शनिवार, 28 नवंबर 2015

च ौथी स्टेज

 
डाक्टर की फुसफुसाहट
कमरे से बाहर तैर गयी,
च ौथी स्टेज है यह सुनते ही,
दुनिया पराई नजर आयी।
कर्ज कितना रह गया है,
बेटे की पढ़ाई का,
बेटी की शादी का,
बीमा जमा है या नही,
सोचते हुए यह भी लगा,
चलो यार बहुत जी लिए।
तभी दौड़ने लगा बचपन,
दादा की गोदी में,
कबड्डी मे, छुपम-छुपाई में,
अरे इतनी जल्दी सबकुछ खत्म।
अभी तो दो इन्क्रीमेन्ट और लगता,
प्रमोशन की सम्भावना दिख रही थी,
बेटे को भी आफर था अच्छी कम्पनी का,
शादी के लिए मालदार पार्टी मिली थी,
सबकुछ इतना ठीकठाक चल रहा था
फिर अचानक च ौथी स्टेज।
बचपन का मित्र,
कितना जल्दी चला गया,
उसको तो कोई चेतावनी भी नही मिली,
ऐसे ही नेताओं,ठेकेदारों, पुलिस से लड़ते,
जाड़े की एक सुबह,
गन्ने के खेत के किनारे
छलनी पड़ा था,
और उसी रात उसने,
सरकारी कोटेदार के यहां बोटी तोड़ी थी ।
केंचुए की तरह जीते,
जोंक की तरह खून पीते,
लोमड़ी की तरह सम्भावना सूंघते,
वक्त कब गुजर गया,
फिर अचानक च ौथी स्टेज।
कितनी बार बचा था,
ट्रªेन हादसे मे दूसरी बोगी में था,
बम फटने के पहले बाजार से निकल चुका था,
कितनी जाचों में बाल-बाल बचा था,
किसी जूलूस मे नही,
किसी नारे में नही,
चर्चित मंदिर में नियमित चढ़ावा,
कितना नियमित और पवित्र जीवन,
लेकिन अचानक च ौथी स्टेज।
पाश कालोनी के किसी बंगले में,
किसी शाम बत्तियां बुझी होंगी,
उदास बैठे होगें ड्राइवर,नौकर,
मृत्यु के कर्मकाण्ड,
कुछ लोग निभाएगें,
देर रात वाली ट्रेन से,
वापस लौट जाएगें,
जैसे उसने निभायी थी,
अनचाही औपचारिकता,
उसी तरह।

छठ


भारतीय उप महाद्वीप की मानव समूह की बसावटों मे खान-पान की भिन्नता पर गौर किया जाय तो उत्तर प्रदेश के कुछ हिस्सो से शुरु होकर बिहार-बंगाल तक भोजन में चावल की प्रमुख भूमिका का क्षेत्र शुरु होता है और यहीं से स्त्री प्रभावी समाज के लक्षण भी दिखाई देने लगते है । इसी क्षेत्र के हिन्दी पट्टी मे बनारस के गंगा नदी के पश्चिमी भाग के देहातों में तालाबों के किनारे इस त्योहार के ढोल नब्बे के दशक के दूसरे अद्र्धाश्ंा मे बजते सुनाई पड़ते हैं, जब पश्चिमी बिहार के समीपवर्ती जिलों की बेटियां अपनी परम्पराओं साधिकार मनाने निकलतीं है और पुरुष सहयोगी की भूमिका मे उनके पीछे-पीछे चलते हैं । हम खुश हो सकते हैं कि इस त्योहार को मनाने के लिए स्त्री आंगन की दहलीज लांघती है और पुरुष सहयोगी भूमिका मे होता है । इस त्योहार को दलित भागीदारी कितनी है मुझे नही पता क्योंकि इसके बारे में जानने का प्रयास मैने नही किया, लेकिन इस त्योहार के कर्मकाण्ड मे स्त्री सशक्तीकरण देखने वाले लोगों के साथ मेरी असहमति है कि दलित और पिछड़े समाज की समाज की स्त्रियां अधिक स्वावलम्बी रही हैं और उनके लिए इस त्योहार मे सम्मिलित होना इसके बाजारु स्वभाव को इन्ज्वाय करना मात्र है। ढोल की थाप पर थिरकती स्त्री के आनन्द को महसूस कीजिए, आप एक समाजवादी परिवार द्वारा सोना-चांदी ओढ़कर परोसे जा रहे बाजार के कसैलेपन से मुक्त हो जाएगें ।

