१२ नवम्बर की शाम को प्रोफ़ेसर लालबहादुर वर्मा से आदमी के बायोलॉजिकल मैन से कल्चरल मैन के रूप में विकसित होने की अवधारणा को सुना । आज सुबह सोच रहा था कि कल्चरल मैन सम्भवतः प्रकृत का बाई प्रोडक्ट है और ये बाई प्रोडक्ट इस स्थिित में आ रहा है की प्रकृत को अपना प्रोडक्ट बना ले । यह मनुष्य के लिए समग्रता में शुभ होगा या अशुभ होगा यह तो भविष्य बतायेगा लेकिन शुभ की कामना ।
गुरुवार, 28 नवंबर 2013
-चश्मा-
लोरियों नें सपने पिरोना बन्द किया,
तो दादी ने डराना शुरू किया ,
चुड़ैलों से,प्रेतों से, विधर्मियों से........
रुआँसी माँ ,
मेरी शरारतों को ,
निम्नजातीय गुण होनें का,
उलाहना देने लगी ,
चाचियों ने ,
पड़ोसियों द्वारा पुरखों की जमीन,
हड़प लेने की कहानी सुनाई ,
दादा के पास स्वधर्म श्रेस्ठता का बखान था,
पिता के पास अन्य जातियों की बुराइयों का विश्वकोष,
चाचा से जाना एटम बम के बिना,
कितने कमजोर थे हम,
विद्यालय ने उपनाम से,
मेरी योग्यता का मूल्यांकन किया,
और इस तरह से बना,
दुनिया को देखने का मेरा चश्मा ।
मेरा प्यार अपने घर, जाति तथा धर्म की,
चहारदीवारी में ही अट जाता है,
शेष के लिए बस अपनी जरूरत भर,
बट जाता है ।
कमजोर विजातीय को ,
अपनी श्रेस्ठता के डंक से तिलमिला देता हू,
और कभी किसी अकेले को ,
चलती ट्रेन में फेकने का मजा लेता हू ।
लेकिन ……
ऐसा भी हो सकता था ,
दादी बताती,
कैसे सुनसान रास्ते पर दादा को,
रहजनों से एक विधर्मी ने बचाया था।
माँ बताती मेरे जन्मोपरांत,
पड़ोसियों ने महीनों तक,
अपनी गाय का दूध पिलाया था।
दादा बताते,
हम श्रेस्ठ हैं लेकिन सर्वश्रेस्ठ नहीं।
पिता के पास,
अन्य जातियों की योग्यता का ज्ञान होता,
और चाचा बताते कि एटम बम से जरूरी ,
बिजली का वो तार है,
जो वर्षो से खम्भे पर नही लगा है।
तब मेरे चश्मे का नंबर दूसरा होता ,
तब शायद मानवता के आंसुओ का ,
खारापन कुछ कम होता।
दरअसल बाग में,
फूल भी थे और कांटे भी ,
मगर मालियों ने,
मेरे जेहन को कांटो से,
ज्यादा पिरोया था।
चलती ट्रेन में फेकने का मजा लेता हू ।
लेकिन ……
ऐसा भी हो सकता था ,
दादी बताती,
कैसे सुनसान रास्ते पर दादा को,
रहजनों से एक विधर्मी ने बचाया था।
माँ बताती मेरे जन्मोपरांत,
पड़ोसियों ने महीनों तक,
अपनी गाय का दूध पिलाया था।
दादा बताते,
हम श्रेस्ठ हैं लेकिन सर्वश्रेस्ठ नहीं।
पिता के पास,
अन्य जातियों की योग्यता का ज्ञान होता,
और चाचा बताते कि एटम बम से जरूरी ,
बिजली का वो तार है,
जो वर्षो से खम्भे पर नही लगा है।
तब मेरे चश्मे का नंबर दूसरा होता ,
तब शायद मानवता के आंसुओ का ,
खारापन कुछ कम होता।
दरअसल बाग में,
फूल भी थे और कांटे भी ,
मगर मालियों ने,
मेरे जेहन को कांटो से,
ज्यादा पिरोया था।
सोमवार, 25 नवंबर 2013
