दक्षिण अफ्रीका भाग-6


ग्रासकोप-क्रूगर पार्क के फेबेनी गेट से निकलकर हम लगभग 100 कि0मी0 दूर 1400 मी0 समुद्रतल की उंचाई पर ड्रेकनबर्ग पर्वत श्रृंखला के सुरम्य पहाड़ों मे स्थित ग्रासकोप कस्बे मे हमे रात्रि विश्राम करना था । रास्ते के दोनो तरफ उंचे पहाड़ो पर देवदार के वृक्षों की श्रखला के बीच से होते हुए हम अंधेरा होते-होते ग्रासकोप मे मैडम शेरी के गेस्ट हाउस पर पहुंचे । ग्रासकोप के आस पास गाड््स विन्डो, बर्लिन फाल, लिस्बन फाल, ब्लाइड रीवर फाल, पाट्सहोल दर्शनीय प्राकृतिक स्थल हैं, प्रतीत होता है इन दर्शनीय स्थलों के नाम उपनिवेशवादियों ने अपने पितृभूमि की स्मृतियों को चिरंजीवी रखने के लिए रखे हैं । पाट्स होल दरअसल पहाड़ो पर से उतरती नदी के पानी द्वारा चट्टानो को काटकर बनाए गए विशाल गढ्ढों को कहा जाता है। इन बड़े-बड़े गढ्ढों मे नदी की फेनिल जलधारा को विभिन्न कुण्डो मे उतरते-निकलते देखने मे कब घण्टों गुजर जाएगें आपको पता नही चलेगा। दोपहर के बाद ग्रासकोप से करीब 250 कि0मी0 दूर पिलग्रिम्स रेस्ट नामक अठारहवीं सदी के अन्त या उन्नीसवीं सदी की शुरुआत मे स्थापित किए गए कस्बे को देखते हुए हम वापस जोहान्सबर्ग पहुंचे।
ब्लोम फाण्टेन-यह शहर जोहान्सबर्ग से करीब 425 कि0मी0 दूर है। पोर्ट एलिजाबेथ जाते समय हम कार से सुबह 6.30 बजे चलकर करीब 9.30 बजे पहुंचे । इसशहर मे सर्वोच्च न्यायालय स्थित है तथा इसको दक्षिण अफ्रीका की न्यायिक राजधानी कहा जाता है। इसको 1846 मे एक ब्रिटिश मेजर ने सीमा चैकी के रुप मे स्थापित किया था, आज इसकी आबादी 6 लाख बताई जाती है और यह समुद्र तल से 1395 मी0 की उंचाई पर स्थित है। इसी शहर मे 1912 मे अफ्रीकन नेशनल कांग्रेस की स्थापना हुई थी । जैसा कि दक्षिण अफ्रीकी शहरों की विशेषता है यहां के शहरों को यूरोपीय लोगो ने सुब्यवस्थित तरीके से बसाया है और जब आप कई शहरों से गुजरंेगें तो उनमे एक पैटर्न पाने लगेगें । इस शहर ने दक्षिण अफ्रीका को कई नामी लेखक, चित्रकार भी दिए हैं । शहर मे एक उंची पहाड़ी जिसको नेवल हिल कहते हैं पर मण्डेला की काले पत्थरों की विशाल प्रतिमा खड़ी है। इस पहाड़ी पर खड़े होकर यह खूबसूरत शहर दूर-दूर तक दिखाई देता है, लाल रंग के टाइल्स की झोपड़ीनुमा आकार की एक मंजिला मकानांे की छतों, बहुमंजिली इमारतों और हरे-भरे बाग-बगीचों से भरा यह शहर इस देश के अन्य शहरों की तरह ही साफ-सुथरा और खूबसूरत दिखाई देता है।
मिडिल वर्ग- ब्लोम फोन्टेन से करीब 10 बजे चलकर हम 1.45 बजे औरेन्ज नदी पार करके मिडिलवर्ग पहुंचे। यह समुद्र तट से 1490 मी0 उंचाई पर स्थित है। इसका नाम प्रिटोरिया और लिडेनवर्ग शहरों के मध्य होने के कारण मिडिलवर्ग रखा गया था। अंग्रेजो ने द्वितीय बोउर युद्ध मे यहां कन्सन्ट्रेशन कैम्प स्थापित किया था, जिसे म्यूजियम मे बदल दिया गया है। कार मे से ही इस शहर को देखते हुए हम पोर्ट एलिजाबेथ की तरफ बढ़े।
