गुरुवार, 20 दिसंबर 2018

दक्षिण अफ्रीका भाग-7








केप टाउन-केप टाउन में हम सायं 8.30 तक पहुंचे। केप टाउन को दक्षिण अफ्रीका की मदर सिटी का सम्मान हासिल है तथा यह शहर दुनिया के शीर्ष पर्यटन स्थलों में भी शुमार किया जाता है। इस शहर को प्रकृति ने भी दो महासागरों और टेबल माउन्टेन की छांव मे रचा है। रात मे इस महानगर मे चमकती रोशनी मे इसके समुद्र तटों मे आप खोए रहेगें और सुबह आपको शहर के हर हिस्से से समुद्र से 3558 फीट की उंचाई पर सिर उठाए सफेद बादलों की झुरमुट से झांकता टेबुल माउण्टेन दिखेगा और उसी के बगल 2195 फीट उंचाई पर शेर मुखाकृत वाला लायन हेड माउण्टेन दिखेगा। जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है टेबल माउण्टेन की चोटी नुकीली न होकर टेबल की तरह है और लायन हेड माउण्टेन लगता है बैठे हुए शेर की मुखाकृति वाला यह पर्वत इस शहर की सुरक्षा मे प्रकृति ने बैठा दिया हो । इन्ही पवर्तमालाओं मे 1150 फीट उचा सिग्नल हिल भी है, जिस पर खड़े होकर हमे पूरा शहर दिखाई देता हैं ।
केप टाउन को सर्वप्रथम 1488 मे पुर्तगाली नाविक बार्थोलोलोपाड्र डियास ने खोजा था, 1497 मे वास्को डि गामा ने भी इस जगह को यूरोप से एशिया जाने के मार्ग के रुप मे चिन्हित किया था ।
केप टाउन पहुंचने पर हम उसी दिन रात मे समुद्र तट पर गए । केप टाउन के समुद्र का पानी बहुत ठंडा था । समुद्र तट पर्यटकों से गुलजार था। उसके बाद वाटर फ्रन्ट पहुंचे । वाटर फ्रण्ट केप टाउन के समस्त सौन्दर्य को समेटे पर्यटकों की भीड़ और गीत, संगीत से गुलजार था। तट के किनारे बने होटलों मे खाते-पीते दर्शक, लोक संगीत गाते बजाते कलाकारों के साथ मानो आप एक जादुई दुनिया मे पहुंच गए हों । केप टाउन मे पर्यटकों को घुमाने वाली बसों से इस शहर को देखना बहुत ही सुविधाजनक है। ये बसें दो मंजिला होती है और लाल, नीली, पीली बसों का अलग-अलग रुट होता है। एक बार आप पूरे दिन का टिकट ले लीजिए और टिकट के साथ दिए गए ब्रोशर मे दर्शाए गए स्थलों का भ्रमण करते रहिए । ये बसें आपको निर्धारित पर्यटक स्थल पर उतार देंगी और आप उस स्थल को देखकर पुनः उसी स्टाप पर अगली बस को पकड़ कर अगले स्थल पर निकल लीजिए । ये बसें प्रायः अपने निर्धारित समय से पांच मिनट भी लेट नही होती हैं और आपको लगभग हर 25 मिनट पर मिलती रहेंगी । इन बसों से केपटाउन के समुद्र तटों, अंगूर के बागानांे और इन बागानो मे बनाने वाली शराब की फैक्ट्रियों, टेबल माउण्टेन आदि को देखा जा सकता है। टेबल माउण्टेन की चोटी पर पैदल जाना श्रम साध्य कार्य है इसलिए केबल कार की सुविधा उपलव्ध है। हमे दो बार प्रयास करने पर केबल कार नही मिल पायी क्योंकि चोटी पर काफी तेज हवा चल रही थी । तीसरे प्रयास मे हम इस पहाड़ की चोटी पर चढ़ सके जो अपने आकार के कारण काफी चैड़ाई मे दूर तक फैला हुआ था। पर्यटन बसें कई तरह के म्यूजियमो मे भी ले गई, इस महानगर के म्यूजियम बहुत ही समृद्ध हैं।
आजकल खबर आ रही है कि केप टाउन प्यासा है, आश्चर्य हो रहा है कि दो महासागरों के मिलन स्थल पर बसा उपनिवेशकालीन जहाजियों का यह शहर लोभ पर विकसित हुई सभ्यता की त्रासदियों से मनुष्यता को दो-चार करा रहा है और नवोन्मेषण की चुनौतियों को परोस रहा है क्योंकि हम जहां तक चले आए है वहां से वापस लौटना मुमकिन नही है ।
कारु का रेगिस्तान और आस्ट्रिªच की सवारी-गार्डन रुट पर वापस लौटते हुए हमे जार्ज कस्बे से होते हुए आस्ट्रिच फार्म पर जाने के लिए कारु का रेगिस्तान पार करना पड़ा । यह दक्षिण अफ्रीका का अर्द्ध रेगिस्तानी क्षेत्र है, जिसमे दूर-दूर तक छोटी-छोटी वनस्पतियां बैगनी रंग की दिखाई पड़ती है और जगह-जगह पर भेड़, शुतुरमुर्ग के फार्म भी पड़ते हैं। इस रास्ते मे कई दर्रे पड़ते हैं, जिनको पार करते हुए हम कांगो केव शुतुरमुर्ग फार्म पर पहुंचे। फार्म पर उपलव्ध गाइड महोदय ने शुतुरमुर्गो के सम्बन्ध मे बहुत सी जानकारी दी । ताकतवर शुतुरमुर्गो को देखकर भय भी लग रहा था लेकिन उस पर सवारी का आनन्द भी उठाया गया, हमारे साथ ही एक अंग्रेज बुर्जुग ने भी सवारी का आनन्द लिया । प्रस्तर युग के आदिम मानव के रिहाइश स्थल कांगो केव का पता 1780 मे एक स्थानीय किसान से लगा था, इन गुफाओं में सुरगें प्रवेश द्वार से 25 कि0मी0 भीतर तक चली गयी हैं। हमारे पहुंचते-पहुंचते प्रवेश का समय खत्म हो चुका था लेकिन गुफा के सम्बन्ध मे दिखाई जाने वाली फिल्म से पता चला कि इन गुफाओं मे आदिम युग से मनुष्य का वास रहा है। कांगो केव तक जाने का रास्ता भी उंचे पहाड़ों की मनोरम हरियाली से भरा हुआ था ।
