मंगलवार, 28 मई 2019

2019 का भाष्य




बढ़ते नगरीकरण और फैलते मध्यवर्ग के श्रममुक्त होते घण्टों को कर्मकाण्डीय धार्मिक जीवन भर रहा है। यह नवनागरी कर्मकाण्डी समाज, खेतिहर जीवन के धार्मिक समाज से भिन्न है। खेतिहर समाज का धर्म,  जीवन के सीमित संसाधनों में किसी तरह से अपने दुख को संतोष में बदलने की कला देता था लेकिन सम्पन्न हो रहे भारत के मध्यवर्ग की नयी  धार्मिेक शैली उनको अपनी उपलव्धियों के अभिव्यक्ति का कर्मकाण्डीय कार्यक्रम दे रहा है। इस नए धर्म की जकड़बन्दी को प्रगाढ़ करने के लिए इसके दृष्टिपथ में भिन्न धार्मिक समुदायों के प्रति भय की निरन्तर सर्जना, कुछ सप्रयास और कुछ भिन्न धर्म की गतिविधियों के फलस्वरुप निरन्तर जारी है। इस सम्बन्ध में एक मित्र का कथन उल्लेखनीय है कि बम्बई फिल्म जगत की उदार जीवन शैली में एक प्रसिद्ध फिल्म संगीतकार की बेटी के बुर्कानशीनी का शौक या श्रीलंका मे करोड़पति मुस्लिम परिवार द्वारा अपने धार्मिक विश्वासों के कारण सैकड़ो लोगों को कत्ल किया जाना एक राजनैतिक संदेश भी देता है, जो लोग इसे पढ़ नही पा रहे हैं उनके लिए किसी नवीन ब्रेल लिपि के आविष्कार की आवश्यकता है।  
नगरीय क्षेत्रों जाति, वर्ण व्यवस्था के निषेधों को अतिक्रमित कर निजी जीवन की व्यवस्थाओं जैसे शादी, विवाह, मरनी, करनी आदि को सम्पन्न कराने का एक सुविधा जनक प्लेटफार्म और नगर के वार्ड स्तर तक की राजनैतिक ताकत हासिल करने का जरिया है। अब यह वर्ण व्यवस्था के जंजीरों में जकड़ी निरीह जाति नही है जिसको सशक्त करने मे सामाजिक न्यायवादियों की भूमिका रही है। नगरीय क्षेत्रों में संसद और विधानसभा के निर्वाचनों में जाति से अधिक प्रभावी भूमिका धर्म की है।  
 ग्रामीण समाज मे जाति प्रधानी से लेकर सांसदी तक राजनैतिक ताकत हासिल करने का उपकरण जरुर है लेकिन बाजारों,चट्टीचौराहों के तेजी से कस्बों में बदलने के कारण खेतिहर अर्थ व्यवस्था से तेजी से मुक्त हो रही नयी पीढ़ी पर से उनके समाज के आरक्षण भोगी मध्यवर्गियों की राजनैतिक पकड़ दिनोदिन क्षीण होता जा रही है। सामाजिक न्याय के नाम पर जयन्तियां मनाने वाले और शेष दिनों में प्रायः जाति की संकीर्णताओं में जीने वाले वाले पिछड़े और दलित समुदाय के सरकारी कारकुन प्रमोशन और आरक्षण के नाम पर भले ही गोलबन्दी खड़ी करने की कोशिश करें परन्तु आरक्षण से वंचित और उससे निराश एक विशाल आबादी का नेतृत्व उसके हाथ से फिसल रहा है। इस आरक्षणभोगी समुदाय ने निजी और सार्वजनिक जीवन में उसी भ्रष्ट जीवन शैली को अपनाया हुआ है जिसमें कथित सवर्णो को महारत हासिल है। यह वर्ग भी अपनी वर्गीय प्रकृति के अनुरुप तेजी से अपने गांव मे ही आप्रवासी बन रहा है।
सामाजिक न्याय का लक्ष्य जातीय पहचान के आधार पर उत्पीड़न को समाप्त करना और इन वंचित समुदायों मे एक मध्यवर्ग तैयार करना था कि जाति या वर्ग को समाप्त करना है। इस मायने मे एक स्तर तक यह कार्य पूर्ण हो चुका है अवशेष कार्य वह सत्ताधारियों की गोद में बैठकर रुठने मनाने का खेल करके निपटा सकता है इसके लिए उसे अपनी सुविधाओं की कीमत पर विद्रोही तेवर अपनाने की आवश्यकता नही है। इसीलिए हम सामाजिक न्याय के छोटे दुकानदारों की सत्ता मे सहज आवाजाही देख रहे हैं, हां बड़ी कम्पनियों को बड़े सौदों की तलाश है।
  
