गिलोटिन (गांव के लोग पत्रिका मे प्रकाशित कहानी)


    नवम्बर की गुनगुनी रात में गरम मशाले की खुशबू दरवाजे पर बैठे लोगों को बेसब्र कर रही थी। जानकार बाटी पक गयी या नही उलट-पुलट कर देख रहे थे। सलाद कट रहा था और कुछ मनचले ‘‘देशी‘‘ की जुगाड़ में परेशान थे। तबतक दो लोग लुंगी मे देशी का पाउच लेकर अंधेरे मे प्रगट हुए, पियाक समझ गए कि जुगाड़ हो गया, नही तो मामला नीरस हो रहा था। दुआर पर जमावड़ा दो जगहों पर लगा था, एक जगह कुछ सरकारी कर्मचारी बैठ कर आपस मे सुखदुख कर रहे थे, दूसरी तरफ प्रधान के कुछ खास लोग ब्यवस्था और मेहमानवाजी दोनों का लुत्फ उठा रहे थे । तभी महाभारत सीरियल मे चर्चित शंख ध्वनि बजने लगी, सेकेटरी ने बतकही को विराम लगाते हुए कुर्ते में से मोबाइल निकाला और नाम देखकर मुह बिगाड़ लिया, ‘‘रतियो को चैन से रहने नही देती है‘‘ बुदबुदाते हुए मोबाइल फिर जेब में रखकर फिर पुराने रौ मे बात पूरी करना चाह रहा था, लेकिन शंखध्वनि अन्तराल पर लगातार बजती रही ं। आखिरकार किनारे जाकर काल रिसीव करते ही बोला, ‘‘नमस्कार मैडम..........पूजा पर था।‘‘ ‘‘परसों तुम्हारे गांव मे मुख्यमंत्री की विजिट है,..............अभी पहुंच कर तैयारी शुरु कर दो‘‘ दूसरी तरफ से आवाज आयी । मोबाइल जेब में रखकर जड़वत अंधेरे मे खड़ा होकर वो कुछ सोच रहा था। तबतक दूसरे कर्मचारी की मोबाइल पर द्विअर्थी भोजपुरी गीत बजने लगा और वो भी लपक कर एक किनारे खड़ा होकर ‘‘सरकार......हुजूर‘‘ करने लगा। उसका विभागीय अधिकारी भी उसको मुख्यमंत्री के प्रोग्राम की जानकारी देकर उसे गांव मे पहुंच कर अपना काम ठीक करने का निर्देश दे रहा था, उनको राहत यही थी कि दावत बड़े मौके से उसी गांव मे  थी, जिसका मुआयना होना था लेकिन दावत का मजा किरकिरा हो गया था ।
उनकी हवाई उड़ने लगी, जान तो वे भी रहे थ,े कि जिले मे मुआइना हो सकता है, लेकिन इसी गांव का होगा, उनको एक पल को विश्वास नही हुआ । वे सोचते थे कि यह आफत कहीं और आएगी और वे भीड़ में खड़ा होकर तमाशा देखेगें, अखबार में खबर दूसरों के बारे मे छपेगी और वे उसका अपने लोगों मे सिर्फ विश्लेषण करेगें, मगर अब तो खुद खबर बनने की नौबत आ गयी। कुछ देर सन्नाटा पसरा रहा फिर एक ने हिम्मत बंधायी ‘‘अरे यार मुख्यमंत्री आ रहा है, तो उसको हमारे शिकार से फुटेज नही मिलेगी, उसको तो बड़ा शिकार करना है, ताकि कुछ बड़ी खबर बने, पब्लिक की तालियां बजे, नही तो इतनी कवायद बेकार जाएगी‘‘ वे कुछ आश्वस्त हुए और जल्दी से दो लालटेनें और मंगायी गयी। सबने अपने-अपने बस्ते खोलकर कागज पत्तर देखना शुरु कर दिया । खास लोग भी इन कर्मचारियों के अगल-बगल खड़े होकर कौतुहल से कारगुजारी देखने लगे । सब जान रहे थे कि सुबह होते-होते पूरा सरकारी अमला गांव मे हाजिर होगा और एक-एक विकास कार्यक्रम के लाभान्वित लोगों से कई-कई बार पूछताछ की जाएगी ताकि मुख्यमंत्री के मुआयने मे कोई कमी न होने पाए। क्षेत्रीय अधिकारी बार-बार फोन करके प्रधान को मुआयने मे नाश्ते, तम्बू, कनात, साफ सफाई की व्यवस्था के लिए  सहेज रही थी, साथ ही गांव के असन्तुष्ट लोगों की पहचान करके उनको मनाने का आग्रह कर रही थी । अगल-बगल के जिले मे किन गड़बडि़यों पर मुख्यमंत्री ने कार्यवाही किया था, इसकी भी जानकारी दे रही थी।
इधर प्रधान सोच रहा था कि छोटे मोटे खर्चे तो गांव को मिलने वाली धनराशि से सलट जाते हैं, लेकिन इतने बड़े खर्चे को वो किस मद से सुलटाएगा । अभी एक महीना पहले दिल्ली से पाखाना वाला बहुत बड़ा अफसर गांव मे आया था, उसके लिए नाश्ता, पानी, माइक, तम्बू का खर्चा ही नही निकल पाया है। पाखाना वाला साहब भी नाराजे हो गया था, हुआ यह कि वो गांव मे बने पाखानों का मुआइना कर रहा था तभी खटिक बस्ती मे बलचनवा के पाखाना का दरवाजा खोलते ही उसमें से सुअर और उसके आठ-दस बच्चे निकल कर भागने लगे, हड़बड़ाहट में वो गिरते-गिरते बचा था, इसीमें उसका गुस्सा सातवें आसमान पर पहुंच गया। उसको किसी तरह होटल में  अंग्रेजी दारु पिला-पिला कर ठंडा करना पड़ा । साला जितने का पाखाना नही उससे जादे की तो दारु पी गया था। दूसरे दिन बलचनवा को बहुत बिगड़ा था। मन ही मन पुरानी घटना सोचकर मुस्कराया फिर सोचने लगा ‘‘इ सब गांव मे फोटो खिचवा कर अपना टी0ए0-डी0ए0 सरकार से वसूलेगें और खर्चा परधान सरकारी पैसे मे बेइमानी करके निकालेगा‘‘ ।
क्षेत्रीय अधिकारी समझा रही थी, बहुत बड़ा मौका है सबकुछ ठीक हुआ तो आप भी हाई लाइट हो जाइयेगा, लेकिन वो समझ रहा था उसको अपनी फिकर जादा है तभी आवाज मे मधुरता आ गयी है, उसने भी आश्वस्त किया मैडम चिन्ता मत करिए ‘‘गांववालों को मै सम्भार लूंगा, लेकिन बलिकरना को आप भी तो बड़ा तवज्जो देतीं थी, एक ठो शिकायती कागज लेकर पहुंचता है और आप जांच कराने लगती हैं, उसका मन बहुत बढ़ गया है‘‘ । ‘‘देखिए जनता आती है तो उसको हमे सुनना पड़ता है, पुरानी बात भूलिए गांव को मैनेज करिए‘‘ उसने आदेशात्मक पुट के साथ अपनी बात खतम की । प्रधान सोचने लगा इतने बड़े मौके पर ये सब कहना तौहीन होगी, इसी बहाने बड़े-बड़े अधिकारियों से सम्पर्क आगे चलकर काम आएगा लेकिन बजरंगिया आजकल उसके खिलाफ गोलबन्दी करके लोगों को भड़का रहा है, उसको भी मैनेज करना होगा।