नाएज्ना-केपटाउन से निकल कर गार्डन रुट पर एक छोटे से कस्बे हरमानस पहुंचे। हरमानस समुद्रतट पर व्हेल दिखाई पड़ने की सम्भावना रहती है लेकिन हम सौभाग्यशाली नही थे । नाएज्ना मे रात्रि निवास किया गया। यह कस्बा पोर्ट एलिजाबेथ और केपटाउन के मध्य पड़ता है। नाएज्ना का वाटर फ्रंट भी मनोहारी था । वाटर फ्रन्ट पर वाटर पोलो खेलने के लिए स्कूली बच्चों की टीमे आई हुई थी। कस्बे मे भारतीय खाने का रेस्तरां था जिसमे अफ्रीकी वेटर को हिन्दी बोलते देख कर अच्छा लगा। दक्षिण अफ्रीका के अधिकांश कस्बों की तरह यहां पर भी फाइन आर्टस की गैलरी थी। इस कस्बे के आस पास समुद्र के कई बीच हैं, जहां पर आप दोपहर और शाम बिता सकते हैं। कस्बे से सटे काफी नीचे घने जंगल मे पानी की एक पतली धारा के पास पिकनिक प्वाइंट बना हुआ है। जब हम पहुंचे तो दो श्वेत महिलाएं उस घने जंगल मे पदयात्रा करने के लिए आयी हुई थी, हमसे कुछ हाय-हलो हुई और वे उस जंगल मे गुम हो गयीं। उस घने जंगल मे भी टायलेट काफी साफ सुथरा मिला और डस्टबिन रखे हुए थे जिसको देखकर लगता था कि उसकी भी नियमित सफाई होती है। पानी की जल धारा बहुत ठंडी थी, जिसमे थोड़ी देर तक पांव डाल कर सुस्ताने के बाद वापस आया गया। यदि समुद्रतट का आनन्द लेना हो तो गार्डन रुट पर नाएज्ना सबसे शान्त और खूबसूरत स्थान है।
किंम्बरली- गार्डन रुट को छोड़कर हम नाएज्नासे 800कि0मी0 दूर किंबरली पहुंचे। यह शहर हीरे की खदान के रुप मे मशहूर है। अब खदान बन्द हो गयी है लेकिन खदान को पर्यटन स्थल कें रुप मे विकसित किया गया है। इस खदान से 3000 कि0ग्रा0 हीरे निकाले गए हैं, जिसके लिए 463 मी0 चैड़ाई मे 240 मी0 गहरी खुदाई की गयी है। इसके बिग होल मे कितने मजदूरांे की जान गयी होगी इसका अन्दाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि 1871 मे इस सुनसान इलाके मे हीरा मिलता है और 1872 मे इस इलाके मे 50000 लोग खुदाई कर रहे थे।
वापस जोहान्सबर्ग मे अपार्थीडम्यूजियम-अफ्रीका के इतिहास मे रंगभेद के दमनकारी अध्याय और रंगभेद के खिलाफ अफ्रीकी जनता के संघर्ष और शेष विश्व के समर्थन को सहेजने के लिए एक शानदार म्यूजियम बनाया गया है, जिसमे लघु फिल्मों और फोटोग्राफ के माध्यम से अफ्रीका के शानदार अतीत के साथ रंगभेद और उपनिवेशकाल के काले कारनामो के विरुद्ध संघर्ष को दर्शाया गया है। इस म्यूजियम को देखने मे कम से कम 4 घण्टा व्यतीत करना ही इस म्यूजियम के साथ न्याय होगा।
प्रिटोरिया- प्रिटोरिया दक्षिण अफ्रीका की तीन राजधानियों मे से एक राजधानी है, जहां पर राष्ट्रपति रहते हैं । यह जोहान्सबर्ग से 80 कि0मी0 दूरी पर है। तुलनात्मक रुप से प्रिटोरिया की साफ-सफाई अच्छी नही है। प्रिटोरिया मे यूनियन बिल्डिंग और फ्रीडम पार्क दर्शनीय स्थल हैं। फ्रीडम पार्क मे बना म्यूजियम उच्च स्तरीय है, जिसमे मानव विकास से लेकर रंगभेद तक के इतिहास को बहुत अच्छे ढंग से दिखाया गया है। इस म्यूजियम मे भी कम से कम 4 घण्टे का समय चाहिए लेकिन दुर्भाग्य से हमारे पास समय नही था।
इस यात्रा मे दक्षिण अफ्रीका के विभिन्न हिस्सों को गुजरते हुए जहां पर काले लोगों की बढ़ती भागीदारी को देखकर संतोष हुआ कि आने वाले वर्षो मे यह मुल्क अफ्रीकी महाद्वीप का वह हिस्सा बन सके जो इस पूरे महाद्वीप को मिलीजुली नस्लों और धर्मो के सम्मिलित प्रयास का शक्तिशाली इंजन बन सके जिससे यह महाद्वीप मानव विकास का नया मुकाम हासिल कर सके ।
समृद्ध श्वेत तथा भारतीय समुदाय लोकतंत्र से दिन पर दिन मजबूत हो रही काली चेतना से आशंकित जरुर है लेकिन इस विश्वास के साथ खड़ा है कि मण्डेला के आभा मण्डल ने दक्षिण अफ्रीका की राष्ट्रीय चेतना को इतना विस्तार दिया है जिसमे वो अपनी गरिमा के साथ नागरिक भागीदारी निभा सकते हैं।
आज केदक्षिण अफ्रीका मे गोरे तथा भारतीय-अरबी समुदाय को साधारणतया लक्ष्यित कर राजनैतिक बढ़त हासिल करने का एक अतिवादी नस्ली रुझान विकसित होता दिख रहा और यह सम्पदा और समृ़िद्ध के बटवारे को नस्ली नजरिए से तय करना चाह रहा है। इसी के गर्भ से एक राजनैतिक शब्दावली भी विकसित करने का प्रयास किया जा रहा है जिसमे गैर काले समुदाय को दक्षिण अफ्रीका की मुक्ति के बाद बने रहने को समस्या के तौर पर रेखांकित कर उसके लिए मण्डेला की नीतियों को जिम्मेदार ठहराया जाय।
पीढ़ियों से दक्षिण अफ्रीका मे बसे एक परिवार से बात करने पर पता चला कि वो भारत के नए राजनैतिक उभार से खुश हैं लेकिन इसी राजनैतिक धारा का दक्षिण अफ्रीकी संस्करण उनको डरा रहा है।लोकतंत्र के अन्दर बहुमतवाद असहमत विचारों के प्रति कब असहिष्णु हो जाता है यह लोगों को जबतक समझ मे आता है तबतक देर हो चुकी होती है। उपनिवेश कालीन और रंगभेद कालीन दौर मे उत्पीड़ित काले समुदाय के कन्धे से कन्धा मिला कर लड़े गोरे और भारतीय नायक दक्षिण अफ्रीका को बहुमतवाद की आड़ मे छिपे नस्लवाद को पहचानने मे मदद करेगें, जब कोई काला बच्चा उनकी तस्वीरों को निहारेगा तो वो उसके कान मे धीरे से फुसफुसाएगें कि तुम्हारे पुरखों की मजबूरी थी लड़ना, लेकिन हमने तो तुम्हारी मुस्कराहटों लिए लिए पक्षद्रोह किया था।