हम क्या हैं यह हमारे परिवार, पर्यावरण, मित्र और शत्रुओं से निर्धारित होता है। हम जिससे प्रतिद्वन्दिता करते हैं उसकी तुलना में खुद को सचेतन रुप से बदलते हैं। साम्राज्यवाद के दौर मे हमारे नेतृत्व की प्रतिद्वन्दिता जिनसे थी उन्होने अपने साहस, अध्ययनशीलता, आधुनिक चितंन और पेशेवराना दक्षता से इस ग्रह के बहुत बड़े भूभाग पर कब्जा किया था। साम्राज्यवाद के विरुद्ध लड़ रहे तत्कालीन भारत का नेतृत्व भी उसी स्तर पर स्वयं को परिष्कृत कर उनको चुनौती दिया परिणामतः हम उनको सफल चुनौती दे सके और एक आधुनिक भारत की नींव रख सके। यह दुर्भाग्य रहा कि स्वतंत्रता के उपरान्त विभिन्न कारणों से हम एक मध्ययुगीन मानसिक अवस्थिति मे रह रहे पड़ोसी के विभिन्न कारणों से प्रतिद्वन्दी बनते गए और चाहअनचाहे उसी स्तर पर उतरते चले गए। अंग्रेजी साम्राज्यवाद के विरुद्ध संघर्ष और उसके दमन की पीड़ा विस्मृतियों मे दर्ज हो चुकी है। इस संघर्ष मे प्रमुख भूमिका निभाने वाला कथित सवर्ण और मध्यवर्ग गांधी की हत्या को स्वीकृति प्रदान कर चुका है। नेहरुवादी माडल से तैयार किए गए सार्वजनिक संस्थानों को निजी सम्पत्ति के रुप में औने पौने दामों पर बेच दिए जाने को सामाजिक स्वीकृति मिल चुकी है। ऐसे में उस धारा का प्रतिनिधित्व करने वाले राजनैतिक दल की परम्परागत वंशावलियों में छिटपुट हरी कोंपले दिखेगीं अवश्य लेकिन उपरोक्त जनाधारों के बूते इनकी वापसी दिवास्वप्न है।   
खेती किसानी, आदिवासियों, स्त्रियों और अल्पसंख्यकों के मानवाधिकार, मजदूरी आदि के मुदृे पर धरना प्रदर्शन करने वाला लेफ्ट भी एक पिछड़ी अर्थव्यवस्था वाले समाज के राजनैतिक तौर तरीकों वाला उपकरण मात्र रह गया है जिसके लिए नए जमाने की ई०वी०एम० में जगह नही है। किसी दिन टी०वी० में लाल झण्डा लेकर मुम्बई, दिल्ली जैसे महानगर की तरफ बढ़ते किसानों को लेकर यह मध्यवर्ग को चौंकाता अवश्य है लेकिन किसान की फटी बिवाइयां सम्पन्न किसानों के शोषण और रुढ़िग्रस्त सामाजिक व्यवस्थाओं का आश्रयस्थल भी है, जिससे मुक्त करके इस समुदाय को अपने हितों के लिए एकजुट होकर राजनीति की ªाइविंग सीट पर बैठाना उतना ही दूभर है जितना किसान से मजदूर के रुप में वर्गान्तरित हो रहे इस समुदाय की एक वर्गीय पहचान बनाना।
 लेकिन समाज मे संकटों को अपनी वैकल्पिक राजनीति की तलाश जारी है और जो इसमें से मुखर संकटों को डील करेगा वही भावी राजनीति मे निर्णायक जगह पाएगा। बेरोजगारी, भीषण आर्थिक असमानता, प्राइवेट कम्पनियों मे बेरोजगारों का शोषण, आगनबाड़ी, शिक्षामित्र, किसान मित्र, आशा कार्यकत्री जैसी सेवाओं की सेवाशर्तो को सम्मानजनक किया जाना, अमीरी की सीमारेखा, किसी भी उत्पाद पर अधिकतम लाभ की निर्धारित दर, लघु तथा कुटीर उद्योगों को संरक्षण, सहकारी खेती, प्रति व्यक्ति आय के अनुपात में ही सरकारी कारकुनों के वेतनभत्तों का निर्धारण, प्रत्येक वरिष्ठ नागरिक के लिए सम्मानजनक पेंशन, रोजगार प्रदाता कम्पनियों द्वारा बेरोजगारों का शोषण, चिकित्सा तथा शिक्षा में मची लूट, पर्यावरण, जाति और लिंग आधारित शोषण, राज्य के अधिकार को सीमित करके स्थानीय निकायों को अधिकार सम्पन्न बनाने आदि जैसी चुनौतियों को सूत्रबद्ध करके भावी भारत को सम्बोधित करने के लिए लेफ्ट को अपने बूढ़े तथा रुढ़ नेतृत्व से विद्रोह करके सम्मिलित काडर बनाकर एक नया विकल्प प्रस्तुत करने के अलावा कोई रास्ता नही है। संतोष मात्र इतना है कि वैकल्पिक दल के रुप में लेफ्ट के अन्दर काडर को आकर्षित करने की क्षमता है और लेफ्ट ही धर्म, जाति,वंशवाद और भ्रष्टाचार से मुक्त रहकर काडर आधारित दीर्घकालीन राजनीति करने में सक्षम है। इस चुनाव ने परम्परागत विपक्ष को हाशिए पर डाल कर एक सम्भावनाशील और बेहतर राजनीति के लिए स्थान रिक्त किया है। यदि ऐसा नही हो सका तो इस निर्वात को जाति, उपजाति, गोत्र, क्षेत्र आधारित संगठन और उग्र धार्मिक समूह भरेगें जो दुनिया के दूसरे सबसे विशाल जनसमूह का प्रतिनिधित्व कर रहे राष्टª के लिए अत्यधिक पीड़ा दायी होगा। निश्चय ही यह सर्वाधिक संकटग्रस्त और सर्वाधिक संभावनाशील समय है।       