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सुबह होते-होते गांव मंे बिजली की तरह खबर फैल गयी कि गांव मे मुख्यमंत्री का मुआइना होगा । सबने इस मौके को अपने-अपने भाग्य का जागरण माना । सुबह की चाय के समय तक अहाते में काफी लोग जुट गए, प्रधान हांक रहा था कि ‘‘गांव ने इतनी तरक्की कर ली है कि मुख्यमंत्री उसको देखने आ रहे है। सब लोग अपनी नाद-चरनी खड़न्जा पर से हटालें और साफ-सफाई कर लें पता नही मुख्यमंत्री खुश होकर गांव के लिए कोई योजना ही दे दें‘‘। उधर विपक्षी खेमें मे भी यह खबर पहुची तो बजरंगी ने चेलों को सुनाया ‘‘ परधनवां इतना सरकारी माल घोंटा है कि उसकी खबर मुख्यमंत्री को भी लग गयी है और मुख्यमंत्री उसी को देखने आ रहे हैं‘‘। कहने का मतलब यह खबर अलग-अलग लोगो को अलग-अलग ढंग से समझा रही थी ।  प्रधान और विपक्षियों की बतकही का अपना-अपना अर्थ निकालते हुए गांव अपने दैनिक काम-काज मे जुट गया ।
प्रधान गांव मे घूम-घूम कर सरकारी योजनाओं को सहेज रहा था, बकरी का लोन लेने वालों को कहा गया कि वो जल्दी से पांच-छः बकरियां अगल-बगल से ंमगां कर बांध ले, क्या पता बकरियों की गिनती हो । परचून की दुकान वाले को कहा गया कि अपनी दुकान जरा झाड़ पोंछ कर कुछ और माल भर ले। सहुआइन भड़क गयी ‘‘लोन का आधा पइसा तो सब दलाली में काट लिया, अब सामान कहा से लाऊं‘‘ प्रधान ने अनसुनी करते हुए उसके बेटे को समझाया कि ‘‘तुम्हारा तो लोन ही नही पास होता, तुम्हारे स्कूटर को देखकर मैनेजर चिंहुक गया था कि तुम गरीब नही हो। वो तो मैने समझाया कि साहब उ पुराना स्कूटर उसके साढ़ू ने कबाड़ समझ कर उसको दे दिया है, कभी-कभार तेल भराकर वक्त-जरुरत में अपना काम कर लेता है, तब वो कुछ नरम पड़ा‘‘ ।
सहुआइन का बेटा दुनियादार था, उसने अपनी मां को डांट कर चुप कराया और दुकान में कुछ माल भर कर मुआइने लायक बनाने का आश्वासन दिया । असल में उसका साढ़ू बिजली का छोटा मोटा मैकेनिक था और उसका मरम्मत के बहाने एक बड़े इंजीनियर के घर आना जाना हो गया था। उस इंजीनियर ने उसको छोटा मोटा ठेकेदारी का काम दिला दिया था, जिससे उसकी हैसियत क्रमशः पुराने बजाज स्कूटर से कान में गाना लगाकर सुनते हुए नई मोटरसाइकिल चलाने लायक हो गयी थी और उस पुराने स्कूटर का कोई खरीददार नही मिलने पर उसको अपने पत्नी की सलाह पर अपनी साली के घर भिजवा दिया। उसकी पत्नी को डर था कि स्कूटर घर पर पड़ा रहने पर उसका देवर उसे लेकर इधर-उधर दौड़ेगा और तेल खर्चा अपने भाई से मांगेगा । उसी पुराने स्कूटर देखकर मैनेजर उसको ऐसा अमीर समझ लिया, जिसको गरीबी की योजनाओं से लाभ नही दिया जाना चाहिए । वस्तुतः उस स्कूटर को मैनेजर ने ब्लैकमेल करने के लिए हथियार की तरह इस्तेमाल किया और सहुआइन के बेटे से उसने लोन देने के लिए मनमाफिक सौदा किया था । सहुआइन उसी सौदे को लेकर आज भड़क रही थी । लोन मिलने के बाद उसके बेटे ने शहर जा कर सारे नकली आइटमों से दुकान भर लिया, नकदी के ग्राहक पहली बार मे ही भड़क गए लेकिन उधारी वाले अभी भी मजबूरी में सौदा-सुलफ लेते रहते है।
उसके बाद प्रधान खटिक बस्ती की तरफ चल पड़ा । उसको अंदाजा था कि हो सकता है मुआइना इसी बस्ती का ज्यादे हो सकता है। बालचन के दरवाजे पर पहुंच कर मुस्कराया, का दद्दा ए बार तो पिछला किस्सा नही होगा । अरे नही प्रधान जी उस बार भी हमारी गलती नही था, उस दिन सांझ को बूंदा-बांदी हो रही थी और छोटका लडि़कवा पाखाना मे सुअर भितरा दिया था। कुछ आगे बढ़ा ही था कि मोबाइल पर खबर आ गयी, दरवाजे पर कुछ सरकारी अफसर आ गए हैं, उनको चाय-पानी के लिए सहेजते हुए वह तेजी से घर वापस घर की ओर चल पड़ा। दरवाजे पर जमावड़ा था, क्षेत्रीय अधिकारी, हलके का दरोगा और तमाम जाने-अनजाने सरकारी लोग पहुंच चुके थे ।
क्षेत्रीय अधिकारी गांव की विकास पुस्तिका उलट-पुलट रही थी ।  कर्मचारी सरकारी कार्यक्रमों से गांव मे हुई उपलव्धियों की जानकारी दे रहे थे, वो किताब को बन्द करते हुए, बोली ‘चलो काम देखते है, एक तरफ से सारा विकास कार्य दिखाओ।‘  बकरी से गरीबी दूर करने वाले लाभार्थियों के दरवाजे पर पहुंची,‘ अरे तुम्हारी बकरियां कहां है, किताब मे तो 10 बकरियां है।‘ ‘‘साहेब चरने गयीं है‘‘ बस्ती के लोग तमाशायी बनकर खड़े हो गए थे, उन्ही में से एक ने जबाब दिया।  दरअसल वो कई लोगों का स्वयं सहायता समूह था, जिसको बैंक ने लोन दिया था।
