और ईश्वर का क्या हुआ ?


            

      ‘तुम जानते हो‘ पोर्ट ने कहा और उसकी आवाज फिर रहस्यमय हो गई, जैसा प्रायः किसी शांत जगह पर लम्बे अन्तराल पर कही गयी बातों से प्रतीत होता है ।
‘यहां आकाश बिल्कुल अलग है । जब भी मै उसे देखता हूं, मुझे  ऐसा महसूस होता है जैसे वहां कोई ठोस वस्तु हो जो हमलोगों की पीछे की हर चीज से रक्षा कर रही हो।‘
किट ने हल्के से कांपते हुए पूहा- ‘पीछे की हर चीज से घ्
‘हां।‘
‘लेकिन पीछे है क्या घ् उसकी आवाज एकदम धीमी थी ।
‘ मेरा अनुमान है, कुछ भी नही । केवल अंधेरा । घनी रात ।‘
                                          -ंपाल बोल्स(द शेल्टरिंग स्काई)

      ‘‘ स्वर्ग ईश्वर के गौरव की घोषणा करते हैं और यह आकाश उनकी दस्तकारी की प्रस्तुति है।‘‘ राजा डेविड या जिसने भी ये स्त्रोत लिखें हैं, उन्हे ये तारे किसी अत्यन्त क्रमबद्ध अस्तित्व के प्रत्यक्ष प्रमाण प्रतीत हुए होगें, जो हमारी चट्टानों, पेड़ों और पत्थरों वाली नीरस सांसारिक दुनिया से काफी अलग रही होंगी । डेविड के दिनों की तुलना मे सूरज और अन्य तारों ने अपनी विशेष स्थिति खो दी है । अब हम समझते है कि ये ऐसे चमकते गैस के गोले हैं जो गुरुत्वाकर्षण बल के कारण परस्पर बंधे हैं और अपने-अपने केन्द्र में चलने वाली उष्मनाभिकीय प्रतिक्रियाओं से उत्सर्जित उष्मा के दबाव के कारण सिमट जाने से बचे हैं । ये तारे हमे ईश्वर के गौरव के बारे मे उतना ही बताते हैं जितना कि हमारे आसपास पाए जाने वाले धरती के पत्थर ।
      ईश्वर की दस्तकारी में कुछ विशेष अन्र्तदृष्टि प्राप्त करने के लिए अगर प्रकृति मे कुछ चीजों की खोज करनी हो तो वह होगा ‘प्रकृति के अन्तिम नियम।‘ इन नियमों को जानकर हम मालिक होगें उन नियमों की किताब के जो तारों और पत्थरों और हर अन्य चीज को नियंत्रित करते हैं । इसीलिए ये स्वाभाविक ही है कि स्टीफन हाकिंग ने प्रकृति के नियमों को ‘ईश्वर के दिमाग‘ की संज्ञा दी है । एक अन्य भौतिकविद चाल्र्स मिजनर ने भी भौतिक विज्ञान और रसायन विज्ञान के परिप्रेक्ष्यों की तुलना करते हुए इसी तरह की भाषा का प्रयोग किया है ‘‘ एक कार्बनिक रसायनज्ञ इस प्रश्न के जबाब मे कि बानवे तत्व क्यों है और ये कब बने, यह कह सकता है कि- कोई दूसरा ही इसका जबाब दे सकता है ।‘‘ लेकिन किसी भौतिकविद से अगर पूछा जाय कि यह दुनिया क्यों कुछ भौतिक नियमों का अनुसरण करने और शेष का अनुसरण नही करने के लिए बनाई गयी है घ् तो वह जबाब दे सकता है -‘ईश्वर जाने ।‘ आईन्सटाइन ने एक बार अपने सहायक अन्सर््ट स्ट्रास से कहा था -‘‘ मुझे यह जानने की इच्छा है कि दुनिया की रचना में ईश्वर के पास कोई विकल्प मौजूद थे या नही।‘‘ एक अन्य मौके पर वे भौतिकी के उपक्रम (विषय) के उद्देश्य का वर्णन करते हुए कहते हैं- इसका उद्देश्य न केवल यह जानना है कि प्रकृति कैसी है और वह कैसे अपना कार्य सम्पादित करती है बल्कि उस आर्दशमय और दम्भपूर्ण लगने वाले उद्देश्य को जहां तक सम्भव हो प्राप्त करना है-जिसके तहत हम भी जानना चाहते हैं कि प्रकृति ऐसी ही क्यों है और वह दूसरे तरह की क्यों नही है।.........इस प्रकार यह अनुभव होता है, जिसे यूं कहा जाय कि ईश्वर खुद इन सम्बन्धों को जैसे वे हैं इससे अलग तरीके से व्यवस्थित नही कर सकते थे । वैज्ञानिक अनुभव का यही प्रोमिथियन तत्व है । मेरे लिए हमेशा से यही वैज्ञानिक प्रयास का विशिष्ट जादू रहा है ।
      आईनस्टाइन का धर्म इतना अस्पष्ट था कि मुझे  संदेह है, और जो उनके ‘ यूं कहा जाय‘ से स्पष्ट होता है, कि उनका यह कथन एक रुपक की तरह है । भौतिक विज्ञान इतना मूलभूत है कि भौतिक विज्ञानियों के लिए यह रुपक स्वाभाविक ही है । धर्म तत्वज्ञ पाल टिलिच ने पाया कि वैज्ञानिकों मे केवल भौतिक विज्ञानी ही बिना किसी उलझन  के ‘ईश्वर‘ शब्द का उपयोग करने में सक्षम हैं । किसी का धर्म चाहे जो हो या बिना धर्म के भी प्रकृति के अंतिम नियमों को ईश्वर के दिमाग के रुप में बताना एक अत्यन्त सम्मोहक रुपक है ।
     इस सम्बन्ध में मेरा सामना हुआ एक विचित्र सी जगह पर वाशिंगटन के रेबर्न हाउस आफ बिल्डिंग में । जब मैं वहां 1987 में विज्ञान, अन्तरिक्ष और प्रौद्योगिकी की हाउस समिति के सामने सुपरकन्डक्टिंग सुपर कोलाइडर (एस0एस0सी0) प्रोजेक्ट के पक्ष में साक्ष्य देने के लिए उपस्थित हुआ । मैने जिक्र किया कि किस प्रकार प्राथमिक कणों के हमारे अध्ययन के दौरान हम नियमों की खोज कर रहे हैं और ये नियम लगातार और ज्यादा सुसंगत और सार्वभौम होते जा रहे हैं और हमें यह आभास होने लगा है के यह मात्र संयोग नही है । हमने यह भी बताया कि इन नियमों में एक व्यापक सुसंगठन (सौन्दर्य) है जो विश्व की संरचना में गहरे स्तर पर छिपे सुसंगठन को प्रतिबिम्बित करता है । मेरी टिप्पणी के बाद अन्य साक्ष्यों ने भी बयान दिए और समिति के सदस्यों ने प्रश्न भी पूछे  । इसके बाद वहां समिति के दो सदस्यों, एक इलिनायस के रिपब्लिकन प्रतिनिधि हैरिस डब्लू0 फावेल, जो सुपर कोलाइडर प्रोजेक्ट के कुल मिलाकर पक्षधर थे और दूसरे पेनसिल्वानिया के रिपब्लिकन प्रतिनिधि डान रिटर (एक पूर्व धातुकीय अभियंता) जो कांग्रेस मे प्रोजेक्ट के धुर विरोधियों मे से थे, के बीच एक बहस छिड़ गई । मि0 फावेल- बहुत बहुत धन्यवाद । मैं आप सभी के साक्ष्यों का आभारी हूं । यह बहुत अच्छा था , अगर मुझे किसी को एस0एस0सी0 की जरुरत के बारे मे समझाना होगा तो  यह निश्चित है कि मैं आपके साक्ष्यों का सहारा लूंगा । यह बहुत लाभदायक होगा । मैं कभी-कभी सोचता हूं कि हमारे पास कोई एक शब्द होता जो सबकुछ बयान कर देता । पर यह लगभग असंम्भव है । मेरा अनुमान है कि शायद डा0 वाइनबर्ग इसके कुछ निकट पहुंचे थे । मैं एकदम निश्चित तो नही कह सकता पर मैने ये लिख लिया है । उन्होने कहा कि उनका अनुमान है कि यह सब एक संयोग नही है कि कुछ नियम हैं जो पदार्थ को नियंत्रित करते हैं । और मैने तुरंत लिखा कि क्या यह हमे ईश्वर को खोजने में मदद करेगा  घ् यह तय है कि आपने यह दावा नही किया, लेकिन निश्चित ही यह विश्व को और अधिक  समझने  में हमे बहुत सक्षम बनाएगा घ्
