रविवार, 18 अक्टूबर 2020

पुर्नजन्म( हमारा मोर्चा में प्रकाशित 26-3-2020)

 


1.

   ई बुढ़वा झगड़ा रोप कर अपने तो दऊ पर गया आउर जिनगी भर का किचाइन माथे पर डाल गया, इमिरतिया बरसातू को साइकिल से आते देख कर भुनभुना रही थी।

चुप रह तनि पानी त दे.....बरसातू अपनी साइकिल मड़ई के किनारे खड़ी करके झिलंगही खटिया पर ठहते हुए बोला। आज भी दिन भर कचहरी मे ही बीत गया था उसका।

वकील से भी बतकुच्चन हो गया पता नही काहे जब तारीखे पड़ना था, तो दिन भर बैठा कर एक दिन की मजूरी मरवाने का का मतलब, उसने पानी लेकर खड़ी अपनी पत्नी से बोलते हुए लोटा थाम लिया।

ठेकेदरवा कल फिर टोकेगा कि या तो मुकदमा लड़ लो या राजगिरी करो। फिर सोचा उसका भी दोष नही है, जिसका काम फंसेगा उ तो बोलेगा ही।

2.

मसला पुराना है, बरसातू के बाप को भाइयों से बटवारे मे जो हिस्सा मिला था, उससे सटी हुई थोड़ी सी सार्वजनिक जमीन भी थी। अतिरिक्त सार्वजनिक जमीन के कारण उसके हिस्से की जमीन रकबे मे थोड़ी बड़ी हो गयी थी।

जमीन के उस अतिरिक्त हिस्से पर पर बरसातू के बाप ने अपने बूढ़ी गाय और बकरी की नाद, चरनी बना ली थी। उसी अतिरिक्त हिस्से के लिए भाइयों मे आपस मे काफी गाली-गलौज हुई थी, उनकी पत्नियों ने भी महीनों इस गाली-गलौज को विस्तार दिया था, जिसमें टोला के लोगों को बिला नागा धारावाहिक मनोरंजन हुआ करता था।

3.

   जब का यह वाकया है, तब थर्ड क्लास के सरकारी कर्मचारी साइकिल से चला करते थे।

बरसातू के बाप खेलावन का घर सड़क के किनारे होने के कारण हलके से शाम को वापस लौट रहे लेखपाल को उसके दरवाजे के नीम के पेड़ पर बैठे मुर्गे की बंाग से अपने लड़की के ससुर यानी समधी के स्वागत-सत्कार की समस्या का समाधान सूझ गया।

मुर्गे ने जब दुबारा बांग दिया तो लेखपाल को लगा जैसे मुर्गा उसको ही बुला रहा है। कुछ आगे बढ़ चुके लेखपाल ने साइकिल वापस मोड़ा और खेलावन को पुकारने लगा ।

 ‘‘अरे खेलावन भाई घर कुछ मेहमान आने वाले हैं, इ मुर्गवा दे देते‘‘ उसने नीम के पेंड़ की डालियों में छिपे मुर्गे की ओर इशारा करते हुए कहा ।

खेलावन अपनी तल्ख जबान के लिए मशहूर था। उस दिन सुबह ही किसी ने खेलावन के दरवाजे पर नीबू सिन्दूर रखकर अपना भूत उसके घर भेजा था और उसकी बीबी पूरे दिन आस पड़ोस को गरियाती रही।

खेलवान की मेहरारु पर उस दिन सचमुच का भूत आ गया था, पूरे दिन मानसून की बारिश की तरह कभी उसकी गालियां तेज हो जाती तो कभी हल्की फुहार की तरह धीमी हो जाती। खेलवान काम पर नही गया, पता नही कब किससे बात बढ़ जाय।

दिन भर की चिकचिक से खिन्नमन अभी लेटा ही था कि लेखपाल की पुकार सुनाई दी, उसे यह भी आशंका हुई कि लेखपाल या तो मुर्गे का दाम नही देगा अथवा औने-पौने में खरीदना चाहेगा, इसीलिए उसने सीधे टाट उलट दिया।

लेखपाल कुछ अपमानित महसूस करते हुए वापस घर चला गया और कुछ दिन बाद उसने अपनी व्यथा गांव के कथित मानिन्दों को बताई। सबने उसके दर्द को सहलाया, दरअसल बहुत से सवर्ण पिछड़ी जाति के खेलावन की तल्ख जबानियों को अपने-अपने दिल में सहेजे सही वक्त का इंतजार कर रहे थे।

4.