मैनेजर स्वयं सहायता समूह को लोन देने के लिए अनिच्छुक था, ‘‘अरे भाई............सगे भाइयों का परिवार तो एकसाथ चलता नही है ये अलग-अलग लोग मिलकर धन्धा क्या चलाएगें, जिनको अपने खाने-पीने के ही लाले पड़े रहते है, आं.......ए। सरकार भी कैसी-कैसी हवा-हवाई स्कीम बनाती है, आं.........ए‘‘। हर बात खतम करने के बाद ‘आं........ए‘ उसका तकिया कलाम था, जिससे वो सामने वाले से अपनी बात की तस्दीक चाहता था । मैनेजर ने लोन देने के पहले समूह के हर आदमी को अलग-अलग बुलाकर पूछताछ के बहाने भड़काया था क्योंकि उसको पता था कि कुछ ही दिनो मे यह लोन एन0पी0ए0 मे बदल जाएगा। समूह का हर आदमी मुफ्त मे मिलने वाली बकरियों को पाने के लिए लालायित था, वो मैनेजर के हर सवाल का भोलेपन से जबाब देता और गांव पर अपने लोगों के बीच बैठकर अपनी समझदारी का बखान करता, दरअसल ये लोग इन सरकारी योजनाओं के परम्परागत लाभार्थी थे। लोन मे उनको नकदी मिली थी जो बकरी सप्लाई करने वाले एजेन्ट ने अपना और सरकारी महकमे का सारा कमीशन काटकर दिया था। गांव के सरकारी कर्मचारी ने समझाया था कि जब-जब मुआयना होगा तुमलोग अगल-बगल से बकरियां मांग कर बांध लेना। प्रधान ने सुबह जब बताया तो सब बकरियां मांगने के चक्कर मे इधर-उधर घूम रहे थे कि तबतक साहेब लोग आ पहुंचे । क्षेत्रीय अधिकारी भी अनुभवी हो गयी थी, उसने जबाब देने वाले से ही पूछा ‘‘अच्छा तुम लोग बकरियां कहां बांधते हो, चलो दिखाओ‘‘ वो अचकचा गया, इधर-उधर गोल-गोल घुमाने पर सौभाग्य से दो तीन खूंटे जमीन मे गड़े दिख गये, ‘‘इहैं बन्हाती है।‘‘ वो मन में समझ गयी इनके पास बकरी नही है, केवल बेवकूफ बना रहे हैं । उसने चेताया, ‘‘दोपहर मे आंऊगी, अगर बकरियां बंधी नही मिली तो तुमलोगों की खैर नही होगी‘‘कहते हुए आगे निकल गयी, ‘‘ठीक है साहेब‘‘ उसको पीछे से सुनायी पड़ा।
सरकारी घर कहां बने है, उस तरफ ले चलो । कुछ ही दूर पर एक दो-तीन कमरे का पलस्तर विहीन मकान दिख गया, ‘‘मैडम यह सरकारी आवास बना है‘‘ इतना बड़ा घ् ये लोग तो गरीब नही दिखते हैं, इसको सरकारी मकान कैसे मिल गया, उसने तरेरते हुए पूछा । ‘‘मैडम इनका नाम गरीबी रेखा वाली लिस्ट मे था, जब ये बनवा रहे थे तो मैने मना किया था कि नियम के मुताबिक एक ही कमरा बनवाओ लेकिन बदकिस्मती से इसका ससुर मर गया, जिसके नाम से जमीन का एक टुकड़ा था, इसने उसी को बेचकर दो कमरा और बनवा लिया है।‘‘ सरकारी कर्मचारी बार-बार सफाई दे रहा था, मैडम मैने प्रधान जी से भी इसको काम रोकवाने के लिए कहा लेकिन इसने प्रधान जी का कहना भी नही माना । अन्दरखाने बात यह भी थी कि उन्होने सरकारी पैसा वापस लेने के नाम पर उससे  हजार दो हजार वसूल भी लिया था।
आगे एक कमरे का मकान था, गेरु से रंगा हुआ, साफ-सुथरा उसके दरवाजे पर पहुंचते ही उसका मन प्रसन्न हो गया, सोचने लगी ऐसे ही सब मकान बनते तो एक सुन्दर कालोनी की तरह दिखते । मकान के बाहर एक मड़ई मे एक औरत चूल्हा फंूक रही थी, क्षेत्रीय अधिकारी ने किताब मे लिखे नाम के आदमी को पुकारा तो उसने कई अनजान लोगों को देखकर घूंघट माथे तक खींचते हुए बताया कि उसका आदमी बाहर मजूरी करने गया है। ‘‘ तुम्हारा मकान बहुत अच्छा है‘‘ उसने महिला की प्रशंसा किया और गांव के कर्मचारी से बोली, ‘‘इसके मकान पर सरकारी आवास लिखवा दो‘‘ इतना कान मे पड़ते ही उसके तेवर बदल गए,‘‘ई...सरकारी आवास लिखवावे के मना कइले हउवन, कौवनो भीख मे मकान मिलल हौ का, जवन हमार मन करी उ लिखवाइब‘‘। क्षेत्रीय अधिकारी को उस महिला का गर्वदीप्त चेहरा पता नही क्यों भा गया, लेकिन कर्मचारी अपने अफसर के सलाह की तौहीन और एक मामूली गरीब औरत की वाचालता पर नाराज होकर बोल उठा, ‘‘सरकारी पैसा से आवास बना है तो लिखा नही जाएगा‘‘। उसने फिर उसी तैश में जबाब दिया, ‘‘तुम लोगन के भी त सरकारी पइसा मिलेला, काहे नही अपने घर-मकान, कपड़ा-लत्ता  पर सरकारी पइसा से बनल लिखवा देते ‘‘।  क्षेत्रीय अधिकारी ने गरीबी मे अपने स्वाभिमान को सहेजती महिला को थोड़ी देर ध्यान से देखा और आगे बढ़ गयी ।
अगला सरकारी आवास अधूरा था, पूछने पर पता चला कि अभी कमरे की कुर्सी ही भरी गयी थी कि  एक एक्सीडेन्ट मे बाएं हांथ-पैर की हड्डी टूट गयी, अब कहां का आवास, अब तो जान बचाने के लाले थे और आवास का पैसा दवा दारु में, उसके दुख मे शामिल होने वाले मेहमानों के स्वागत में खर्च हो गया। 6 महीने घर बैठकर बिना मजदूरी के खाने-पीने का खर्चा भी उसी आवास के पैसे से चला। उसकी औरत भी मेहनत मजूरी करती थी, लेकिन चार जने का खर्चा और दवाई उसकी मजदूरी से निकलना सम्भव नही था। बड़की बिटिया पढ़ाई छोड़कर 6 महीने तक लगातार बाप, छोटे भाई को सम्हाली, चूल्हा-चौका किया तब जाकर वो खड़ा होने लायक हुआ, अभी भी लंगड़ा कर चलता है और मेहनत मजूरी करने लायक नही हुआ है। निराशा में कभी कभार कच्ची दारु लगाकर अपनी किस्मत और परिवार को कोसता रहता है। सरकारी लोगों को उसके दुर्भाग्य से मतलब नही था उनको तो उस पैसे से आवास चाहिए था और वे बराबर उसको सरकारी पैसा नाजायज खर्च नही करने और किसी तरह से आवास बनवाने के लिए कोंचते रहते । क्योंकि उनके कागजों मे यह अधूरा आवास कभी भी बड़ी समस्या पैदा कर सकता था और उपर से जांच मे आने वाले लोगों के लिए यह सरकारी कर्मचारियों को ब्लैकमेल करने के लिए अच्छा चारा साबित होता। क्षेत्रीय अफसर थोड़ी देर तक खड़ी होकर इस समस्या के समाधान के बारे मे सोचती रही, फिर अपने कर्मचारी को उसके पीछे पड़कर किसी तरह से आवास पूरा कराने के लिए लगातार दबाव बनाए रखने की हिदायत देती रही ।