शुक्रवार, 26 अप्रैल 2019

नंगा युग


धारणाओं के सुकाल मे जनसमर्थन के हाथी जातियों के ठेले पर खड़ी की गयी प्रतिरोधी चट्टानों से नही रुकने वाले हैं। चट्टानें अपने आप मे मजबूत हो सकती हैं लेकिन अस्थिर आधार उनको रोकने का हास्यापद प्रयास भर ही कर सकती है। अगर इन प्रतिरोधी चट्टानों की बुनावट देखेगें तो इसमें आदिम स्मृतियों मे बसी जातीय वैमनस्यता के तत्व ही मिलेगें। इनके द्वारा कोशिश की जाती है कि जातीय वैमनस्यता को मात्र चर्तुवर्ण की वैमनस्यता का आकार दे सकें और उसके बल पर एक बड़ी गोलबन्दी कर सकें लेकिन यह परिकल्पना जमीन पर उतरते-उतरते वास्तविक रंग मे आ ही जाती है। बौद्धिक लोगों को जातियों की दुकानों से राशनपानी मिल जाता है इसलिए जातीय वैमनस्यता पर वर्ण की वैमनस्यता का कलेवर चढ़ाकर भ्रमित करने के लिए कागज काला करते  रहते है। ज्यादा नही जानता हूं लेकिन उत्तर भारत की सच्चाई यही है कि प्रत्येक जाति अपने से भिन्न जाति के प्रति अविश्वास और नफरत पालती है और यही अविश्वास और नफरत उनकी अन्दरुनी जातीय एका का रसायन पैदा करता है। इसीलिए किसी बड़े शत्रु के विरुद्ध यदि जाति आधारित कोई एका बनता भी है तो उसके परिदृश्य से हटते ही यह एका जातिगत स्वार्थ के उतने ही तीखे संघर्ष मे बदल जाता है।  जो लोग पारम्परिक जातीय नफरत की गंध को नकार कर मात्र चर्तुवर्ण की नफरत को सूंघते हैं उन के आचरण का दोहरापन अधिक पारदर्शी होकर दिख रहा है। यह दुहराने की आवश्यकता नही है कि भारतीय समाज कभी भी यूरोपियन अर्थो मे धर्म निरपेक्ष समाज नही रहा है क्योंकि यहां के बहुसंख्यक सामी तौर तरीके के धार्मिक नही थे। यह विभिन्न आर्थिक संस्तरों और हुनर जीवियों का बहुकोशीय प्रकृति पूजक समाज रहा है जो साम्राज्यवाद से मुक्ति के बाद एक आधुनिक जीवन पद्धति के आर्दश की आकांक्षा पाले अभिजातवर्गीय नेतृत्व में अपने संख्याबल को हथियार बनाकर अपने सामुदायिक हितों का सौदा करता रहा है और आवश्यकतानुसार अपनी रुढ़ियों से मुक्त होने की कोशिश भी करता रहा है। इधर बीच तेजी से इस बहुसंख्यक समाज ने एक धार्मिक पहचान से खुद को जोड़ना शुरु किया है और दुर्योग यह है कि इस पहचान की प्रेरणा उसको अपने सहजीवी अल्पसंख्यक धर्म से मिल रही है अन्यथा इस समाज ने अपने अल्पसंख्यकों को भी एक प्रकार की भिन्न जाति मानकर अपने बहुकोशीय ढाचें मे समाहित कर लिया था जिसके साथ अन्य जातियों की तरह ही नफरत और मुहब्बत का रिश्ता बना हुआ था। सूचना के युग ने हमारी बहुत सारी पहचानों की प्रच्छन्नता को बेनकाब कर दिया है और इक्कीसवीं सदी में हम ज्यादा नंगे होने के लिए अभिशप्त हैं।