रविवार, 16 दिसंबर 2018

दक्षिण अफ्रीका भाग-6


ग्रासकोप-क्रूगर पार्क के फेबेनी गेट से निकलकर हम लगभग 100 कि0मी0 दूर 1400 मी0 समुद्रतल की उंचाई पर ड्रेकनबर्ग पर्वत श्रृंखला के सुरम्य पहाड़ों मे स्थित ग्रासकोप कस्बे मे हमे रात्रि विश्राम करना था । रास्ते के दोनो तरफ उंचे पहाड़ो पर देवदार के वृक्षों की श्रखला के बीच से होते हुए हम अंधेरा होते-होते ग्रासकोप मे मैडम शेरी के गेस्ट हाउस पर पहुंचे । ग्रासकोप के आस पास गाड््स विन्डो, बर्लिन फाल, लिस्बन फाल, ब्लाइड रीवर फाल, पाट्सहोल दर्शनीय प्राकृतिक स्थल हैं, प्रतीत होता है इन दर्शनीय स्थलों के नाम उपनिवेशवादियों ने अपने पितृभूमि की स्मृतियों को चिरंजीवी रखने के लिए रखे हैं । पाट्स होल दरअसल पहाड़ो पर से उतरती नदी के पानी द्वारा चट्टानो को काटकर बनाए गए विशाल गढ्ढों को कहा जाता है। इन बड़े-बड़े गढ्ढों मे नदी की फेनिल जलधारा को विभिन्न कुण्डो मे उतरते-निकलते देखने मे कब घण्टों गुजर जाएगें आपको पता नही चलेगा। दोपहर के बाद ग्रासकोप से करीब 250 कि0मी0 दूर पिलग्रिम्स रेस्ट नामक अठारहवीं सदी के अन्त या उन्नीसवीं सदी की शुरुआत मे स्थापित किए गए कस्बे को देखते हुए हम वापस जोहान्सबर्ग पहुंचे।
ब्लोम फाण्टेन-यह शहर जोहान्सबर्ग से करीब 425 कि0मी0 दूर है। पोर्ट एलिजाबेथ जाते समय हम कार से सुबह 6.30 बजे चलकर करीब 9.30 बजे पहुंचे । इसशहर मे सर्वोच्च न्यायालय स्थित है तथा इसको दक्षिण अफ्रीका की न्यायिक राजधानी कहा जाता है। इसको 1846 मे एक ब्रिटिश मेजर ने सीमा चैकी के रुप मे स्थापित किया था, आज इसकी आबादी 6 लाख बताई जाती है और यह समुद्र तल से 1395 मी0 की उंचाई पर स्थित है। इसी शहर मे 1912 मे अफ्रीकन नेशनल कांग्रेस की स्थापना हुई थी । जैसा कि दक्षिण अफ्रीकी शहरों की विशेषता है यहां के शहरों को यूरोपीय लोगो ने सुब्यवस्थित तरीके से बसाया है और जब आप कई शहरों से गुजरंेगें तो उनमे एक पैटर्न पाने लगेगें । इस शहर ने दक्षिण अफ्रीका को कई नामी लेखक, चित्रकार भी दिए हैं । शहर मे एक उंची पहाड़ी जिसको नेवल हिल कहते हैं पर मण्डेला की काले पत्थरों की विशाल प्रतिमा खड़ी है। इस पहाड़ी पर खड़े होकर यह खूबसूरत शहर दूर-दूर तक दिखाई देता है, लाल रंग के टाइल्स की झोपड़ीनुमा आकार की एक मंजिला मकानांे की छतों, बहुमंजिली इमारतों और हरे-भरे बाग-बगीचों से भरा यह शहर इस देश के अन्य शहरों की तरह ही साफ-सुथरा और खूबसूरत दिखाई देता है।
मिडिल वर्ग- ब्लोम फोन्टेन से करीब 10 बजे चलकर हम 1.45 बजे औरेन्ज नदी पार करके मिडिलवर्ग पहुंचे। यह समुद्र तट से 1490 मी0 उंचाई पर स्थित है। इसका नाम प्रिटोरिया और लिडेनवर्ग शहरों के मध्य होने के कारण मिडिलवर्ग रखा गया था। अंग्रेजो ने द्वितीय बोउर युद्ध मे यहां कन्सन्ट्रेशन कैम्प स्थापित किया था, जिसे म्यूजियम मे बदल दिया गया है। कार मे से ही इस शहर को देखते हुए हम पोर्ट एलिजाबेथ की तरफ बढ़े।
पोर्ट एलिजाबेथ-मिडिल वर्ग से नीचे उतरते हुए पोर्ट एलिजाबेथ की तरफ का रास्ता शानदार पर्वत श्रंखलाओं के बीच से होकर गुजरता है। कई नदियों और घाटियों से गुजरते हुए रास्ते का यह भाग प्रकृति के शानदार नजारों से भरा था, यद्यपि अभी तक जो रास्ता गुजरा था वह भी शानदार था परन्तु बारिश ने धूप के तीखेपन को खत्म कर दिया था और हमे आभास नही हो रहा था कि हम सुबह से लगभग 1100 कि0मी0 लगातार चल चुके है। मार्ग के इस भाग मे पहुंचने पर लगा कि वक्त थम जाय और हम बस यूंही चलते रहें । शाम 6.00 बजे तक पोर्ट एलिजाबेथ आ गया और हिन्द महासागर अपने नीले सौन्दर्य के आभा मण्डल के साथ लहरा रहा था । यहां पर समुद्र के किनारे सूर्यास्त लगभग 8.00 बजे होता है । शहर मे घुसते ही घुमावदार लम्बे-लम्बे ओवर ब्रिजों के उपर नीचे से गुजरते हुए पश्चिमांचल मे डूब रहे सूर्य की क्षैतिज किरणों मे लाल, कत्थई रंग के प्रस्तरो से निर्मित विशालकाय भवन मुस्कराते दिख रहे थे। जैसा कि इस मुल्क का रिवाज है 7 बजते-बजते सड़के खाली होने लगती हैं, दूर-दराज इलाकों मे जाने वाली बसें अपनी सवारियों को लेकर निकल चुकी होती हैं और विरल जनसंख्या वाले इस देश की सड़के और खाली हो जाती है। देर शाम तक सड़को पर आदमी शायद ही दिखाई देते हैं और सिर्फ कारें दौड़ती है। बस कुछ व्यस्त पर्यटन स्थलों पर ही चहल-पहल बची रहती है। यदि कोई शहर बन्दरगाह हो तो निश्चय ही समुद्र तट उसका सबसे खूबसरत स्थल होगा । हमने गेस्ट हाउस मे अपना सामान उतारा और समुद्र तट की तरफ निकल पड़े। समुद्र तट का दृृश्य शाम ढलते-ढलते चमकती रोशनी मे खूबसूरत होकर और निखर गया था।
