धारणाओं के सुकाल मे जनसमर्थन के हाथी
जातियों के ठेले पर खड़ी की गयी प्रतिरोधी चट्टानों से नही रुकने वाले हैं। चट्टानें
अपने आप मे मजबूत हो सकती हैं लेकिन अस्थिर आधार उनको रोकने का हास्यापद प्रयास भर
ही कर सकती है। अगर इन प्रतिरोधी चट्टानों की बुनावट देखेगें तो इसमें आदिम स्मृतियों
मे बसी जातीय वैमनस्यता के तत्व ही मिलेगें। इनके द्वारा कोशिश की जाती है कि जातीय
वैमनस्यता को मात्र चर्तुवर्ण की वैमनस्यता का आकार दे सकें और उसके बल पर एक बड़ी
गोलबन्दी कर सकें लेकिन यह परिकल्पना जमीन पर उतरते-उतरते वास्तविक रंग मे आ ही जाती
है। बौद्धिक लोगों को जातियों की दुकानों से राशनपानी मिल जाता है इसलिए जातीय वैमनस्यता
पर वर्ण की वैमनस्यता का कलेवर चढ़ाकर भ्रमित करने के लिए कागज काला करते रहते है। ज्यादा नही जानता हूं लेकिन उत्तर भारत
की सच्चाई यही है कि प्रत्येक जाति अपने से भिन्न जाति के प्रति अविश्वास और नफरत पालती
है और यही अविश्वास और नफरत उनकी अन्दरुनी जातीय एका का रसायन पैदा करता है। इसीलिए
किसी बड़े शत्रु के विरुद्ध यदि जाति आधारित कोई एका बनता भी है तो उसके परिदृश्य से
हटते ही यह एका जातिगत स्वार्थ के उतने ही तीखे संघर्ष मे बदल जाता है। जो लोग पारम्परिक जातीय नफरत की गंध को नकार कर मात्र
चर्तुवर्ण की नफरत को सूंघते हैं उन के आचरण का दोहरापन अधिक पारदर्शी होकर दिख रहा
है। यह दुहराने की आवश्यकता नही है कि भारतीय समाज कभी भी यूरोपियन अर्थो मे धर्म निरपेक्ष
समाज नही रहा है क्योंकि यहां के बहुसंख्यक सामी तौर तरीके के धार्मिक नही थे। यह विभिन्न
आर्थिक संस्तरों और हुनर जीवियों का बहुकोशीय प्रकृति पूजक समाज रहा है जो साम्राज्यवाद
से मुक्ति के बाद एक आधुनिक जीवन पद्धति के आर्दश की आकांक्षा पाले अभिजातवर्गीय नेतृत्व
में अपने संख्याबल को हथियार बनाकर अपने सामुदायिक हितों का सौदा करता रहा है और आवश्यकतानुसार
अपनी रुढ़ियों से मुक्त होने की कोशिश भी करता रहा है। इधर बीच तेजी से इस बहुसंख्यक
समाज ने एक धार्मिक पहचान से खुद को जोड़ना शुरु किया है और दुर्योग यह है कि इस पहचान
की प्रेरणा उसको अपने सहजीवी अल्पसंख्यक धर्म से मिल रही है अन्यथा इस समाज ने अपने
अल्पसंख्यकों को भी एक प्रकार की भिन्न जाति मानकर अपने बहुकोशीय ढाचें मे समाहित कर
लिया था जिसके साथ अन्य जातियों की तरह ही नफरत और मुहब्बत का रिश्ता बना हुआ था। सूचना
के युग ने हमारी बहुत सारी पहचानों की प्रच्छन्नता को बेनकाब कर दिया है और इक्कीसवीं
सदी में हम ज्यादा नंगे होने के लिए अभिशप्त हैं।
शुक्रवार, 26 अप्रैल 2019
बुधवार, 17 अप्रैल 2019
––अनमनापन––
