि क्रिकेट का अजगर कितने खेलों को निगल गया । आज उस टीम के कई महत्वपूर्ण चेहरे इस मित्र मण्डली मे दिख जाएगें, जिन्होने गांव मे जब भी टूर्नामेण्ट होता था तो अपने कितने ही जरुरी कामो को दरकिनार करके टीम के साथ अपना बहुमूल्य समय दिया । मेरे फेसबुक मित्र सूची मे सम्मिलित श्यामाम्बुज सिंह, विनय कुमार, सब्यसाची, सतीश कुमार सिंह, आनन्द सिंह, रामराजीव सिंह वर्चुवल चेहरे नही हैं और न ही इन चेहरों ने किसी किस्म की रामनामी ओढ़ी है । ये जैसे हैं वैसे ही दिखने की कोशिश करते हैं। इनके व्यक्तित्व के विकास मेे गांव की क्रिकेट टीम का योगदान रहा है, इनको जो कुछ इनका विद्यालय नही सिखा सका, परिवार नही सिखा सका उन गुणों को इन्होने क्रिकेट का मैदान साफ करते हुए, टूर्नामेण्ट को सफल बनाने के लिए नवम्बर-दिसम्बर की रातो मे मैदान पर टेन्ट के नीचे रात गुजारते हुए ,हारने पर एक दूसरे की हिम्मत बढ़ाते हुए, जीतने पर एक दूसरे की खिंचाई करते हुए सीखा है। उस दौर मे हमारी टीम ग्रामीण इलाकों मे काफी सम्मानित टीम थी, जिसमे वो भी सम्मिलित होते थे जिनका पढ़ाई-लिखाई मे अच्छा रिकार्ड था और वो भी सम्मिलित होते थे जिनके लिए स्कूल-कालेज एक गैर जरुरी कवायद थी लेकिन आपस मे किसी प्रकार की श्रेष्ठता या हीन भावना नही होती थी । अपनी सीमाओं के चलते मैं इस टीम का खिलाड़ी नही रहा लेकिन इस टीम का शुभचिन्तक जरुर बना रहा ।
-सपने-
-सपने-
बेटों के सपनों,
और,
बेटियों की जरुरतों,
में फंसी जेब,
थरथराती है,
बाजार के गुरुत्वाकर्षण में ।
कुलबुलाती आंते,
पूछती हैं,
ईमानदारी का पता,
और
नैतिकता
इतिहास के पन्नो से ओझल,
पराजित अश्वारोही की तरह,
ढूढ़ रही है अपना आश्रय।
लेकिन,
स्वर्ग के द्वारपालों की खूंखार फौज,
शिनाख्त है,
कुलीनों के डर का,
क्योंकि
सपने डिलीवर कर रहा है,
कोई फटेहाल पिज्जा बाय। सन्तोष
अन्तिम विदाई
मणिकर्णिका और हरिश्चन्द्र घाट से कितने ही परिजनों को अन्तिम विदाई दी है । हरिश्चन्द्र घाट पर कल ऐसा ही एक दुखद अवसर था । इन श्मशानों पर होने वाले क्रियाकर्म मे प्रायः पुरुष वर्ग ही रहता है । अपने दुःख को जज्ब किए दुनियावी बातचीत से उससे उबरने की कोशिश मे लगे लोग जहां जलती हुई चिताओं को निहारते हुए क्षणिक वैराग्य महसूस करने लगते हैं, वही अन्तिम क्रियाकर्म के कारोबारियों की सौदेबाजी उनको यथार्थ की दुनियां में खींचती रहती है । जलते हुए मांस की चिरांयध गंध से धुआंते वातावरण में शोकग्रस्त पुरुषों के बर्फानी विषाद के बीच मे जगह-जगह बिखरी अधजली लकड़ियों, गोबर और कोयलों के ढेर पर आवारा कुत्ते, छुट्टा जानवर, मुर्गे जहां निर्विकार भाव से घूमते रहते हैं वहीं दारिद्रय सुख का पर्यटन करते यूरोपीय, पुण्य पर्यटन करते शेष भारतीय भी कौतुक भाव से तमाशायी बने रहते हैं । इस पूरे माहौल मे हम गतात्मा के बारे मे नहीं अपितु कर्मकाण्ड की बारीकियों के बारे मे ज्यादा सोचते