बुधवार, 17 अप्रैल 2019

––अनमनापन––

इतिहास की व्याख्या की जाती है, भविष्य की कल्पना की जाती है लेकिन वर्तमान को जीना पड़ता है और जीना ही राजनीति है। सांस्कृतिक मनुष्य के अंतरण मे जिस बुद्धि ने नेतृत्व किया उसका स्तर समुदाय मे कभी बराबर नही रहा है। उर्वर मस्तिष्कों ने समुदायों के वर्तमान का नेतृत्व किया, समुदायों के सुदूर भविष्य की सम्भावनाओं के बारे मे सचेत किया तथा अपने उप समूहों के वृत्त बनाए। नवीनता के प्रति आकर्षण और अज्ञात के प्रति उत्सुकता से भरे इन मस्तिष्कों के उप समूह के केन्द्र में जबतक नवीनता के उत्पादन की क्षमता रही तबतक इसकी परिधि को विस्तार मिलता रहा परन्तु यह दुर्योग है कि अधिकांश समूहों के केन्द्र मे नवोन्मेष का पुनरुत्पादन पाण्डा प्रजाति की तरह ही दुर्लभ रहा। इस दुर्योग ने इन उप समूहो को उसी प्रकार की रुढ़ियों से आबद्ध कर दिया, जिनसे उच्छेदन का शंखनाद करके नव समूह का सृजन हुआ था। सभ्यता के शुरुआती चरण में  विचारों के विस्तार की गति अपेक्षाकृत धीमी परन्तु उम्र सदियों मे हुआ करती थी। आज विचारों के विस्तार मे अभूतपूर्व गतिकी आ चुकी है परन्तु उनकी उम्र तेजी से घट रही है। वर्तमान संकट किसी भी विचार के अनिगिनत संस्करणों के तत्काल प्रचलित होने के कारण मौलिकता के क्षीण होते जाने के कारण पैदा हो रहा है और यह नवीनता के अल्पजीवी होने का कारण भी बन रहा है। इसको यूं कहा जा सकता है कि हम किसी मैदान मे दो टीमों के बीच फुटबाल मैच को देखने और उसके साथ जीवंत रिश्ता बनाए
जाने के आदी रहे हैं लेकिन अब हो ये रहा है कि उस मैदान मे कई टीमे फुटबाल खेल रही है, जिनके खेल का स्तर, गोलपोस्ट और नियम भी असमान हैं और हम है कि अब भी मैदान मे उसी पुराने खेल को जीना चाहते हैं। इसी तरह से वर्तमान मे बदलाव की आकांक्षी शक्तियों बनाम यथास्थितिवादी शक्तियों के खेल मे हमारी कर्मकाण्डीय हिस्सेदारी जरुर दिखती हैं लेकिन हमारा अनमनापन भी दिखता है, जिसके टूटने की तभी सम्भावना है जब पूरा खेल एक निर्णायक गोलबन्दी के तहत खेला जाए। या ऐसा भी हो सकता है कि जीवन की विविधता हमारी एकनिष्ठ लक्ष्य की तरफ बढ़ने की क्षमता को इस हद तक प्रभावित कर चुकी हो कि हम टेस्ट मैच के बजाय ट््वण्टी-ट्वण्टी खेलने लायक ही रह गए हों यानी दूरगामी स्थिर लक्ष्य के बजाय निकट के छोटे-छोटे लक्ष्य हमे अधिक विष्वसनीय लग रहे हों और फिर यह अनमनापन इसलिए हो सकता है कि हम पसीना कम बहाना चाहते हैं लेकिन गहरी नींद का सुख भी नही छोड़ना चाहते हैं।

