रविवार, 25 अक्टूबर 2015

-खुशी-


  अलसाई दुपहरिया में कचहरी की भीड़-भाड़ थोड़ी कम हो गयी थी। खेल-मदारी वाले, दांत उखाड़ने वाले, खटमल-चूहा मारने वाले, किस्मत बांचने वाले भी हट बढ़ गए थे । चैकी पर लाई-चना-गुड़ आते ही लोग चबाना शुरु किए । मनसायन के लिए रोज की तरह एक रिटायर दीवान और दो-तीन अभ्यस्त मुकदमेबाज काम नही रहने पर भी दुपहरिया काट रहे थे। तभी एक लौंडा वकील मुस्कराते हुए बोला.....दीवान जी कुछ सुनाइये, आपके मुंह से बड़ा अच्छा लगता है। चैकी पर बैठे मुहर्रिर और मुवक्किलों ने भी दीवान को उकसाया। ठोंगा की तरफ हांथ बढ़ाते हुए दीवान जी मुस्कराए....हंसमुख स्वभाव के दीवान अपने सिपाही जीवन के किस्से इतने मनोरंजक ढंग सुनाते कि सुनने वालों का अच्छा-खासा टाइमपास हो जाता था, दीवान के लिए वर्दी पहन कर छोटी-मोटी छिनैती, बदजुबानी कभी अपराध नही लगा, उनके लिए यह सदियों की सबल-निर्बल के आपसी व्यवहार की परम्परा का हिस्सा मात्र था, जिसके वे आस्थावान वाहक थे ,उनके चरित्र का यही इकहरापन उनकी लोकप्रियता का कारण था ।
      दीवान शुरु हो गए......पंन्द्रह-बीस साल पहले की बात है, मंदिर-मस्जिद का बड़ा टेंशन चल रहा था । जल्दी छुट्टी मिलती नही थी, थाने से  । तनखाह, उपर झापर से जो कुछ बीने बटोरे थे, एक दिन पहले ही पड़ोसी गांव के एक परिचित सिपाही से  घर भेजवा दिए थे, तबतक  अगले दिन बाऊ के बीमार होने के बहाने पर छुट्टी मिल गयी । भइया तुरन्ते बस पकड़े तिजहरियां तक कैण्ट, दो घण्टा मे सिपाह फिर आगे की जीप पकड़ कर कस्बे तक पहुंचे तो कौनांे साधन नही दिखाई दिया। पैदले चल दिए कि घंटा भर मे तो पहुंचे जाएगें । बच्चों के लिए मिठाई लेने के लिए जेब मे हांथ डाले तो मुश्किल से दस-बारह रुपिया ही था। बजार मे वर्दी के जोर से मिठाई लेने मे कुछ संकोच लग रहा था । पैदल आगे बढ़े बाजार पीछे छूट चुका था, सड़क पर बनी पुलिया पर बैठकर सोचने लगे कि का करे  ।
   अंधियार होने लगा था, तब्बे एक ऊंट पर लकड़ी लादे ऊंटहारा चला आ रहा था। दिमाग काम कर गया । पुलिया से थोड़ी दूर था, तभी मैने ललकारा, कहां आ रहे हो बे । ऊंटहारा चिहुंका गांव जा रहे हैं साहेब, वो वर्दी देखकर डर गया अउर मै समझ गया कि काम बन गया । साले..........एक तो 10 मन का ऊंट और उसपर समुच्चा पेंड़ लादकर मचक-मचक कर चले आ रहे हो, देखते नही पुलिया कमजोर है । दूसरे रास्ते से जाओ । ऊंटहरवा समझ गया कि वो परेशानी मे पड़ जाएगा, पुलिया के अलावा दूर-दूर तक उस पार जाने का रास्ता नही था । पच्चीसे रुपया था उसके जेब मे और उस जमाने मे इहे बहुत था बाल बच्चों की  मिठाई के लिए ।

मंगलवार, 13 अक्टूबर 2015

-बीज गणित-

पच्चीस सालोें की,
लम्बी मेज के उसपार,
हिचकिचाता खड़ा था।
सीधे चलने की जिद मे,
वो अब भी अड़ा था ।
उसके माथे पर झुर्रियंों की मुस्कान थी,
अपने मुखौटे पर मेन्स पार्लर की दुकान थी।
कालेज में हमने साथ साथ पढ़ा था,
पर जिन्दगी के बीजगणित ने,
अलग-अलग गढ़ा था ।
इन्कमटैक्स मेरे लिए बवालेजान था,
उस पर मुफलिसी का पेंशन ही एहसान था।
दुनियादारी की समझ से,
मेरा पेट निकल आया था ।
सीधे चलने की जिद मे,
वो हल्का सा झुक आया था ।

