आखिर- क्यों
----आखिर- क्यों-----
आखिर- क्यों सामाजिक उद्वेलन की उत्ताल लहरें,
टी वी विज्ञापनों के बीच,
समय को भरने वाला मसाला बन जाती है |
आखिर- क्यों गरीबी की रेखा,
सिनेमा की रेखा की तरह,
६० साल बाद भी सदाबहार दिखती है|
आखिर- क्यों पिछडो के नेता,
हरित क्रांति के उत्तर जीवियो की,
लिप्सा के प्रतिनिधि बन जाते है |
आखिर- क्यों सामाजिक उद्वेलन की उत्ताल लहरें,
टी वी विज्ञापनों के बीच,
समय को भरने वाला मसाला बन जाती है |
आखिर- क्यों गरीबी की रेखा,
सिनेमा की रेखा की तरह,
६० साल बाद भी सदाबहार दिखती है|
आखिर- क्यों पिछडो के नेता,
हरित क्रांति के उत्तर जीवियो की,
लिप्सा के प्रतिनिधि बन जाते है |
आखिर- क्यों दलितों की उम्मीद,
उनके कंधे पर सवार होकर,
नौकरशाहो का सर्कसी शेर बन जाती है |
आखिर- क्यों दुनिया को बदलने का जज्बा पाले लोग,
या तो किताबो के बीच सड़ते है,
या किसी संथाल के कंधे पर टंगे बैताल बन जाते है |
आखिर- क्यों सदियों तक लड़ने के बाद भी,
विज्ञानं धर्म की तरह,
समर्थो की सेवा में लग जाता है |
आखिर- क्यों वर्तमान में किसी क्यों का जवाब नही होता ,
शाएद हर क्यों वर्तमान के भूत होने का इंतजार करता है |
उनके कंधे पर सवार होकर,
नौकरशाहो का सर्कसी शेर बन जाती है |
आखिर- क्यों दुनिया को बदलने का जज्बा पाले लोग,
या तो किताबो के बीच सड़ते है,
या किसी संथाल के कंधे पर टंगे बैताल बन जाते है |
आखिर- क्यों सदियों तक लड़ने के बाद भी,
विज्ञानं धर्म की तरह,
समर्थो की सेवा में लग जाता है |
आखिर- क्यों वर्तमान में किसी क्यों का जवाब नही होता ,
शाएद हर क्यों वर्तमान के भूत होने का इंतजार करता है |
28-03-2012

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