इतिहास की व्याख्या की जाती है, भविष्य की कल्पना की जाती है लेकिन वर्तमान को जीना पड़ता है और जीना ही राजनीति है। सांस्कृतिक मनुष्य के अंतरण मे जिस बुद्धि ने नेतृत्व किया उसका स्तर समुदाय मे कभी बराबर नही रहा है। उर्वर मस्तिष्कों ने समुदायों के वर्तमान का नेतृत्व किया, समुदायों के सुदूर भविष्य की सम्भावनाओं के बारे मे सचेत किया तथा अपने उप समूहों के वृत्त बनाए। नवीनता के प्रति आकर्षण और अज्ञात के प्रति उत्सुकता से भरे इन मस्तिष्कों के उप समूह के केन्द्र में जबतक नवीनता के उत्पादन की क्षमता रही तबतक इसकी परिधि को विस्तार मिलता रहा परन्तु यह दुर्योग है कि अधिकांश समूहों के केन्द्र मे नवोन्मेष का पुनरुत्पादन पाण्डा प्रजाति की तरह ही दुर्लभ रहा। इस दुर्योग ने इन उप समूहो को उसी प्रकार की रुढ़ियों से आबद्ध कर दिया, जिनसे उच्छेदन का शंखनाद करके नव समूह का सृजन हुआ था। सभ्यता के शुरुआती चरण में विचारों के विस्तार की गति अपेक्षाकृत धीमी परन्तु उम्र सदियों मे हुआ करती थी। आज विचारों के विस्तार मे अभूतपूर्व गतिकी आ चुकी है परन्तु उनकी उम्र तेजी से घट रही है। वर्तमान संकट किसी भी विचार के अनिगिनत संस्करणों के तत्काल प्रचलित होने के कारण मौलिकता के क्षीण होते जाने के कारण पैदा हो रहा है और यह नवीनता के अल्पजीवी होने का कारण भी बन रहा है। इसको यूं कहा जा सकता है कि हम किसी मैदान मे दो टीमों के बीच फुटबाल मैच को देखने और उसके साथ जीवंत रिश्ता बनाए
जाने के आदी रहे हैं लेकिन अब हो ये रहा है कि उस मैदान मे कई टीमे फुटबाल खेल रही है, जिनके खेल का स्तर, गोलपोस्ट और नियम भी असमान हैं और हम है कि अब भी मैदान मे उसी पुराने खेल को जीना चाहते हैं। इसी तरह से वर्तमान मे बदलाव की आकांक्षी शक्तियों बनाम यथास्थितिवादी शक्तियों के खेल मे हमारी कर्मकाण्डीय हिस्सेदारी जरुर दिखती हैं लेकिन हमारा अनमनापन भी दिखता है, जिसके टूटने की तभी सम्भावना है जब पूरा खेल एक निर्णायक गोलबन्दी के तहत खेला जाए। या ऐसा भी हो सकता है कि जीवन की विविधता हमारी एकनिष्ठ लक्ष्य की तरफ बढ़ने की क्षमता को इस हद तक प्रभावित कर चुकी हो कि हम टेस्ट मैच के बजाय ट््वण्टी-ट्वण्टी खेलने लायक ही रह गए हों यानी दूरगामी स्थिर लक्ष्य के बजाय निकट के छोटे-छोटे लक्ष्य हमे अधिक विष्वसनीय लग रहे हों और फिर यह अनमनापन इसलिए हो सकता है कि हम पसीना कम बहाना चाहते हैं लेकिन गहरी नींद का सुख भी नही छोड़ना चाहते हैं।
जाने के आदी रहे हैं लेकिन अब हो ये रहा है कि उस मैदान मे कई टीमे फुटबाल खेल रही है, जिनके खेल का स्तर, गोलपोस्ट और नियम भी असमान हैं और हम है कि अब भी मैदान मे उसी पुराने खेल को जीना चाहते हैं। इसी तरह से वर्तमान मे बदलाव की आकांक्षी शक्तियों बनाम यथास्थितिवादी शक्तियों के खेल मे हमारी कर्मकाण्डीय हिस्सेदारी जरुर दिखती हैं लेकिन हमारा अनमनापन भी दिखता है, जिसके टूटने की तभी सम्भावना है जब पूरा खेल एक निर्णायक गोलबन्दी के तहत खेला जाए। या ऐसा भी हो सकता है कि जीवन की विविधता हमारी एकनिष्ठ लक्ष्य की तरफ बढ़ने की क्षमता को इस हद तक प्रभावित कर चुकी हो कि हम टेस्ट मैच के बजाय ट््वण्टी-ट्वण्टी खेलने लायक ही रह गए हों यानी दूरगामी स्थिर लक्ष्य के बजाय निकट के छोटे-छोटे लक्ष्य हमे अधिक विष्वसनीय लग रहे हों और फिर यह अनमनापन इसलिए हो सकता है कि हम पसीना कम बहाना चाहते हैं लेकिन गहरी नींद का सुख भी नही छोड़ना चाहते हैं।