गांव मे झाड़ू-बेलचा लिए सफाई कर्मचारियों से भरा एक ट्रक पहुंच चुका था और हर गली मुहल्ले की सफाई शुरु हो चुकी थी । लोगों ने गलियों मे जानवरों को बांधने वाले खूंटे उखाड़ लिए और अपने घर सामने बची-खुची जगह में जानवरों को बांधा जा चुका था । बाहरी लोगों को सफाई मे लगे देखकर सबने अपने-अपने दरवाजे की सफाई शुरु कर दी थी और कुछ मौके का फायदा उठाकर अपने दरवाजे की सफाई भी करा ले रहे थे, कुछ लगातार व्यंग बोले जा रहे थे कि काश मुख्यमंत्री रोज आते तो इसी तरह सफाई होती, सरकारी लोग इन ब्यंगबाणों को हंसी-मजाक मे उड़ाकर अपने-अपने जिम्मे का काम निपटा रहे थे, अबतक गांव का हर आदमी-औरत वी0आई0पी0 हो चुका था ।  गांव मे पंचायत भवन पर बैठक होने की डुगडुगी बज रही थी, पता चला कि कलेक्टर भी और अधिकारियों के साथ आने वाले हैं । दोपहर में कलेक्टर, कप्तान की गाडि़यां धूल उड़ाती पहुंची, वे आपस में कहां हेलीपैड बनेगा, कहां मंच से मुख्यमंत्री आम जनता को सम्बोधित करेगें, कितने लोगों को मुख्यमंत्री से मिलने दिया जाएगा, पत्रकारवार्ता कहां होगी इसी पर चर्चा करते हुए बैठक स्थल पर पहुंचे ।
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  काफी संख्या मे ग्रामवासी इकठ्ठा थे, कुछ उदास चेहरों से कौतुक निहारने आए थे तो कुछ अपना सारा गुस्सा आज ही उतारने का निश्चय करके गोलबन्द होकर बैठे थे । कलेक्टर ने बोलना शुरु किया, देखिये आप सभी लोगों के लिए और हमारे लिए सौभाग्य की बात है कि मुख्यमंत्री जी इस गांव मे पधार रहे हैं । आपको जो भी समस्या है कागज पर लिख कर दे दीजिए, उसको मुख्यमंत्री जी तक पहुंचा दिया जाएगा । बजरंगी तमतमा कर खड़ा हो गया, ‘‘साहब मुख्यमंत्री जी आएगें तो उनसे तो बताया ही जाएगा, लेकिन साहब बलिकरना केे साथ इतने दिनों से अन्याय हो रहा है और आपलोगों ने कोई सुनवाई नही किया, पहले इसका जबाव मिलना चाहिए, उसने पूरे सरकारी अमले को घेरना चाहा । इसका गरीबी वाला राशनकार्ड अबतक नही बना है, जबकि इससे अच्छी  हालत के लोगों का गरीबी का राशनकार्ड बन गया है।‘‘ गरीबी के राशनकार्ड पर मुफ्त मे कुछ राशन मिल जाता था, इसीलिए गांव मे इसकी मारामारी थी । मैडम बताइये इनकी समस्या का निराकरण अबतक क्यों नही किया गया, कलेक्टर ने क्षेत्रीय अधिकारी की तरफ मुखातिब होकर पूछा । संयोग से बजरंगी क्षेत्रीय अधिकारी से इस मसले पर बलिकरन को लेकर कईबार मिल चुका था और उसने तहकीकात भी कराया था । ‘‘सर, गांव मे 55 लोगों का ही गरीबी रेखा वाला राशनकार्ड बनना था, अभी 55 लोगों का बन चुका है, आगे जब राशनकार्ड मिलेगा तब बलिकरन का बन जाएगा ।‘‘ प्रधान ने भी क्षेत्रीय अधिकारी की बात का समर्थन किया, लेकिन बजरंगी फिर उठ खड़ा हुआ, उसने कहा ‘‘सर समस्या यह नही है, समस्या यह है कि रामअचल के मरने पर खाली हुआ राशनकार्ड भुआल को दे दिया गया, जबकि बलिकरन उससे ज्यादा गरीब है ।‘‘ दर असल भुआल के पास बलिकरन से दो बिस्वा जमीन ज्यादा थी, सामान्य गणित के अनुसार भुआल बलिकरन से ज्यादा अमीर था, लेकिन भुआल की जमीन का कुछ हिस्सा उसर था और घरवाली को टी0बी0 की गम्भीर बीमारी से अबतब लगा था, इसीलिए प्रधान ने गरीबी रेखा वाला राशनकार्ड भुआल को दिलवा दिया था । प्रधान ने इससे एक तीर से दो शिकार किए थे, पिछले चुनाव मे बलिकरन ने बजरंगी के पक्ष मे बढ़चढ़ कर प्रचार किया था, प्रधान को उसका बदला भी लेना था, इसीलिए उसने भुआल के पक्ष मे राशनकार्ड जारी किया था और बजरंगी उसी को मुद्दा बनाकर लगातार दरखास देता फिर रहा था । उसके लिए मुख्यमंत्री का मुआइना बहुत अच्छा मौका था।
कलेक्टर ने समझ लिया समस्या बलिकरन से ज्यादा बजरंगी की है, उसने बजरंगी से उसका नाम पूछा, फिर पुचकार का बोला ‘ बजरंगी जी मुआइना बीत जाता है तो आप आफिस मे आइए, आपकी सारी समस्याओं का समाधान किया जाएगा।‘ उसको लगा पुचकार से घोड़ा सध जाएगा, लेकिन घोड़ा और उखड़ गया । ‘साहब एक समस्या हो तो गिनाए, बुढ़ापे का पेंशन कई लोगों को नही मिल रहा है, उनको बड़ी तकलीफ है और कितने अमीर लोगों को मिल रहा है‘ अरे भाई नाम बताइये किनको नही मिल रही है तो इसकी जांच कराई जाय। ‘खड़ा हो जा हो चचा‘ बजरंगी ने इशारा किया और दो-तीन बृद्ध महिलाएं-पुरुष खड़े हो गए । कलेक्टर ने क्षेत्रीय अधिकारी की तरफ प्रश्नवाचक मुद्रा मे सिर घुमाया, सर 42 पेंशन का कोटा है, इस गांव का, जब खाली होगा तब इन लोगों को दिया जाएगा, खाली होना मतलब जब कोई बुढ़ापे का पेंशन पाने वाला मरेगा तो जगह बनेंगी। कलेक्टर ने बजरंगी से पूछा अच्छा किन अपात्र लोगों को पेंशन मिल रहा है, यह भी बताइये ।
अब बजरंगी फंस गया, उसके हिसाब से कई लोग थे जिनको यह पेंशन नही मिलनी चाहिए लेकिन वो किसी का नाम लेकर सबसे खुली दुश्मनी नही लेना चाहता था और चुनाव भी आने वाले थे। साहब आप जांच कराइये, हम काहे बताएं। देखिये हम तो जांच कराएगें लेकिन आपको अगर जानकारी है तो बताइये । उधर कई कर्मचारी कागज कलम लेकर खड़े हुए वृद्धों का नाम, वल्दियत पूछने लगे । कलेक्टर ने आश्वस्त किया ‘घबड़ाइये मत आज कल में  इनके पंेशन का कागज बनालिया जाएगा और कोई समस्या हो तो बताइए।‘ ‘साहब चांपाकल खराब है‘ ‘अरे कब से खराब है।‘ ‘तीन महीना हो गया साहब।‘ क्यों मैडम अभी तक क्यों नही बना, ‘आज सुबह से ठीक कराया जा रहा है, वाशर खराब था, सरकारी वाशर की सप्लाई कल ही हुई है एकाध घण्टे मे ठीक हो जाएगा।‘ इस बार संन्तोषजनक जवाब से कलेक्टर आश्वस्त हुआ, क्षेत्रीय अधिकारी को भी कुछ राहत महसूस हुई ।