लेखपाल को गांव के गणितज्ञों का थोड़ा इशारा ही तो चाहिए था, खेलावन के आबादी की जमीन से सटी हुई सार्वजनिक जमीन जिन्दा हो गयी और उस पर अतिक्रमण का मुकदमा कचहरी में दाखिल हो गया।

लोग कहते हैं कचहरी जिसको पकड़ती है, उसकी पीढ़ियों को भी नही बख्शती है। तारीख............वकील.............पेशकार..............मुहर्रिर.....................साहब.............हजूर............पुकार.................हड़ताल...............फीस..................फैसला................अपील...................बहस................के साथ खेलावन की बची खुची उम्र गुजर गयी।

बीस-पच्चीस साल बहुत होते हैं भाइ, अखबारों ने इतने दिनों मे भिंडरवाले से लादेन का सफर तय कर लिया, अमरीका ने  रीगन से बुश और रुस ने गोर्बाचेव से पुतिन का सफर तय कर किया।

गांव में उग रही गुमटियों में बोरे के नमक की जगह बन्द पैकेट का टाटा नमक बिकने लगा। इतने दिनों मे नीम के पेड़ की डालियां खेलावन के क्रिया कर्म में काम आ गयी  और वह मुर्गा भी किसी बिलार के काम आ गया था।

बाप की  विरासत को बरसातू नें दो-चार साल ढोने के बाद...............वकीलों की चैकी पर जम्हाई लेते ............ दाना खाते................... पेशी देते........................दरखासी कागज खरीदते.............................किस्मत खोलने वाली अंगूठी परखते.....................मदारियों का मजमा देखते........................जोश बढ़ाने वाली दवाओं और साण्डा का तेल निहारते.................समझ लिया कि कचहरी रोज कमाने खाने वाले आदमी को तारीख-दर-तारीख मारती है।

5.

कचहरी का चक्कर लगाते-लगाते बरसातू को समझ मे आ गया कि मसला प्रधान से हल हो सकता है।

इस बार के चुनाव मे उसने काफी नाप तौल कर पुराने प्रधान की पार्टी पकड़ ली और जाति, बिरादरी, टोला, मोहल्ला मे जबानी प्रचार से लेकर दारु की पाउच तक बांटने का काम बड़े मन से किया।

प्रधान भी पिछली बार आरक्षण के कारण नही लड़ पाया था और इस बार गांव वालों को वर्तमान से अतीत अच्छा लगने की सहज प्रवृत्ति के चलते और कुछ बिरादरियों का गणित बैठ जाने के कारण झार कर वोट पाया।

तो साहेब जब कोई झार कर वोट पाकर जीत जाता है तो उसको भरम हो जाता है कि उ किसी की बदौलत चुनाव नही जीता है बल्कि कोई उससे काबिले नही है।

6.

खैर जैसे प्रधान झार कर वोट पाकर जीत गया था, वैसे ही उसको जिन्दगी मे बहुत कुछ बड़ी सहजता से मिल गया था।

उसके बाप ने सार्वजनिक उपक्रम की नौकरी से अपना काफी बड़ा निजी उपक्रम खड़ा कर लिया था। आधा दर्जन बहनो मे सबसे छोटा इकलौता भाई होने के कारण उसके हिस्से काफी प्यार-दुलार आया था।

बाप ने उसकी बहनों की शादी बुश-रेडियों और रैले-साइकिल से शुरु करके रंगीन-टी0वी0 और मारुती-800 पर खत्म की थी और इसी से उसने अपने अस्तबल में काफी अच्छे-अच्छे घोड़े(दामाद) बांध लिए थे।

घर में पड़ने वाले प्रयोजनों मे जब इन घोड़ो की हिनहिनाहट उसके दरवाजे पर गूंजती तो समृ़िद्ध के उस अहाते मे चापलूसों की भीड़ उमड़ पड़ती।

बाप के बुढ़ापे और बेटे की जवानी के बीच मे सिर्फ रिटायरमेन्ट के दिन ही बचे थे और बाप ने अपने बचे-खुचे दिन बेटे के साथ गांव मे ही काटने का फैसला किया था।

बड़े होते बेटे ने अपने बहनोइयों की संगत में बातचीत, अदब और मुफ्तखोरी का सलीका भरपूर सीख लिया, जो उसके प्रधानी के दिनों मे सरकारी तंत्र से घुलने-मिलने में बहुत काम आया।

सुबह, शाम हाजिर रहने वाले गांव के निठल्लों के लिए उसका अहाता बड़ी माकूल जगह साबित हुआ, दिन भर ताश-पत्ती और कभी-कभार मिलने वाली चाय से ज्यादा इन निठल्लों का क्या चाहिए था।

कभी-कभार निठल्लों के मां, बाप, पत्नियां उनकी कामचोरी का उलाहना देते माने गरियाते-गरियाते अहाते तक आ जातीं तो, उन बेचारों को जमी-जमाई बाजी छोड़कर खेती-गिरस्ती के जरुरी कामों मे उलझना पड़ता।

इन निठल्लों मे छोटी-छोटी राशियों पर सूद वसूलने वाले कथित सवर्ण थे, तो हरित क्रांति के बाद उभरे पिछड़ी जाति के लोग भी थे, जिन्होने अपनी खेती-गिरस्ती का भी कार्यभार घर की औरतों को सौंपकर अपनी दुनिया अलग कर ली थी और कुछ निरर्थक मेहनत का मतलब समझ चुके दलित भी थे, कहने का मतलब यह पूरा परजीवी सर्व समाज था, जिनको खेतीबारी मे परिश्रम की निरर्थकता का ज्ञान हो गया था।

7.