बुधवार, 10 अप्रैल 2019
जहाज
सामाजिक न्यायवाद जाति उन्मूलन की जगह जाति सशक्तीकरण
की लड़ाई लड़ता है जिसका चरम वंश और परिवार के सशक्तीकरण पर खत्म होता है। किसी का
भी सशक्त होना यानी किसी के सापेक्ष मजबूत होना होता है जो बदलते समीकरण के अनुसार
शोषण और शोषित का पक्ष बदल देता है। इसी प्रकार धार्मिक पुनरुद्धानवाद या शुद्धिकरण
का चरम राज्यसत्ता पर नियंत्रण कर अन्य धर्मो को बलात प्रतिबन्धित करते हुए अपने अनुयायियों
को असमानता की आध्यात्मिक स्वीकार्यता दिलाना होता है। इतिहास में उत्पीड़ित उत्पीड़क
की भूमिका मे बदलते रहे हैं जिसके नजदीकी उदाहरण यहूदी या अफ्रीका की हूतू जाति या
भारत मे हरित क्रन्ति से सशक्त हुई जातियां है। जाति तथा धर्म का उन्मूलन किसी भी भौगालिक
इकाई को दो आयामी समाजिक रचना की तरफ ले जाता है जहां से समता स्वप्न न होकर कुछ दूर
पर यथार्थ मे खड़ी दिखेगी और इस प्रकार की स्पष्टदृश्यता किसी भी प्रभुत्वशाली वर्ग
के लिए खतरनाक होती है। जाति तथा धर्म के भौतिक आधार समाप्त हो जाने के उपरान्त भी
उनके सांस्कृतिक अवशेष सदियों तक प्रचलित रहकर इस विभाजन की नैतिक स्वीकार्यता बनाए
रखने का प्रयास करते रहते हैं। संस्कृति जीवन जीने की कला है और धार्मिक और जातिवादी
राजनीति का निषेध वैकल्पिक सांस्कृतिक जीवन पद्धति के विकल्प की मांग भी करता है जिसको
उपरोक्त दोनो प्रकार की राजनीति का विकल्प विरोध करने वाली राजनैतिक शक्तियों ने प्रस्तुत
करने का सचेतन प्रयास नही किया है इसका परिणाम यह दिखता है कि धार्मिक और जातिवादी
राजनैतिक शक्तियों की निषेध करने वाली राजनीति शीघ्र ही खोखलेपन का शिकार होकर क्षरित
हो जाती है। समस्या यह है कि संस्कृति को रेडिमेड नही प्रस्तुत किया जा सकता है यह
सदियों का अभ्यास होता है इसलिए इस क्षेत्र में परिमार्जन ही विकल्प है।ऐसा नही है
कि शेष विश्व मे इसके लिए प्रयास नही किए गए लेकिन अभी असफलता दर ज्यादा है लेकिन घबराने
की जरुरत नही है हवाई जहाज ही कहां हम चन्द बार में उड़ाना सीख लिए थे।
सोमवार, 8 अप्रैल 2019
भीमा कोरेगांव बनाम सारागढ़ी का युद्ध
1 जनवरी 1818 को भीम नदी के किनारे एक लड़ाई लड़ी गयी थी जिसे संख्याबल के अनुसार युद्ध के
बजाय सैनिक शब्दावली मे झड़प कहा जा सकता है। इस लड़ाई में पेशवा के दो हजार सैनिकों
तथा ब्रिटिश कम्पनी के आठ सौ सैनिकों ने भाग लिया था। पेशवा की सेना मे मराठों के साथ
अरबी सैनिकों ने भी भाग लिया था जो कि जाहिर है मुसलमान थे लेकिन ये किसी इस्लामी राज्य
की लड़ाई नही लड़ रहे थे। ये बस अपने हुनर से अपने ढंग की जिन्दगी जीने की लड़ाई लड़
रहे थे। ब्रिटिश कम्पनी मे महार सैनिक लड़ रहे थे और यह भी अपनी जिन्दगी जीने की लड़ाई