-पिन्टुआ-


पिन्टुआ तो बस भौकाल बनाने के लिए चुनाव लड़ रहा था, उसको जीविको पार्जन के लिए खुद काम करने की जरुरत नही थी । दादा ने परदेश मे मेहनत से धंधा चमकाया और अपने बाल बच्चों को पढ़ाया-लिखाया, बाप ने सरकारी नौकरी मे अथाह सम्पदा कूटी, एक चचा ने चिट-फंड और चार सौ बीसी से काफी माल बनाया था। अब पिन्टुआ को उस सम्पदा से जवार मे प्रतिष्ठा खरीदनी थी, गांव मे तो डंका बज ही रहा था । केतना मिनहत करत बा बचवा पिन्टुआ के घर की बुर्जुग महिलाएं तरस खाती, उनको पिन्टुआ कभी काम करते नही दिखा था, अब खलिहरों और लम्पटों की भीड़-भाड़ मे चैबीसों घण्टे की व्यस्तता से उनका दुलार उमड़ पड़ता है, पिन्टुआ पर । वो मना रहीं थीं, जल्दी वोट पड़ जात दिन रात के चाय-पान, आवा-जाही से मुक्ति मिलत । उनको लगता इतनी भाग दौड़, इतनी सिफारिस, इतनी मरनी- करनी,शादी-बियाह का नेवता करने के बाद पिन्टुआ को चुनाव जीतना ही चाहिए । चुनाव जीतकर पिन्टुआ का करेगा, उनको पता नही था, लेकिन अगर कोई टोला महल्ला मे पिन्टुआ की जीत पर शंका जताता तो वो उसका मुंह नोचने पर उतारु हो जातीं।
   लेकिन........अफसोस पिन्टुआ हार गया, महीनों सियापा रहा एतना सियापा जेतना छोटकी बिटियवा के ससुराल मे जला कर मार डालने पर नहीं हुआ था । असल मे पट्टीदरवा सब खेल करके दक्खिन टोला का ओट बिगाड़ दिए । उ सब पिन्टुआ के भौकाल से दुखी  थे, इसका पता पिन्टुआ को चुनाव बाद चला ।

-पंचायत चुनाव-

शहराते देहात की दीवारों पर उगे पोस्टर दशहरा, दीवाली की तरह चुनावी त्योहार के आने की खबर दे रहे हैं । जी हां पंचायत के चुनाव आ गए हैं उत्तम प्रदेश में । गांवों की दीवाल  करबद्ध सुर्दशन युवकों और दुल्हनों की तस्वीरों की दीवाली मना रही है। पोस्टर देखकर चचा चिंहुकते है ‘‘अरे फलनवो भी खड़ा हो गयल, बाह ‘‘।
बड़ी-बड़ी गाडि़यों मे गरदन मे सोने की सीकड़ लटकाए, धूपी चश्मा पहने उम्मीदवार और उनके पीछे लटकन बने गांवो के खलिहर किशोर, बेरोजगार युवा निचाट दुपहरिया मे एकाएक बंसखट पर बैठे किसी अधेड़ के दरवाजे पर कूद पड़ते हैं, पालागी चचा, तोहार आर्शिवाद चांही । अरे बचवा इधर सब तोहरे इलाका हौ, चिन्ता क कौनो बात नाही हौ । अधेड़ चचा भी शातिर है अलसायी दुपहरिया मे उनको किसी तरह टरकाना चाहता है, नेताजी और उनके लटकन इधर-उधर देख रहे हैं दुआर से कोई और रास्ता फूटता हो तो आगे हांथ-गोड़ जोड़ा जाय । तबतक कारखास चचा को नेता जी के बारे मे बता देता है, किस गांव के है, समाज मे कितना काम करते है, कौन-कौन बिरादरी का वोट पक्का है और घाघ चचा भी आश्वस्त करते हैं कि उनको चिन्ता करने की जरुरत  नही है, इधर के मुहल्ले का वोट एक मुश्त नेताजी को ही जा रहा है। चचा चाह रहे हैं तबतक घर मे से आवाज आती है, बिजली आ गइल बा..........जा जल्दी से ट्यूबवेल चलवा....वा, चचा का धान झुरा रहा है  । चचा गमछा कंधे पर रखते खड़े होते है और नेता जी समझ जाते है कि किसी और दरवाजे की तरफ बढ़ा जाय । क्योंकि अब छेक कर बतियाने पर चचवा खेती-किसानी- बिजली-पानी की बात बतियाने लगेगा, जिसका उसके पास कोई जबाब नही है। 

- गोश्त -


गोश्त दिखा उनको,
सपनों मे, कल्पनाओं मे, तस्वीरों में,
देवता ने उंगली दिखाई,
शिकार की तरफ,
वो टूट पड़े,
इंसानी जिस्म पर,
वो शाकाहारी थे,
वो मांसाहारी थे,
नहीं, 
वो सिर्फ आदमखोर थे,
जिनके देवता की प्यास,
अतृप्त है अबतक, 
इंसानी खून से।

जेन जी के द्वन्द

सुबह उठकर चाय बनाने के लिए फ्रिज से दूध निकालते समय देखा कि दूध पर मलाई की एक मोटी परत जमी है, जिसको निकालकर अलग एक बरतन में रखा जिसमें लगात...