सोमवार, 31 मार्च 2014

हाशिया पर  लकड़बग्घा मिल गया। 

उस समय तुम कुछ नहीं कर सकोगे

अब लकड़बग्घा
बिल्कुल तुम्हारे घर के 
करीब आ गया है
यह जो हल्की सी आहट
खुनकती हंसी में लिपटी
तुम सुन रहे हो
वह उसकी लपलपाती जीभ
और खूंखार नुकीले दांतों की 
रगड़ से पैदा हो रही है।
इसे कुछ और समझने की
भूल मत कर बैठना,
जरा सी गलत गफलत से
यह तुम्हारे बच्चे को उठाकर भाग जाएगा
जिसे तुम अपने खून पसीने से
पोस रहे हो।
लोकतंत्र अभी पालने में है
और लकड़बग्घे अंधेरे जंगलों 
और बर्फीली घाटियों से
गर्म खून की तलाश में 
निकल आए हैं।
उन लोगों से सावधान रहो
जो कहते हैं
कि अंधेरी रातों में
अब फरिश्ते जंगल से निकलकर
इस बस्ती में दुआएं बरसाते
घूमते हैं
और तुमहारे सपनों के पैरों में चुपचाप
अदृश्य घूंघरू बांधकर चले आते हैं
पालने में संगीत खिलखलिता
और हाथ-पैर उछालता है
और झोंपड़ी की रोशनी तेज हो जाती है।

इन लोगों से सावधान रहो।
ये लकड़बग्घे से
मिले हुए झूठे लोग हैं
ये चाहते हैं
कि तुम
शोर न मचाओ
और न लाठी और लालटेन लेकर
इस आहट
और खुनकती हंसी
का राज समझ
बाहर निकल आओ
और अपनी झोंपड़ियों के पीछे
झाड़ियों में उनको दुबका देख
उनका काम-तमाम कर दो।

इन लोगों से सावधान रहो
हो सकता है ये खुद
तुम्हारे दरवाजों के सामने 
आकर खड़े हो जाएं
और तुम्हें झोंपड़ी से बाहर
न निकलने दें,
कहें-देखो, दैवी आशीष बरस
रहा है
सारी बस्ती अमृतकुंड में नहा रही है
भीतर रहो, भीतर, खामोश-
प्रार्थना करते
यह प्रभामय क्षण है!

इनकी बात तुम मत मानना
यह तुम्हारी जबान
बंद करना चाहते हैं
और लाठी तथा लालटेन लेकर
तुम्हें बाहर नहीं निकलने देना चाहते।
ये ताकत और रोशनी से 
डरते हैं
क्योंकि इन्हें अपने चेहरे
पहचाने जाने का डर है।
ये दिव्य आलोक के बहाने
तुम्हारी आजादी छीनना चाहते हैं।
और पालने में पड़े
तुम्हारे शिशु के कल्याण के नाम पर
उसे अंधेरे जंगल में
ले जाकर चीथ खाना चाहते हैं।
उन्हें नवजात का खून लजीज लगता है।
लोकतंत्र अभी पालने में है।

तुम्हें सावधान रहना है।
यह वह क्षण है
जब चारों ओर अंधेरों में
लकड़बग्घे घात में हैं
और उनके सरपरस्त
तुम्हारी भाषा बोलते
तुम्हारी पोशाक में
तुम्हारे घरों के सामने घूम रहे हैं
तुम्हारी शांति और सुरक्षा के पहरेदार बने।
यदि तुम हांक लगाने
लाठी उठाने
और लालटेन लेकर बाहर निकलने का
अपना हक छोड़ दोगे
तो तुम्हारी अगली पीढ़ी
इन लकड़बग्घों के हवाले हो जाएगी
और तुम्हारी बस्ती में
सपनों की कोई किलकारी नहीं होगी
कहीं एक भी फूल नहीं होगा।
पुराने नंगे दरख्तों के बीच
वहशी हवाओं की सांय-सांय ही
शेष रहेगी
जो मनहूस गिद्धों के
पंख फड़फड़ाने से ही टूटेगी।
उस समय तुम कुछ नहीं कर सकोगे
तुम्हारी जबान बोलना भूल जाएगी
लाठी दीमकों के हवाले हो जाएगी
और लालटेन बुझ चुकी होगी।
इसलिए बेहद जरूरी है
कि तुम किसी बहकावे में न आओ
पालने की ओर देखो-
आओ आओ आओ
इसे दिशाओं में गूंज जाने दो
लोगों को लाठियां लेकर
बाहर आ जाने दो
और लालटेन उठाकर
इन अंधेरों में बढ़ने दो
हो सके तो
सबसे पहले उन पर वार करो
जो तुम्हारी जबान बंद करने