-श्रद्धांजलि-


हाईस्कूल मे पढ़ने के लिए जाते समय कस्बे के साप्ताहिक बाजार के लिए छोड़े गए मैदान को पार करना पड़ता था। कस्बे में दो साप्ताहिक बाजार लगते थे, जिनके लिए दो अलग-अलग मैदान थे और वे बाजार के दिन के अलावा खाली रहते थे । एक मैदान को मंगल की बाजार कहा जाता था और दूसरे मैदान को शुक्र का बाजार कहा जाता था । हम विद्यार्थियों का झुण्ड मंगल की बाजार को धूल उड़ाते हुए पार करके एक गली में घुसता था । गली एक मिर्जा साहब के मकान को पार करके समकोंण पर मुड़ती थी, मिर्जा साहब कस्बे के एक अन्य इण्टर कालेज के वाइस प्रिन्सीपल थे और उस समय के सहपाठियों से मिली जानकारियों के अनुसार उनका परिवार कस्बे का पढ़ा लिखा परिवार था। बिना बरामदे वाले पक्के मकान के मुख्य दरवाजे पर लटका पर्दा मकान के लोगों को बाहरी दुनिया से एकान्त प्रदान करता था । उस मकान के ठीक सामने वाले रास्ते के उस पार की दीवार पर गेरु से एक नारा लिखा होता था ‘ हम हैं हिन्दू साठ करोड़, ताला देगें तोड़ मरोड़‘। यह नारा उस मकान के आंगन से निकलने वालो को बाहर की तल्ख हो रही दुनिया का एहसास कराता होगा और लगातार घूरता रहता होगा, अब ये महसूस करता हूं।
अस्सी का दशक था, हम प्रतिदिन स्कूल जाते हुए इस नारे को पढ़ते और कभी कभी उसका समवेत उच्चारण करते, बिना ये महसूस किए कि ये समवेत स्वर जो मात्र खिलवाड़ होता था, उस मकान के भीतर रहने वाले परिवार जनों को कितना खौफजदा करता होगा । लेकिन हमारे लिए ये मात्र खेल होता था । दुनियां के बहुसंख्यक और अल्प संख्यक समाज के रिश्तों को केर-बेर के रिश्तो मे बदलने वाले शिल्पकारों की बढ़ती संख्या मे अशोक सिंघल जी का जाना एक जैविक क्षति है । मैं यही कामना करता हूं कि हिन्दू विश्वासों के आधार पर उनका अगला जन्म मानव योनि कें किसी अल्पसंख्यक समुदाय में हो ।

-मच्छर-


बहुत सी चिन्ताए हैं, 
जो जागती रातों मे,
मच्छरों से जादा भनभनाती हैं।
मसलन..........
बकरी बच्चा कब देगी,
बोया आलू उगेगा कि नही,
खाद असली है कि नकली,
लंगड़ी गाय अब लगेगी कि नही,
बिजली फिर कब आएगी,
नील गाय से चैती बचेगी कि नही,
प्रधान मंत्री जी देश कब आएगें,
मिट्टी का तेल कब बटेंगा,
छोटका फिर दारु पीकर पिटेगा,
आत्महत्या पर कितना मिलता होगा (मुआवजा),
बिजली वाले छापा तो नही मारेगें,
ठेकेदरवा कब्भौं फंसेगा कि नही,
बड़की माई की तेरही में कितने खाएगें,
छोटकी के तिलक में कितने जने जाएगें,
इलेक्शन फिर कब आएगें,
अबकी गेंहू बोएं कि बारुद।

जेन जी के द्वन्द

सुबह उठकर चाय बनाने के लिए फ्रिज से दूध निकालते समय देखा कि दूध पर मलाई की एक मोटी परत जमी है, जिसको निकालकर अलग एक बरतन में रखा जिसमें लगात...