इस बन्दरगाह का हिन्दुस्तान से गहरा रिश्ता है। पुर्तगालियों ने इस क्षेत्र का नाम अलगोवा खाड़ी रखा था क्योंकि इस बन्दरगाह से गोवा के लिए अनुकूल हवाओं मे जहाज प्रस्थान करते थे । तमाम उतार चढ़ावों के बाद 1820 मे ब्रिटिशांे ने खोसा जनजाति के साथ समझौता करके क्षेत्र निर्धारण किया और इसका नामकरण केप गर्वनर सर रुफाने सा डांकिन की पत्नी एलिजाबेथ के नाम पर किया गया । 1830 तक यहां सैकड़ो मकान और हजारो लोग आबाद हो चुके थे, संयोग से 1873 के आसपास किंबरली की हीरा की खदानों के मिलने के बाद तो यहां की जनसंख्या में अप्रत्याशित बढ़ोत्तरी हुई । द्वितीय बोअर युद्ध मे इस शहर मे दस हजार सैनिक घोड़ो के सम्मान में स्मृति स्थल बना वहीं पर बोअर महिलाओं और बच्चों के यन्त्रणा शिविर की घुटती चीखों को भी इस शहर ने अपने सीने मे जज्ब किया है। ब्लैक इज ब्यूटीफुल जैसे खूबसूरत नारे से रंगभेद को तार-तार करने वाले स्टीव बीको की शहादत भी इस शहर की पत्थर की मीनारों ने देखा है तो 2010 के फीफा वल्र्ड कप के दसियों मैंचो मे नाचते-गाते उमड़े हुजूम का इस शहर के किनारे समन्दर की लहरों ने झूम कर स्वागत किया है।
देर रात तक हमने समुद्र तट का कई चक्कर लगाया, इसका रेत डरबन के समुद्र तट के मुकाबले महीन है और पानी कुछ ठंडा लगा जिससे पानी मे उतरने की हिम्मत नही हुई । समुद्र तट के पास ही स्थित सन् 1799 मे बने फोर्ट फ्रेडरिक जो तत्कालीन ब्रिटिश कमाण्डर इन चीफ के नाम पर बना है तथा फ्रांसीसियों को रोकने के लिए बनाया गया था। यह छोटा सा उपेक्षित किला अपने समय मे कभी इस बन्दरगाह की नियति तय करता था, अब चन्द इतिहास यात्रियों से सन्नाटे मे गुफ्तगू करता है।
अगली सुबह समुद्र तट का चक्कर लगाकर हम पेग्विन पुर्नवास केन्द्र देखने गए, जहां पर घायल पेग्विनों की देखभाल की जाती है। वहां पर बताया गया कि कुछ दूर स्थित बर्ड आइलैण्ड मे या अन्य जगहों पर जो पेंग्विन घायल हो जाती हैं उनको देखभाल के लिए यहां लाया जाता है और स्वस्थ्य होने पर छोड़ दिया जाता है। केन्द्र की उत्साही बुर्जुग संचालिका से यह भी जानकारी मिली की यहां से छोड़ी गयी पेंग्विनें करीब 12 दिनों केप टाउन समद्र मे तैरते हुए पहुंच जाती है। अपने खुश मिजाज गेस्ट हाउस संचालक से अगली यात्रा की शुभ कामना लेते हुए हम गार्डन रुट से केप टाउन की तरफ निकल पड़े।
गार्डन रुट-पोर्ट एलिजाबेथ जिसको संक्षेप मे पीई भी कहते हैं से केप टाउन की तरफ समुद्र के किनारे-किनारे जाने वाले मार्ग को गार्डन रुट कहते हैं। पीई से केपटाउन की दूरी लगभग 800 कि0मी0 है, जिसका अधिकांश भाग गार्डन रुट है। गार्डन रुट का सौम्य तापमान और उसके मार्ग मे प्रकृति की सुन्दरता किसी भी यात्री के स्मृति पटल मे सदैव के लिए सुरक्षित हो जाती हैं । इस रास्ते मे करीब 7 घाटियां है और आपके मार्ग के एक तरफ पर्वत श्रृृंखला तो दूसरी तरफ समुद्र और उपर रंग बदलता आसमान आपको पूरी यात्रा मे मंत्रमुग्ध किए रहेगा । रास्ते मे आपको नायज्ना, जार्ज जैसे खूबसूरत कस्बे मिलेगें जो अपने खूबसूरत समुद्रतटों और हरीभरी पहाड़ियो से मंत्रमुग्ध करते हुए दम लेने का इसरार करेगें और जब आप दम लेने रुकेगें तो कहेंगे कि ‘‘दिल अभी भरा नही‘‘। इस रास्ते पर आपको हजारो फीट गहरी खाई मे रंेगती स्टार्म नदी मिलेगी जिसके छोटे से पुल की कारीगरी और प्रकृति की खूबसूरती देखने के लिए लकड़ी की बनी सीढ़ियां मिलेगी। ऐसे ही गुजरते हुए आपको दो पहाड़ों और समुद्र के त्रिभुज को बीच से काटती ब्लाउक्रांस नदी मिलेगी, जिस पर बने पुल की उंचाई इतनी होगी की पुल की नीचे बंजी जम्पिंग मे झूलता इंसान एक छोटा सा बच्चा नजर आएगा, दुनिया मे किसी भी पुल के नीचे की सबसे गहरी बंजी जम्पिंग होगी और जब आप पुल से सामने देखेगंे तो आमने सामने खड़े दो पहाड़ों से टकराते समुद्र की फेनिल लहरें आपको किसी अनन्त प्रवाह मे शामिल होने या जड़वत खड़े रहने का आमंत्रण देंगी।इसी रास्ते मे आगे चलकर हम कुछ देर के लिए प्लेटनवर्ग कस्बे मे समुद्र के किनारे रुके थे। 1779 मे डच इस्ट इण्डिया कम्पनी के केप गर्वनर के नाम पर बसे इस कस्बे के समुद्रतट की खूबसूरती अवर्णनीय है।

रविवार, 9 दिसंबर 2018

मेरी दक्षिण अफ्रीका यात्रा भाग-5