और तुम्हारी आजादी छीनने के
चालाक तरीके अपना रहे हैं
उसके बाद लकड़बग्घों से निपटो।

अब लकड़बग्घा
बिल्कुल तुम्हारे घर के करीब
आ गया है।-सर्वेश्वरदयाल सक्सेना 

शुक्रवार, 28 मार्च 2014

  साझा संस्कृति मंच के तत्ववधान में आयोजित होली मिलन समारोह में शामिल होने का न्यौता था।रास्ते में  चेतगंज से गोदौलिया  के बीच में ६ सांड खड़े मिले  चचा कुछ चुहलबाजी वाले अंदाज में बोले बनारस में इतने दिनों से रह रहा हुँ लेकिन कभी सांड़ों को गायों को दौड़ाते नही देखा, ये सब भी लगता है बनारसियों की तरह सधुआ गये है।  मुझको भी चचा की बात में दम लगा कि  चाहे संकटमोचन में बम फेंको या मंदिर के गेट पर अंडा फेंको अब बनारसी लोग भी बनारसी सांड़ों  की मुद्रा में आ गये है ।  
   हम कुछ जल्दी पहुंच गये थे ।  अस्सी  घाट पर एक न्यूज चैनल का ब्यवसायिक चुनाव चर्चा कार्यक्रम चालू था, कुर्सियां खाली थी ऒयोजको में सम्मिलित एक लड़की दौड़ कर आयी, बैठने का निवेदन करने लगी लेकिन हम तो तमाशा देखने के मूड में थे और एक किनारे बैठ तमाशा देखने लगे। जैसा  अक्सर  दिखाया जाता  है, बहस को घेर कर बड़े पहलवान बनाम नये पहलवान पर केंद्रित करके डब्लू ० डब्लू ० एफ ० चल रहा था।  बड़ा पहलवान ज्यादा बिकाऊ है इसलिए उसको कुश्ती जीतना  दिखाना जरूरी था, लेकिन नया पहलवान सनसनी पैदा कर रहा था इसलिए उसको दिखाना भी मजबूरी था। 
  प्रोग्राम ख़त्म होते होते  सूरज गंगा को तिरछी नजर से देखने लगा था, तबतक   चंचल जी सायकिल पर दरी बाधे और फादर अपने दल के साथ आ चुके थे।  शाम ढलते ढलते दरी बिछ चुकी थी और अफलातून  की बुलंद आवाज में लल्लन यादव जी की मसहूर कविता ---गलत मत कदम उठाओ सोच कर चलो , विचार कर चलो ---से घाट  गूंजने लगा।  घाट पर ऊंचाई से आ रही रोशनी में  सलीम शिवालवी का गरजती आवाज में धुंधली रोशनी में झूमकर कविता पाठ  लोगों को ठिठकने के लिए मजबूर कर रहा था और  बनारस पूरी रौं में गंगा के किनारे बह रहा था।   
    बनारसी भोजपुरी में -- लोग बहुते महान हो जालन, लड़िकनो सयान हो जालन , माह फागुन क हाल मत पूछा , एम्मे बुड़वो जवान हो जालन --  सलीम शिवालवी


