बुधवार, 29 जुलाई 2015

डबलू0टी0ओ0- गैट्स के सुपुर्द हो रही उच्च शिक्षा


शिक्षा के मन्दिर को पहले बाजार और अब बाजार को चकलाघर बनाने की साजिश से सहमे सुधीजनो से हाल भरा हुआ था । अपने-अपने खन्दकों से निकल कर जुटे सिपाहियो, छात्रों, नौजवानांे के बीच डबलू0टी0ओ0- गैट्स के सुपुर्द हो रही उच्च शिक्षा पर स्थापित संचार माध्यमो एवं दलो की चुप्पी की ब्याख्या करते हुए अफलातून  ने उचित ही कहा कि गुलाम को आभास ही न हो कि वह गुलाम है, यह गुलामी की सबसे निकृष्ट स्थिति है। माल (शिक्षा) और उपभोक्ता (विद्यार्थी) के रिश्ते विकसित करता डबलू0टी0ओ0 के तीसरी दुनिया के विद्यार्थियों का हमदर्द होने की त्रासदी पर दिल्ली के  साथी विकास गुप्ता ने अपने गहन दृष्टिबोध से सभागार को आलोकित किया । साथी सचिन ने मलयाली भाषी होते हुए भी जिस तरह से हिन्दी मे अपने सम्बोधन से नवउदारवादियो के शिकंजे मे फंसे समाजो की अकुलाहट को जोड़ते हुए पूर्वांचल की जमीन से उपजने वाले आलोड़न की पीठिका तैयार करने का आह्वाहन किया, उससे लगा कि बाजार के शिकंजे मे जकड़े अभिभावकों के दर्द को स्वर मिलने लगा है  । मैं सोच रहा था कि सन् 1848 मे महात्मा ज्योतिबा फूले और सावित्री बाई फुले ने किस मुनाफे के लिए तथाकथित शूद्रों, पिछ़ड़ो, महिलाओ और दारुण विपन्नता मे पलते मनुष्यों के हित में तमाम् रुढि़वादियो से लड़ते हुए विद्यालय खोलकर उनको उस नायाब मानव जीवन से परिचय कराया होगा, जो तत्समय की रुढि़यो से उत्पादित सिर्फ मानवेतर दो पाए ही रह गए होते । शब्दों की बाजीगरी से कैसे लूट को आर्थिक लोकतंत्र की तरह पेश किया जा रहा है, कैसे किसान, आदिवासी, मजदूर को तीसरे दर्जे का नागरिक बनाकर उनसे ही इन दुकानो की चैकीदारी कराने की साजिश रची जा रही है सभागार मे छात्रो, नौजवानो, बुनकरो, सामाजिक कार्यकर्ताओ, विभिन्न शिक्षण संस्थानो के प्राध्यापकों ने महसूस किया ।
और अन्त में-
सम्मेलन मे बहुत दिनो बाद मिले साथी गिरजेश जी की पंक्तियां-
तिलमिलाती अस्मिता की दलित क्षमता,
घात से, उपहास से आक्रोश तीखा,
श्रम निरन्तर, गति सतत,
हैं वेदना-संवेदना के तार झंकृत।
जिन्दगी की भृकुटियों पर बल पड़े हैं ।
मे मैने अभी भी उसी तेवर मे अपने प्रयोगधर्मिता पर अटूट विश्वास देखा, जैसा मैने बीसियों वर्ष पूर्व सरायगोबर्द्धन मे देखा था । धन्यवाद डा0 स्वाती, प्रो0 महेश विक्रम, मनोज त्यागी, डा0 नीता चैबे जी इस आयोजन के लिए ।