फीनिक्स सेटलमेन्ट-डरबन के उत्तर-पश्चिम मे महात्मा गांधी द्वारा स्थापित फीनिक्स आश्रम अपने इर्दगिर्द की जुलू आबादी से घिरा हुआ है। आश्रम को जी0पी0एस0 खोज नही पा रहा था तो हमने एक जुलू महिला का सहारा लिया और उसने खुशी-खुशी आश्रम तक पहुंचाया और कुछ रैण्ड का मेहनताना लेकर प्रसन्न हो गयीं । एक अश्वेत अपरिचित महिला को इस तरह से गाड़ी मे बैठाने की चर्चा होने पर विनय के सहकर्मियों ने इसे दुस्साहस कहा और भविष्य मे इससे बचने की सलाह दी, इससे पता चलता है कि भारतीयों और अश्वेत समुदाय के बीच अविश्वास की कितनी गहरी खाई है । इस आश्रम की देखभाल बहुत व्यवस्थित तरीके से हो रही है। परिसर मे लगे फलदार वृक्षों पर लदे फलांे ने सहयात्री श्रीमती शिवा के बचपने को जाग्रत कर दिया और उस परिसर की देखभाल करने वाले की ईमानदारी का भी एहसास हुआ । जूलू आबादी से घिरा परिसर जिस तरह से सुरक्षित और साफ सुथरा है, यह उल्लेखनीय है क्योंकि ऐसे स्थानों पर हमारे जैसे भारतीय ही कभी-कभार आते है। इस स्थल पर आनंे पर हमे टिन की छतो से बने छोटे-छोटे लेकिन साफ-सुथरे मकान और सड़को के किनारे आपस मे सुख-दुख बांटती महिलाएं दिखीं ।
मण्डेला कैप्चर साइट- डरबन से जोहान्सबर्ग लौटते समय हम डरबन से लगभग 100 कि0मी0 दूर मण्डेला कैप्चर साइट देखने पहुंचे । यहां पर मण्डेला को गोरी सरकार ने काफी लम्बी अवधि तक कैद मे रखा था । अब इस जगह को म्युजियम मे बदलने का कार्य चल रहा है।  म्यूजिम का मुख्य भवन निर्माणाधीन है, अभी एक अस्थाई भवन मे रंगभेद कालीन अफ्रीका मे अश्वेतों के संघर्ष की चित्र प्रर्दशनी, फिल्मे दिखाई जाती हैं । यह जेल काफी वीराने मे बनायी गयी है, जिसके दूर-दूर तक मानव बस्ती नही दिखी। यहां पर सबसे आर्कषक नेल्सन मण्डेला अनेक लोहे की छड़ों से बनायी गयी विशाल मुखाकृति है, जो एक खास दूरी से देखने पर धीरे-धीरे स्पष्ट होने लगती है। दूर-दूर तक निर्जन पहाड़ियों के बीच बने इस म्यूजियम मे नेल्सन मण्डेला का यह विशाल लौह मूर्ति शिल्प इन निर्जन पहाड़ियों को निहारता हुआ इस महादेश की निगहबानी करता प्रतीत होता है। मण्डेला को इसी  जगह पर 5 अगस्त,1962 को रंगभेदी पुलिस द्वारा गिरफ्तार किया गया था, जहां से उनके  27 वर्षो लम्बी कैद की शुरुआत हुई । इस जगह पर गिरफ्तारी की  50वीं वर्षगांठ पर  50 स्टील के खम्भों से यह मूर्तिशिल्प बनाया गया है।
पीटरमेरित्सबर्ग रेलवे स्टेशन- बैरिस्टर गांधी को राजनेता गांधी की दीक्षा इसी रेलवे स्टेशन के प्लेटफार्म पर मिली थी । भारतवंशियों के दक्षिण अफ्रीका के रंगभेद विरोधी आन्दोलन की पृष्ठभूमि तैयार होने मे इस रेलवे स्टेशन का इतना महत्वपूर्ण स्थान है कि भारत से आने वाले अधिकांश अतिमहत्वपूर्ण व्यक्तियो ने प्रायः इस प्लेटफार्म पर खड़े होकर उस क्षण को महसूस करने की कोशिश की है । वर्तमान भारतीय प्रधान मंत्री ने भी दक्षिण अफ्रीका के प्रवास मे इस स्टेशन का भ्रमण किया।  इस रेलवे स्टेशन का प्लेटफार्म नं0 1 तथा वो बेन्च सुरक्षित रखे गए हैं, जिस पर बैठकर गांधी ने रात बिताई थी । रेलवे स्टेशन अभी भी प्रयुक्त होता है और स्टेशन पर कुछ यात्री भी प्रतीक्षारत मिले । डरबन से जोहान्सबर्ग तक रेल से लगभग 12 घण्टे का रास्ता बताया गया। यह एक छोटा सा कस्बा है, जो तमाम अफ्रीकी कस्बों की तरह चैड़ी सड़कों और उनकी दोनो तरफ दुकानों से सजा हुआ है। इस कस्बे मे एक गांधी चैक भी है, जिस पर लाठी लिए गांधी की काले पत्थर की खूबसूरत प्रतिमा है।
हजारों साल पुराना वृक्ष-जोहान्सवर्ग से 400 कि0मी0 दूर लिम्पोपो प्रान्त मे बाओबाब वृक्ष के बारे मे बताया गया कि 10000 वर्ष पुराना वृक्ष है। कार्बन डेटिंग के अनुसार यह वृक्ष 1700 वर्ष पुराना पाया गया, इसकी उंचाई 22 मी0 एवं फैलाव कहीं-कहीं पर 47 मी0 है।  वृक्ष का तना इतना चैड़ा था कि उसके भीतर एक टेबुल रखी हुई थी और खाली जगह मे पांच-छ लोग खड़े हो सकते है। उसके तने को खोखला करके बनाए बार को देखकर आश्चर्यलगा लगा लेकिन दुख हुआ कि हमारे कौतुक पसन्दगी ने इस बुर्जुग बृक्ष को कितना घायल कर दिया है। इस बुर्जुग बृक्ष की शुरुआती तीन डालियां तीन दिशाओं मे जमीन की टेक लेकर उपर उठी हुई थीं, मानो यह महाबृक्ष अपने भारी शरीर को जमीन की टेक लगाकर खड़ा होने की कोशिश कर रहा है। वृक्ष आम के शानदार बागो के बीच घिरा हुआ था । पके सिन्दूरी आमो को देखकर खरीदनें का मन हुआ, देखभाल करने वाली अफ्रीकी महिला जिसे बोलचाल मे ममा कहते है से अनुरोध करने पर ममा ने मालिक से फोन पर बात करनी चाही लेकिन छुट्टी होने के कारण मालिक द्वारा फोन नही उठाया गया और ममा ने अपने स्तर से आम देने मे असमर्थता व्यक्त की गयी । दक्षिण अफ्रीका मे साप्ताहिक छुट्टी शनिवार और रविवार को होती है और इन दोनो दिनो मे प्रायः लोग अपने व्यावसायिक काम नही करके पार्टी आदि का आनन्द लेते हैं । यदि आप इन दो दिनो के बीच गम्भीर बीमार पड़ गए तो आपका दुर्भाग्य है, आपको बेहतर चिकित्सा सेवा शायद ही मिले । दक्षिण अफ्रीका को चिकित्सा और सार्वजनिक परिवहन के क्षेत्र मे काफी काम करने की जरुरत है।