‘आप इन लोगों की समस्या सुनिये‘ तमाम छोटे-बड़े अधिकारियों को सहेजता हुआ कलेक्टर कप्तान को लेकर एक कोने मे चला गया ‘ऐसा करिए एक तेज तर्रार दारोगा लगाइये । जितने शिकायती पत्र मिल रहे है, उसमे कौन-कौन शरारती हैं, जो मुख्यमंत्री जी की विजिट मे बवाल कर सकते है, उनको देर रात मे ही उठवा लीजिए और कल शाम तक छोड़ दिजीएगा । देखिए बहुत सावधानी से यह काम होना चाहिए कोई हल्ला-गुल्ला न हो और उनको किसी किस्म का टार्चर नही होना चाहिए नही तो मीडिया वाले तिल का ताड़ बना देगें ।‘ सर, मैने पहले ही लगा दिया है और उसने लिस्ट भी तैयार कर ली है । उसमे वो क्या नाम है इसका जो बहुत बोल रहा है, बजरंगी कप्तान ने बताया, ‘हां बजरंगी को भी डाल दीजिएगा, यह भी बखेड़ा खड़ा करेगा।‘ ‘यह प्रधान कैसा आदमी है, ठीक-ठाक है सर कोई क्रिमिनल रिकार्ड नही है । ऐसा करिएगा, कल सुबह से ही गांव की घेरेबन्दी करा लिजिएगा, कोई अनावश्यक व्यक्ति गांव मे घूमता दिखाई न दे । अरे हां एक काम और करियेगा, मेरी अभी शासन मे बात हुई है, मुख्यमंत्री जी गांव मे कार से पहुंच कर दो मिनट के लिए किसी गली में पैदल चलेगें, किस गली में चलेगें, ये जल्दी ही डिसाइड हो जाएगा । जिस गली में मुख्यमंत्री जी चलेगें उस में पड़ने वाले मकानों में गंवई वेश मे 100-150 सिपाहियों को खड़ा करा दीजिएगा, जिससे लगे कि वे भी गांव वाले ही है और मुख्यमंत्री जी के जाने तक कुछ पेशेवर लोगों को जिन्दाबाद का नारा लगाते रहने के लिए लगा दीजिए, जानते ही हैं इन नेताओं यह सब कितना पसन्द होता है । मुख्यमंत्री तो इन नारा लगाने वालो को हाथ हिलाते अभिवादन स्वीकार करने मे ही व्यस्त हो जाएगें, फिर कितना समय ही उनके पास बचेगा । कलेक्टर ने मुस्कराकर अपनी योजना समझाई ।
कप्तान सहमति मे केवल सर.....सर बोलता रहा । फिर कलेक्टर ने क्षेत्रीय अधिकारी को भी अपने पास बुलाया और शेष योजना मे भागीदार बनाने की गरज से बोलने लगा, नगर पालिका वालों से कहो कि तीन-चार सौ और सफाई कर्मचारी रात के शिफ्ट मे लगा दें और बिजली के प्रकाश मे रातभर सफाई का काम इस तरह चलता रहे कि गांव वाले रातभर सो नही पाएं, इनके साथ ही पुलिस लाइन से दो-तीन सौ रंगरुट सिपाहियों को रात भर गांव की गलियों मे मार्च कराइए । कप्तान ने प्रश्नवाचक मुद्रा मे आदत के मुताबिक बोला......सर । आप समझ नही रहे हैं, रात भर जागने से और इतने अनजाने लोगों के इस गांव मे घूमने से ये लोग अपने गांव मे ही अपरिचित महसूस करने लगेगें और तब इनके कान्फिडेन्स का लेवल कुछ कम हो जाएगा, जिससे कल इनको हैण्डल करने मे आसानी हो जाएगी और ये भी सोचेंगे कि किसी तरह से बिना और किसी लफड़े के यह कार्यक्रम जल्दी खत्म हो और उनको सुकून मिले । कप्तान सहमति में बोला.........सर, फिर दारोगा को लेकर एक किनारे चला गया। यार कलेक्टर साहब कह तो रहे हैं लेकिन किसी को अनावश्यक उठाने मे लफड़ा खड़ा हो जाएगा, तब ये लोग किनारे हो जाएगें और झेलेंगे हम । कुछ ऐसा करो कि इनको उठाने पर लोगों को हमारा काम जेनुइन लगे। ठीक है.....सर । दारोगा एड़ी चटकाते हुए दूर चला गया ।
दारोगा ने प्रधान को किनारे ले जाकर कुछ खुसर-फुसर किया । गांव की बैठक खतम हो चुकी थी, अधिकतर लोग अपने-अपने घर की तरफ निकल लिए ।
 रात 8 बजे बजरंगी के दरवाजे पर कोई दूर से चिल्ला कर बताया कि उसके मटर के खेत मे किसी की भैंस चर रही है, बजरंगी का बेटा गरम दिमाग का था, तुरन्त लाठी लेकर दौड़ पड़ा और उसके पीछे-पीछे बजरंगी भी उसको सम्भालने के लिए दौड़ा। गाली-गलौज से शुरु होकर लठ्म-लठ्ठ होने लगा । गांव के दूसरे टोले मे पूरा प्रशासन था और कुछ सिपाहियों के साथ दरोगा पहुंचा। सिपाहियों ने दोनो पक्षों को अलग-अलग किया और दारोगा फटकारने लगा ‘मुख्यमंत्री जी आ रहे हैं और आपलोग यही नजारा पेश करेगें उनके सामने। इनलोगों को थाने ले चलिए ।‘‘ बजरंगी, उसका बेटा और विपक्षी गाड़ी मे बैठाकर थाने भेज दिए गए, लोग मौके की नजाकत समझ कर शान्त होकर तमाशाई बने रहे । गांव मे  बिजलीे की सप्लाई मे कोई गड़बड़ी आ गयी थी जिसको ठीक होने मे तीन-चार घण्टे लगते, लेकिन वक्त कहां था । रात भर में खड़न्जो की मरम्मत होनी थी, चार-पांच बड़े-बडे जनरेटर गलियों मे खड़े कर दिए गए कुछ उनका शोर, कुछ रात भर काम करने वाले लोगों का शोरगुल गांव वालो के लिए असहज हो गया था। दरवाजे पर बंधे जानवर  बैठ नही पा रहे थे वो  लगातार खूंटे के चारो ओर चक्कर लगा रहे थे, बच्चे दौड़कर बाहर निकल रहे थे, अजनबियों को देखकर घूंघट काढ़े औरतों को नित्यक्रिया में परेशानी हो रही थी । झुंझलाए पुरुष कभी खड़ा होकर काम देखते, कभी बिेस्तर पर लेटते, बच्चे तमाशा देख-देख कर थक गए थे । काम करने वाले गांववालों से कभी पानी मांगते, कभी कुछ खाने पीने का इंतजाम करने का अनुरोध करते । लगता था पूरे गांव मे हर किसी के दरवाजे पर बारात आयी है।
पृथ्वी अपनी गति से ही चल रही थी लेकिन उस गली की मरम्मत करने वालों और मरम्मत कराने वालों का समय जैसे भाग रहा था । इस तमाम शोरगुल के कारण जिनकी दैनिक चर्या प्रभावित हो गयी थी उनका समय थम गया था, उनको लगता था जैसे इस रात की सुबह नही होगी ।
