दक्षिण अफ्रीका भाग-7
केप टाउन-केप टाउन में हम सायं 8.30 तक पहुंचे। केप टाउन को दक्षिण अफ्रीका की मदर सिटी का सम्मान हासिल है तथा यह शहर दुनिया के शीर्ष पर्यटन स्थलों में भी शुमार किया जाता है। इस शहर को प्रकृति ने भी दो महासागरों और टेबल माउन्टेन की छांव मे रचा है। रात मे इस महानगर मे चमकती रोशनी मे इसके समुद्र तटों मे आप खोए रहेगें और सुबह आपको शहर के हर हिस्से से समुद्र से 3558 फीट की उंचाई पर सिर उठाए सफेद बादलों की झुरमुट से झांकता टेबुल माउण्टेन दिखेगा और उसी के बगल 2195 फीट उंचाई पर शेर मुखाकृत वाला लायन हेड माउण्टेन दिखेगा। जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है टेबल माउण्टेन की चोटी नुकीली न होकर टेबल की तरह है और लायन हेड माउण्टेन लगता है बैठे हुए शेर की मुखाकृति वाला यह पर्वत इस शहर की सुरक्षा मे प्रकृति ने बैठा दिया हो । इन्ही पवर्तमालाओं मे 1150 फीट उचा सिग्नल हिल भी है, जिस पर खड़े होकर हमे पूरा शहर दिखाई देता हैं ।
केप टाउन को सर्वप्रथम 1488 मे पुर्तगाली नाविक बार्थोलोलोपाड्र डियास ने खोजा था, 1497 मे वास्को डि गामा ने भी इस जगह को यूरोप से एशिया जाने के मार्ग के रुप मे चिन्हित किया था ।
केप टाउन पहुंचने पर हम उसी दिन रात मे समुद्र तट पर गए । केप टाउन के समुद्र का पानी बहुत ठंडा था । समुद्र तट पर्यटकों से गुलजार था। उसके बाद वाटर फ्रन्ट पहुंचे । वाटर फ्रण्ट केप टाउन के समस्त सौन्दर्य को समेटे पर्यटकों की भीड़ और गीत, संगीत से गुलजार था। तट के किनारे बने होटलों मे खाते-पीते दर्शक, लोक संगीत गाते बजाते कलाकारों के साथ मानो आप एक जादुई दुनिया मे पहुंच गए हों । केप टाउन मे पर्यटकों को घुमाने वाली बसों से इस शहर को देखना बहुत ही सुविधाजनक है। ये बसें दो मंजिला होती है और लाल, नीली, पीली बसों का अलग-अलग रुट होता है। एक बार आप पूरे दिन का टिकट ले लीजिए और टिकट के साथ दिए गए ब्रोशर मे दर्शाए गए स्थलों का भ्रमण करते रहिए । ये बसें आपको निर्धारित पर्यटक स्थल पर उतार देंगी और आप उस स्थल को देखकर पुनः उसी स्टाप पर अगली बस को पकड़ कर अगले स्थल पर निकल लीजिए । ये बसें प्रायः अपने निर्धारित समय से पांच मिनट भी लेट नही होती हैं और आपको लगभग हर 25 मिनट पर मिलती रहेंगी । इन बसों से केपटाउन के समुद्र तटों, अंगूर के बागानांे और इन बागानो मे बनाने वाली शराब की फैक्ट्रियों, टेबल माउण्टेन आदि को देखा जा सकता है। टेबल माउण्टेन की चोटी पर पैदल जाना श्रम साध्य कार्य है इसलिए केबल कार की सुविधा उपलव्ध है। हमे दो बार प्रयास करने पर केबल कार नही मिल पायी क्योंकि चोटी पर काफी तेज हवा चल रही थी । तीसरे प्रयास मे हम इस पहाड़ की चोटी पर चढ़ सके जो अपने आकार के कारण काफी चैड़ाई मे दूर तक फैला हुआ था। पर्यटन बसें कई तरह के म्यूजियमो मे भी ले गई, इस महानगर के म्यूजियम बहुत ही समृद्ध हैं।
आजकल खबर आ रही है कि केप टाउन प्यासा है, आश्चर्य हो रहा है कि दो महासागरों के मिलन स्थल पर बसा उपनिवेशकालीन जहाजियों का यह शहर लोभ पर विकसित हुई सभ्यता की त्रासदियों से मनुष्यता को दो-चार करा रहा है और नवोन्मेषण की चुनौतियों को परोस रहा है क्योंकि हम जहां तक चले आए है वहां से वापस लौटना मुमकिन नही है ।