पहली बार के इलेक्शन में प्रधानी के चुनाव की घोषणा होते ही निठल्लों को मानो नया काम मिल गया, उन्होने उसको चुनाव लड़ने के लिए उकसाना शुरु कर दिया और एक बार ब्लाक पर परचा भरने जाते समय निठल्लों ने जब उसके जिन्दाबाद का नारा लगाया तो उसको पहली बार अपनी सार्थकता समझ में आयी, जिससे चुनाव को लेकर उसका अनमनापन खत्म हो चुका था।

गांव में बाप की समृद्धि ने सम्मानजनक स्वीकृति दिला दी थी, लोग भूल चुके थे कि उसके बाप ने अपने सगे भाइयों के हिस्से की जमीन को उनकी बेटियों की शादी-बीमारी आदि मे मदद के नाम पर किस तरह औने पौने दाम पर खरीदा था, दरअसल गंवई समाज मे परिवार के किसी व्यक्ति को समृद्धि आती है तो वो पहले अपने  भाई, बन्धु, पड़ोसी को ही डंसती है।

  चचाजात भाई, पट्टीदार बहुत दिनों तक दूर रहे, लेकिन समय ने धीरे-धीरे उनके दर्द को कम किया और इसमें बेटे का सहज-सरल स्वभाव भी मरहम ही साबित हुआ था।

  गांव में धीरे-धीरे उग रही गुमटियां ग्लोबलाइजेशन की खबर दे रही थी और निठल्लों के लिए ये गुमटियां ज्यादे बेहतर सार्वजनिक स्थल हो गयी थी।

  प्रधानी के चुनाव मे उतरने का यह भी एक प्रमुख कारण था क्योंकि लोग अहाते की अपेक्षा गुमटियों पर बैठकी करने लगे थे, इनको अहाते मे बनाए रखने के लिए भी चुनाव में भागीदारी जरुरी थी।

  आकंठ दारिद्र्य में डूबा गांव का बहुसंख्य उसकी समृद्धि की चकाचैंध मे बस वोट डालनें की औपचारिकता ही पूरा कर पाया था।

  पहली प्रधानी के शुरुआती कुछ दिनों उसमंे समाज-सेवा का भाव रहा, फिर प्रधानी खाते मे आने वाली धनराशि से साहबों के खैर-मकदम का खर्चा और उसीसे अपना रोजमर्रा का खर्चा निकालने की ब्यावहारिकता समझ मे आ गयी ।

  दो बार आरक्षण के कारण चुनाव नही लड़ पाया तो अपने चेले चाटिंयो को ही खड़ाऊ रखकर प्रधानी चलाना चाहा लेकिन चेले खड़ाऊ पहन कर अहाते के बाहर निकल गए थे।

 इसलिए इसबार का इलेक्शन काफी मंहगा पड़ गया था। अरे भाई इलेक्शन जादेतर या तो खलिहर लड़ते हैं या लतिहर। खलिहर माने जिसके पास  अपनी रोजी-रोटी का संकट न हो और लतिहर माने गांव के गणित मे हमेशा नया कोंण पैदा करके अपना मतलब सिद्ध करने वाले।

(2)

1.

   अगले दिन बरसातू जब काम पर निकला उसके थोड़ी देर बाद ही सोनार का आदमी तकादा करने उसके घर पहुंच गया।

   बरसातू की पत्नी इमरिती हिसाब किताब के माने मे बहुत साफ-पाक थी। दो महीना पहले बाजार के सोनार से महीना खाड़ के उधार पर बिटिया के पहिलौठी लड़के के लिए और बिटिया के चांदी की पैजनी, मुनरी गढ़वा कर भेजी थी।

   का करती, बिटिया की सास लगातार ताना मार रही थी, उसको बरदास नही हो रहा था। उसको भी बिटिया की शान रखनी थी।

   अब वही शान उसको परेशान कर रही थी। उसको इन्तजार था बकरीद का। उसके बकरे का अच्छा दाम पिछले बकरीद पर ही लग रहा था लेकिन उसने लालच मे नही बेचा था कि अगले साल और अच्छा दाम मिल जाएगा।

   उसने महाजन से एकाध महीने की और मोहलत मांगी और विश्वास दिलाया कि एक-एक पैसा जरुर चुकता कर देगी।

   2.