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मुख्य मरम्मत का काम पूरे गांव को उत्तर और दक्खिन मे बांटने वाली ईट की सड़क का हो रहा था । प्रधानी खाते मे पैसा आने के शुरुआत मे यह सड़क बनी थी । यह सड़क बहुत दिनों तक गांव का सबसे खूबसूरत हिस्सा हुआ करती थी, क्योंकि तबतक इसके किनारे जनसंख्या वृद्धि और बंटवारे से इतनी सघन बस्ती नही हुई थी । गांव के पुराने लोगों को इसके खूबसूरत दिखने का राज था इसका इतिहास, जब यह कच्ची थी। प्रायः घरों के नाबदान और बरसाती पानी मिल कर इसको मसाला  देते जिसको इस रास्ते पर गुजरने वाले गाय, भैंस, बैल आदि जानवर इतना मथ देते कि इस रास्ते को पार करना बच्चों और बूढ़ों के लिए दूरुह हो जाता । इस रास्ते को पार करने की कोशिश मे कितने बूढ़ों की हड्डियां ऐसी चटकी कि उन्होने बिस्तर पर ही इस दुनिया को सलाम किया था। कितनी नयी नवेली दुलहिनों के लिए यह सड़क उनकी झिझक और शरम तोड़ने का कारण बन गयी, क्योंकि इस सड़क को नित्य क्रिया के लिए रोज ही पार करना होता था।
 कहने का मतलब साल मे चार महीने यह सड़क साधन नही चुनौती होती थी, लोग इस सड़क से जाते नही थे इसको पार करते थे, जैसे कोई नदी पार करते हों । जिस साल परधानी खाते मे पैसा आया, सबने इस सड़क को ही बनवाने पर जोर दिया, शुरु के कई साल इस पर मिट्टी फेंकी गयी, फिर जब इसको ईट से बनाने का प्रयास प्रधान ने किया तो सेकेटरी ने समझाया, परधान जी लम्बा काम है, लगभग 200 मीटर का । ईट के सरकारी रेट और बाजार के रेट मे डेढ़गुने का अन्तर है। इस रास्ते के लिए जितनी ईट चाहिए उतनी सरकारी रेट से खरीदने पर लगभग 50 मी0 काम नही हो पाएगा क्योंकि ईट सरकारी रेट पर भट्ठे से मिलेगी नही, परधान  दलित जाति का था चिहुंक गया । उसको लगा अगर बाजार के रेट पर ईट खरीद कर सड़क बनवा दिया तो आएगें-जाएगें सभी लेकिन पता चलते ही अपर कास्ट वाले दरखास ठोंकनेे लगेगें और वो जानता था जांच का मतलब है जांच करने वालों की जी हजूरी और जेब गरम करना।
परधान कुछ महीनों तक ठंडा पड़ा रहा, तबतक पूरा गांव उसको गरियाने लगा। वो सीधा-सादा आदमी था जो मात्र दुर्घटनावश प्रधान हो गया था क्योंकि गांव के अपर कास्ट और पिछड़ों को उस दलित की विनम्रता पसन्द थी । उसने ब्लाक पर जाकर अनुभवी लोगों से राय ली, उन्होनें बताया कि परधान जी इस सड़क को दो बार मे बनवाओ, एक साल पूरब तरफ से 100 मीटर फिर दूसरे साल पश्चिम तरफ से 100 मीटर तब जाकर 200 मीटर ईट की सड़क बनेगी क्योंकि उसमे 50 मी0 कामन हो जाएगा। परधानी कागज मे तो बस फलाने के कुआं से फलाने के दुआर तक ही लिखा जाएगा, इसको गांव के बाहर का आदमी पकड़ नही पाएगा । काम पर पूरे गांव की निगाह थी, कागज कौन देखता है इसलिए प्रधान ने हिम्मत करके सड़क बनवाई और पूरे गांव ने इस पर से अपना अतिक्रमण स्वेच्छा से या समझाने पर हटा लिया ।
इस प्रकार यह सुन्दर सी सड़क एक कागजी अनियमितता से ही बन पायी। इस सड़क के एक तरफ अपर कास्ट और पिछड़ो की मिश्रित आबादी थी तो दूसरी तरफ पिछड़े और दलितों की मिश्रित आबादी थी। कई साल तक गांव वाले पूरे गर्व से उस सड़क के गुजरते। घर आने वाले मेहमानों से उस सड़क से पैदा हुई सुविधा का बखान सुनकर सीना फुलाते और जिनका घर उस सड़क से सटा हुआ होता था वो अपना दुआर साफ करते समय कभी-कभी इस सड़क को भी साफ कर दिया करते थे । कितनी अर्थियां और डोलियां इस सड़क से गुजर गयीं, धीरे-धीरे इस सड़क पर से बैलों और गायों के गले मे बजती घण्टियों की आवाज गुम होकर मोटर साइकिलों और ट्रैक्टरों की कर्कश आवाज गूंजने लगी । समय गुजरने पर यह सीधी सपाट सड़क ट्रैक्टरों की उझल कूद से उबड़ खाबड़ हो गयी थी । आज रात उसी सड़क के दिन फिर गए थे, कई दर्जन मजदूर उसके पुराने टूटे फूटे ईटों को उखाड़ कर नयी ईटें लगा रहे थे, क्योंकि प्रशासन को अन्दाजा था मुख्यमंत्री की कार इस सड़क से गांव के भीतर भी जा सकती है, यदि उनकी कार को इस पर गुजरने मे झटके लगे तो जिले के अफसरों को कई झटके लग जाएगें।
 
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गांव की जिस मुख्य सड़क की मरम्मत हो रही थी, उसके किनारे से बिजली के तार गुजरे थे, जिसके तीसरे खम्भे के बगल से एक गली भीतर जाकर गांव की आबादी में गुम हो गयी थी । उसी गली मे रामअधार और शिवअधार सगे भाइयों का घर था। घर के बर्तनों के काफी लड़ने के बाद दोनो भाइयों मे आंगन से लेकर गली तक दीवाल खिंच गयी थी । वैसे दोनो भाइयों मे काफी प्रेम था लेकिन सौभाग्य से शिवअधार का बेटा सरकारी विभाग के चपरासी हो गया । इस खबर को सुनकर कुछ पड़ोसियांे ने मुह बिचकाया लेकिन कुछ लोग समझ गए कि उसने कितनी बड़ी लाटरी जीती है। का समझते हैं.........चपरासी को.....................10 हजार के उपरे तनखाह होगी.....................बिला नागा मिलेगी.................आराम से...............न धूल मिट्टी लगेगी.............न पसीना बहेगा। कौने धंधा मे एतना कमाई है............................बताओ जरा...........................बड़े-बड़े खेतीबारी वाले.....................दुकान-दौरी वाले को हर महीना एतना निकालना मुश्किल है। परिवार में मुश्किल अब शुरु हो गयी थी, शिवअधार के नाती  सरकारी प्राइमरी स्कूल की जगह नर्सरी स्कूल मे जाने लगे, उनको स्कूली ड्रेस, पानी का बोतल, टिफिन दिया जाने लगा और यहीं से पतोहों मे तकरार शुरु हो गयी । एक तरफ रामअधार के नाती कउवा...क, खरहा...........ख पढ़ते दूसरी तरफ शिवअधार के नाती ए फार एप्पुल, बी फार ..........बैट पढ़ते। घर में ऐसी असमानता आ गयी, जिसके कारण बंटवारा अवश्यंभावी हो गया था । बाप..........मतारी...........गोरु.........बछरु.........गहना..........गुरिया.........लोटा........थरिया..........हित...........नात सब बंट गए।