मि0 रीटर-ं क्या महाशय ने इस विषय में कुछ कहा घ् अगर ये इस पर कुछ प्रकाश डालें तो मैं कहूंगा कि
मि0 फावेल- मैं ऐसा दावा नही कर रहा हूं ।
मि0 रीटर - अगर यह मशीन वह सब करेगी तो मैं इसके पक्ष में खड़ा रहूंगा ।
      मेरे विवेक ने मुझे  इस विचार-विनिमय में पड़ने से रोक दिया, क्योंकि मैं नही समझते  कि कांग्रेस के सदस्य यह जानने के लिए उत्सुक थे कि एस0एस0सी0 (प्रोजेक्ट) मंे ईश्वर की खोज के बारे मे मैं क्या सोचता हंू । और इसलिए भी क्योंकि मुझे  नही लगा कि इसके बारे मे मेरे विचार जानना प्रोजेक्ट के लिए फायदेमंद होता ।
      कुछ लोगों का ईश्वर के बारे मे दृष्टिकोंण इतना ब्यापक और लचीला होता है कि यह निश्चित (अवश्यम्भावी) है कि वे जहां भी ईश्वर को देखना चाहते हैं उन्हे वही पा लेते हैं । हम प्रायः सुनते हैं कि ‘ ईश्वर अन्तिम सत्य है‘ या ‘यह विश्व ही ईश्वर है‘ । वस्तुतः किसी भी अन्य शब्द की तरह ईश्वर का भी वही अर्थ निकाला जा सकता है, जो हम चाहते हैं । अगर आप कहना चाहते हैं कि ‘ईश्वर उर्जा है‘ तो  आप ईश्वर को कोयले के एक टुकड़े में पा सकते हैं । लेकिन यदि शब्दों का हमारे लिए कोई महत्व है तो हमें उन रुपों की कद्र करनी होगी, जिनमे उनका इतिहास मे उपयोग होता आया है, और खासकर हमें उन विशिष्टताआंे की रक्षा करनी होगी जो शब्दों के अर्थो को अन्य शब्दों में विलीन हो जाने से बचाते हैं ।
      इसी स्थिति में मुझे लगता है कि ‘ईश्वर‘ शब्द का अगर कुछ भी उपयोग है तो इसका अर्थ ईश्वर के रुप में ही लिया जाना चाहिए । वे जो रचयिता और नियम बनाते हैं जिन्होने केवल प्रकृति के नियमों और विश्व को ही स्थापित नही किया है बल्कि अच्छे और बुरे के मापदण्ड को ही स्थापित किए हैं, ऐसा व्यक्तित्व जो हमारी गतिविधियों से सम्बद्ध है, संक्षेप मे ऐसे जो हमारे अराध्य हो सकते हैं । यह स्पष्ट होना चाहिए कि इन विषयों पर बहस करते हुए मैं अपना दृष्टिकोंण रख रहा हूं और इस अध्याय में किसी खास विशेषता का दावा नही करता ।  यही वो ईश्वर है जो पूरे इतिहास में पुरुषों और नारियों के लिए महत्वपूर्ण रहे हैं । वैज्ञानिक और अन्य लोग कभी-कभी ‘ईश्वर‘ शब्द का उपयोग इतने अमूर्त और असम्बद्ध अर्थो में करते हैं कि प्रकृति के नियमों और ‘उनमें‘ कोई अन्तर नही रह जाता । आइन्सटाइन ने एक बार कहा था कि ‘‘मेरा विश्वास उस स्पीनोजा के ईश्वर पर है जो सभी वस्तुओं की क्रमबद्धता समरसता के रुप में प्रगट होता है । मैं उस ईश्वर को नही मानता जो मनुष्य की गतिविधियों और उसके भाग्य से हितबद्ध है ।‘‘ लेकिन ‘‘क्रमबद्धता‘‘ या ‘‘समरसता‘‘ की जगह पर हम ईश्वर शब्द का प्रयोग करें तो इससे क्या फर्क पड़ेगा- इस इल्जाम से बचने के अलावा कि ईश्वर है ही नही, ऐसे तो, इस प्रकार से ईश्वर शब्द के प्रयोग के लिए हर व्यक्ति स्वतंत्र है, पर मुझे लगता है कि इससे ईश्वर की अवधारणा गैर महत्वपूर्ण हो जाती है, गलत तो नही होती ।
      क्या हम प्रकृति के अंतरिम नियमों में हितबद्ध ईश्वर को पा सकते हैं घ् यह प्रश्न कुछ बेतुका सा लगता है । केवल इसलिए नही कि हम अबतक अंतिम नियमों को नही जान पाए हैं, बल्कि ज्यादा इसलिए कि यह कल्पना करना भी मुश्किल है कि ऐसे अंतिम सिद्धान्तों को प्राप्त किया जा सकता है जिनकी और गहन सि़द्धान्तो की मदद से व्याख्या करने की जरुरत ना पड़े । लेकिन यह प्रश्न चाहे जितना अधूरा हो, इसपर कौतूहल न होना असम्भव है कि क्या हम अंतिम सिद्धान्तों में अपने गम्भीरतम सवालांे का जबाब हितबद्ध ईश्वर के कारनामों का कोई प्रतीक घ् मेरा अनुमान है कि हम ऐसा नही कर पाएगें ।
      विज्ञान के इतिहास में हमारे सभी अनुभव एक विपरीत दिशा में, एक रुखे अवैयक्तिक प्रकृति के नियमों की ओर अग्रसर है । इस पथ पर पहला महत्वपूर्ण कदम था आकाश (स्वर्ग) का रहस्योदघाटन । इससे जुड़े महान नायकों को तो हर कोई जानता है । कापरनिकस, जिन्होने प्रस्तावित किया कि विश्व (यूनिवर्स) के केन्द्र में पृथ्वी नही है । गैलिलियो, जिन्होने यह सि़द्ध किया कि कापरनिकस सही थे । ब्रूनो, जिनका अनुमान था कि सूरज असंख्य तारों में से एक तारा है और न्यूटन जिन्होने दिखाया कि एक ही गति और गुरुत्वाकर्षण के नियम सौर मंडल और पृथ्वी पर स्थित वस्तुओं पर लागू होते हैं । मेरे विचार में महत्वपूर्ण क्षण वह था जब न्यूटन ने यह अवलोकन किया कि जो नियम पृथ्वी के चारो ओर चन्द्रमा की गति को नियंत्रित करता है वही पृथ्वी की सतह पर किसी वस्तु का गिरना भी निर्धारित करता है । हमारी (20वीं) शताब्दी में आकाश के रहस्योदघाटन को एक कदम और आगे बढ़ाया अमेरिकन खगोलविद एडविन हबल ने, उन्होने एन्डोमिडा नीहारिका (नेबुला) की दूरी को मापकर यह सिद्ध किया कि यह नीहारिका और निष्कर्षतः ऐसी ही हजारों अन्य नीहारिकाओं, हमारी आकाशगंगा के मात्र बाहरी हिस्से में नही हैं बल्कि वे खुद में कई आकाशगंगा हैं और हमारी आकाशगंगा की तरह प्रभावशाली भी हैं । आधुनिक ब्रह्मांड विज्ञानी ;ब्वेउवसवहपेजद्ध कापर्निकन (सिद्धान्त) की भी बात करते हैं, जिसके अनुसार कोई भी ब्रह्मांड शास्त्रीय सिद्धान्त जो हमारी आकाशगंगा को विश्व मे एक विशेष स्थान देता हो उसे गम्भीरता से नही लिया जा सकता है ।
      जीवन के रहस्यों पर से भी पर्दा उठा है । जस्टस वान लाबिंग व अन्य कार्बनिक रसायनज्ञों ने उन्नीसवीं सदी के प्रारम्भ में यह प्रदर्शित किया कि जीवन से संबधित रसायनों जैसे यूरिक एसिड के प्रयोगशाला संश्लेषण की कोई सीमा नही है । सबसे महत्वपूर्ण खोज चाल्र्स डारविन और अल्फ्रेड रसेल वैलेस की थी, जिन्होने दर्शाया कि सजीव वस्तुओं की आश्चर्यजनक क्षमताओं का क्रमिक विकास स्वाभाविक चयन प्रक्रिया के बिना किसी वाह्य योजना या निर्देशन के हो सकता है । रहस्योद्घाटन की यह प्रक्रिया इस शताब्दी में और तेज हो गयी है जब जैव रसायन और आणविक जीव विज्ञान के क्षेत्र में सजीव वस्तुओं के क्रिया-कलापों की ब्याख्या में लगातार सफलताएं हासिल हो रही हैं ।
