रविवार, 22 दिसंबर 2013

   गांव में इस समय सिवान की हरियाली में  किसान के प्रतिस्पर्धियों ( नीलगायों, छुट्टा जानवरों ) के पीछे दौड़ लगाते चचा को  , रात भर खेत में  गेंहू की सिंचाई करके लौटे भइया को दुआर पर कंबल ओढ़े चाय सुड़कते देख कर किसान दिवस की बधाई देने जा रहा था कि प्रधान जी को मनरेगा का काम शुरू होने की हांक लगाते सुनकर ठिठक गया । पता चला फिर उसी चकरोड पर मिटटी फेंकी जायेगी जिसकी   मिट्टी पिछली बारिश में बह गई थी । प्रधान जी को मनरेगा में काम देने की मजबूरी है लेकिन काम की उपयोगिता नही है। सरकार ने मनरेगा का बजट २ लाख करोड़ रखा  है , इस योजना ने ग्रामीण मजदूरों की मजदूरी सम्मानजनक ढंग से बढ़ाई है लेकिन सरकार तो बस 100 दिन की मजदूरी देकर अपना पल्ला झाड़ लेती है बाकि दिवसों में सरकार की दर पर मजदूरी किसान दे रहे है।  जरा सोचिये सरकार इस योजना का बहुलांश औचित्यहीन  कार्यो पर खर्च कर रही है। अगर मनरेगा में जरा सा संशोधन करके इसको कृषि उत्पादन से जोड़ दिया जाय तो इससे किसानों को और ग्रामीण मजदूरों दोनों को राहत मिल सकती है बस इतना करना होगा कि किसान को इस योजना के अंतर्गत मजदूर उपलब्ध कराये जाय और किसान मजदूरी का आधा अंश ग्राम पंचायत के खाते में डाल दें। जो लोग मनरेगा की जमीनी हकीकत जानते हैं उनको भली भांति पता है कि काम देने कि मजबूरी में ग्राम पंचायते एक कार्य को कई बार करा रही हैं जिसके फलस्वरूप इसका बड़ा हिस्सा अनुत्पादक कार्यों पर खर्च हो रहा है दूसरी तरफ किसान बढ़ी हुई लागत के कारण आर्थिक दुस्वारियां झेल रहें है।  इसलिए इस योजना को अगर किसान से जोड़ दिया जाय तो किसान को भी कुछ राहत मिल जायेगी और इसका बहुत अच्छा प्रभाव  कृषि उत्पादन पर भी पड़ेगा  जिससे  सरकार का भी मजदूरी का कुछ अंश बचेगा।किसान दिवस की शुभकामना के साथ  नक्कारखाने में अपनी तूती अदम साहब को याद करके बंद कर रहा हू -
 वो जिसके हाथ में छाले हैं पैरों में बिवाई है 
उसी के दम से रौनक आपके बंगले में आई है 

इधर एक दिन की आमदनी का औसत है चवन्नी का 
उधर लाखों में गांधी जी के चेलों की कमाई है 

कोई भी सिरफिरा धमका के जब चाहे जिना कर ले 
हमारा मुल्क इस माने में बुधुआ की लुगाई है 

रोटी कितनी महँगी है ये वो औरत बताएगी 
जिसने जिस्म गिरवी रख के ये क़ीमत चुकाई है

मंगलवार, 17 दिसंबर 2013

इस समय कि राजनैतिक आपाधापी में विक्टर ह्यूगो के लेस मिजरेबल का छोटा सा अंश उद्धृत कर रहा हू।  यह महान लेखक 1840 के आसपास फ़्रांस के राजनैतिक ऊथल पुथल कि कितनी सटीक ब्याख्या कर रहा है, और समय कि धूल ने आजतक इसकी  प्रासंगिकता की चमक को जरा भी धुंधला नहीं किया  है।          
------ईश्वर अपनी इक्छा घटनाओं से व्यक्त करता है, रहष्यमय भाषा में लिखा एक अश्पस्पट पाठ। लोग उसका तत्काल अनुवाद करने लग जाते हैं। गलत शासन, पूर्व भ्रांतियों से भरपूर बहुत थोड़े लोग दैवी भाषा समझ पाते हैं। सबसे दूरदर्शी, सबसे गहरे लोग, धीरे धीरे समझ पाते हैं और जबतक उनका पाठ तैयार हो जरूरत ख़त्म हो चुकी होती है।  बीसों अनुवाद चौराहे पर खड़े हैं। हर से एक पार्टी जन्मती है ---जो अपने को ही मठ समझती है, हर गुट समझता है कि वही एकमात्र प्रकाशवान है। --------