क्रूगर नेशनल पार्क- क्रूगर नेशनल पार्क का क्षेत्रफल 19485 वर्ग कि0मी0 का अभयारण्य है। इसको अंग्रेज साम्राज्यवादियों द्वारा 1899 से 1926 के मध्य टोंगा जाति के मूल निवासियों को जबरन विस्थापित करके बनाया गया है। इसमे प्रवेश करने एवं निकलने के लिए 09 गेट बने हैं । हमलोगों ने पुण्डा मारिया गेट से प्रवेश करने और फेबियन गेट से बाहर निकलने की योजना बनाई थी, जिसकी दूरी लगभग 400 कि0मी0 है, इस प्रकार हम इस जंगल के दो तिहाई हिस्से लम्बाई को पार करने वाले थे । 
हम लिम्पोपो प्रान्त के बाओबाब वृक्ष से लगभग 2.30 बजे क्रूगर पार्क मे प्रवेश के लिए पुन्डा मारिया गेट। के लिए निकले । पुन्डा मारिया गेट तक पहुंचते पहुंचते अंधेरा हो गया क्योंकि जी0पी0एस0 की महिमा से हमारी गाड़ी कुछ मुख्य रास्तो से अलग रास्तो को पकड़ कर चली । इसका फायदा यह हुआ कि हम अफ्रीका के भीतरी हिस्सो का दर्शन कर पाए जो प्रायः पर्यटक निगाहों से ओझल होता है। रास्ते में अश्वेत समुदाय के लिए निर्माणाधीन और निर्मित हो चुकी कालोनियां दिखीं । प्रत्येक मकान के इर्दगिर्द शाक सब्जी उगाने के लिए पर्याप्त भूमि छोड़ी गयी थी और कालोनी के चारो तरफ तारों की बाड़ बनायी गयी थी । कालोनियां यद्यपि की निर्माणाधीन थी परन्तु बहुत ही साफ-सुथरी थी। दक्षिण अफ्रीका मे घूमते हुए आप पाएगें कि यहां पर ईटें भी पालीथिन मे लपेट कर ही रखी मिलेगी न कि खुली इधर-उधर बिखरी हुई ।
थोड़ा रास्तो के भटकाव के कारण और अपने ठहरनें के ठिकाने के सम्बन्ध मे हुए कन्फ्यूजन के कारण पुण्डा मारिया गेट तक पहुंचने मे रात हो गयी, इस सूनसान गेट तक पहुंचने मे पहली बार हमे बीच सड़क पर खड़ा एक गधा और कुछ दूरी पर खड़ी गाय मिली, जिससे टकराने से हम बाल बाल बचे। अन्धेरे मे गेट के सामने जो चैकीदार मिले उनके द्वारा बताया गया कि सुबह 5.00 बजे से अन्दर प्रवेश मिलेगा । रुकने के ठिकाने के बारे मे उनके द्वारा बताया गया कि लगभग 15 कि0मी0 दूरी पर कोपाकोपा गेस्ट हाउस मे रुका जा सकता है। हमें अन्दाजा था कि पुण्डा मारिया गेट के आसपास कुछ कस्बेनुमा जगह होगी लेकिन रात के अन्धेरे मे 15 कि0मी0 दूरी बहुत लम्बी लग रही थी, क्योंकि रात मे प्रायः मिलने वाले अफ्रीकी नशे मे होगें और अन्जान भिन्न नस्ल के लोगों के साथ तो लूटपाट होने की सम्भावना से यहां के गैर अफ्रीकी समुदाय के लोग काफी डरते हैं । डरने कारण लूटपाट नही, बल्कि लूट के साथ-साथ हत्या कर दिया जाना यहां के नशे मे चूर अपराधियों के लिए असामान्य नही होता है।
रात मे कोपा-कोपा गेस्ट हाउस पहुंचने पर वह गेस्ट हाउस भी जंगल का ही एक हिस्सा लग रहा था क्योंकि एक तो गेस्ट हाउस कई एकड़ मे बाग-बगीचों मे फैला था दूसरे बिजली मे कुछ समस्या होने के कारण कहींे-कहीं पर ही रोशनी दिख रही थी । रिसेप्सन पर खड़े अश्वेत सज्जन यद्यपि कुछ नशे मे थे लेकिन उनके द्वारा बहुत सहृदयता से कुछ सस्ती दर पर एक सूट उपलव्ध कराया गया । सूट मे हम कुछ व्यवस्थित हुए ही थे कि बिजली पूर्णतया चली गयी लेकिन रिसेप्सनिष्ट सज्जन ने, यद्यपि कि हमारा सूट मुख्य भवन से  दूरी पर था लेकिन बैटरी वाली लालटेन खुद लाकर दी गयी और असुविधा के लिए बार-बार क्षमा मांगी गयी । बिजली की आपूर्ति की समस्या रात 11 बजे तक ठीक हुई लेकिन हमलोग तबतक सो गए । 
अगली सुबह 7 बजे तक हम पासपोर्ट वगैरह चेक कराकर परमिट लेकर पुण्डा मारिया गेट से क्रूगर पार्क मे प्रवेश कर गए । पुण्डा मारिया गेट से फेबियन गेट की दूरी लगभग 400 कि0मी0 को अधिकतम 60 कि0मी0 प्रति घण्टे की गति से ही तय करना था, जो कि यहां के लिए असहज गति है। गति पर प्रतिबन्ध का कारण आगे चलते ही स्पष्ट होने लगा, सुबह बादलों से भरी थी और कहीं-कहीं पर बारिश भी हुई । पार्क के भीतर की सड़क भी डबल लेन की थी, सड़क पर कहीं-कहीं हाथियो के गोबर पड़े हुए थे जिससे लग रहा था कि उन्हांेने कुछ देर पहले रास्ता पार किया हो । कू्रगर पार्क का दर्शन बिग 5 से पूर्ण माना जाता है, बिग 5 मतलब शेर,चीता,हाथी, भैंसा, गैण्डा । यह आपके भाग्य पर है कि इन पांचो के दर्शन हो पाते हैं कि नही । जंगल मे घुसने के दसियों किलोमीटर पर हमे जिराफों का समूह दिखाई दिया, उसके बाद जेब्रा, हिरन की तमाम प्रजातियों के अलग-अलग झुण्ड और विशालकाय अफ्रीकी हाथियों के कई झुण्ड रास्ते मे मिलते चले गए। कई बार ये झुण्ड हमारे आने के कुछ पहले ही सड़क को पार कर दूसरी तरफ जंगल मे उतरे होते थे तो कई बार इन हमे गाड़ी खड़ी करके इन झुण्डों को सड़क पार करने का इन्तजार करना पड़ता था । एक बार हाथियों का झुण्ड सड़क पार करने के लिए लगभग किनारे पर था कि हमारी कार पहुंच गयी, झुण्ड मे हाथी का बच्चा भी था, हाथी अपने बच्चों के प्रति बहुत ही संवेदनशील होते हैं उस पर दुर्योग यह कि हमारे कार का रंग भी गाढ़ा लाल था, एक हथिनी चिघ्घाड़ते हुए काफी आक्रामक अंदाज मे आगे ब़ढ़ी गनीमत था कि हमारी कार कुछ आगे निकल चुकी थी लेकिन झुरझुरी के लिए काफी था ।