      भौतिक विज्ञान की किसी अन्य खोज की तुलना में जीवन के रहस्यों पर से पर्दा उठनें का धार्मिक संवेदनशीलता पर दूरगामी प्रभाव पड़ा । यह आश्चर्य की बात नही है कि भौतिकी और खगोल विज्ञान के क्षेत्र में खोज नही, बल्कि जीव-विज्ञान में न्यूनीकरण ;त्कनबजपवदपेउद्ध और क्रमिक विकास ;म्अवपनजपवदद्ध के सिद्धान्त सबसे ज्यादा दुराग्रहपूर्ण विरोधों को जन्म देते रहें हैं ।
      वैज्ञानिकों ने यदा-कदा उस जैवशक्तिवाद (वाइटलिज्म) के संकेत मिलते हैं, जिसका मत है कि जैविक प्रक्रियाओं की की व्याख्या भौतिकी एवं रसायन के आधार पर नही की जा सकती है । यद्यपि इस शताब्दी में जीव-विज्ञानी (न्यूनीकरण विरोधियों जैसे अन्स्र्ट,मेयर सहित) कुल मिलाकर जैवशक्तिवाद से मुक्ति की दिशा में अग्रसर है, लेकिन 1944 तक भी इरविन श्राडिंगर ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘व्हाट इज लाइफ‘ (जीवन क्या है) में तर्क दिया कि जीवन की भौतिक संरचना के बारे में इतनी जानकारियां है कि यह सही-सही इंगित किया जा सकता है कि क्यों आज का भौतिक विज्ञान जीवन को व्याख्यायित नही कर सकता । उनका तर्क था कि अनुवांशिक सूचनाएं जो जीव-जन्तुओं को नियंत्रित करती हैं बहुत ही स्थाई होती हैं जिन्हे क्वांटम और सांख्यकीय यांत्रिकी में वर्णित त्वरित और लगातार बदलाव वाले संसार में समायोजित नही किया जा सकता है । श्राडिंगर की गलती को आण्विक जीव-विज्ञानी मैक्स पेरुज ने चिन्हित किया, जिन्होने अन्य चीजांे के अलावा हिमोग्लोबिन की रचना पर काम किया था । श्रैडिंगर ने एन्जाइम-उत्प्रेरण नामक रासायनिक प्रक्रिया द्वारा उत्पन्न किये जा सकने वाले स्थायित्व पर ध्यान नही दिया था ।
      आज क्रमिक विकास ;म्अवपनजपवदद्ध के सबसे ज्यादा सम्माननीय अकादमिक आलोचक कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय के ‘स्कूल आफ लाव‘ के प्रोफेसर फिलिप जानसन माने जा सकते हैं । जानसन स्वीकार करते हैं कि क्रमिक विकास हुआ है और यह कभी-कभी स्वाभाविक चयन प्रक्रिया द्वारा होता है, लेकिन वे तर्क पेश करते हैं कि ऐसा कोई अकाट्य प्रमाण नही है जिससे यह साबित हो कि क्रमिक विकास किसी ईश्वरीय योजना से निर्देशित नही होता है । वास्तव में यह प्रमाणित करने की आशा करना मूर्खता होगी कि ऐसी कोई अलौकिक शक्ति नही है जो कुछ उत्परिवर्तनों (म्यूटेशन) के पक्ष में और कुछ के विरोध में पलड़ा नही झुका देती । लेकिन ठीक यही बात किसी भी वैज्ञानिक सिद्धान्त के लिए कही जा सकती है । न्यूटन या आइन्सटाइन के गति के नियमों के सौरमण्डल पर सफलतापूर्वक लागू करने में ऐसा कुछ भी नही है जो हमे यह मानने से रोके कि कुछ धूमकेतु (पुच्छल तारे) बीच-बीच में किसी अलौकिक शक्ति से हल्का-सा धक्का पा लेते हैं । यह अत्यन्त स्पष्ट है कि जानसन यह मुद्दा निष्पक्ष उदारमति सोच के तहत नही उठाते हैं, बल्कि उन धार्मिक कारणों से उठाते हैं जिनका जीवन के लिए वे महत्व समझते हैं पर धूमकेतु के लिए नही । लेकिन किसी भी प्रकार का विज्ञान इसी तरह आगे बढ़ सकता है कि पहले यह मानलिया जाय कि कोई अलौकिक हस्तक्षेप नही है और फिर यह देखा जाय कि इस मान्यता के तहत हम कितना आगे बढ़ सकते हैं । जानसन का तर्क है कि प्राकृतिक क्रमिक विकास वह क्रमिक विकास जो प्रकृति की दुनिया से बाहर किसी सृष्टिकर्ता के निर्देशन या हस्तक्षेप को शामिल नही करता- वास्तव में, जीव-जातियों (स्पेसीज) के उत्पत्ति की बहुत अच्छी व्याख्या प्रस्तुत नही करता । मुझे लगता है कि वे यहां गलती कर बैठते हैं क्योंकि वे उन समस्याओं को महसूस नही कर रहे जिनका सामना किसी भी वैज्ञानिक सिद्धान्त को हमारे अवलोकनों का स्पष्टीकरण देते हुए हमेशा करना पड़ता है । स्पष्ट गलतियों को छोड़ दिया जाय, तो भी हमारी गणनाएं और अवलोकन कुछ ऐसी मान्यताओं पर आधारित होती है जो उस सिद्धांत, जिसको परीक्षण की हम कोशिश कर रहे होते हैं, की वैधता की सीमा के बाहर होतीं हैं । कभी ऐसा नही था जब न्यूटन के गुरुत्वाकर्षण के सिद्धांत या अन्य किसी भी सिद्धांत पर आधारित गणनाएं सभी अवलोकनों से पूरी तरह मेल खाती हों । आज के जीवाश्म विज्ञानियों और क्रमिक विकास पंथी ;म्अवपनजपवदंतलद्ध जीव विज्ञानियों के लेखन मे हम उस स्थिति को पहचान सकते हैं जिससे भौतिक विज्ञान में हम वाकिफ हैं-यानि कि प्राकृतिक क्रमिक विकास के सिद्धान्त जीव विज्ञानियों के लिए अत्यन्त ही सफल सिद्धान्त है, फिर भी इसके स्पष्टीकरण का कार्य अभी समाप्त नही हुआ है । मुझे लगता है यह सिद्धान्त एक अत्यन्त महत्वपूर्ण खोज है जिससे हम जीव विज्ञान और भौतिक विज्ञान दोनो ही क्षेत्रों में बिना किसी अलौकिक हस्तक्षेप की परिकल्पना के दुनिया की ब्याख्या बहुत आगे तक कर सकते हैं ।
      दूसरे सन्दर्भ में, मै सोचता हूं जानसन सही र्है । उनका तर्क है, जैसा वे समझते हैं कि प्राकृतिक क्रमिक विकास के सिद्धान्त और धर्म में एक विसंगति है, और जो वैज्ञानिक और शिक्षाविद इससे इन्कार करते हैं, उनके सामने एक चुनौती पेश करते हैं । वे आगे शिकायत करते हैं कि ‘ प्राकृतिक क्रमिक विकास‘ और ईश्वर के अस्तित्व में तभी तालमेल संभव है, अगर ‘ईश्वर‘ शब्द का अर्थ हम उस प्रथम कारण से ज्यादा न लें जो प्रकृति के नियमों को स्थापित करने और स्वाभाविक प्रक्रिया को लागू करने के बाद आगे की गतिविधियों से विरत हो जाता है ।
      आधुनिक क्रमिक विकास के सिद्धान्त और हितबद्ध ईष्वर मंे विश्वास के बीच की विसंगति मुझे तर्क की विसंगति नही लगती । कोई यह कल्पना कर सकता है कि ईश्वर ने प्रकृति के नियमो को रचा और क्रमिक विकास की प्रक्रिया को इस उद्देश्य से स्थापित किया कि एक दिन स्वाभाविक चयन प्रक्रिया के द्वारा आप और हम प्रकट होगें । लेकिन वास्तविक विसंगति दृष्टि की है । आखिर ईश्वर उन नर-नारियों के दिमाग की पैदाइश नहीं है, जिन्होने अनन्त दूरदर्शी प्रथम कारणों की परिकल्पना की, बल्कि उन दिलों की खोज है जो हितबद्ध ईश्वर के लगातार हस्तक्षेप के लिए लालायित थे ।