सोमवार, 9 दिसंबर 2013

नपुंसक दर नपुंसक पीढ़िया है ,
और क्या है हम ,
की जब चाहे बना लो सीढिया है ,
और क्या है हम ,
हमारी वेदना से जन्म लेते है ,
कई नारे ,
जिन्हें रटकर बने मिट्ठू मियां है ,
और क्या है हम ।
पिछले वर्ष के अंत में इसी कविता को उद्धृत करते हुए मै काफी निराश था।  आज निराश नहीं हू लेकिन  बहुत से अम्बेडकरवादी मित्रों , मार्क्सवादी मित्रों की तरह मै भी आशंकित अवश्य हू कि विभिन्न  ज्वलंत मुद्दों पर अपनी राजनैतिक लाइन स्पष्ट किये बिना " आप " कहां तक जा पायेगा। दरअसल दुनिया के जिस खित्ते में हम रहते है उसके आसपास एकाध को छोड़कर बाकी जगहो पर बर्बर सत्तातंत्र है उनको आश्चर्य हो रहा होगा कि कैसे दिल्ली की सुल्तान सहजता से एक आम आदमी की जीत को स्वीकार करके पद त्याग रही है, कैसे जनता एक आम आदमी को स्वीकार कर ले रही है जिसके पास न अथाह पूंजी है न लुटेरों का गिरोह।
       जिनको जनतंत्र में यकीन है उनको दिल्ली के परिवर्तन का स्वागत करना चाहिए और जनतंत्र को सैल्यूट करना चाहिए, लेकिन इस जनतंत्र पर सवार होकर दिल्ली की बादशाहत के लिए एक मध्युगीन योद्धा के काफिले की धमक भी सुनाई दे रही है,उसका क्या होगा ?
              इस सवाल को भी जनतंत्र के उसूलों से ही हल करना पड़ेगा।

गुरुवार, 5 दिसंबर 2013

गेंहू

  यह तो नही कहूंगा कि उस दौर में होश सम्भाला था, जब गेंहू " खास " हुआ करता   था, लेकिन  जब गेंहू   खास हुआ करता  था, उस दौर के लोगो  की गोंद  में पला और गेंहू के "आम " होने की कहानियों को सुनकर बड़ा हुआ हू । मेरे इलाके के भूगोल में सिंचाई का पानी हमेशा से दुर्लभ रहा है , चाहे वो ढेंकुल या रहट का जमाना रहा हो या आज के ट्यूबवेल का  जमाना रहा  हो।  गेंहू को जौ के मुकाबले  पानी जादा  पसन्द है । एक-दो ट्यूबवेल जरुर सरकार ने लगवा दिए थे लेकिन ढेकुल,रहट ,दोन  आदि ही गेंहू पैदा करने के लिए सिंचाई का मुख्य श्रोत था ।  सिंचाई के अभाव में सूखती  गेंहू की  फसल  के मोह में कितनी बार लाठियां चली और रिश्ते बने बिगड़े।  जिनके पास सिंचाई का साधन हो गया उनकी ठाकुर सुहाती करने वालों की दिनचर्या का बड़ा हिस्सा इसी में बीतता था । 
  आजादी के बिहान से  गेंहू का प्रताप बढ़ना शुरू हुआ और धीरे - धीरे   जौ के दिन पूरे हुए। तब मेहमानों के आने पर बच्चों में खुशियाँ तैर जाती थी कि" आज गेंहू के आटे से बनी रोटी या पूड़ी मिलेगी "। सरकारी लोंगो की सिफारिश पर गेंहू उगाने का प्रयास प्रथम पंचवर्षीय योजना से ही  शुरू हुआ।  किसानों के  किसी भी नई चीज के प्रति संदेह के सदियों पुराने रोग ने इस फसल के प्रचलित  होने में कुछ समय जरुर लिया लेकिन गेंहू से बनी  रोटी और  अन्य ब्यंजनों  ने शीघ्र ही सबको अपना मुरीद बना लिया। 
  गेंहू किसान की बहुत कठिन परीक्षा लेता रहा है । जब शहरी समाज आराम से रजाई में सोता है तो बिजली विभाग की मेहरबानी से  किसान गेंहू की प्यास बुझाने के लिए  दिसम्बर, जनवरी के जाड़े की ठिठुरती रातों में खेत के मेड़ पर खड़े रहते है कि कही पानी मेड़ तोड़कर कही और न निकल जाय, क्योंकि पानी तो अपने स्वभाव से लाचार होता है उसको क्या मतलब कि कोई उसकी अगवानी में खड़े खड़े ठिठुर रहा है, उसको जब जिधर मौका मिलेगा बह निकलेगा। जब ये फसल पक कर तैयार होती है तब चिलचिलाती धूप में उसकी कटाई और दंवाई का अनुभव जिनको नही है वो इस कार्य की कठिनाई को समझ ही नहीं सकता। पकी फसल से दाना निकालने की तकनीक के विकास ने इसके कठोर परिश्रम को कम कर दिया है नहीं तो लगभग पूरी गर्मी और बरसात की पहली फुहारों तक किसान भूसा और दाना में ही उलझे रहते थे। वस्तुतः गेंहू जेठ की दोपहरी में किसान के बदन पर चुहचुहाता पसीना है । गेंहू किसान की बहुत कठोर परीक्षा लेता है तब कही जाकर उसके ब्यंजनों की  खुशबू से हमारी रसोइ महकती है ।
  

जेन जी के द्वन्द

सुबह उठकर चाय बनाने के लिए फ्रिज से दूध निकालते समय देखा कि दूध पर मलाई की एक मोटी परत जमी है, जिसको निकालकर अलग एक बरतन में रखा जिसमें लगात...