कोरौत घाट और पिसौर घाट पर बन रहे पुल तमाम राजनैतिक आग्रहों और दुराग्रहों के बीच दशकों से झूल रहें है । हमारे क्षेत्र से वरुणा नदी पार करके वाराणसी शहर से जौनपुर या लखनऊ जाने वाले रास्तों पर पहुचना या वाया शिवपुर कचहरी जाना सदैव दुष्कर रहा है । मामाजी स्व ० मारकंडे सिंह ( bhu छात्रसंघ के पूर्व अध्यक्ष ) ने अस्सी के दशक में कई मीटिंगे करके इस मुद्दे को ज्वलंत बनाने का प्रयास किया था । उनके तब के साथियों में से अब कुछ बड़े नेता हो गये होंगे, लेकिन पुल अभी भी विक्रम का बैताल ही बना हुआ है । जो सत्ता में नही रहता है उसको हमारे क्षेत्र के इस पुल की याद आ जाती है । मित्र अनिल सिंह और कुछ साथियों ने भी पिछले वर्षों अख़बार के माध्यम से इन पुलों को पूरा करने के लिय़े जनजागरण का बहुत प्रयास किया, जनता तो जगी लेकिन ब्यवस्था अपने हुकमरानो के नफे नुकसान का आंकलन करके सोती ही रही । इससे जुड़ी एक घटना साझा करना चाहता हू ।
हमारे गांव के कल्लू भइया बसनी सरकारी हास्पिटल में नौकरी करने रोज कोरौत घाट से वरुणा नदी पार करके जाते थे । इमरजेंसी का समय था, नसबंदी का कैम्प अक्सर हास्पिटल में लगा करता था और घर लौटते समय अक्सर रात हो जाती थी । एक बार जाड़े में घाट पर पहुचते पहुचते काफी देर हो गई और नाव वाला नहीं था, काफी आवाज लगाई लेकिन नदी उस पार जिधर नाव बंधी थी वहा से कोई आवाज नही आई । अब विकल्प था कि २० किमी का चक्कर लगा कर कैंट होकर गांव आये या थोड़ी हिम्मत करके नदी पार करके 10 मिनट में घर पहुंचे । दिन भर का थका हारा शरीर मन को दूसरे विकल्प के लिये तैयार किया । बदन के कपड़े उतार कर साईकिल के हैंडिल में बांधा, साईकिल को कंधे पर लटकाया और दोनों जूते हाथ में लेकर नदी के किनारें पानी में दूसरा कदम डाला ही था कि गड़ाप से पोरसा भर नीचे चले गये । साईकिल कही छटक गई और जूते भी हाथों में नहीं थे । अब जान बचाने का संघर्ष था लेकिन सतह पर आने पर थोड़ी दूर पर पानी की लहरों पर कोई चीज तैरती दिखाई दी, लगा जैसे जूता तैर रहा है । मन में लालच आ गया , सोचा जूता ही बचा लें, कुछ ही दिन पहले बड़े शौक से तमाम जरूरतों को दरकिनार कर लहुराबीर से खरीदा था । तैर कर पास पहुचे तो देखा कुत्ते का शव लहरों में ऊपर नीचे हो रहा था, रोंगटे खड़े हो गये सारा मोह ख़त्म हो चुका था । किसी तरह तैर कर उस पार पहुँचे और जाड़े की ठिठुरती रात में भींगे और नंगे बदन कोरौत बाजार के अपने मित्र श्री दिनेश्वर लाल का दरवाजा खटखटाया । अर्धनिद्रा में दिनेश्वर जी लालटेन की रोशनी में उनको देखकर घबड़ा गये तुरंत अपना शाल और साईकिल दिए घर जाने के लिए ।
ये दोनों घाट ऐसी कितनी ही ज्ञात अज्ञात घटनाओं और दुर्घटनाओं के साक्षी रहें हैं, लेकिन इन घाटो पर बनने वाले पुल किसी बड़े राजनैतिक नफे नुकसान से नही जुड़े है । इन पुलो के चालू हो जाने पर जौनपुर से इलाहाबाद का अधिकतर ट्रैफिक कैंट स्टेशन पर जाम नही लगाएगा और काफी समय और ईंधन भी बचाएगा ।इन पुलों के बनने में जो थोड़ी बहुत तेजी दिखाई दे रही है। वो वाराणसी महानगर की जरुरतो की वजह से है हमारे गांव गिरांव की जरूरतों के कारण नहीं हैं ।