पोर्ट एलिजाबेथ-मिडिल वर्ग से नीचे उतरते हुए पोर्ट एलिजाबेथ की तरफ का रास्ता शानदार पर्वत श्रंखलाओं के बीच से होकर गुजरता है। कई नदियों और घाटियों से गुजरते हुए रास्ते का यह भाग प्रकृति के शानदार नजारों से भरा था, यद्यपि अभी तक जो रास्ता गुजरा था वह भी शानदार था परन्तु बारिश ने धूप के तीखेपन को खत्म कर दिया था और हमे आभास नही हो रहा था कि हम सुबह से लगभग 1100 कि0मी0 लगातार चल चुके है। मार्ग के इस भाग मे पहुंचने पर लगा कि वक्त थम जाय और हम बस यूंही चलते रहें । शाम 6.00 बजे तक पोर्ट एलिजाबेथ आ गया और हिन्द महासागर अपने नीले सौन्दर्य के आभा मण्डल के साथ लहरा रहा था । यहां पर समुद्र के किनारे सूर्यास्त लगभग 8.00 बजे होता है । शहर मे घुसते ही घुमावदार लम्बे-लम्बे ओवर ब्रिजों के उपर नीचे से गुजरते हुए पश्चिमांचल मे डूब रहे सूर्य की क्षैतिज किरणों मे लाल, कत्थई रंग के प्रस्तरो से निर्मित विशालकाय भवन मुस्कराते दिख रहे थे। जैसा कि इस मुल्क का रिवाज है 7 बजते-बजते सड़के खाली होने लगती हैं, दूर-दराज इलाकों मे जाने वाली बसें अपनी सवारियों को लेकर निकल चुकी होती हैं और विरल जनसंख्या वाले इस देश की सड़के और खाली हो जाती है। देर शाम तक सड़को पर आदमी शायद ही दिखाई देते हैं और सिर्फ कारें दौड़ती है। बस कुछ व्यस्त पर्यटन स्थलों पर ही चहल-पहल बची रहती है। यदि कोई शहर बन्दरगाह हो तो निश्चय ही समुद्र तट उसका सबसे खूबसरत स्थल होगा । हमने गेस्ट हाउस मे अपना सामान उतारा और समुद्र तट की तरफ निकल पड़े। समुद्र तट का दृृश्य शाम ढलते-ढलते चमकती रोशनी मे खूबसूरत होकर और निखर गया था।
इस बन्दरगाह का हिन्दुस्तान से गहरा रिश्ता है। पुर्तगालियों ने इस क्षेत्र का नाम अलगोवा खाड़ी रखा था क्योंकि इस बन्दरगाह से गोवा के लिए अनुकूल हवाओं मे जहाज प्रस्थान करते थे । तमाम उतार चढ़ावों के बाद 1820 मे ब्रिटिशांे ने खोसा जनजाति के साथ समझौता करके क्षेत्र निर्धारण किया और इसका नामकरण केप गर्वनर सर रुफाने सा डांकिन की पत्नी एलिजाबेथ के नाम पर किया गया । 1830 तक यहां सैकड़ो मकान और हजारो लोग आबाद हो चुके थे, संयोग से 1873 के आसपास किंबरली की हीरा की खदानों के मिलने के बाद तो यहां की जनसंख्या में अप्रत्याशित बढ़ोत्तरी हुई । द्वितीय बोअर युद्ध मे इस शहर मे दस हजार सैनिक घोड़ो के सम्मान में स्मृति स्थल बना वहीं पर बोअर महिलाओं और बच्चों के यन्त्रणा शिविर की घुटती चीखों को भी इस शहर ने अपने सीने मे जज्ब किया है। ब्लैक इज ब्यूटीफुल जैसे खूबसूरत नारे से रंगभेद को तार-तार करने वाले स्टीव बीको की शहादत भी इस शहर की पत्थर की मीनारों ने देखा है तो 2010 के फीफा वल्र्ड कप के दसियों मैंचो मे नाचते-गाते उमड़े हुजूम का इस शहर के किनारे समन्दर की लहरों ने झूम कर स्वागत किया है।
