स्मृतियाँ


दादा की लाई पहली लालटेन,
पिता का बत्तियो वाला स्टोव, 
और चाचा की पहली तनखाह का कुकर,
घर के एक गुमनाम से कोने में,
अपनी अपनी स्मृतियों की चादर में लिपटे पड़े थे |
मेरे घर की जवान हो रही पीढ़ी को शायद,
लालटेन की उस पहली उजास का पता नही था,
जिसके आंगन में फैलते ही दिबरिया जलभुन गई थी|
उस पीली उजास की मद्धिम रोशनी में,
कई नव परींनिताओ के रतजगे हुए होगे |
उसी की मद्धिम रोशनी को निहारते हुए,
कितनी दर्द में डूबी रातें कटी होगीं |
कितनी ख़ुशी मिली होगी,
जब तीज त्योहारों पर ब्यंजनो को बनाने में,
पनियाई आखों को धुएं से मुक्ति मिली होगी |
कुकर ने तो शायद अपनी पहली सिटी से ही,
भारी भरकम बर्तनों को,
रसोईं से बाहर कर दिया होगा |
मेरे घर की जवान हो रही पीढ़ी को शायद,
घर के उस कोने में बची स्मृतियों में,
अपने स्पेश की तलाश ख़त्म हो रही है |
किसी कबाड़ी की तराजू में,
इन स्मृतियों का वजन हो रहा है |
28-04-2012

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