हैं और हमेशा की तरह गांव के कुछ विशेषज्ञ चिता की लकड़ियों को उलटते पलटते शरीर के शेष हिस्सों के जलने मे लगने वाले समय की स्वतःस्फूर्त ढंग से जानकारी देते रहते हैं । श्मशान पर एक महिला का करुण क्रंदन विषाद की बर्फ को पिघलाने लगा और मैने डूबती आंखो से उबरने के लिए सीढ़ियों पर चहलकदमी करते हुए एक लापता सज्जन के सम्बन्ध मे चिपके पोस्टर पर निगाह गड़ा दी । अजीब लगा कि जो जगह बहुसंख्य हिन्दुओं का अंतिम पता है, वहां पर भी लोग लापता की तलाश कर रहे है फिर महसूस हुआ कि शवदाह की क्रिया मे प्रतिदिन लापता होने वाले सैकड़ो पेंड़ो का पोस्टर भी इन घाटों पर जगह-जगह जरुर चिपकाया जाना चाहिए ताकि पता चलता रहे स्वर्ग की ओर प्रस्थान कर रहे हिन्दुओ के साथ गंगा प्रतिदिन कितने वृक्षों के असामयिक संहार की गवाह बन रही है ।
फागुन
सुनो.........फागुन,
तुम्हारी अश्लीलता ,
वर्जनाओं का दहन है,
या,
वासनाओं का प्रस्फुटन है,
या केवल,
परम्पराओं का निर्वहन है ।
बताऊ मैं,
तुम्हारा रंग,
बलत्कृता बेटियों की,
योनियों से टपकता खून है,
और
लालच की चिता पर,
दहकते सिन्दूर से,
बना है अबीर,
योनि पर,
विजयोत्सव के दिन,
पूरे हो रहे हैं फागुन,
जिस दिन हम पहचानेगें,
ईश्वर की दाढ़ो से,
टपकते मानव रक्त को,
फिर देगें तुमको,
नया रंग,
और गरिमामय खुशी,
और देगंे,
तुमको इस विद्रूपता से मुक्ति । सन्तोष
तुम्हारी अश्लीलता ,
वर्जनाओं का दहन है,
या,
वासनाओं का प्रस्फुटन है,
या केवल,
परम्पराओं का निर्वहन है ।
बताऊ मैं,
तुम्हारा रंग,
बलत्कृता बेटियों की,
योनियों से टपकता खून है,
और
लालच की चिता पर,
दहकते सिन्दूर से,
बना है अबीर,
योनि पर,
विजयोत्सव के दिन,
पूरे हो रहे हैं फागुन,
जिस दिन हम पहचानेगें,
ईश्वर की दाढ़ो से,
टपकते मानव रक्त को,
फिर देगें तुमको,
नया रंग,
और गरिमामय खुशी,
और देगंे,
तुमको इस विद्रूपता से मुक्ति । सन्तोष
खेवली
पक्की सड़क छूटी, आबादी के बीच में से गुजर रहा खड़ंजा ठिठक गया तो कुछ पेड़ो के बीच से पगडण्डीनुमा रास्ते दिखाई दिए। खटोले पर बैठी एक महिला से पूछना पड़ा सुदामा पान्डे के घर का रास्ता कौन है। एहर से चल जा, उसके बताने की विशिष्टता पर गौर किया तो पाया हम एक दृष्टिहीन से रास्ता पूछ रहे हैं। मोटरसाइकिल पर पीछे बैठे चचा ने संस्मरणों की पोटली खोली, एक बार गोदौलिया के पास एक गूंगा किसी को रास्ता बता रहा था, धूमिल बोले "देखिये न प्रकाश जी ये गूंगा अपने पूरे शरीर से बतिया रहा है"। ऐसे ही संस्मरणों को दुहराते हम कार्यक्रम स्थल तक पहुंचे, जहां नन्दलाल मास्टर गांव के बच्चों के साथ दूसरे प्रजातंत्र की तलाश में लगे हुए। खेवली अभी भी धूमिल को याद कर रहा है, गांव के उनके समकालीन धूमिल के तेवर को अभी भी सहेजे हुए हैं। आशा करता हूँ वो दिन भी आएगा जब ९ नवंबर को हम नारा लगाएंगे " खेवली चलो ".
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