  इस बार के इलेक्शन मे अपनी पार्टी जीतने पर तो बरसातू बड़ी उम्मीद से था। उसको वकील ने समझा दिया था कि सरकार की तरफ से पैरवी नही होगी तो मामला खतम हो जाएगा।

  वकील भी अपने दरिद्र मुवक्किल से उब गया था, वो हर तारीख पर फीस के लिए होने वाली चिकचिक से पिण्ड छुड़ाना चाहता था क्योंकि पुराने मुवक्किल की फीस भी पुरानी होती है और मंुहलगा हो जाने के कारण फीस बढ़ाने के सवाल पर किचाइन करने लगता है।

 मुकदमे मे सरकार माने प्रधान था और चुनाव जीतने के बाद जब प्रधान से उसने अपने मुकदमे की चर्चा किया तो प्रधान का अंदाज कुछ बदल गया था । इसी तरह के कई मामलो मे उसको अपने विपक्षियों को मजा चखाना था, इसलिए बरसातू को जहां वो इलेक्शन के पहले आश्वस्त कर रहा था, वहीं इलेक्शन के बाद हीलाहवाली करने लगा।

3.

  हफ्ता दिन बाद संयोग से प्रधान मुन्हार बेला मे बरसातू के घर के बगल से अकेले गुजर रहा था कि उसने मौका देखकर प्रधान को घेर लिया।

 प्रधान भी थोड़ा थका था और बतिआते बतिआते धुधलके मे उसके दरवाजे पर बिछी खाट पर बैठना चाहा तबतक उसका बकरा बें-बें करता खाट से कूद कर नीचे आ गया।

  प्रधान कुछ परेशान था चुनाव मे उसका काफी खर्चा हो चुका था लेकिन हेली मेली, नेता परेता, थाना, ब्लाक वाले सब दावत के लिए पीछे पड़े थे।

  बकरा जब बें बोलकर खटिया से नीचे कूदा तो प्रधान को समझ मे आ गया कि अगली दावत का इंतजाम कैसे होगा और उसके इशारा करते ही बरसातू की समझ मे आ गया कि बाप के मुर्गे की आत्मा उसके बकरे का रुप धर कर उसके दुआर पर इतने दिनो से माया फैलाए हुए है।

  कमजोर गृहस्थी मे बकरा बड़ी उम्मीद था। जल्दी ही बकरीद आने वाली थी, पिछली बार भाव अच्छा लगा था लेकिन अगले साल और अच्छी कीमत के लालच मे बकरा कुर्बान होने से बचा हुआ था।

  बरसातू के लिए दुविधा खड़ी हो गयी एक तरफ बकरे की कीमत से इमिरितिया का तगादा खतम करा सकता था या दूसरी तरफ उसको प्रधान को देकर कचहरी के जंजाल से छुटकारा पा सकता था।

  प्रधानी के चुनाव मे जितने उत्साह से लगा था उससे उसको उम्मीद थी कि प्रधान खाली ब्यवहार पर फोकट में उसके पक्ष मे बयान देकर मुकदमा खारिज करा सकता है लेकिन झार कर वोट पाने से प्रधान का दिमाग आसमान पर था। अब उसको बरसातू जैसे समर्थकों की सहूलियत से ज्यादा विपक्षियो को सबक सिखाने की पड़ी थी।

4.

  प्रधान के जाने के बाद खटिया पर पड़े-पड़े बरसातू सोचता रहा कि इमिरितिया से इसपर चरचा करे या न करें, कारण मेहरारु जात है कब टोला मोहल्ला मे बकर देगी और सारा खेल बिगड़ जाएगा, पता नही।

  अन्त मे उसे लगा कि बकरा प्रधान को देने की बात तो इमिरितिया को बताए लेकिन मुफ्त मे देने की बात गोल कर जाय और कौनो मौके पर बाद मे बताया जाएगा । उसने मेहरारु को समझाया कि प्रधान के यहां जलसा है बड़े-बड़े साहेब, नेता लोग आएगें और बकरा मांग रहे हैं, कीमत समझ कर दे देगें।

  इमिरितिया पहले तोे भड़क गयी क्योंकि उसको अन्दाज था कि कीमत उसकी मनमुताबिक नही होगी लेकिन चुनावी गोलबन्दी मे प्रधान के पक्ष से एतना हेलमेल हो गया था कि उसको लगा जादे मोलतोल करने मे हिनाई होगी और थोड़ी ना नुकुर के बाद बकरा देने को राजी हो गयी।

तो अगले दिन भोर मे बकरा प्रधान के दरवाजे पर पहुंच गया । प्रधान ने भी गांव वालों को बकरा खरीदने की बात बताई और बरसातू ने भी बेचने की बात कही । भोज हुआ लेकिन बरसातू नही गया क्योंकि बकरे से उसको ममता हो गयी थी।

 प्रधान को भी अपने गोल को इसी बहानंे उपकृत करना था नही तो आज के जमानें मे कौन बिना किसी मतलब के उसके पक्ष मे खड़ा होकर दहलेंगई बतिआएगा।

दहलेंगई मतलब समझते हैं इसका मतलब होता है कि सच बात पर तो सब्बे लोग मनमार कर हां.....हूं कर देते है लेकिन झूठ्ठो बात पर जो ललकार कर हुंकारी पारे उसको दहलेंगई कहते हैं। सबको ऐसे लोग ही चाहिए चाहे प्रधान हो या प्रधान मंत्री।

5.

