मंगलवार, 14 जून 2016

-चक्र-


नेता को,
फौज चाहिए।
फौज को,
राज्य चाहिए।
राज्य को,
देश चाहिए।
देश को,
हथियार चाहिए।
हथियार को,
दुश्मन चाहिए।
दुश्मन को,
खून चाहिए।
खून को,
उपदेश चाहिए।
उपदेश को,
जन्नत चाहिए।
जन्नत को,
दोजख चाहिए।
दोजख को,
धरती चाहिए।
धरती को,
चांद चाहिए।
चांद को,
रोटी चाहिए।
रोटी को,
नींद चाहिए।
नींद को,
सपने चाहिए।
सपनों को,
फिर नेता चाहिए।

का कइलन बाऊ ?


जिनको संयुक्त परिवारों का सुख और हश्र पता है, वो ऐसे सवालो पर चैंकते नही हैं अपितु समय की महिमा को स्वीकार करते हुए पी जाने का अभ्यास कर लेते हैं ।
जब आंगन मे उठती दीवालें सवाल करने लगती हैं, चूल्हे मे दरार और भाई पट्टीदार बनते हैं तों तोहमतो के ऐसे ही सिलसिले उठते हैं ।
सरकारी स्कूल की फीस कई महीनो पर किसी तरह जमा कर पाने की विवशता और कहने पर भी बच्चों को ट्यूशन नही करा पाने की मजबूरियां पिछली पीढ़ी की अर्कमण्यता समझी जाती हैं।
थकता मिजाज और बूढ़ा होता शरीर नयी कोपलो के रोज बदलते स्कूल परिधानो और टिफिन के मैगी नूडल्स को देखकर अपराधबोध से भर उठता है कि वे अपने बच्चो को ऐसा सुख नही दे पाए और उनकी तोहमतो को जाने-अनजाने मे स्वीकार करने लगते हंै।
ऐसे मे शायद ही कभी याद आता है कि कैसे अपने पालितो की नौकरियों के लिए जिसतिस के दरवाजे पर उन्होने मत्थे टेके थे, कैसे पढ़ाकू बच्चे लिए उन्होने अपनी जरुरतो को नगण्य बना दिया और कैसे उन्होने उनके सपनों के लिए अपने गांव, समाज और भाइयों से दगा किया था ।
अपनी पीढ़ी के रिश्तो मे सूखती नमी और नौजवान पीढ़ी के रिश्तो मे पनपती गर्मी के बीच उनको पता ही नही चलता कि जिसको उन्होने पाला पोसा उनके लिए वे अप्रासंगिक हो गए ।
ऐसे ही जब 60 साल मे क्या हुआ ? जैसे व्यंग जब आभाषी दुनिया मे तैरते हैं, तो होटलनुमा कालेजो से निकलते युवा और सोशल साइटों की चिप्पियो से देश, इतिहास और समाज को जानने का अभिमान पाले लोगों के तंज जाने-अनजाने स्वीकार होने लगते हैं।
तब याद नही आता है कि सरकारी योजनाओं की लूट और सुविधा पर पनपी यह पीढ़ी विगत की असफलताओ को गिनाते हुए उन्ही बुनियादों पर हमलावर हो रही है, जिसने उसको तंज करने लायक हैसियत बख्शी है।

-सम्भावना-


एक नेता कम ठेकेदार और नौकरशाह कम धनपशु के समधी बनने से गांव के दक्खिन अंलग को छू कर गुजरती कच्ची सड़क कोलतार से खिल उठी ।
छोटे-मोटे खेतिहर, मजूर सड़क के किनारे अपने-अपने हक-हिस्से का बखरा-बटवारा करके नाद, कोहा, गाय, बकरी, मुर्गा-मुर्गी लेकर आ बसे ।
शहर और कस्बे को जोड़ती नयी बनी सड़क ने दूर दराज के गांव के खेतिहर समाज मे कई तरह से हस्तक्षेप कर दिया ।
मसलन महिलाओं का कुछ समय खेती-बारी, गाय-गोरु के काम से खाली होकर, सास-जेठान के तानो से उबकर एकान्त ओढ़कर किसिम-किसिम की सवारियों और आते जाते लोगों को निहारते वक्त कट जाता था।
बुर्जुगों के लिए सड़क टी0वी0 स्क्रीन थी, जिस पर पल-पल बदलती छवियांे को निहारते समय बीत जाता था।
नई नेवलियों के लिए सुबह-शाम की शौच के लिए आबादी से कुछ दूरी पर स्थित पटरियां हंसी-ठिठोली का स्थान बन गयी थी ।
छोटे बच्चो के लिए खाली सड़क गाहे-बगाहे क्रिकेट की पिच हो जाती थी ।
गांव के किशोर आबादी से कुछ आगे पुलिया पर बैठ कर फिल्मी हीरो-हिरोइनों, द्विअर्थी गीतों और क्रिकेट मैचों पर एक दूसरे के अज्ञान की खिल्ली उड़ाते।
महानगरों मे खट रही जवानियों के पसीने से इन किशोरो के हाथ मे सेकेण्ड हैण्ड मोबाइले आ गयी थी, जिसपर सुलभ अश्लील फिल्मों ने नारी देह का मूर्तन कर दिया था।
मोबाइल और टी0वी0 स्क्रीनो पर तैरते अथाह सम्पन्नताओ मे डूबे जीवन की छवियों ने इन किशोरो को अपनी वास्तविक दुनिया से निराश कर दिया था ।
ऐसी ही एक थकी हुई रात के अंधेरे मे दो हेडलाइटें आपसे में चीख कर टकरा गयी ।
एकाएक पसरे सन्नाटे को कुछ चीखों, खूंटे पर बंधे पगुरी करते जानवरों और दरबो मे बन्द मुर्गे-मुर्गियों ने तोड़ा और फिर सभी दौड़ पड़े।
कुछ ने लथपथ शरीरो मे जिन्दगी की उम्मीद टटोली और कुछ ने मोबाइल, पर्स और नगदी टटोली ।
गांव का उम्रदराज मानस अपने पालितों के इस बर्बरता पर स्तब्ध था, लेकिन जिनमे जीने की लालसा थी उनके लिए ये दुर्घटना कुछ सुविधाओं के लिए एक सम्भावना थी ।

जेन जी के द्वन्द

सुबह उठकर चाय बनाने के लिए फ्रिज से दूध निकालते समय देखा कि दूध पर मलाई की एक मोटी परत जमी है, जिसको निकालकर अलग एक बरतन में रखा जिसमें लगात...