रविवार, 16 मार्च 2014

 पत्थर के गिट्कों से  उछलती बाइकों पर बिना फलोर के डिस्को करते मजनुओं, किसी भी जाम की टांग में अपना अगला पहिया डाल कर गुर्राते टेम्पुओं, डाक्टरों की सट्टी में मरीज फंसाते कुंजड़ों , अकबकाये सैलानियों को हर क़ुब्यवस्था का सोंदर्य दिखाते गाइडों, ठगों को भी ठगते महान ज्योतिषियों के साथ शंकर की बरात के अन्य समस्त विभुतिओं की काशी में लोग सदियों से अपना पाप धोने आते रहें है। इ  सही है की ए बार इलेक्सन की होली में खूब कबीर गाये जायेंगे, लेकिन बनारसियों से अनुरोध है की कबीर पर अपना जन्मसिद्ध अधिकार होने के बावजूद इस होली में उनके अश्लील संस्करण से बचियेगा नहीं तो बहरियो समझ जायेंगे कि बनरसिया खाली हवा बाँधते हैं।  हवा पर याद आया चचा कह रहे थे कि नेतवा सब हवा पर भी अपना अधिकार मान लिए है, मीडिया वाले हांक रहे हैं इ बार फलाने की हवा है, अरे कैसा जमाना आ गया बदबू को भी हवा समझते हैं।  अब बदबू  साफ नही कर सकते तो नाक दबा कर निकल जाइये जइसे, अंग्रेजवा सब मनकनीका घाट से निकलते हैं, लेकिन  जिनका कफ़न बेंचने का रोजगार है उ तो रहबे करेंगें न अउर जिनको दाह संस्कार करना है उनकी भी मजबूरिये है भाई.……… चचा समझा रहे थे।            .………………… होली की अग्रिम शुभकामना मित्रों।   

शनिवार, 8 मार्च 2014

   शाम के धुँधलके में कोल्हाड़ की खुशबु फैली हुई थी।  भट्ठे की आग की ऊपरी परत ठंडी होकर चमक को धुंधला कर रही थी रह रह कर कोई चिंगारी चटक कर आग की ऊपरी परतो को कुरेद रही थी। अमूमन अब तक गन्ने से  भेली बनाने का काम हो चुका होता है, क्योकि किसान जल्दी से पेराई करके एक और फसल लेने की कोशिस करते है लेकिन इस साल की बेमौसम बारिशों ने सबकुछ उलट पुलट कर दिया।  भेली बनाते बनाते मौन टूटा---- ए साल आलू लेहलन ,मंटर लेहलन, चना लेहलन, अब गेहुओं लिहन का----लगा चचा आत्मालाप कर रहे हैं।  किसी ने विषय बदला, एतना बरबादी हो..…ता अख़बार में बस पानी से लगल जाम खबर निकलेला। शिवगोविंद के लड़िकवा फोन कइले रहल की इंदौर (मध्य प्रदेश ) के तरफ भी बारिस से बड़ी बरबादी भइल बा गेंहू, चना खेतै में खराब हो जायल चाहत बा। बेबसी की चर्चा से ऊबे रामजी ने गुरूजी को उकसाया--- का गुरु एदा त मामला चपल हो--।  हर चुनाव में रामराज का सपना बुनते बुनते गुरु की दाड़ी खिचड़ी से सफेद हो गई थी, बमक गये---- अरे सुनामी खाली बनरसे में हौ कि ओही बहाने बुढ़वा के धकियावल चाहत हवन एक दरे ढेला चला के भगा देहलन त का सबे भाग जाइ--। लालटेन की रोशनी में ताजी बनी भेली की चमक और चारो ओर गहराते अंधेरे में सबको सड़ रहे आलू की फिकर थी  किसी ने गुरु के दुःख में अपने होंठ नही हिलाए। भेली बन चुकी थी घुटना पकड़कर पीठ सीधी करते हुए लोग अपनी-अपनी सिन्नी लेकर अँधेरे में गुम होने लगे जैसे चुनाव ख़त्म हो गया था।    
कैसी सुनामी है भाई,
जो बस बनारस की सरहद में हैं समाई।
पहले एक पुराने गिद्ध को पत्थर फेंक कर भगा दिया , 
अब एक बुजुर्ग को डरा दिया।
(गावं के कोल्हाड़ पर हुई बतकही )

जेन जी के द्वन्द

सुबह उठकर चाय बनाने के लिए फ्रिज से दूध निकालते समय देखा कि दूध पर मलाई की एक मोटी परत जमी है, जिसको निकालकर अलग एक बरतन में रखा जिसमें लगात...