सबसे बड़ी उत्कन्ठा जंगल के राजा से मुलाकात की होती है । दोपहर की धूप कड़ी हो गयी थी और सड़क एक नदी के किनारे किनारे चल रही थी, कभी सड़क नदी के पास पहंुच जाती तो कभी नदी कुछ दूर हो जाती । दोपहर बीतने के कुछ बाद एक जगह सड़क के किनारे दो तीन कारे और पर्यटकों को घुमाने वाली गाड़िया खड़ी थी । पर्यटक खिड़कियों मे से बड़े-बड़े लेंसो वाले कैमरे आदि लगाकर शूट करने की कोशिश कर रहे थे । जहां पर लोगो ने कार और पर्यटको की गाड़ियां सड़क के किनारे खड़ी थी, वहां पर नदी सड़क से काफी नजदीक और गहराई मे थी । उचक-उचक कर देखने पर नदी के दूसरी तरफ घने वृक्षों की छाया मे एक शेर परिवार नदी की रेत पर लेटा मिला, घनी छाया मे करीब 5 शेर लेटे हुए थे लेकिन हम जहां पर खड़े थे वहां से एक झलक ही मिल पा रही थी । धीरे धीरे गाड़ियां जब आगे निकलीं तो हमे भी देखने का मौका मिला । शेरों का परिवार काफी गहराई मे सोया हुआ था तो मुझे लगा कि मैं सड़क पर निकल कर कुछ अच्छी जगह लेकर फोटो ले सकता हूं । वहां पर अन्य गाड़ियां नही थी इसलिए मै गेट खोलकर सड़क की पटरी की ढलान पर उगी झाड़ियों के पास पहुंचा ही था कि झुण्ड मे हलचल हो गयी । एक दो तो वापस नदी की दूसरी तरफ जाने लगे लेकिन एक महाशय को मेरा बर्ताव पसन्द नही आया और वे अपनी पूरी आक्रामकता से नदी की दूसरी तरफ खड़े हो गए, नदी की धारा इतनी पतली थी कि वो उनके एक छलांग के भी काबिल नही थी यानी दूसरी छलांग मे हम और वो आमने सामने होते । मुझको अपनी हठधर्मिता समझ मे आ गयी और भाग कर कार मे घुसकर दरवाजा बन्द करके हम नौ-दो ग्यारह हो लिए। कुछ देर मे समझ मे आया कि सम्भवतः कार से बाहर निकल कर खुले मे आ जाने के कारण दूसरी तरफ मुह करके काफी दूरी पर लेटे शेर परिवार को हमारी गंध मिल गयी थी इसीलिए पार्क मे खुले मे निकलना प्रतिबन्धित होता है परन्तु हमने सुनसान होने पर नियम की परवाह न करने की अपनी आदत के अनुसार ब्यवहार किया था, जिसमे खतरा हो सकता था ।
इसी तरह दूर-दराज एक पेड़ पर बैठे दो चीतों के भी दर्शन हो गए । पार्क की मुख्य सड़क से जुड़ी बहुत सड़के अर्द्ध चन्द्राकार पथ मे बनाई गयी हैं जो कई किलोमीटर लम्बी होती है और इनको लूप कहते हैं । लूप मे जाकर आप जंगल की गहराई का दृश्यावलोकन कर सकते हैं । करीब 70-80 किलोमीटर के अन्तराल पर पार्क मे एक ही कैम्पस मे पेट्रौल पम्प मनोरम रेस्टोरेंट वगैरह रहते हैं जहां पर आप रिफ्रेस होकर अपनी यात्रा जारी रख सकते हैं । हमको अपनी मंजिल पूरी करते करते 5 बज गए और बिग 5 मे से एक गेंडा महाराज के दर्शन नही हो सके।
कुल मिलाकर क्रूगर पार्क हमे उस दुनिया से मुखातिब करता है, जिसको हमने सदियों पहले अपने आधुनिक विकास की जरुरतों के मद्देनजर रौंद डाला है।
क्रमशः

बुधवार, 5 दिसंबर 2018

मेरी दक्षिण अफ्रीका यात्रा, भाग-4



जोहान्सबर्ग से डरबन- जोहान्सबर्ग से बाई रोड कार से हम डरबन पहुंचे। जोहान्सबर्ग उंचाई पर बसा दक्षिण अफ्रीका का महानगर है और डरबन समुद्रतट पर। जोहान्सबर्ग से नीचे उतर कर डरबन जाते हुए वैनरीनेंस पास से गुजरते हुए प्रकृति के शानदार नजारे दिखाई देते हैं। जब जोहान्सवर्ग से लगभग 290 कि0मी0 पर दक्षिण अफ्रीका के प्रान्त क्वाजा नटाल मे प्रवेश करते है तब यह पास हैरीस्मिथ से शुरु होकर वेनरीनेंस तक पर्वतों के बीच से गुजरते हुए अपने अद््भुत नजारों से आपको सम्मोहित करता रहता है। हमंे जोहान्सबर्ग की स्थानीय निवासिनी श्रीमती शिवा के सौजन्य से उनकी यहूदी सह अध्यापिका का फ्लैट मिल गया डरबन मे रहने के लिए। तड़कती बिजलियों और बारिश की फुहारों के बीच हम रात्रि 8.00 बजे जी0पी0एस0 महोदय के सहयोग से बहुमंजलीय आवास मे पहुंचे । बुुर्जुग श्वेत केयर टेकर महोदय ने हमारा स्वागत किया और फ्लैट के सम्बन्ध मे सारी जानकारी विस्तार से देते हुए हमारी सुखद यात्रा की कामना किया। बुर्जुग केयरटेकर करीब 80 साल के रहे होगें लेकिन कमर झुकी होने के बावजूद उनकी सक्रियता से हम आश्चर्यचकित थे। फ्लैट बेहद साफ सुथरा था और अपने बुर्जुग मालिकान की स्मृतियों को अपनी दीवालों पर संजोए हुए था, इसके मालिक की बनाई पेंण्टिंग्स दीवालोे पर टंगी हुई नवागंतुकों को निहार रहीं थीं। 7वीं मजिल की बड़ी-बड़ी बालकनियों से रोशनियों मे चमकता डरबन महानगर और उसके किनारे फैले हिन्द महासागर के तट पर झिलमिलाती रोशनियां हमे मंत्रमुग्ध कर रहीं थी। जैसा कि इस देश का रिवाज है उसी का अनुसरण करते हुए हम जल्दी सो गए और सुबह जल्दी ही उठकर समुद्रतट के किनारे पहुंच गए। 