     धार्मिक रुढि़वादी यह समझते हैं, जैसा कि उनके उदारवादी विरोधी समझ नही पाते कि जिन विद्यालयों (पब्लिक स्कूल) में क्रमिक विकास के शिक्षण की बहस मे कितनी बड़ी चीज दांव पर लगी है । 1983 में, टेक्सस से आने के थोड़े दिनों बाद, उस अधिनियम पर टेक्सस सीनेट समिति के समक्ष गवाही देने के लिए मुझे आमंत्रित किया गया, जिसके अनुसार राज्य द्वारा खरीदी हुई माध्यमिक विद्यालयों के पाठ्य-पुस्तकों में क्रमिक विकास के सिद्धान्त के पठन-पाठन की तब तक मनाही थी, जब तक उतना ही महत्व सृष्टिवाद को न दिया जाय । समिति के एक सदस्य ने मुझसे पूछा कि राज्य क्रमिक विकास जैसे सिद्धान्त के शिक्षण को कैसे मदद दे सकता है, जो धार्मिक विश्वासों के साथ इतना खिलवाड़ करता है । मैने जबाब दिया कि नास्तिकता से भावनात्मक रुप से जुड़े लोगों के लिए जीव-विज्ञान में शिक्षण के लिए उपयुक्त महत्व से ज्यादा महत्व क्रमिक विकास को देना जितना अनुचित है, उतनी ही विसंगति प्रथम संशोधन के लिए धार्मिक विश्वासों की रक्षा के लिए क्रमिक विकास पर कम महत्व देने में है । यह जन विद्यालयों का काम नही है कि वे वैज्ञानिक सिद्धान्तों के धार्मिक प्रभावों के पक्ष या विपक्ष में अपने को शामिल करे । मेरे उत्तर ने सीनेटर को संतुष्ट नही किया क्योंकि वह मेरी तरह जानता था कि जीव विज्ञान के पाठ्यक्रम में क्रमिक विकास के सिद्धान्त पर उपयुक्त जोर देने का क्या प्रभाव पड़ेगा । ज्योंही मैने समिति कक्ष से बाहर कदम रखा, वह बुदबुदाया- ‘‘अभी भी ईश्वर स्वर्ग में है।‘‘ ऐसा हो सकता है लेकिन लड़ाई मे जीत हमारी हुई । टेक्सस के माध्यमिक स्कूल की पाठ्यपुस्तकों मे केवल आधुनिक क्रमिक विकास के सिद्धान्त को शामिल करने की छूट ही नही मिली, बल्कि इसे शामिल करना अब अनिवार्य हो गया है और वह भी सृष्टिवाद के बारे में बकवास के बिना । लेकिन ऐसी बहुत सारी जगहे हैं(खासकर आज के इस्लामिक देशों में) जहां यह लड़ाई अभी जीती जानी है और कहीं भी यह गारंटी नही है कि यह जीत कायम रहेगी ।
      हम प्रायः यह सुनते हैं कि विज्ञान और धर्म में कोई विरोध नही है । उदाहरण के लिए जानसन की पुस्तक की विवेचना करते हुए स्टीफन गोल्ड कहते हैं कि ‘विज्ञान और धर्म एक-दूसरे के विरोध मे खड़े नही होते, क्योंकि विज्ञान तथ्यात्मक सच्चाइयों से नाता जोड़ता है, जबकि धर्म मानव की नैतिकता से ।‘ बहुत सारी बातों पर मैं गोल्ड से सहमत हूं, किन्तु यहां मुझे लगता है वे दूसरी दिशा मे चले गए हैं । धर्म के अर्थ की परिभाषा, धार्मिक लोगों के वास्तविक विश्वास की परिधि मे ही की जा सकती है  और दुनिया के धार्मिक लोगों के विशाल बहुमत को यह जानकर आश्चर्य होगा कि धर्म का तथ्यात्मक सच्चाइयों से कुछ लेना देना नही है ।
     लेकिन गोल्ड के विचार वैज्ञानिकों और धार्मिक उदारपंथियों के बीच बहुत प्रचलित है, लेकिन मुझे लगता है कि धर्म के उस स्थान से जहां वह कभी विराजमान था, पीछे हटने का महत्वपूर्ण संकेत है । एक समय था जब हर नदी में बिना एक जलपरी के और हर पेंड़ मे बिना एक बनदेवी के प्रकृति की ब्याख्या नही की जा सकती थी । उन्नीसवीं शताब्दी तक भी पेंड़ और जन्तुओं की संरचना सृष्टिकर्ता के प्रत्यक्ष प्रमाण के रुप में देखी जाती थी । आज भी प्रकृति में अनन्त ऐसी वस्तुएं हैं, जिनकी ब्याख्या हम नही कर सकते, लेकिन हम उन सिद्धान्तों को जानते हैं जो उनके कार्य पद्धति को नियंत्रित करते हैं । आज वास्तविक रहस्यों के लिए हमे ब्रह्मांड विज्ञान ;ब्वेउवसवहलद्ध और प्राथमिक कण भौतिकी ;म्समउमदजंतल चंतजपबंस चीलेपबेद्ध की तह में जाना पड़ेगा । उन लोगों के लिए जो धर्म और विज्ञान में कोई विरोध नही देखते, विज्ञान द्वारा कब्जा की गयी जमीन से धर्म के पीछे हटने की प्रक्रिया लगभग पूरी हो चुकी है ।
      इस ऐतिहासिक अनुभव से सीख लेते हुए, हम यह अनुमान लगा सकते हैं कि यद्यपि प्रकृति के अंतिम नियमों मे हमे विशेष सौन्दर्य के दर्शन होगें, लेकिन जीवन या बुद्धि के लिए यहां कोई विशेष जगह नही होगी । आगे चलकर, मूल्य या नैतिकता के मापदण्ड नही बनेगें और इसलिए हमें ईश्वर का कोई संकेत नही मिलेगा, जो इन चीजों पर ही टिके हुए हैं । यह चीजें कहीं और भले मिल जांय, पर प्रकृति के नियमों में नही ।
      मुझे यह स्वीकार करना होगा कि कभी-कभी प्रकृति जरुरत से ज्यादा खूबसूरत लगती है । मेरे घर के कार्यालय की खिड़की के सामने एक हैकबेरी का पेंड़ है । उस पर बार-बार सुसभ्य पक्षियों का समारोह- नीलकंठ, पीले गले वाले वाइरोज और सबसे प्यारे कभी-कभी पहुंचने वाले लाल कार्डिनल । यद्यपि मैं अच्छी तरह समझता हूं कि किस प्रकार चमकीले रंग की पंखुडि़या अपने साथी जोड़े को आकर्षित करने की प्रतिद्वन्दिता मे विकसित हुए, फिर भी यह कल्पना किए बिना नही रहा जा सकता कि यह सारा सौन्दर्य हमारी सुविधा के लिए बनाया गया है । लेकिन यह भी तय है कि पक्षियों और पेड़ो के ईश्वर को, जन्म से ही अंग-भंग करने वाला या कैन्सर देने वाला ईश्वर भी बनना पड़ेगा ।
      सहस्राब्दियों से लोग ईशशास्त्र में उलझे हुए हैं । उनके सामने यह समस्या खड़ी है कि एक अच्छे ईश्वर द्वारा शासित मानी जाने वाली दुनिया मे दुखों का अस्तित्व क्यों है । अलग-अलग दैविक योजनाओं की कल्पना कर उन्होनें इस समस्या के कई विलक्षण हल निकाले हैं । इन समाधानों पर मै तर्क नही करुंगा और न ही अपनी ओर से एक और समाधान पेश करुंगा । विध्वंस की यादों ने मुझे ईश्वर के मनुष्यों के प्रति रवैयों को न्यायपूर्ण बताने की कोशिशों से विमुख कर दिया है । अगर कोई ईश्वर है जिनके पास मनुष्यों के लिए खास योजनाएं हैं तो हमारे लिए अपने इस भाव को छिपाए रखने के लिए वे इतना कष्ट क्यों मोल ले रहे हैं घ् मुझे तो यह अगर अपवित्र नही तो कठोर लगेगा कि ऐेसे ईश्वर की हम अपने प्रार्थनाओं मे फिक्र करें । अन्तिम नियमों के प्रति अपने कठोर दृष्टिकोंण से सभी वैज्ञानिक सहमत नही होगें । मैं किसी को नही जानता जो स्पष्ट रुप से यह कहे कि देवता के अस्तित्व के वैज्ञानिक प्रमाण हैं लेकिन बहुत सारे वैज्ञानिक प्रकृति में बु़िद्धयुक्त जीवन की एक विशेष स्थिति के लिए अवश्य तर्क देते हैं । वस्तुतः यह तो हर कोई जानता है कि जीव विज्ञान और मनोविज्ञान का अध्ययन अपनी-अपनी परिधि में होना चाहिए, न कि प्राथमिक-कण- भौतिकी के सन्दर्भ में । लेकिन यह बुद्धि या जीवन के लिए विशेष स्थिति का द्योतक नही है, क्योंकि यही बात रसायन विज्ञान और द्रव विज्ञान के संबध में भी सही है । दूसरी ओर, यदि हम अभिमुखी ब्याख्याओं के मिलन बिन्दु पर अंतिम नियमों में बुद्धियुक्त जीवन की विशेष भूमिका खोजें तो हम यह निष्कर्ष निकालेगें कि वे सृष्टिकर्ता, जिन्होने ये नियम बनाए, हमलोगों में खास दिलचस्पी रखते थे ।