  इधर फिर महीना खांड़ बीतते बीतते सुनार का तगादा फिर आने लगा औरइमिरितिया बरसातू से तगादा करने लगी। अपनी बात कटते देख कर उसका गुस्सा आसमान पकड़ रहा था।

  पैसे की बात तो उसके दिमाग मे बरहो बखत घूम रही थी लेकिन जब बरसातू मुह नही खोल रहा था तो वो भी अन्दाज रही थी कि दाम मिलने पर खुद ही उसको आदमी पैसा थमा देगा।

  इधर प्रधान ने बरसातू को तागीद किया था कि मुकदमे मे गवाही की बात और बकरा मुफ्त मे देने की बात खुलने न पाए नही तो केस बिगड़ जाएगा।

  अब बरसातू दोहमस मे था का करे, सुनार का पैसा भी देना है और बकरे का दाम भी नही लेना है। अब वही सूदखोर सहारा थे, जिनसे लाख जतन करके बचता आया था।

  लेकिन चार-पांच हजार रुपया और उसका सूद चुकाने के नाम पर झुरझुरी आ रही थी उसको। रोजही का मजूर कितना खाएगा कितना बचाएगा।

  ले दे कर एक बछिया रह गयी थी जो इमिरितिया के सेवा जतन से दो महिने पहले गाभिन हुई थी। एक रात बड़ी हिम्मत करके उसने मेहरारु से सारी बात बताते हुए मिन्नत किया कि इसकी कानो-कान खबर नही होनी चाहिए।

   हफ्ता दिन बीतते बीतते बछिया का दाम लग गया। नाद, चरनी सूनी हो गयी और वो सार्वजनिक जमीन भी खाली हो गयी। अब इमिरितिया अपने पति से झगड़ा होने पर अपने मृतक ससुर का नाम लेकर कोसना भूल गयी है।

 

 

  

  

 

 

बम्बई में का बा बनाम बिहार में का बा

 


              कोरोना त्रासदी की रचना्त्मक अभिव्यक्तियां विभिन्न प्रकार के माध्यमों से लोकप्रिय हो रहीं है। जिसमें आजकल एक चर्चित रैप बम्बई में का बा भी काफी लोकप्रियता प्राप्त कर रहा है। अनुभव सिन्हा द्वारा निर्देशित और मनोज बाजपेयी द्वारा अभिनीत यह रैप चन्द घण्टों में ही हिन्दी पट्टी पर छा गया मानो सड़क पर भूखे प्यासे घिसटते हुए घर वापस आए पूरबिया के आहत स्वाभिमान पर मरहम लगा गया।

 

  इस रैप में पुरबिया ने वर्गफुट में घमण्ड करने वालों को बताया कि हमलोग बिगहा (जमीन के क्षेत्रफल की एक देशज इकाई जिसमें एक बीघे या बिगहे में लगभग 17452 वर्गफुट होता है) में अपना घर दुआर रखते हैं। यानि इस रैप का नायक उस बिहार का प्रतिनिधित्व नही कर रहा है जहां के ग्रामीण क्षेत्र में 65 प्रतिशत परिवार भूमिहीन है अपितु यह नायक बिहार के उस हिस्से का प्रतिनिधित्व करता है जिसके पास इतना भूगोल है कि वो महानगर में वर्गफुट में जीने वालों की खिल्ली उड़ा सके। सामाजिक संरचना में यह हैसियत बिहार और उत्तर प्रदेश में  पूर्वाचंल के सवर्ण और ताकतवर पिछड़े समुदाय से आने वाले उस विपन्न  युवक की है जिसकी सारी प्रतिभा और क्षमता का महानगर ने दोहन कर उसको निष्प्रयोज्य जूठे खाली बर्तन की तरह फेंक दिया है और इसे बस हवा में उड़ते–उड़ते किसी पालीथिन के थैले की तरह किसी गटर में अटक कर सड़ांध को और विस्तार देना है। इसके पास बिहार में थोड़े कम में लेकिन स्वाभिमान से जी लेने की सम्भावना है लेकिन उसके सपनों को उड़ान मुम्बई ही दे सकती है। यह युवा बिहार में जी नही सकता है और मुम्बई में मर नही सकता है। यह जब मुम्बई पहुंचता है तो उसको पूर्वाचंल और बिहार में छूट गयी सामाजिक पूंजी याद आती है और जब बिहार पहुंचता है तो यहां की सामाजिक जकड़न और आर्थिक गतिहीनता के बरक्स उसके सपनों में मुम्बई झिलमिलाती है।

              इसी के समानान्तर एक नवोदित गायिका द्वारा गाया गया एक रैप बिहार में का बा भी लोकप्रियता बटोर रहा है। यह भी बिहार के सम्भावना विहीन भविष्य, मर्दवादी अपसंस्कृति और बर्चस्ववादी राजनीति में घुटते युवाओं का दर्द है। यह गीत कमजोर सामाजिक आधार वाले उसी बिहार और पूर्वाचंल के गांव के दलितों कमजोर पिछड़ों और महिलाओं के संत्रास को बयान करता है। जिसके पास अपनी ही जन्मभूमि पर अपने पावों के नीचे खड़े रहने भर की भी जमीन नही है। यह दूसरा गीत बिहार के उस युवा का बयान है जिसको सभी राजनैतिक दलों ने स्वास्थ्य विभाग द्वारा मुफ्त में बांटे गए निरोध के गुब्बारों की तरह फुला–फुला कर बच्चों का खिलौना बना दिया और जिसकी नियति कुछ देर हवा में उछलते रहकर फट कर बिखर जाने के अलावा कुछ नही है।