कारु का रेगिस्तान और आस्ट्रिªच की सवारी-गार्डन रुट पर वापस लौटते हुए हमे जार्ज कस्बे से होते हुए आस्ट्रिच फार्म पर जाने के लिए कारु का रेगिस्तान पार करना पड़ा । यह दक्षिण अफ्रीका का अर्द्ध रेगिस्तानी क्षेत्र है, जिसमे दूर-दूर तक छोटी-छोटी वनस्पतियां बैगनी रंग की दिखाई पड़ती है और जगह-जगह पर भेड़, शुतुरमुर्ग के फार्म भी पड़ते हैं। इस रास्ते मे कई दर्रे पड़ते हैं, जिनको पार करते हुए हम कांगो केव शुतुरमुर्ग फार्म पर पहुंचे। फार्म पर उपलव्ध गाइड महोदय ने शुतुरमुर्गो के सम्बन्ध मे बहुत सी जानकारी दी । ताकतवर शुतुरमुर्गो को देखकर भय भी लग रहा था लेकिन उस पर सवारी का आनन्द भी उठाया गया, हमारे साथ ही एक अंग्रेज बुर्जुग ने भी सवारी का आनन्द लिया । प्रस्तर युग के आदिम मानव के रिहाइश स्थल कांगो केव का पता 1780 मे एक स्थानीय किसान से लगा था, इन गुफाओं में सुरगें प्रवेश द्वार से 25 कि0मी0 भीतर तक चली गयी हैं। हमारे पहुंचते-पहुंचते प्रवेश का समय खत्म हो चुका था लेकिन गुफा के सम्बन्ध मे दिखाई जाने वाली फिल्म से पता चला कि इन गुफाओं मे आदिम युग से मनुष्य का वास रहा है। कांगो केव तक जाने का रास्ता भी उंचे पहाड़ों की मनोरम हरियाली से भरा हुआ था ।
नाएज्ना-केपटाउन से निकल कर गार्डन रुट पर एक छोटे से कस्बे हरमानस पहुंचे। हरमानस समुद्रतट पर व्हेल दिखाई पड़ने की सम्भावना रहती है लेकिन हम सौभाग्यशाली नही थे । नाएज्ना मे रात्रि निवास किया गया। यह कस्बा पोर्ट एलिजाबेथ और केपटाउन के मध्य पड़ता है। नाएज्ना का वाटर फ्रंट भी मनोहारी था । वाटर फ्रन्ट पर वाटर पोलो खेलने के लिए स्कूली बच्चों की टीमे आई हुई थी। कस्बे मे भारतीय खाने का रेस्तरां था जिसमे अफ्रीकी वेटर को हिन्दी बोलते देख कर अच्छा लगा। दक्षिण अफ्रीका के अधिकांश कस्बों की तरह यहां पर भी फाइन आर्टस की गैलरी थी। इस कस्बे के आस पास समुद्र के कई बीच हैं, जहां पर आप दोपहर और शाम बिता सकते हैं। कस्बे से सटे काफी नीचे घने जंगल मे पानी की एक पतली धारा के पास पिकनिक प्वाइंट बना हुआ है। जब हम पहुंचे तो दो श्वेत महिलाएं उस घने जंगल मे पदयात्रा करने के लिए आयी हुई थी, हमसे कुछ हाय-हलो हुई और वे उस जंगल मे गुम हो गयीं। उस घने जंगल मे भी टायलेट काफी साफ सुथरा मिला और डस्टबिन रखे हुए थे जिसको देखकर लगता था कि उसकी भी नियमित सफाई होती है। पानी की जल धारा बहुत ठंडी थी, जिसमे थोड़ी देर तक पांव डाल कर सुस्ताने के बाद वापस आया गया। यदि समुद्रतट का आनन्द लेना हो तो गार्डन रुट पर नाएज्ना सबसे शान्त और खूबसूरत स्थान है।
किंम्बरली- गार्डन रुट को छोड़कर हम नाएज्नासे 800कि0मी0 दूर किंबरली पहुंचे। यह शहर हीरे की खदान के रुप मे मशहूर है। अब खदान बन्द हो गयी है लेकिन खदान को पर्यटन स्थल कें रुप मे विकसित किया गया है। इस खदान से 3000 कि0ग्रा0 हीरे निकाले गए हैं, जिसके लिए 463 मी0 चैड़ाई मे 240 मी0 गहरी खुदाई की गयी है। इसके बिग होल मे कितने मजदूरांे की जान गयी होगी इसका अन्दाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि 1871 मे इस सुनसान इलाके मे हीरा मिलता है और 1872 मे इस इलाके मे 50000 लोग खुदाई कर रहे थे।