      जान व्हीलर इस तथ्य से काफी प्रभावित हैं कि क्वांटम यांत्रिकी की मानक कोपेनहेगन व्याख्या के अनुसार किसी भौतिक प्रणाली में स्थान, उर्जा या संवेग जैसे गुणमापकों (तत्वों) का एक निश्चित मान तबतक नही बताया जा सकता जबतक कि किसी पर्यवेक्षक के यंत्र से इन्हे माप न लिया जाय । व्हीलर के लिए क्वांटम यांत्रिकी सार्थकता के लिए एक प्रकार के बुद्धियुक्त जीवन की जरुरत है । हाल में व्हीलर ने और आगे जाकर प्रस्तावित किया है कि बुद्धियुक्त जीवन को विश्व में दिखना ही नही बल्कि उसके हर हिस्से में फैल जाना चाहिए ताकि विश्व की भौतिक स्थिति के बारे में सूचना का हर बिट ;ठपजद्ध प्राप्त किया जा सके । मेरे हिसाब से व्हीलर के निष्कर्ष प्रत्यक्षवाद ;च्वेपजपअपेउद्ध के मत को अत्यन्त गम्भीरता से लेने के खतरे का अच्छा उदाहरण प्रस्तुत करते हैं । प्रत्यक्षवाद का तर्क है कि विज्ञान को उन्ही क्षेत्रों तक अपने आप को सीमित रखना चाहिए जिनका हम अवलोकन कर सकते हैं । मैं और अन्य भौतिक विज्ञानी क्वांटम यांत्रिकी की दूसरी यथार्थवादी पद्धति को वरीयता देते हैं, जो तरंग फलन ;ॅंअम निदबजपवदद्ध  के आधार पर प्रयोगशालाओं और पर्यवेक्षकों, साथ ही साथ अणुओं और परमाणुओं की व्याख्या कर सकता है, जो नियमों द्वारा नियंत्रित होते हैं और इसबात पर वस्तुगत रुप से निर्भर नही रहते कि पर्यवेक्षक मौजूद है या नही ।
      कुछ वैज्ञानिक इस बात पर जोर देते है कि कुछ मौलिक स्थिरांको के मान विश्व में बु़िद्धयुक्त जीवन की मौजूदगी के अनुकूल हैं । अबतक यह स्पष्ट नही हो पाया है कि इस अवलोकन के पीछे कुछ ठोस आधार है, लेकिन अगर ऐसा हो तो भी यह आवश्यक रुप से किसी दैविक उद्देश्य के क्रियान्वयन की ओर इंगित नही करता। बहुत सारे आधुनिक ब्रह्मांड-विज्ञान के सिद्धान्तों मे प्रकृति के ये तथाकथित स्थिरांक (जैसे कि प्राथमिक कणों की मात्रा ) स्थान और समय के साथ, और यहां तक कि विश्व के तरंग फलन ;ॅंअम निदबजपवदद्ध  के एक पद से दूसरे के पद तक में बदल जाते हैं । अगर यह सही हो, तो जैसा हम देख चुके हैं, एक वैज्ञानिक विश्व के उसी हिस्से में रहकर प्रकृति के नियमों का अध्ययन कर सकता है जहां स्थिरांको को बुद्धियुक्त जीवन के क्रमिक विकास के अनुकूल मान प्राप्त होते हैं ।
      सादृष्य के लिए हम एक उदाहरण लेते हैं । मान लीजिए कि एक ग्रह है, जिसका नाम है प्राइमपृथ्वी ;म्ंतजीचतपउमद्ध  यह हमारी पृथ्वी से हर तरह से अभिन्न है, सिर्फ इसके अलावे कि उस ग्रह के मनुष्यों नंे बिना खगोल विज्ञान को जाने भौतिकी के विज्ञान को विकसित किया है (उदाहरण के लिए कोई यह कल्पना कर सकता है कि प्राइम पृथ्वी की सतह शाश्वत रुप से बादलों से घिरी रहती है) । जैसा कि हमारी पृथ्वी पर है । प्राइम पृथ्वी के छात्र भौतिक विज्ञान की पाठ्य पुस्तकों के पीछे मौलिक स्थिराकों की सारणी अंकित पाएगें । इस सारणी में प्रकाश की गति, इलेक्ट्रान की मात्रा आदि-आदि लिखी होगी, और एक अन्य मौलिक स्थिरांक लिखा होगा जिसका मान 1.99 कैलोरी उर्जा प्रति मिनट प्र्रति वर्ग सेंटीमीटर होगा, जो प्राइम पृथ्वी की सतह पर किसी अनजान बाह्य स्रोत से आने वाली उर्जा की माप होगी । पृथ्वी पर यह सूर्य-स्थिरांक कहलाती है, क्योंकि हम जानते हैं यह उर्जा हमें सूर्य से प्राप्त होती है । लेकिन प्राइम पृथ्वी पर किसी के पास यह जानने की विधि नही होगी कि यह उर्जा कहां से आती है और यह स्थिरांक यही मान क्यों ग्रहण करता है । प्राइम पृथ्वी के कुछ वैज्ञानिक इस पर जोर दे सकते हैं कि स्थिरांक का मापा गया यह मान जीवन के प्रकट होने के अत्यन्त अनुकूल है । अगर प्राइम पृथ्वी 2 कैलोरी प्रति मिनट प्रति वर्ग संेटीमीटर से ज्यादा या कम उर्जा प्राप्त करता तो समुद्रों का पानी या तो भाप या बर्फ होता, और प्राइम पृथ्वी पर द्रव जल या अन्य उपयुक्त विकल्प जिसमें जीवन विकसित हो सके, की कमी हो जाती । भौतिक विज्ञानी इससे यह निष्कर्ष निकाल सकते थे कि 1.99 कैलोरी प्रति मिनट प्रति वर्ग सेंटीमीटर का यह स्थिरांक ईश्वर द्वारा मनुष्य की भलाई के लिए सेट किया गया है । प्राइम पृथ्वी पर कुछ संशयवादी भौतिक विज्ञानी यह तर्क कर सकते थे कि ऐसे स्थिराकों की व्याख्या अतंतोगत्वा भौतिकी के अंतिम नियमों से की जा सकेगी और यह एक मात्र संयोग है कि वहां इसका मान जीवन के अनुकूल है । वास्तव में दोनो ही गलत होते । जब पृथ्वी प्राइम के निवासी अखिर खगोल विज्ञान विकसित कर लेते, तब वे जानते कि उनका ग्रह इसलिए 1.99 कैलोरी प्रति मिनट प्रति वर्ग सेंटीमीटर उर्जा प्राप्त करता है क्योंकि पृथ्वी की तरह उनका ग्रह भी एक सूरज से 9.3 करोड़ मील दूर है जो प्रति मिनट 56 लाख करोड़ कैलोरी उर्जा उत्सर्जित करता है । और वे यह भी देखते कि दूसरे ग्रह जो उनके सूरज से जादा निकट हैं इतने गर्म हैं कि वहां जीवन पैदा नही हो सकता और बहुत सारे ग्रह जो उनके सूरज से जादा दूर हैं वे इतने ठंल हैं ।
      हम अपने तर्क को और आगे बढ़ाएगें । जैसा कि हमने पाया है कि भौतिकी के सिद्धान्त जितने ज्यादा मौलिक होते हैं उसका ताल्लुक हमसे उतना ही कम होता है । एक उदाहरण लें, 1920 के प्रारम्भ में ऐसा सोचा जाता था कि केवल इलेक्ट्रान और प्रोटान ही प्राथमिक कण हैं । उस समय यह माना जाता था कि ये ही घटक हैं, जिससे हम और हमारी दुनिया बनी है । जब नए कण जैसे न्यूट्रान की खोज हुई तो पहले यह मानलिया गया कि वे इलेक्ट्रान और प्रोटान से ही बने होगें, लेकिन आज के तत्व बिलकुल भिन्न हैं ।