बुधवार, 10 अप्रैल 2019

जहाज

सामाजिक न्यायवाद जाति उन्मूलन की जगह जाति सशक्तीकरण की लड़ाई लड़ता है जिसका चरम वंश और परिवार के सशक्तीकरण पर खत्म होता है। किसी का भी सशक्त होना यानी किसी के सापेक्ष मजबूत होना होता है जो बदलते समीकरण के अनुसार शोषण और शोषित का पक्ष बदल देता है। इसी प्रकार धार्मिक पुनरुद्धानवाद या शुद्धिकरण का चरम राज्यसत्ता पर नियंत्रण कर अन्य धर्मो को बलात प्रतिबन्धित करते हुए अपने अनुयायियों को असमानता की आध्यात्मिक स्वीकार्यता दिलाना होता है। इतिहास में उत्पीड़ित उत्पीड़क की भूमिका मे बदलते रहे हैं जिसके नजदीकी उदाहरण यहूदी या अफ्रीका की हूतू जाति या भारत मे हरित क्रन्ति से सशक्त हुई जातियां है। जाति तथा धर्म का उन्मूलन किसी भी भौगालिक इकाई को दो आयामी समाजिक रचना की तरफ ले जाता है जहां से समता स्वप्न न होकर कुछ दूर पर यथार्थ मे खड़ी दिखेगी और इस प्रकार की स्पष्टदृश्यता किसी भी प्रभुत्वशाली वर्ग के लिए खतरनाक होती है। जाति तथा धर्म के भौतिक आधार समाप्त हो जाने के उपरान्त भी उनके सांस्कृतिक अवशेष सदियों तक प्रचलित रहकर इस विभाजन की नैतिक स्वीकार्यता बनाए रखने का प्रयास करते रहते हैं। संस्कृति जीवन जीने की कला है और धार्मिक और जातिवादी राजनीति का निषेध वैकल्पिक सांस्कृतिक जीवन पद्धति के विकल्प की मांग भी करता है जिसको उपरोक्त दोनो प्रकार की राजनीति का विकल्प विरोध करने वाली राजनैतिक शक्तियों ने प्रस्तुत करने का सचेतन प्रयास नही किया है इसका परिणाम यह दिखता है कि धार्मिक और जातिवादी राजनैतिक शक्तियों की निषेध करने वाली राजनीति शीघ्र ही खोखलेपन का शिकार होकर क्षरित हो जाती है। समस्या यह है कि संस्कृति को रेडिमेड नही प्रस्तुत किया जा सकता है यह सदियों का अभ्यास होता है इसलिए इस क्षेत्र में परिमार्जन ही विकल्प है।ऐसा नही है कि शेष विश्व मे इसके लिए प्रयास नही किए गए लेकिन अभी असफलता दर ज्यादा है लेकिन घबराने की जरुरत नही है हवाई जहाज ही कहां हम चन्द बार में उड़ाना सीख लिए थे।

जेन जी के द्वन्द

सुबह उठकर चाय बनाने के लिए फ्रिज से दूध निकालते समय देखा कि दूध पर मलाई की एक मोटी परत जमी है, जिसको निकालकर अलग एक बरतन में रखा जिसमें लगात...