 जिन भतीजों ने चाचा की नौकरी मिलने पर होने वाली सतनरायन की कथा का बोलउवा बड़ी उमंग से आस पड़ोस मे बांटा था, दौड़-दौड़ कर पंजीरी-चरनामृत बांटा था, वही भतीजे आंगन मे दीवाल के उस पार से आ रही कुकर की सीटी से निकल रही महीन चावल की गंध, गरम मसाले की खुशबू, गाहे बगाहे तरी जाने वाली पूड़ी-कचौडि़यों की महक पर मन मसोस कर अपनी रसोंई का बासी-कुबासी खाकर मनमार कर सोने लगे । यही भतीजे चाचा की नौकरी लगने पर आस-पड़ोसियों, नाते-रिश्तेदारों को बड़े गुमान से बताया करते कि आज चाचा क्या लेकर आए थे, वो सब पराया था जिसे रिश्तों की क्रूरता ने उन्हे अनकहे समझा दिया था । हजारों साल की सभ्यता के विकास ने बाहर के जंगल को हमारे मन मे बसा दिया है, जिसमे सामर्थ्यवान के लिए ही सबकुछ होता है ।
शिवअधार के कमासुत बेटे से मिलने-जुलने वालों का एक भिन्न स्तर भी हो गया, ऐसे में प्राइवेसी के लिए चहारदीवारी जरुरी हो गयी, दीवार  आंगन से चली, दरवाजे पर आकर ठिठक गयी, सामने कटहल का पेंड़ खड़ा था। रामअधार और शिवअधार ने बहुतेरी कोशिश की लेकिन न कोई एक इंच  जमीन छोड़ना चाहता था और न कोई कटहल का पेंड़। बंटवारा करने वाले गुनी रिश्तेदारों ने तमाम जोड़ घटाना करने के बाद कटहल का पेंड़ रामअधार के हिस्से मे दिया था।
कटहल के पेंड़ की भी अपनी यादें थी । एक बार उनकी मां शिवअधार को लेकर नैहर गयी थी, वहां से उसको बिदायी मे पका कटहल मिला था, जिसका कोआ परिवार ने कई दिनों तक बड़े मन से खाया था । इधर उधर फेंके गए बीजों मे एक बीज अपने शुरुआती संघर्षो के बाद जिन्दा रह गया, जिसको ननिहाल की देन मानकर रामअधार और शिवअधार ने बड़े जतन से बचाया था। कटहल धीरे-धीरे बड़ा होता गया, उसकी छाया मे परिवार की साल के गर्मियों वाले तीन-चार महीने की दोपहर और हल्के जाड़े मे दो-तीन महीने की रातें गुजरती थी, वो कटहल उनके घर की पहचान हो गया। किसी नए मेहमान को उनके घर तक पहुचने के लिए वह कटहल न सिर्फ लाइट हाउस का काम करता बल्कि पड़ोसियों के यहां पहुंचने वाले नए-नवेले मेहमानों के लिए एक जरुरी पहचान होता था । लोग अजनबियों को पता बताते थे..............अरे उस कटहर के पेंड़ से तीन घर आगे ही फलाने का घर है। अब वही कटहर उस दीवार के सामने खड़ा हो गया था । रामअधार का उस पेंड़ के प्रति आसक्ति इसलिए भी थी कि यह पेंड़ इतना फलता कि हर साल सीजन के कटहल बेंच कर उससे कुछ आमदनी हो जाती, इस प्रकार उस डगमगाती अर्थव्यवस्था के लिए यह पेंड़ बहुत बड़ा सहारा था।
 शिवअधार जमीन छोड़ने के लिए तैयार नही था और रामअधार पेंड़ छोड़ने के लिए । अन्त मे फैसला यह हुआ कि कटहल के तने तक दीवाल जाएगी, फिर उसके तने के उस पार से दीवाल खड़ी की जाएगी । तने के दोनो तरफ दीवाल बनाने के लिए नींव खोदने में कटहल की जड़ों को काफी लहूलुहान हो गयी थी, लेकिन मामला यहीं नही रुका । शिवअधार के चपरासी बेटे की तनखाह इतनी अतिरिक्त आमदनी ला रही थी कि उसके दिमाग में नित कुछ नया चलता रहता । दुआर की छोटी सी बची जमीन को शिवअधार ने पक्का फर्श करा दिया और दबगंयी करते हुए कटहल की कुछ डालों को भी छंटवा दिया । कुछ इन्ही कारणों से कटहल इस साल फला नही था, जिसका रामअधार को काफी सदमा लगा था हालांकि आर्थिक क्षति की भरपायी संयोग से नेनुआ, भिण्डी ने कर दी थी, जो थोड़ा पहले फलने लगा था, जिसके कारण कुछ बाजार-भाव अच्छा मिल गया था, लेकिन रामअधार को लग रहा था कि शायद कटहल अब कभी न फले, जिसका निराकरण गाहे-बगाहे लोगों से पूछा करता था, सभी लोग जो कारण बताते थे, उसका निदान उसके हांथ मे नही था।
 शिवअधार के चपरासी बेटे को समझ में आने लगा कि गांव मे तो उससे काबिल-काबिल लोग पड़े हैं लेकिन उसको सरकारी नौकरी मिलना ईश्वर की कृपा और पिछले जनम के सुकर्मो का ही नतीजा है। नही तो यही नौकरी पाने के लिए लोग लाखो रुपया घूस देते हैं, लाखो रु0 खरच करके बड़ी-बड़ी पढ़ाई करके बंगलौर, दिल्ली जैसे शहर मे इतना ही पाते हैं । ईश्वर कृपा के प्रति उसकी उमड़ती आस्था ने उसको पुरोहितों के काफी नजदीक ला दिया। जिन्होने उसे बताया कि अभी तो सब ठीक है लेकिन दरवाजे पर दूध वाला पेंड़ शुभ नही होता है दर असल कटहल के तने या पत्तो को तोड़ने से जो सफेद द्रव निकलता है, लोक प्रचलन मे उसको दूध कहा जाता है । कटहल के पेंड़ के कारण उसके परिवार को कितनी क्षति हुई थी, अब उसको समझ में आया ।