सामनें नीला हिन्द महासागर था, इस अपरिचित महाद्वीप की भूमि पर खड़े होकर अपने परिचित महासागर को निहारने का सुख अद्भुत था, वैसे ही जैसे बहुत दिनों बाद अपने गांव जाने वाली सड़क दिख जाने पर लगता है या कहीं दूर से लौटने पर अपने घर की खिड़की से आ रही रोशनी को देखकर लगता है। इतनी सुबह पहुंचने पर भी हमे लगा कि हमे कुुछ देर हो गयी है। तट के किनारे निवासियोें की जलक्रीड़ा देखकर धीरे-धीरे पानी से दूर रहने की मेरी हिचक खत्म हुई। मैं उत्तर भारत में जनवरी की कड़ाकेदार ठंड को झेलकर यहां के खुशगवार मौसम मे पहुंचा था लेकिन शरीर के भीतर घुसी ठंड अभी भी पानी से डरा रही थी। 
काफी लम्बे, साफ-सुथरे समुद्रतट के किनारे खूबसूरत टाइल्स से बने फुटपाथ पर उस दिन मैराथन दौड़ थी, थोड़ी देर मे देखता हूं कि हजारो श्वेत, अश्वेत, एशियाई, युवा, बुर्जुग, बच्चे, पुरुष, स्त्री, विकलांग लोगों को हुजूम दौड़ रहा है और केवल जूतो की आवाज ही सुनाई दे रही है। समुद्रतट के किनारे रंगविरंगे टी-शर्ट और टोपियों को दौड़ते देखकर लग रहा था कि जैसे हजारो तितलियों का समूह एक अनुशासनबद्ध उड़ान भर रहा है। किनारे समुद्र की हिलोरों के आमंत्रण को हम देर तक अवाएड नही कर पाए और पानी मे कूद पड़े। पानी मे घुसते ही सारी हिचक वैसे ही काफूर हो गयी जैसे किसी शिशु का किसी अनजान वत्सला स्त्री की गोद मे पहुंचने पर दूर होती है, अब हमे समुद्र अपनी गोद मे उछाल रहा था और हमारी शिशुवत किलकारियां गूंज रही थी।
डरबन- जोहान्सबर्ग से लगभग 500 कि0मी0 दूरी पर हिन्द महासागर के किनारे बसा दक्षिण अफ्रीका का एक बेहद खूबसूरत शहर है। भारतीय ब्यापारी, मजदूर इसी किनारे उतर कर सदियों से इस महाद्वीप मे समाते चले गए। इसीलिए यहां पर भारतवंशी अच्छी संख्या मे सड़को पर दिखते हैं। कहीं-कहीं पर तो इनकी बस्तियां लघु भारत होने का भ्रम देती हैं। डरबन और भारत का रिश्ता सदियो पुराना रहा है, इसकी खाड़ी मे क्रिसमस के समय 1497 मे पहंुचे थे वास्को डि गामा। महान जूलू राजा शाका और हेनरी के समझौते मे इसको व्यापार केन्द्र के रुप मे विकसित किया गया और केप के गर्वनर सर बेंजामिन डरबन के नाम पर इस बस्ती का नाम डरबन रखा गया। शुरु मे इसको पोर्ट नाटाल नाम दिया गया था। डरबन मे 16 नवम्बर 1860 को पहले 342 गिरमिटिया भारतीय उतरे थे फिर 26 नवम्बर, 1860 को गिरमिटिया मजदूरों का दूसरा जत्था इस खाड़ी मे उतरा था। 1860 से 1911 तक लगभग 15184 भारतीय गन्ने की खेती के लिए डरबन मे लाए गए थे। डरबन मे भारतीयो ने व्यापार मे अश्वेतों से सहज रिश्ते बना कर शीघ्र ही श्वेत व्यापारियों के माथे पर बल डाल दिए और यही चलकर आगे भारतीयों के आगमन पर प्रतिबंध का कारण बना। अधिकांश भारतीय चेस्टवर्थ मे रहते हैं। भारतीय बच्चों के लिए रोमन कैथोलिक चर्च ने 1867 मे पहला भारतीय स्कूल खोला और 1909 तक 35 भारतीय स्कूल खोले गए थे। 
डरबन के समुद्रतट- हिन्द महासागर के किनारे पर बसा यह महानगर अपने शानदार समुद्र तटों पर इतराता रहता है क्योंकि इन समुद्र तटों के किनारे इसके निवासी लगातार खेलते रहते हैं। इस महानगर के किनारे  दूर-दूर तक छोटे-छोटे तटों पर सुन्दर स्नानागारों मे प्रकृति का आनन्द मे डूबे निवासियों को देखकर आप विभोर हो उठेगें। मुख्य नगर के किनारे के समुद्रतटों के अतिरिक्त नगर के बाहरी हिस्सों मे स्थित समुद्रतटों के समानान्तर तरणताल भी बने हुए हैं और नगरवासी इच्छानुसार समुद्रतट और तरणतालों का देर रात तक आनन्द लेते रहते हैं। 
डरबन के म्यूजियम- डरबन मे डरबन लोकल हिस्ट्री म्यूजियम, ओल्ड हाउस म्यूजियम, ओल्ड कोर्ट हाउस म्यूजियम, पोर्ट नेटाल मेरीटाइम म्यूजियम हमने देखा। इन म्यूजियमों मे दक्षिण अफ्रीका का उपनिवेशकालीन इतिहास दर्ज है। ओल्ड हाउस म्यूजियम नेटाल प्रान्त के प्रथम उपनिवेशकालीन प्रधानमंत्री के घर को यथावत बनाकर रखा गया है। जब हम पहंुचे तो म्यूजियम की मरम्मत शुरु होने के कारण उसको बन्द करके तिरपाल से ढका जा चुका था। सुदूर भारत से आने और फिर कभी देखपाने का अवसर न मिल पाने की सम्भावना जब हमने दर्शायी तो आयोजकों ने हमे 5 मिनट के लिए अन्दर प्रवेश करके म्यूजियम देखने की अनुमति खुशी-खुशी दे दी गयी। इन म्यूजियमों के माध्यम से आप न केवल दक्षिण अफ्रीका का अतीत जान सकते है वरन इन म्यूजियमों मे जीवन के विकास क्रम को समझाने, मानव जाति के विकास क्रम को भी जान सकते हैं।


जेन जी के द्वन्द

सुबह उठकर चाय बनाने के लिए फ्रिज से दूध निकालते समय देखा कि दूध पर मलाई की एक मोटी परत जमी है, जिसको निकालकर अलग एक बरतन में रखा जिसमें लगात...