      अब हम यह निश्चित रुप से नही कह सकते कि प्राथमिक कणों से हमारा क्या तात्पर्य है, पर हमने यह महत्वपूर्ण सीख ली है कि सामान्य पदार्थो में इन कणों की उपस्थिति उनकी मौलिकता के बारे में कुछ नही बताती । लगभग सभी कणों का प्रभाव क्षेत्र ;थ्पमसकद्ध  जो आधुनिक कणों एवं अन्र्तक्रियाओं के मानक माडल में प्रकट होते हैं, का इतनी तेजी से ह्रास होता है कि सामान्य पदार्थ में वे अनुपस्थित होते हैं और मानव जीवन में कोई भूमिका अदा नही करते । इलेक्ट्रान हमारे दैनन्दिन दुनिया का एक आवश्यक हिस्सा है, जबकि म्यूअँन और अँउन नामक कण हमारे जीवन में कोई महत्व नही रखते, फिर भी सिद्धान्तों मे उनकी भूमिका के अनुसार इलेक्ट्रान को म्यूअँन और राँअन से किसी भी प्रकार ज्यादा मौलिक नही कहा जा सकता, और व्यापक रुप से कहा जाय तो किसी वस्तु का हमारे लिए महत्व और प्रकृति के नियमों के लिए उसके महत्व के बीच सहसम्बन्ध की खोज किसी ने कभी नही की है।
      वैसे ईश्वर के बारे में जानकारी विज्ञान के खोजो से हासिल करने की उम्मीद ज्यादातर लोगों ने नही पाली होगी । जाँन पाँल्किंगहोम ने एक ऐसे धर्म-विज्ञान के पक्ष में भावपूर्ण तर्क दिए हैं जो ‘मानव विवेचना की परिधि के अंदर हो, पर जिसमे विज्ञान का भी घर हो । यह धर्म विज्ञान धार्मिक अनुभवों, जैसे रहस्य का उद्घाटन (ज्ञान प्राप्ति), पर आधारित हो, ठीक उसी तरह जैसे विज्ञान प्रयोग और अवलोकन पर आधारित होता है, उन्हे उन अनुभवों की गुणात्मकता का आत्म-परीक्षण करना होगा । लेकिन दुनिया के धर्मो के अनुयायियों का बहुतायत खुद के धार्मिक अनुभवों पर नही बल्कि दूसरों के कथित अनुभवो द्वारा उद्घाटित सत्य पर निर्भर करता है । ऐसा सोचा जा सकता है कि यह सैद्धान्तिक भौतिक विज्ञानियों के दूसरों के प्रयोगो पर  निर्भर करता है । ऐसा सोचा जा सकता है कि यह सैद्धान्तिक भौतिक विज्ञानियों के दूसरे के प्रयोगों पर निर्भरता से भिन्न नही है । लेकिन दोनों में एक महत्वपूर्ण अन्तर है । हजारो अलग-अलग भौतिक विज्ञानियों की अन्र्तदृष्टि भौतिक वास्तविकता की एक संतोषजनक (पर अधूरा) समान समझ पर अभिकेन्द्रित हुई है । इसके विपरीत, ईश्वर या अन्य चीजों के बारे मे धार्मिक रहस्योदघाटनों से उपजे विवरण एकदम भिन्न दिशाओं में संकेत करते हैं । हम आज भी, हजारों सालों के ब्रह्मवैज्ञानिक विश्लेषण के बावजूद, धार्मिक उद्घाटनो से मिली शिक्षा की किसी साझा समझ के निकट भी नही है।
      धार्मिक अनुभव और वैज्ञानिक प्रयोग के बीच एक फर्क है । धार्मिक अनुभव से प्राप्त ज्ञान काफी संतोषप्रद हो सकता है । इसके विपरीत, वैज्ञानिक पर्यवेक्षण से प्राप्त विश्व-दृष्टिकोंण अमूर्त और निर्वैयक्तिक होता है । विज्ञान से इतर, धार्मिक अनुभव जीवन में एक उद्देश्य के विशाल ब्रह्मांडीय नाटक में अपनी भूमिका निभाने के लिए सुझाव पेश कर सकते हैं और जीवन के पश्चात एक निरन्तरता को बनाए रखने के लिए ये हमसे वादा करते हैं । इन्ही कारणों से मुझे लगता है कि धार्मिक अनुभव से प्राप्त ज्ञज्ञन पर इच्छाजनित सोच की अमिट छाप है ।
      1977 की अपनी पुस्तक ‘ द फस्र्ट थ्री मिनट्स‘ (पहले तीन मिनट) में मैने एक अविवेकपूर्ण टिप्पणी की थी कि ‘ जितना ही हम इस विश्व को समझते जाते हैं, उतना ही यह निरर्थक लगता है घ् ‘ मेरा यह मतलब नही था कि विज्ञान हमें सिखाता है कि यह विश्व निरर्थक है, बल्कि यह बताना था विश्व खुद किसी लक्ष्य की ओर इशारा नही करता । मैने तत्काल यह जोड़ा था कि ऐसे रास्ते हैं जिसमें हम अपने आप अपने जीवन के लिए एक अर्थ नें का प्रयास । लेकिन क्षति तो हो चुकी थी । उस मुहावरे ने तबसे मेरा पीछा किया है । हाल में एलन लाइटमैन और राँबर्ट ब्रेबर ने सत्ताइस खण्ड ब्रह्माण्ड विज्ञानियो और भौतिक विज्ञानियों के साक्षात्कार प्रकाशित किए हैं । इनमें से ज्यादातर विज्ञानियों से साक्षात्कार के अन्त में पूछा गया कि वे उस वक्तव्य के बारे में क्या सोचते हैं । विभिन्न विशेषणों के साथ, दस साक्षात्कार देने वाले मुझसे सहमत थे और तेरह असहमत । लेकिन तेरह में से तीन इसलिए असहमत थे क्यों कि वे यह समझ नही पाए कि विश्व में कोई किसी अर्थ की आशा क्यों करेगा । हावर्ड के खगोल विज्ञानी मारग्रेट गेलर ने पूछा-‘............इसका कोई अर्थ क्यों होना चाहिए घ् कौन-सा अर्थ  घ् यह तो मात्र एक भौतिक प्रणाली है । इसमें अर्थ कैसा घ् मैं उस वक्तव्य से एकदम अचम्भित हूं‘ । प्रिन्सटन के खगोल विज्ञानी जिम पीबल्स ने उत्तर दिया ‘‘मैं यह मानने को तैयार हूं कि हमलोग बहते हुए और फेंके हुए हैं।‘‘ (पीबल्स को भी अन्दाजा था कि मेरे लिए वह एक बुरा दिन था।) प्रिन्सटन के दूसरे खगोल विज्ञानी ण्डविन टर्नर मुझसे सहमत थे, किन्तु उनका अनुमान था कि मैने यह टिप्पणी पाठक को नाराज करने के उद्देश्य से की थी । एक अच्छी प्रतिक्रिया टेक्सस विश्वविद्यालय के मेरे सहकर्मी, खगोल विज्ञानी गेरार्ड द वाकोलियर्स की थी। उन्होने कहा कि वे सोचते हैं कि मेरा उत्तर नोस्टालजिया पैदा करने वाला था । वास्तव में यह वैसा ही था-उस दुनिया के लिए जहां स्वर्ग ईश्वर के गौरव की घोषणा करते हैं, वह नोस्टालजिया पैदा करने वाला ही था ।
      लगभग 150 वर्ष पहले मैथ्यू आर्नोल्ड ने समुद्र की लौटती लहरों मे धार्मिक विश्वास के पीछे हटते कदमों के दर्शन किए थे और जल की ध्वनि में उदासी का गीत सुना था । प्रकृति के नियमों में किसी चिन्तित सृष्टिकर्ता द्वारा तैयार योजना, जिसमें मनुष्य कुछ खास भूमिका में होते, को देख पाना कितना कितना दिलचस्प होता । लेकिन ऐसा कर पाने में अपनी असमर्थता में मुझे उस उदासी का एहसास हो रहा रहा है । हमारे वैज्ञानिक सहकर्मियों में कुछ ऐसे हैं जो कहते है कि उन्हे प्रकृति के चिन्तन से उसी आध्यात्मिक संतोष की प्राप्ति होती है जो औरों को परम्परागत रुप से किसी हितबद्ध ईश्वर में विश्वास से मिलता है । उनमें से कुछ को तो ठीक वैसा ही अहसास भी होता होगा, मुझे नही होता । और मुझे नही लगता कि यह प्रकृति के नियमों की पहचान करने में सहायक होगा, जैसा कि आईन्सटाइन ने एक प्रकार के दूरस्थ और निष्प्रभावी ईश्वर को मानकर किया । इस धारणा को युक्तिसंगत दिखाने के लिए ईश्वर की समझ को हम जितना परिमार्जित करते हैं, उतना ही और निरर्थक लगता है ।