कलाम साहब


अब जब भावनाओं का उफान ठंडा पड़ गया है तो मैने भी अपने विचारों को व्यवस्थित करना चाहा है। कलाम साहब क्यंू इतना भाते थे और क्यू हम उनके करीब जाते-जाते ठिठक जाते थे।
    वो मुसलमान थे......ये देवी प्रसाद मिश्र की कविता का शीर्षक नही कलाम साहब के व्यक्तित्व का हिस्सा था, लेकिन बिना तराशी हुई दाढ़ी वाले मुसलमान थे । बचपन से किशोरावस्था तक अक्षरों मे रुचि होने के कारण गीता प्रेस आदि से छपने वाली हिन्दू वीर बालको की कहानियों मे गायो को मुसलमान कसाइयों से बचाते बहादुर बालकों, युवा नारियो या कहे रानियों को विजेता आक्रान्ताओं से बचाने मे उत्सर्ग होने वाले बहादुरो की कहानियों के साथ जो रेखाचित्र उकेरे होते थे वे ऐसी तराशी हुई दाढि़यों वाले खलनायकों के होते, मन मे कही ऐसी दा़िढ़यो के प्रति उपजी नफरत के अंश अभी भी दबे छुपे दंश मार देते हैं । आज का प्रौढ़ हिन्दू इस प्रकार की पहचानो से आगे निकल चुका है और एक बुर्जग मुसलमान का अपनी पहचान के प्रति निष्ठावान नही रहना हमे आश्वस्त करता था कि इस भूगोल के रसायन ने उनको इसी भू-भाग की पहचान ढाल लिया है। वैसे मैं स्व0 असगर अली इंजिनियर साहब का आभारी हूं, जिनकी बदौलत जान सका प्रायः दाढ़ी रखना मुसलमान क्यू पसंद करते हैं और यह भी समझ सका कि काल के साथ प्रतीक कैसे अपनी अलग पहचान गढ़ लेते हैं ।
   गुरु हमारे चेतना मे बहुत अहम स्थान रखते हैं । कभी हम कथित रुप से विश्व गुरु थे और आगे भी हम वैश्विक ताकत की अपेक्षा विश्व गुरु होने मे गहन रुचि रखते है और मुख्य धारा का मीडिया गाहे-बगाहे हमारे सपने को बेचता रहता है। कलाम साहब का सम्पूर्ण व्यक्तित्व ही शिक्षक का था । वो किसी भी प्रयोजन मे पहंुच कर राष्ट्रपति से शिक्षक बन जाते और दर्शक समूह छात्र । संयोग देखिए वो अपने आखिरी वक्त मे भी छात्रों के मुखातिब ही थे । और हम ऐसे शिक्षक को बहुत प्यार करते हैं जो हमारे बच्चों के हौसलों को उड़ान देता है।
  उनके बाल सुलभ व्यक्तित्व मे झलकती निर्मलता से कुछ याद आ रहा है, हमने हाल मे ऐसे किस शिखर पुरुष को देखा है । मुझे मदर टेरेसा और गांधी ही याद आ रहे हैं । हमारे पाखंडी अभिजातवर्गीय समाज मे साधू संत भी सोने के सिंहासन पर बैठकर जनता को मोह माया से मुक्त करते हैं । आपको उनके आखिरी कार्यक्रम मे बैठने के लिए सिंहासन की जगह साधारण कुर्सी लगाए जाने का दृश्य दिख रहा होगा । कदम-कदम पर विषमताएं झेलता साधारण भारतीय ऐसी असाधारण सादगी से ज्यादा कनेक्ट होता है और प्यार करता है।
  कलाम साहब .़वैज्ञानिक थे । उन्होने ऐसा कुछ नही बनाया जो किसान को चिलचिलाती दोपहर मे गेंहू की मड़ायी करने मे हो रहे असाध्य, दमघोंटू श्रम से मुक्त कर सके । उन्होने ऐसा कुछ नही बनाया जो हैण्डलूम के बुनकरों को बड़ी मशीनों की मार से मची भुखमरी से बचा सके । उन्होने ऐसा कुछ नही बनाया गरीब मरीजों को महंगी जांचो से बचा सके । लेकिन उन्होने जो भी बनाया उससे भारतीय प्यार करते हैं, भले ही उसने इस उप महाद्वीप मे हथियारों की दौड़ को गति दे दी हो । अब सवाल उठाएंगे तो बहुत कुछ पूछा जा सकता है, हमने सचिन को प्यार किया लेकिन उसने कितने मैच हमको जिता कर दिया, उसके नाते लोकप्रिय होते क्रिकेट ने सट्टेबाजो को जनता को ठगने का मौका मिला तो इसके लिए सिर्फ सचिन ही दोषी है क्या ।
और मैं क्या हूं, अपनी उच्च जातीय परम्पराओं से उपजा एक साधारण पढ़ा लिखा भारतीय, जिसको स्व0 मुकेश का गाए गीत ‘‘कोई शर्त होती नही प्यार में‘‘ की प्रथम पंक्ति के साथ डा0 कलाम के प्रति अपने प्यार की व्याख्या मिल रही है।    

जेन जी के द्वन्द

सुबह उठकर चाय बनाने के लिए फ्रिज से दूध निकालते समय देखा कि दूध पर मलाई की एक मोटी परत जमी है, जिसको निकालकर अलग एक बरतन में रखा जिसमें लगात...