              इस प्रकार ये दोनो गीत इस मायनें में एक विरल सांस्कृतिक घटना है कि इन दोनो गीतों ने बिहार की त्रासद राजनैतिक और सामाजिक पक्षों को एक दूसरे का पूरक बनकर उजागर किया है और शायद भोजपुरी यहां से पुर्नजन्म ले रही है जो अपने अश्लील और भौंड़े नायकों से मुक्त होकर गंभीर सामाजिक मुद्दों पर विर्मश का माध्यम बनेगी। 

 

सोमवार, 5 अक्टूबर 2020

मुस्लिम दुनिया के नास्तिकों के सपने


 

बीसवीं शताब्दी में गैर मुस्लिम विश्व के बहुत बड़े हिस्से में राज्य व्यवस्थाओं नें धर्म निरपेक्षता को एक नीति निर्देशक सिद्धान्त के रुप में स्वीकार किया था। इनमें से अधिकांश क्रूसेड की व्यर्थताओं से सीखे इसाई बहुल राज्य थे। इन देशों के अतिरिक्त लोकतांत्रिक प्रणाली वाले भारत और कम्यूनिष्ट प्रणाली वाले चीन जैसे विशाल देश भी धर्मनिरपेक्ष विश्व के भूगोल में सम्मिलित थे, जिसके कारण धर्मनिरपेक्षता सर्वस्वीकार्य मूल्य की तरह दिख रही थी।

यद्यपि भारत और चीन कृषि आधारित जीवन प्रणाली वाले पिछड़े राज्य थे फिर भी इनके नेताओं ने अपने समाजों में धर्मनिरपेक्षता की स्वीकार्यता स्थापित कराया और राज्य व्यवस्थाओं को एक हद तक धर्मनिरपेक्ष आधार पर क्रियान्वित किया। इसका सुपरिणाम यह निकला कि इन राज्यों से निकले प्रवासियों ने यूरोप और अमेरिका जैसे समृद्ध और आधुनिक मुल्कों के नागरिको के कदम से कदम मिलाकर इन आधुनिक मुल्कों में सफलता के नए मानदण्ड स्थापित किए।

इस धर्मनिरपेक्ष विश्व के बाहर एशिया और अफ्रीका के बड़े हिस्से में स्थित मुस्लिम जगत में आधुनिक सुविधाओं का उपभोग करते हुए १४सौ साल पुरानी दुनिया की धार्मिक मान्यताओं में अपना आर्दश ढूढ़ने वाली राज्य व्यवस्थाएं येनकेन प्रकारेण सत्ता में बनी रहीं। इन सत्ताओं ने जहां अपने समानधर्मी नागरिकों की स्वतंत्रता पर कई किस्म की पाबन्दियां लगाए रखीं वही इन्होने अपने ही मुल्क में सदियों से रह रहे भिन्न धर्मी नागरिकों, स्त्रियों को संवैधानिक रुप से द्धितीय श्रेणी का नागरिक बनाए रखा। इन राज्य व्यवस्थाओं के लगातार टिके रहने के कारण हजार और बहाने दस हजार हो सकते हैं लेकिन यह विडंबनापूर्ण वास्तविकता है कि मुस्लिम जगत की बंजर भूमि में धर्मनिरपेक्षता और लोकतंत्र जड़ नही जमा सका। मुस्लिम जगत के नागरिक अगर आधुनिक विश्व में कहीं गए तो वहां भी उनके अधिकांश हिस्से ने अरबी कबीले के सांस्कृतिक प्रतिनिधि के रुप में ही रहना पसन्द किया।

धर्मनिरपेक्षता के पक्षधरों में काफी समय तक यह विश्वास था कि धीरे–धीरे मुस्लिम जगत स्वयं आधुनिकता के मूल्यों को स्वीकार करेगा। इस विश्वास के कारण उन्होने मुस्लिम जगत द्वारा रुढ़िवादी मूल्यों को अपनाए रखने की हठधर्मिता से उपजने वाली प्रतिक्रियाओं की तरफ से आंखे मूंदे रखा। यही नही जिसने भी इस दिशा में उंगली उठाई उनके उपर फासिस्ट होने जैसे तमाम आरोप उछाल दिए। दूसरी तरफ धर्मनिरपेक्षता के पक्षधरों की इस कार्यवाही से मुस्लिम जगत ने खुद को विक्टिम मान लिया और उनके अन्दर यह भाव पैदा हुआ कि उनसे एडजस्ट करने की सारी जिम्मेदारी आधुनिक समाज की है, वो तो इस दुनियां में बस जन्नत की तैयारी करने के लिए हैं।