देर रात तक हमने समुद्र तट का कई चक्कर लगाया, इसका रेत डरबन के समुद्र तट के मुकाबले महीन है और पानी कुछ ठंडा लगा जिससे पानी मे उतरने की हिम्मत नही हुई । समुद्र तट के पास ही स्थित सन् 1799 मे बने फोर्ट फ्रेडरिक जो तत्कालीन ब्रिटिश कमाण्डर इन चीफ के नाम पर बना है तथा फ्रांसीसियों को रोकने के लिए बनाया गया था। यह छोटा सा उपेक्षित किला अपने समय मे कभी इस बन्दरगाह की नियति तय करता था, अब चन्द इतिहास यात्रियों से सन्नाटे मे गुफ्तगू करता है।
अगली सुबह समुद्र तट का चक्कर लगाकर हम पेग्विन पुर्नवास केन्द्र देखने गए, जहां पर घायल पेग्विनों की देखभाल की जाती है। वहां पर बताया गया कि कुछ दूर स्थित बर्ड आइलैण्ड मे या अन्य जगहों पर जो पेंग्विन घायल हो जाती हैं उनको देखभाल के लिए यहां लाया जाता है और स्वस्थ्य होने पर छोड़ दिया जाता है। केन्द्र की उत्साही बुर्जुग संचालिका से यह भी जानकारी मिली की यहां से छोड़ी गयी पेंग्विनें करीब 12 दिनों केप टाउन समद्र मे तैरते हुए पहुंच जाती है। अपने खुश मिजाज गेस्ट हाउस संचालक से अगली यात्रा की शुभ कामना लेते हुए हम गार्डन रुट से केप टाउन की तरफ निकल पड़े।
गार्डन रुट-पोर्ट एलिजाबेथ जिसको संक्षेप मे पीई भी कहते हैं से केप टाउन की तरफ समुद्र के किनारे-किनारे जाने वाले मार्ग को गार्डन रुट कहते हैं। पीई से केपटाउन की दूरी लगभग 800 कि0मी0 है, जिसका अधिकांश भाग गार्डन रुट है। गार्डन रुट का सौम्य तापमान और उसके मार्ग मे प्रकृति की सुन्दरता किसी भी यात्री के स्मृति पटल मे सदैव के लिए सुरक्षित हो जाती हैं । इस रास्ते मे करीब 7 घाटियां है और आपके मार्ग के एक तरफ पर्वत श्रृृंखला तो दूसरी तरफ समुद्र और उपर रंग बदलता आसमान आपको पूरी यात्रा मे मंत्रमुग्ध किए रहेगा । रास्ते मे आपको नायज्ना, जार्ज जैसे खूबसूरत कस्बे मिलेगें जो अपने खूबसूरत समुद्रतटों और हरीभरी पहाड़ियो से मंत्रमुग्ध करते हुए दम लेने का इसरार करेगें और जब आप दम लेने रुकेगें तो कहेंगे कि ‘‘दिल अभी भरा नही‘‘। इस रास्ते पर आपको हजारो फीट गहरी खाई मे रंेगती स्टार्म नदी मिलेगी जिसके छोटे से पुल की कारीगरी और प्रकृति की खूबसूरती देखने के लिए लकड़ी की बनी सीढ़ियां मिलेगी। ऐसे ही गुजरते हुए आपको दो पहाड़ों और समुद्र के त्रिभुज को बीच से काटती ब्लाउक्रांस नदी मिलेगी, जिस पर बने पुल की उंचाई इतनी होगी की पुल की नीचे बंजी जम्पिंग मे झूलता इंसान एक छोटा सा बच्चा नजर आएगा, दुनिया मे किसी भी पुल के नीचे की सबसे गहरी बंजी जम्पिंग होगी और जब आप पुल से सामने देखेगंे तो आमने सामने खड़े दो पहाड़ों से टकराते समुद्र की फेनिल लहरें आपको किसी अनन्त प्रवाह मे शामिल होने या जड़वत खड़े रहने का आमंत्रण देंगी।इसी रास्ते मे आगे चलकर हम कुछ देर के लिए प्लेटनवर्ग कस्बे मे समुद्र के किनारे रुके थे। 1779 मे डच इस्ट इण्डिया कम्पनी के केप गर्वनर के नाम पर बसे इस कस्बे के समुद्रतट की खूबसूरती अवर्णनीय है।

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