      आज के वैज्ञानिकों में इन मसलों पर सोचनेवालो में मैं शायद लीक से हटकर हूँ । चाय या दोपहर के भोजन के चन्द मौकों पर जब बातचीत धार्मिक मुद्दों को छूती है तो मेरे मित्र भौतिक विज्ञानियों मे से ज्यादातर की सबसे तीखी प्रतिक्रिया हल्के आश्चर्य और मनोविनोद के रुप में व्यक्त होती है, जिसमें यह भाव होता है कि अब भी कोई क्या इन मुद्दांे को गम्भीरता से लेता है । बहुत सारे भौतिक विज्ञानी अपनी नृजातीय ;म्जीदपबद्ध  पहचान बनाए रखने के लिए और विवाह, अन्त्येष्टि के मौकों पर इसका उपयोग करने के लिए, अपने अभिभावको के विश्वास से नाम मात्र का नाता जोड़े रहते हैं लेकिन इनमें से शायद ही कोई उसके धर्मतत्व पर विचार करता है । मैं ऐसे दो व्यापक सापेक्षता ;ळमदमतंस तमसंजपअपजलद्ध  पर काम करने वाले वैज्ञानिकों को जानता हूं जो समर्पित रोमन कैथोलिक हैं । बहुत सारे सैद्धान्तिक भौतिक विज्ञानी हैं जो यहूदी रिवाजों के अनुपालक हैं । एक प्रायोगिक भौतिक विज्ञानी हैं, जिनका ईसाई धर्म में पुनर्जन्म हुआ है । बहुत सारे सैद्धान्तिक भौतिक विज्ञानी हैं जो यहूदी रिवाजों के अनुपालक हैं । एक सैद्धान्तिक भौतिक विज्ञानी जो समर्पित मुस्लिम हैं और एक गणितज्ञ भौतिक विज्ञानी हैं जिनका इंग्लैण्ड के गिरजाघर में पुरोहिताभिषेक हुआ है। निस्संदेह अन्य अत्यन्त धार्मिक भौतिक विज्ञानी होगें जिन्हे मैं नही जानता या जो अपना मत खुद तक ही सीमित रखते हैं । लेकिन जितना मैं अपने अवलोकनों के आधार पर कह सकता हंू कि आज ज्यादातर भौतिक विज्ञानी धर्म में पर्याप्त रुचि नही रखते और उन्हे व्यावहारिक नास्तिक कहा जा सकता है ।
      कट्टरपंथियों और धार्मिक रुढि़वादियों की अपेक्षा धार्मिक उदारपंथी वैज्ञानिकों से अपने रुख मे एक मायने में ज्यादा दूर हैं । धार्मिक रुढि़वादी, वैज्ञानिकों की तरह, कम से कम जिन चीजों पर वे विश्वास करते हैं उसके बारे मे बताएगें कि वे ऐसा इसलिए करते हैं क्योंकि वही सत्य है, न कि इसलिए क्योंकि वह अच्छा है या खुश करता है । लेकिन बहुत सारे धार्मिक उदार पंथी यह सोचते हैं कि अलग-अलग लोग अलग-अलग परस्पर असम्बद्ध चीजों पर विश्वास कर सकते हैं और उनमें से कोई गलत नही होता जबतक कि उनका विश्वास उनके काम आता है ।  यह पुर्नजन्म में विश्वास करता है तो वह स्वर्ग और नरक में । तीसरा यह मानता है कि मृत्यु के बाद आत्मा समाप्त हो जाती है । लेकिन कोई भी तबतक गलत नही कहा जा सकता जबतक कि उन्हे इन विश्वासों में आध्यात्मिक संतोष की तेज धार मिलती है । सुसान साँनटैग के मुहावरे में कहें- ‘यह मुझे बटेªण्ड रसेल के उस अनुभव की कहानी की याद दिलाता है, जब 1918 में युद्ध का विरोध करने पर उन्हे जेल में डाल दिया गया था । जेल के नित्यकर्म के पश्चात जेलर ने रसेल से उनका धर्म पूछा । रसेल ने जबाब दिया कि वे एक अज्ञेयवादी ;।हदवेजपबद्ध  हैं । कुछ क्षण के लिए जेलर भौचक्का रह गया, फिर उसका चेहरा खिला और वह बोल पड़ा- ‘मेरा अनुमान है यह एकदम ठीक है । हम सभी एक ही ईश्वर की पूजा करते हैं । क्या ऐसा नही घ् ‘
      वुल्फगैंग पाली से एक बार पूछा गया कि क्या वे सोचते हैं कि वह अमुक अत्यन्त कुविचारित शोध पत्र गलत था । उन्होने जवाब दिया कि ऐसा वर्णन उसके लिए काफी नर्म होगा । वह शोध-पत्र तो गलत भी नही था । मैं सोचता हूं कि रुढि़वादी जिस पर विश्वास करते हैं वह गलत है । लेकिन कम से कम, विश्वास करने का मतलब क्या है, वे यह तो नही भूले । धार्मिक उदारवादी तो मुझे गलत भी नही लगते ।
      हम प्रायः सुनते हैं कि धर्म के सम्बन्ध में धर्मतत्व शास्त्र उतना महत्वपूर्ण नही है- महत्वपूर्ण है कि यह हमे जीवन में कैसे मदद करता है । घोर आश्चर्य ! ईश्वर का अस्तित्व और उसकी प्रकृति, दया और पाप और स्वर्ग और नरक महत्वपूर्ण नही है । मेरा अन्दाज है कि लोग अपने माने हुए धर्म के धर्मतत्व शास्त्र को इसलिए महत्वपूर्ण नही मानते क्योंकि वे खुद यह स्वीकार नही कर पाते कि वे किसी मे विश्वास नही करते । लेकिन पूरे इतिहास के दौरान और आज भी दुनिया के कई हिस्सों मे लोगों ने एक धर्मतत्व शास्त्र या दूसरे में विश्वास किया है और उनके लिए यह महत्वपूर्ण रहा है।
      धार्मिक उदारपंथ के बौद्धिक निस्तेज से कोई निराश हो सकता है, लेकिन यह रुढि़वादी कट्टर धर्म है जिसने क्षति पहुंचाई है । निस्संदेह इसके महान नैतिक और कलात्मक योगदान भी हैं । लेकिन मैं यहां यह तर्क नही करुंगा कि एक तरफ धर्म के इन अवदानों और दूसरी तरफ धर्मयुद्ध  और जिहाद एवं धर्म परीक्षण और सामूहिक हत्या की लम्बी निर्मम कहानी के बीच हमें किस प्रकार संतुलन बैठाना चाहिए । लेकिन इस बात पर मैं अवश्य जोर देना चाहूंगा कि इस तरह के संतुलन बैठाते हुए यह मान लेना सुरक्षित नही है कि धार्मिक अत्याचार और पवित्र युद्ध सच्चे धर्म के विकृत रुप है। मेरे विचार में यह धर्म के प्रति उस मनोभाव का दुष्परिणाम हैय जिसमें गहरा आदर और ठोस निष्ठुरता का गहरा समिश्रण है ।दुनिया के महान धर्मो में से कई यह सिखाते हैं कि ईश्वर एक ईश्वर एक विशेष धार्मिक विश्वास रखने और पूजा के एक खास रुप को अपनाने का आदेश देता है । इसलिए इसमें आश्चर्य नही होना चाहिए कि कुछ लोग जो इन शिक्षाओं को गम्भीरता से लेते हैं वे किन्ही धर्मनिरपेक्ष मूल्यों जैसे सहिष्णुता, करुणा या तार्किकता की तुलना में इन दैनिक आदेशो को निष्ठापूर्वक सबसे ज्यादा महत्व दें ।
      एशिया और अफ्रीका में धार्मिक उन्माद की काली ताकतें अपनी जड़ मजबूत करती जा रही हैं और पश्चिम के धर्मनिरपेक्ष राज्यों में भी तार्किकता और सहिष्णुता सुरक्षित नही है । इतिहासकार ह्यू-रोपर ने कहा है कि सत्रहवीं और अठारहवीं शताब्दी में यह विज्ञान के उत्साह का फैलाव ही था जिसने अंततोगत्वा यूरोप मे डायनों का जलाना समाप्त कर दिया । हमें एक स्वस्थ्य दुनिया के संरक्षण के लिए फिर से विज्ञान के प्रभाव पर भरोसा करना होगा । वैज्ञानिक ज्ञान की निश्चितता नही बल्कि अनिश्चतता ही उसे इस भूमिका के लिए अनुकूल बनाती है । वैज्ञानिकों द्वारा पदार्थ के बारे में अपनी समझ, जिसका प्रत्यक्ष अध्ययन प्रयोगशाला में प्रयोगों द्वारा हो सकता है, बार-बार बदलते हुए देखने के बावजूद, धार्मिक परम्परा या पवित्र ग्रन्थों द्वारा पदार्थ के उस ज्ञान, जो मानवीय अनुभव से परे है, के दावे को गम्भीरता से कौन लेगा घ्