धीरे–धीरे इक्कीसवीं सदी के प्रारम्भिक दशक में आधुनिक मूल्यों वाले समाज की आंखों के सामनें भिन्न प्रकार की वेशभूषा, दोयम दर्जे की नागरिक स्त्रियों और धार्मिक कर्मकाण्ड में जीने की जिद के साथ ही उदार मूल्यों वाले समाजों की सारी सुविधाओं का लाभ उठाने वाली धूर्तताएं धीरे–धीरे  स्पष्ट होने लगी।

इस हठधर्मिता का दुष्परिणाम यह निकला कि इग्लैण्ड, फ्रांस, डेनमार्क, स्वीडेन, अमेरिका जैसे उदार समाजों और राजनैतिक व्यवस्थाओं वाले देश के नागरिकों ने मुस्लिम जगत को ज्यादा यर्थाथवादी ढंग से डील करनें के लिए उदार धर्मनिरपेक्षतावादी राजनैतिक धारा के बजाय यर्थाथवादी दक्षिणपंथ की तरफ देखना पसन्द किया। उदार धर्मनिरपेक्षतावादी दलों ने यूरोप की मजलिसों मे शरिया कायम करने की तकरीरों, इंग्लैण्ड में हजारो गोरी बच्चियों का यौन शोषण करने वाले के ग्रूमिंग गैंग के कारनामे जिसके ९९ प्रतिशत सदस्य पाकिस्तानी मुस्लिम थे या अमेरिका में न्यूर्याक के ग्राउण्ड जीरो की जमीन खरीद कर इस्लाम की फतह के स्मारक की मस्जिद बनाने के अभियान जैसी अनेक घटनाओं को अनदेखा किया। जिसकी प्रतिक्रिया में इन लोकतांत्रिक देशों में बहुसंख्यक समाज में दक्षिणपंथी राजनीति का जनसमर्थन बढ़ना ही था।

एक पार्टी प्रणाली वाले चीन ने तानाशाही तरीके से धार्मिक शिक्षा में आवश्यक संशोधन करके पुनः प्रशिक्षित कर मुस्लिमों को आधुनिक मनुष्य बनाने की एकतरफा कार्यवाही किया है जिसका सुपरिणाम या दुष्परिणाम आना शेष है। चीन जैसी एकाधिकारवादी सत्ता के पास यह प्रयोग करने का विकल्प है।

भारत जैसे लोकतांत्रिक परम्पराओं वाले विकासशील देश के पास राजनैतिक विकल्पों में एक तरफ वामोन्मुख राजकीय समाजवाद के साथ बोनस में अल्पमत सांम्प्रदायिकता है तो दूसरी तरफ दक्षिणपंथी कारपोरेटवाद के साथ नत्थी बहुसंख्यकवाद है। बहुसंख्यकवाद उसका वर्तमान नष्ट करने में सक्षम है तो अल्पसंख्यक सांम्प्रदायिकता में भविष्य की भयावह सम्भावना दिखती है। हम वर्तमान में जिस डर से डील कर रहे होते हैं उसकी उसकी भयावहता भविष्य के काल्पनिक डर से कम होती है और यही मनोदशा भारत का सामान्य बहुसंख्यक की है।

भारतीय बहुसंख्यकों के बीच यह प्रभावी धारणा है कि मुस्लिम अल्पसंख्यक किसी भी देश के उदार संवैधानिक प्राविधानों को रणनीतिक रुप से इस्तेमाल करते हैं लेकिन उनका इसमें विश्वास बिल्कुल नही होता है। भारतीय बहुसंख्यक के सामने इस्लामिक स्टेट का माडल प्रमाण के रुप में उपलव्ध है जिसको यूरोप, अमेरिका के पढ़ेलिखे मुस्लिम नौजवानों और छिटपुट कुछ पढ़ेलिखे भारतीय मुस्लिम नौजवानों का भी समर्थन प्राप्त था। इस्लामिक स्टेट ने धार्मिक विश्वासों के आधार पर गैर मुस्लिम युवतियों को यौन दासी के रुप में इस्तेमाल करने, हाथ पैर सिर काटने जैसी बर्बर कार्यवाहियां की, जिसको पढ़ेलिखे मुस्लिम समुदाय के मौन समर्थन की तरह प्रस्तुत किया गया।