हमारे गांव के कल्लू भइया बसनी सरकारी हास्पिटल में नौकरी करने रोज कोरौत घाट से वरुणा नदी पार करके जाते थे । इमरजेंसी का समय था, नसबंदी का कैम्प अक्सर हास्पिटल में लगा करता था और घर लौटते समय अक्सर रात हो जाती थी । एक बार जाड़े में घाट पर पहुचते पहुचते काफी देर हो गई और नाव वाला नहीं था, काफी आवाज लगाई लेकिन नदी उस पार जिधर नाव बंधी थी वहा से कोई आवाज नही आई । अब विकल्प था कि २० किमी का चक्कर लगा कर कैंट होकर गांव आये या थोड़ी हिम्मत करके नदी पार करके 10 मिनट में घर पहुंचे । दिन भर का थका हारा शरीर मन को दूसरे विकल्प के लिये तैयार किया । बदन के कपड़े उतार कर साईकिल के हैंडिल में बांधा, साईकिल को कंधे पर लटकाया और दोनों जूते हाथ में लेकर नदी के किनारें पानी में दूसरा कदम डाला ही था कि गड़ाप से पोरसा भर नीचे चले गये । साईकिल कही छटक गई और जूते भी हाथों में नहीं थे । अब जान बचाने का संघर्ष था लेकिन सतह पर आने पर थोड़ी दूर पर पानी की लहरों पर कोई चीज तैरती दिखाई दी, लगा जैसे जूता तैर रहा है । मन में लालच आ गया , सोचा जूता ही बचा लें, कुछ ही दिन पहले बड़े शौक से तमाम जरूरतों को दरकिनार कर लहुराबीर से खरीदा था । तैर कर पास पहुचे तो देखा कुत्ते का शव लहरों में ऊपर नीचे हो रहा था, रोंगटे खड़े हो गये सारा मोह ख़त्म हो चुका था । किसी तरह तैर कर उस पार पहुँचे और जाड़े की ठिठुरती रात में भींगे और नंगे बदन कोरौत बाजार के अपने मित्र श्री दिनेश्वर लाल का दरवाजा खटखटाया । अर्धनिद्रा में दिनेश्वर जी लालटेन की रोशनी में उनको देखकर घबड़ा गये तुरंत अपना शाल और साईकिल दिए घर जाने के लिए ।
ये दोनों घाट ऐसी कितनी ही ज्ञात अज्ञात घटनाओं और दुर्घटनाओं के साक्षी रहें हैं, लेकिन इन घाटो पर बनने वाले पुल किसी बड़े राजनैतिक नफे नुकसान से नही जुड़े है । इन पुलो के चालू हो जाने पर जौनपुर से इलाहाबाद का अधिकतर ट्रैफिक कैंट स्टेशन पर जाम नही लगाएगा और काफी समय और ईंधन भी बचाएगा ।इन पुलों के बनने में जो थोड़ी बहुत तेजी दिखाई दे रही है। वो वाराणसी महानगर की जरुरतो की वजह से है हमारे गांव गिरांव की जरूरतों के कारण नहीं हैं ।
रविवार, 17 नवंबर 2013
अख़बार के छठे या ऐसे ही किसी पन्ने पर तीन या चार लाइनों में छोटी सी खबर छपी थी ओमप्रकाश वाल्मीकि जी नही रहे । हालांकि रात में ही पता चल गया था लेकिन सुबह उनके बारे में कुछ विशेष जानने की अपेक्षा थी, अख़बार के माध्यम से । कैसे हुआ , क्या हुआ था , परिवार में और कौन कौन है लेकिन कुछ नही छपा था । मैंने उनको १०-१५ साल पहले जाना था जूठन के माध्यम से । उनकी मध्यवय में लिखी गई आत्मकथा, पुरे भंगी समाज का आख्यान है । अपने इर्द गिर्द के इस समाज को, इसकी सहनशीलता को , इसकी बहादुरी को और अपनी चेतना में बसे सवर्ण को मैं वाल्मीकि जी के माध्यम से ही जान पाया ।इस आत्मकथा का शीर्षक स्व ० राजेन्द्र यादव जी ने ही वाल्मीकि जी को सुझाया था, लगता है हंस अपने समूह के साथ ही प्रयाण करते है ।
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