            निश्चित रुप से, दुनिया की तकलीफों को बढ़ाने मे विज्ञान का भी अपना योगदान है । लेकिन सामान्य तौर पर विज्ञान एक दूसरे को मारने का साधन भर उपलव्ध कराता है, उद्देश्य नही । जहाँ विज्ञान के प्राधिकार का उपयोग आतंक को जायज ठहराने के लिए होता रहा है जैसे कि नाजी वंशवाद या सुजनन-विज्ञान ;म्नहमदपबेद्ध । वहां विज्ञान को भ्रष्ट किया गया है । कार्ल पाँपर ने कहा है- ‘‘यह एकदम स्पष्ट है कि तार्किकता नही बल्कि अतार्किकता, धर्मयुद्धों के पहले और बाद में, राष्ट्रीय शत्रुता और आक्रमण के लिए जिम्मेदार रही हैं । लेकिन कोई युद्ध वैज्ञानिक लक्ष्य के लिए वैज्ञानिकों की पहल पर लड़ा गया हो- यह मुझे नही मालूम ।‘‘
      दुर्भाग्यवश, मुझे नही लगता कि युक्तिसंगत दलील पेश करने से तार्किकता की वैज्ञानिक पद्धति को स्थापित करना सम्भव है । डेविड ह्यूूम ने बहुत पहले बताया था कि सफल विज्ञान के पुराने अनुभवों के समर्थन में हम बहस की उस तर्क पद्धति की प्रामाणिकता मानकर चलते हैं, जिसे हम स्थापित करना चाहते हैं । इस प्रकार सभी तर्कपूर्ण बहसों को केवल तर्क पद्धति को अस्वीकार कर मात दिया जा सकता है । इसलिए, अगर हमें प्रकृति के नियमों मे आध्यात्मिक सुख नही मिलता, तो भी इस प्रश्न से नही बच सकते कि इसकी खोज अन्य जगहों पर एक या दूसरे प्रकार के आध्यात्मिक प्रकार में या धार्मिक विश्वास को स्वतंत्र रुप से बदल कर हम क्यों नही कर सकते घ्
      विश्वास करना है या नही करना है, इसका निर्णय पूरी तरह हमारे हाथों मे नही है । अगर मै सोचूँ कि मै यदि चीन के बादशाह का उत्तराधिकारी होता तो मैं ज्यादा सुखी और सुसभ्य होता । लेकिन मैं अपनी इच्छा-शक्ति पर चाहे जितना जोर डालूँ मुझे यह विश्वास नही हो सकता, ठीक उसी तरह जैसे हमारे दिल की धड़कन को रोकने की चाहत ऐसा नही कर सकती । तब भी ऐसा लगता है कि बहुत सारे लोग अपने विश्वास को थोड़ा नियंत्रित करते हैं और उन्ही विश्वासों को चुनते हैं जो उन्हे लगता है कि उन्हे अच्छा और खुश रखेगा । यह नियंत्रण कैसे कार्यान्वित होता है, इसका मेरी जानकारी में सबसे दिलचस्प वर्णन जार्ज आँरवेल के उपन्यास 1984 में मिलता है । नायक विन्सटन स्मिथ अपनी डायरी में लिखता है- ‘ दो धन दो चार होता है, यह कहने की छूट ही मुक्ति है ।‘ धर्म परीक्षक ओ ब्रायन इसे एक चुनौती के रुप में लेता है और उसकी सोच को मजबूरन बदलनें का उपाय करता है । उत्पीड़न में स्मिथ यह कहने के लिए पूरी तरह तैयार हैं कि दो धन दो पाँच होता है । लेकिन ओ‘ ब्रायन केवल यह नही चाहते थे । अन्त में जब दर्द बरदाश्त के बाहर हो जाता है, तो उससे बचने के लिए स्मिथ अपने आप को एक क्षण के लिए यह विश्वास दिलाता है कि दो धन दो पाँच होते हैं । ओ ‘ब्रायन उस क्षण संतुष्ट हो जाते हैं और उत्पीड़न रोक दिया जाता है । ठीक इसी प्रकार अपने और अपने चहेतों की सम्भावित मृत्यु से सामना होने का दर्द हमें अपने विश्वासों में फेरबदल के लिए मजबूर करता है । ताकि हमारा दर्द कम हो जाय । पर सवाल उठता है कि अगर हम अपने विश्वासों में इस तरह से समझौता करने में सक्षम है, तो ऐसा क्यों नही किया जाय  घ्
            मुझे इसके खिलाफ कोई वैज्ञानिक या तार्किक कारण नही दिखलाई पड़ता कि हम अपने विश्वासों में समझौता करके-नैतिकता और मर्यादा के लिए, कुछ सान्त्वना हासिल क्यों न करें । हम उसका क्या करें जिसने खुद को यह विश्वास दिला दिया हो कि उसे एक लाटरी मिलनी ही है क्योंकि उसे रुपयों की बहुत-बहुत जरुरत है घ् कुछ लोग भले उसके इस क्षणिक विशाल ख्वाब से ईष्र्या रखते हों पर ज्यादातर लोग यह सोचेंगे कि वह एक वयस्क और तार्किक मनुष्य की सही भूमिका में, चीजों को वास्तविकता की कसौटी पर देख पाने में, असफल है । जिस प्रकार उम्र के साथ बढ़ते हुए, हम सभी को यह सीखना पड़ता है कि लाटरी जैसे साधारण चीजों के बारे में ख्वाबपूर्ण सोच के लोभ से कैसे बचा जा सके, ठीक उसी प्रकार हमारी प्रजाति को उम्र के साथ बढ़ते हुए यह सीखना ही पड़ेगा कि हम किसी प्रकार के विराट ब्रह््माण्डीय नाटक में किसी ‘हीरो‘ की भूमिका में नही हैं ।
      फिर भी, मैं एक मिनट के लिए भी यह नही सोचता कि मृत्यु का सामना करने के लिए धर्म जो सान्त्वना देता है, विज्ञान वह उपलव्ध कराएगा । इस अस्तित्ववादी चुनौती के लिए मेरी जानकारी में सबसे बढि़या विवरण 700 ईस्वी के आस-पास पूज्य बेडे ;ठमकमद्ध द्वारा रचित पुस्तक ‘द इक्लेजियास्टिकल हिस्ट्री आफ द इंगजिश‘ (अंग्रेजों का गिरजा-सम्बन्धी इतिहास) मे है । बेडे ने लिखा है नाँर्थम्ब्रीया के राजा एडविन ने 627 ईस्वी में यह तय करने के लिए कि उनके राज्य में कौन सा धर्म स्वाकारा जाय एक परिषद की बैठक बुलाई, जिसमें राजा के प्रमुख दरबारियों में से एक ने निम्नलिखित भाषण दिया:
      हे महराज ! जब हम पृथ्वी पर मनुष्य के आज के जीवन की तुलना उस समय से करते हैं जिसकी कोई जानकारी हमारे पास नही है, तो हमे लगता है जैसे एक अकेली मैना शाही-दावत वाले हाँल में द्रुत उड़ान भर रही हो, जहाँ आप किसी जाड़े की रात में अपने नवाबों और दरबारियों के साथ दावत में बैठे हों । ठीक बीच हाल में आनन्ददायी गर्मी प्रदान करने के लिए आग जल रही हो और बाहर जाड़े की तुफानी बारिश मे या बर्फ का प्रकोप हो । मैना हाल के एक दरवाजे से होते हुए दूसरे दरवाजे  तक द्रुत उड़ान भर रही है । जब तक वह अन्दर है, बर्फीले तूफान से सुरक्षित है । लेकिन कुछ क्षणों के आराम के बाद, वह उसी कड़ाके की ठंढ वाली दुनिया में, जहाँ से वह आयी थी, हमारी दृष्टि से ओझल हो जाती है । फिर भी, आदमी थोड़े समय के लिए पृथ्वी पर दिखता है । इस जीवन के पहले क्या हुआ और बाद में क्या होगा, इसके बारे में हम कुछ नही जानते ।‘
      बेडे और एडविन की तरह इस विश्वास से बच पाना मुश्किल है कि उस दावत वाले हाल के बाहर हमलोगों के लिए कुछ अवश्य होगा । इस ख्याल को तिलांजलि देने का साहस ही उस धार्मिक सान्त्वना का छोटा सा विकल्प है, और यह भी संतुष्टि से विहीन नही है । साभार 
- स्टीवन वाइनबर्ग-




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