उसका बाप शिवअधार बम्बई मे कपड़े के मिल मे नौकरी करता था, कई साल नौकरी करने के बाद उसकी मां को भी बम्बई अपनी चाल मे लेकर गया था, वहीं पर उसकी मां ने पहली बार समुद्र देखा था, बड़ा-बड़ा पानी का जहाज, लोकल ट्रेन, बड़ा पाव जिसका जिकर वह बात-बेबात करती रहती थी, दुर्भाग्य से कपड़े की मिल हड़ताल में बन्द हो गयी, और कुछ महीने बेकार रहने के बाद उनका परिवार मन मारकर गांव चला आया था, तब उसके बड़के बाउ ने बहुत सहारा दिया था, उनको लगा ही नही कि वे किसी दूसरे के घर मे आए हैं, उनको लगा जैसे वे अपने घर ही परदेश से लौटे हैं । उसको समझ में आ गया कि यदि दुआर पर यह कटहल का पेंड़ नही रहता तो शायद मिल बन्द नही होती और वे सब अब भी बम्बई जैसे महानगर मे बेहतर जिन्दगी जी रहे होते । आगे यह कटहल कौन सा अशुभ कर देगा इससे पहले इससे निजात पाना जरुरी है लेकिन बड़का बाउ  तो समझते ही नही है। इसीलिए उसने भरसक कोशिश किया कि कटहल की जड़ों को इतना नुकसान हो जाए कि वो अपने आप ही सूख कर खतम हो जाय।
आज रात रामअधार का भी वक्त थम गया था, धमा चौकड़ी से उसको नींद नही आ रही थी ।  
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अगले दिन सुबह दस बजते-बजते गांव तमाम जाने-अनजाने लोगों से भर चुका था । मुख्यमंत्री के आने का समय हो चुका था । जिस खड़न्जे वाले रास्ते से मुख्यमंत्री को गुजरना था उसके किनारे-किनारे मोटी-मोटी रस्सियों से बैरिकेटिंग किया जा चुका था । गांववासी उसी बैरिकेटिंग के किनारे खड़े होकर इंतजार कर रहे थे, उनके अगल-बगल खड़े इतने अनजाने चेहरे थे कि वे खुद ही अजनबी होकर तमाशायी बन गए थे । एकाएक सायरन बजाती धूल उड़ाती गाडि़यों का काफिला तेजी से गांव के किनारे से होते हुए बाहर की तरफ खड़ा हो गया और एक कार उस खड़न्जे की तरफ तेजी से घूम गयी । कार मालाओं से लदी हुई थी । गांव के भीतरी रास्ते पर कार धीरे-धीरे चलने लगी और उसके शीशे में से हाथ निकल कर अभिवादन करने लगा । भीड़ उत्साहित होकर नारे लगाने लगी, गांव के लोग भी उन नारों मे सम्मिलित हो गए । एकाएक मुख्यमंत्री कार रोक कर बाहर निकल पड़े । किनारे पर खड़े लोगों ने नारों के साथ फूल मालाओं की बरसात कर दी । गांव वाले कभी नारे लगाने वालों को, कभी फूल माला फेंकने वालों को अकबका कर चीन्हने की कोशिश करने लगे, मुख्यमंत्री के पीछे-पीछे सैकड़ों पुलिस, आला अधिकारियों का हुजूम था । मुख्यमंत्री गांव वालों का अभिवादन स्वीकार करते, उनको चुप रहने के लिए पुचकारते लेकिन जोश थमने का नाम ही नही ले रहा था । दरअसल कलेक्टर ने सरकारी पार्टी के अनुशासित कार्यकर्ताओं को भी मजमे मे घुसेड़ रखा था, वो सब मुख्यमंत्री की नजदीकी से ही प्रफुल्लित थे ।
एकाएक मुख्यमंत्री ने एक दीनहीन दिखने वाले ग्रामीण का हाथ थाम लिया। कई दिनों की बड़ी दाढ़ी, धूप में झुलसा पोपला चेहरा तमाशे के केन्द्र मे आ गया। कैमरों के फ्लैश चमकने लगे, पोज के लिए मुख्यमंत्री ने उस बुर्जुग को अपने करीब कर लिया । दादा तबीयत कैसी है, ठीक......है, साहब बुजुर्ग ने जबाब दिया । कउनो समस्या तो नाही है ! बुजुर्ग सारी रात उधेड़ बुन मे था, बोल उठा ‘साहेब इ....साल कटहरवा नाही फरा‘ । इतना सुनते ही सरकारी मशीनरी हरकत मे आ गयी । बागवानी का अधिकारी पेश कर दिया गया ।
बागवानी वाले अधिकारी ने सपने मे भी नही सोचा था कि आज उसकी भी पूछ हो सकती है। वो तो मजमे मे खड़ा होकर अपने साथी अधिकारियों के साथ हंसी-ठिठोली कर रहा था। उसकी पहली पोस्टिंग थी । बड़ी मेहनत से हुई सलेक्शन के बाद पहला जिला था, उसके बाप ने उसकी शादी मे खींच कर दहेज लिया था, अभी वो उसी को पचा रहा था। उसने जल्दी ही शादी की साल गिरह मनाई थी, तमाम सालियों, सालों, साढ़ूओं के स्वागत और बिदायी में ही उसके दिन महीने खर्च हो रहे थे । मुख्यंमत्री के मुआइने को सुनकर उसकी बीबी ने भी तमाम अफसरों की बीबीयों की तरह सकुशल बीत जाने पर शहर के चर्चित मन्दिर मे लड्डू चढ़ाने का संकल्प लिया था, जिसका उसने खूब मजाक उड़ाया था।
जब उसको पुकारा गया तो उसकी हवाई उड़ने लगी। मुख्यमंत्री ने गरजती हुई आवाज मे पूछा कब से तैनात हो.............सर 2 साल हो गए । कभी इस गांव मे आए हो, वो क्या जबाब देता थूक निगलकर सर.....सर करने लगा । आपको इनके कटहल मे फल नही लगा है इसकी जानकारी है । वो क्या जबाब देता....सर.....सर  कहकर फिर चुप हो गया । एकाएक मुख्यमंत्री भीड़ की तरफ मुखातिब हुआ । ये जिले के बागवानी के अफसर हैं, इनको कभी आपने देखा है........खिलन्दड़ो ने जोर से ललकारा.....कब्भौं नाही । इनको तत्काल सस्पेण्ड किया जाता है । लकदक कपड़ा पहने अफसर भींगी बिल्ली बनकर खड़ा था, जनता उसको देखकर तालियां बजा रही थी, जैसे फ्रांसिसी क्रान्ति में उसको गिलोटिन पर चढ़ाया जा रहा था, मुख्यमंत्री की जै-जै कार हो रही थी । मुख्यमंत्री ने कलेक्टर को फटकारा कि आपलोग इन बुजुर्ग का भी खयाल नही रख सकते है, इसके लिए भी मुझको आना पड़ता है। तालियों की गड़गड़ाहट मे मुख्यमंत्री तेजी से कार मे घुसा और कार हूटर बजाते हुए रास्ता बनाने लगी । गांव जय-जयकार मे डूब गया, बड़े-बड़े सरकारी अफसर दौरा ठीक-ठाक बीत जाने की खुशी में किसी बड़े होटल मे पार्टी की तैयारी कर रहे थे। राम अधार को शाम को खटिया पर लेटे-लेटे कटहल के पेंड़ को निहारते-निहारते गहरी नींद आ गयी थी ।
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