भारतीय बहुसंख्यक विश्वास करता है कि कश्मीर में सरकार का दमन प्रतिक्रिया में है और कश्मीरी उग्रवाद सिर्फ उस राज्य के बहुसंख्यक मुसलमानों की धार्मिक लड़ाई है, जो लोकतंत्र और आधुनिकता के विरुद्ध है और गजवा–ए–हिन्द का एक पड़ाव मात्र है। भारतीय धर्मनिरपेक्ष दलों के पास इसका कोई काउण्टर नैरेटिव नही है। इन धर्मनिरपेक्ष दलों के पास हिन्दुओं की जातीय संरचना में अगड़े–पिछड़े का समीकरण, अल्पसंख्यक वोट और एण्टी इन्कैम्बेन्सी का सहारा है जिसे साधकर चुनाव का अंकगणित हल कर लेगें है। कोढ़ में खाज यह है कि अल्पसंख्यक वोट पाने के लिए ये धर्मनिरपेक्ष दल रुढ़िवादी मुस्लिम नेतृत्व को प्रश्रय देते रहे है जिनके दबाव में मुस्लिम कठमुल्लावाद से लड़ रही तस्लीमा नसरीन जैसी लेखिका को उस बंगाल में रहने के लिए एक घर नही मिल पाता है जिसके लिए कोलकाता मौसी के घर जैसा था। भारतीय धर्मनिरपेक्ष दलों के इस प्रकार के तमाम दोहरेपन को भारतीय बहुसंख्यकों के मानस में यह बात बैठा दिया है कि ये धर्मनिरपेक्ष दल वोट के लालच में मुस्लिम रुढ़िवादिता को प्रश्रय दे रहे हैं।

संचार माध्यमों की उपलव्धता से भारतीय बहुसंख्यक के समक्ष भारतीय मुस्लिम में एक अंतराष्टªीय छवि विकसित हुई है। जिसमें उसके पड़ोस में रहने वाला अपनी रोजी रोटी में बेहाल सामान्य गरीब मुसलमान भी किसी अरबी या इस्लामिक स्टेट जैसे कट्टर धार्मिक गिरोह का भारतीय प्रतिनिधि है, जो किसी कमजोर और निर्णायक समय में उनके दुश्मन के साथ होगा।

यद्यपि गैर मुस्लिम विश्व, मुस्लिम जगत में धर्मनिरपेक्ष राजनीति को विकसित करने में असफल रहा है लेकिन ऐसा नही है कि मुस्लिम समाज जड़वत है तथा उनके अन्दर किसी प्रकार की हलचल नही है। जब से सोशल मीडिया ने राज्य समर्थित मीडिया के एकाधिकार को कमजोर किया है इन रुढ़िग्रस्त बन्द समाजों में सेंध लग गयी है। इन देशों के वैज्ञानिक सोच वाले सामाजिक कार्यकर्ताओं ने अपने समाजों के धार्मिक विश्वासों और सामन्ती सत्ताओं के विरुद्ध बिगुल फूंक दिया है। इन नास्तिक प्रचारकों का घोषित लक्ष्य अपने राज्य को धर्मनिरपेक्ष बनाने के लिए जनमत तैयार करना है। पाकिस्तान के दसियों नास्तिक नागरिकों द्वारा यू–ट्यूब चैनल चलाए जा रहे हैं जिसमें लगातार धार्मिक रुढ़ियों की लानत मलामत की जाती है। इसी प्रकार फ्री–थिंकर्स के बहुत से पेज है जिनको सरकार लगातार प्रतिबंधित कराती रहती है लेकिन वे जिन्दा होते रहते हैं। इन फ्री–थिंकर्स का आंकलन है कि पाकिस्तान में नास्तिक नागरिकों की संख्या लगभग २ करोड़ है। बताया जा रहा है कि गैलप के आंकलन के अनुसार ईरान में नास्तिकों का प्रतिशत २० से ३० है। इसी प्रकार भारत बाग्लादेश में भी मुस्लिम नास्तिकों ने यू–ट्यूब चैनल शुरु किए हैं। अपना अस्तित्व दांव पर लगाकर इस्लामी रुढ़िवादियों के विरुद्ध लड़ने वाले ये अल्पचर्चित योद्धा यह अच्छी तरह से जानते हैं कि उनकी लड़ाई कई दशकों तक लड़ी जानी है और धर्मान्धों द्वारा उनकी या उनके परिजनों की हत्या होने पर किसी समूह या राजनैतिक दल द्वारा एक कतरा आंसू भी नही बहाया जायेगा फिर भी गैलिलियो के ये साधनहीन वंशज पूरी दिलेरी से लड़ते हुए मुस्लिम जगत को लोकतांत्रिक धर्मनिरपेक्ष समाज में बदलने का सपना देख रहे हैं। लोकतांत्रिक और धर्मनिरपेक्षता में विश्वास करने वाले जाग्रत नागरिकों को क्रूर धार्मिक सत्ताओं के विरुद्ध लड़ने वाले इन बहादुरों के प्रति अपना दायित्व नही भूलना चाहिए क्योंकि इनकी सफलता ही शेष विश्व में धर्मनिरपेक्षता और लोकतंत्र को स्थायित्व दे सकेगी। खुली आंखों से देखे जा रहे इन सपनों को सलाम।              

 

जेन जी के द्वन्द

सुबह उठकर चाय बनाने के लिए फ्रिज से दूध निकालते समय देखा कि दूध पर मलाई की एक मोटी परत जमी है, जिसको निकालकर अलग एक बरतन में रखा जिसमें लगात...