ही लड़ रहे थे। यह युद्ध महार सैनिकों की बहादुरी के लिए याद किया जाता है जिन्होने
कम संख्या मे होने के बावजूद पेशवाई सैनिकों को पीछे हटने के लिए मजबूर कर दिया। यह
युद्ध कम्पनी के लिए पेशवाओं पर विजय प्राप्त करने के क्रम में महत्वपूर्ण था और जैसा
कि होता विजेता ने जीत के बाद अपना स्तम्भ स्थापित किया। जाहिर है इस कीर्तिस्तम्भ
अपने हुनर मे असाधारण दक्षता तथा आत्मोसर्ग करने वाले योद्धाओं का नाम अंकित किया गया।
ऐसे स्तम्भ कम्पनी ने और जगहों पर भी स्थापित किया है परन्तु इस युद्ध मे महारों की
बहादुरी की प्रसिद्धि मे अन्य कारण भी सम्मलिति होते गए।
सारागढ़ी
युद्ध का इतिहास भी इसी 19वीं शताब्दी के आखिरी वर्षो में ब्रिटिश साम्राज्य के विस्तार
का एक महत्वपूर्ण पन्ना है जब 12 सितम्बर 1897 को आधुनिक पाकिस्तान के नार्थ वेस्ट
फ्रण्टियर प्रान्त मे सारागढ़ी किले पर लड़ा गया था। इस युद्ध मे ब्रिटिश सेना के 21
सिक्ख बहादुर सैनिकों ने लगभग 10 हजार अफगान सैनिकों का मुकाबला करते हुए अपने प्राणों
का उत्सर्ग किया था और लगभग 450 अफगान सैनिक मारे गए थे। जैसी की परम्परा रही है विजेता
ब्रिटिश साम्राज्य ने इस युद्ध की याद मे भी सारागढ़ी मे एक गुरुद्वारे का निर्माण
कराया।
ब्रिटिश साम्राज्य
से मुक्ति के लगभग 70 साल बाद इस साम्राज्य की हिफाजत मे शहीद हुए योद्धाओं को विभिन्न
कारणों से याद किया जा रहा है। भीमा कोरेगांव का युद्ध सामाजिक न्यायवादियों का स्मृतिचिन्ह
बन चुका है तो सारागढ़ी के युद्ध को मुस्लिम कबाइलियों के विरुद्ध शानदार स्मारक के
रुप मे खड़ा किया गया है। अपने समय मे ये दोनो युद्ध भारतीय उपमहाद्धीप मे उभरी नयी
राजनैतिक ताकत की सेवा मे लड़े गए थे लेकिन अब वर्चुवल विश्व मे इन दोनो युद्धों को पुनः लड़ा जा रहा है तथा इसके नायकों को स्वतंत्र
भारत की प्रभावी राजनैतिक ताकतों ने अपने अपने झण्डे थमा दिए हैं। इन योद्धाओं को जनस्मृतियों
मे दर्ज कराने के लिए दोनो राजनैतिक धाराएं अपने आर्थिक राजनैतिक क्षमता का प्रयोग
कर रही है ताकि यह घटना उनके राजनैतिक प्रतिद्वन्दियों के विरुद्ध प्रेरक बल का कार्य
कर सके। ब्रिटिश साम्राज्य कालीन भारत में हिन्दू वर्णवादी व्यवस्था के शोषण और दमन
के प्रतिरोध मे जागृत हो रही शक्तियों के लिए अगर ब्रिटिश साम्राज्य मुख्य शत्रु नही
था तो अरबी सांस्कृतिक परम्पराओं के प्रति चिढ़ और अपनी वर्चस्वशाली जाति व्यवस्था
की अक्षुण्णता के लिए गोलबन्द हो रही शक्तियों के लिए भी ब्रिटिश साम्राज्य मुख्य शत्रु
नही था। इसलिए आश्चर्यजनक नही है कि आजादी के कुछ दशाब्दियों के उपरान्त ही ब्रिटिश
व्यवस्था को स्थानापन्न करने वाली राजनैतिक धारा के विरुद्ध एक दूसरे की प्रबल विरोधी
दिखने वाली ये राजनैतिक ताकतें आवश्यकतानुसार आपस मे रणनीतिक एवं राजनैतिक सहयोग करती
पायी जाती हैं।
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