वापस जोहान्सबर्ग मे अपार्थीडम्यूजियम-अफ्रीका के इतिहास मे रंगभेद के दमनकारी अध्याय और रंगभेद के खिलाफ अफ्रीकी जनता के संघर्ष और शेष विश्व के समर्थन को सहेजने के लिए एक शानदार म्यूजियम बनाया गया है, जिसमे लघु फिल्मों और फोटोग्राफ के माध्यम से अफ्रीका के शानदार अतीत के साथ रंगभेद और उपनिवेशकाल के काले कारनामो के विरुद्ध संघर्ष को दर्शाया गया है। इस म्यूजियम को देखने मे कम से कम 4 घण्टा व्यतीत करना ही इस म्यूजियम के साथ न्याय होगा।
प्रिटोरिया- प्रिटोरिया दक्षिण अफ्रीका की तीन राजधानियों मे से एक राजधानी है, जहां पर राष्ट्रपति रहते हैं । यह जोहान्सबर्ग से 80 कि0मी0 दूरी पर है। तुलनात्मक रुप से प्रिटोरिया की साफ-सफाई अच्छी नही है। प्रिटोरिया मे यूनियन बिल्डिंग और फ्रीडम पार्क दर्शनीय स्थल हैं। फ्रीडम पार्क मे बना म्यूजियम उच्च स्तरीय है, जिसमे मानव विकास से लेकर रंगभेद तक के इतिहास को बहुत अच्छे ढंग से दिखाया गया है। इस म्यूजियम मे भी कम से कम 4 घण्टे का समय चाहिए लेकिन दुर्भाग्य से हमारे पास समय नही था।
इस यात्रा मे दक्षिण अफ्रीका के विभिन्न हिस्सों को गुजरते हुए जहां पर काले लोगों की बढ़ती भागीदारी को देखकर संतोष हुआ कि आने वाले वर्षो मे यह मुल्क अफ्रीकी महाद्वीप का वह हिस्सा बन सके जो इस पूरे महाद्वीप को मिलीजुली नस्लों और धर्मो के सम्मिलित प्रयास का शक्तिशाली इंजन बन सके जिससे यह महाद्वीप मानव विकास का नया मुकाम हासिल कर सके ।
समृद्ध श्वेत तथा भारतीय समुदाय लोकतंत्र से दिन पर दिन मजबूत हो रही काली चेतना से आशंकित जरुर है लेकिन इस विश्वास के साथ खड़ा है कि मण्डेला के आभा मण्डल ने दक्षिण अफ्रीका की राष्ट्रीय चेतना को इतना विस्तार दिया है जिसमे वो अपनी गरिमा के साथ नागरिक भागीदारी निभा सकते हैं।
आज केदक्षिण अफ्रीका मे गोरे तथा भारतीय-अरबी समुदाय को साधारणतया लक्ष्यित कर राजनैतिक बढ़त हासिल करने का एक अतिवादी नस्ली रुझान विकसित होता दिख रहा और यह सम्पदा और समृ़िद्ध के बटवारे को नस्ली नजरिए से तय करना चाह रहा है। इसी के गर्भ से एक राजनैतिक शब्दावली भी विकसित करने का प्रयास किया जा रहा है जिसमे गैर काले समुदाय को दक्षिण अफ्रीका की मुक्ति के बाद बने रहने को समस्या के तौर पर रेखांकित कर उसके लिए मण्डेला की नीतियों को जिम्मेदार ठहराया जाय।
पीढ़ियों से दक्षिण अफ्रीका मे बसे एक परिवार से बात करने पर पता चला कि वो भारत के नए राजनैतिक उभार से खुश हैं लेकिन इसी राजनैतिक धारा का दक्षिण अफ्रीकी संस्करण उनको डरा रहा है।लोकतंत्र के अन्दर बहुमतवाद असहमत विचारों के प्रति कब असहिष्णु हो जाता है यह लोगों को जबतक समझ मे आता है तबतक देर हो चुकी होती है। उपनिवेश कालीन और रंगभेद कालीन दौर मे उत्पीड़ित काले समुदाय के कन्धे से कन्धा मिला कर लड़े गोरे और भारतीय नायक दक्षिण अफ्रीका को बहुमतवाद की आड़ मे छिपे नस्लवाद को पहचानने मे मदद करेगें, जब कोई काला बच्चा उनकी तस्वीरों को निहारेगा तो वो उसके कान मे धीरे से फुसफुसाएगें कि तुम्हारे पुरखों की मजबूरी थी लड़ना, लेकिन हमने तो तुम्हारी मुस्कराहटों लिए लिए पक्षद्रोह किया था।







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